Friday, December 12, 2008

विनोदधन..


बेचैनियां बमबरसाती विमानों की तरह आसमान में सत्रह दिशाओं में दौड़ती क्‍यों नज़र आती हैं? किसी एक अकेली तितली की तरह फूलों पर सुस्‍ताती मिलती? बेचैनी का एक लघुकाय-मासूम दृश्‍य होता, बमबारियों का बारोक, बीहड़-लाचारियां न होतीं.. मगर तिरे प्‍यार में कितने तन्‍हां रहे, ऐ सलम की ससुर तन्‍हायी, इकलौताई कहां मिलती है.. सिंगुलर दृश्‍य कहां, थोकमार्केट के होलसेल दृश्‍यबंध ही मिलते हैं..

कड़वाहटसना मैं अब चुप ही रहता हूं, आगे की कहनी विनोदधन साहित्‍यरतन की ही कहता हूं:

“दृश्‍य में एक देहाती स्‍टेशन आ रहा था. और एक पैसेन्‍जर रेलगाड़ी आ रही थी कि देहाती स्‍टेशन का दृश्‍य रेलगाड़ी में बैठकर आ रहा था. इसके पहले जो रेलगाड़ी आयी थी दृश्‍य का काफी हिस्‍सा उसमें आ चुका था. एक यात्री उतरता तो एक दृश्‍य की तरह उतरता. एक यात्री एक दृश्‍य की तरह चढ़ता. बूंदाबांदी एक दृश्‍य की तरह हो जाती. धूप का निकलना एक दृश्‍य की तरह होता. दृश्‍य की भरमार थी. दृश्‍य में एकरसता कभी नहीं थी. परन्‍तु लगता था देहाती स्‍टेशन का दृश्‍य यहां हमेशा के लिए उतर गया हो.”

अब सुखसंसार की सुनें:

“सुख भविष्‍य के बहुत नज़दीक नहीं होता. दु:ख का वर्तमान इतना लम्‍बा, नुकीला होता है कि भविष्‍य में उसकी नोक घुसी होती. ऐसा कम होता है कि दु:खी हुए और चार मिनट बाद सुखी हो गये. सुख थोड़ा लचीला होता. इतना लचीला कि पांच मिनट के सुख को खींच-खींच कर किसी तरह ग्‍यारह मिनट तक ले आये. बारहवें मिनट में सुख के टूट जाने का डर होता. दु:ख से पीछा छुड़ाना मुश्किल होता.”
विनोदकुमार शुक्‍ल के उपन्‍यास ‘खिलेगा तो देखेंगे’ (आधार प्रकाशन, 1999) से साभार.

3 comments:

  1. यह क्या तो विरल कथाकार है और क्या विरल है इसकी कथा कहने की अद्वितीय अदा। आपने मार्मिक अंश चुने। यह विरल कथाकार इसी उपन्यास में कहता है कि चीजों को उसी तरह के साथ उसके अलावा भी देखने का अभ्यास होता था। पत्नी को पत्नी के अलावा देखने के अभ्यास के लिए उससे और प्रेम कर लेना था।
    विनोदकुमार शुक्ल की कथाएं उसी तरह से लिखी जा रही कथाअों को उसके अलावा भी देखने के अभ्यास से पैदा हुई कथाएं हैं इसी तरह वे कथा को कथा के अलावा देखने के अभ्यास के लिए उससे और प्रेम कर लेते हैं।

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  2. आप्ने सिगरेट छोड दी लगता है किताबो के साथ नजर आ रहे है !! वैसे दुख से पीछा छुडाने का एक ही विकल्प है दुख को स्वीकार कर लो स्वीकृती ही शांती की सिढी है !!

    उल्लेखीत अंश काफ़ी अच्छे है !!

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