Tuesday, December 30, 2008

गुडलक एंड गुडबाई..

पुराना साल जा रहा है. वक़्त हुआ था जायेगा ही. जिन्‍हें जाना होता है, हमारे-आपके जैसे हेंहें-ठेंठें करते रहते हैं, वे चुपके से निकल लेते हैं. अगस्‍त के महीने हम दुनिया में आये, क़ुर्रतुल आपा पिछले साल इसी महीने निकल लीं. शायद हमारी मसखरी उनसे और झेलना न हुआ. ताज़्ज़ुब की बात नहीं, कभी-कभी हमसे भी नहीं होता. अब याद करके तक़लीफ़ हो रही है कि गयीं. हिंदी सभ्‍य व स्‍वस्‍थ समाज होता तो उनकी लिखी हर चीज़ उनके गुज़र चुकने के इस एक वर्ष की अवधि में अबतक एक जगह कहीं मुहैय्या होती. मगर हिंदी पाठकों की नहीं, प्रकाशकों व सरकारी खरीद की सहूलियत का प्रकाशन- संसार है. तो उनके लिखे की कॉपीराइट जेब में लेकर टहल रहे कहीं धूप ले रहे होंगे, दीवार पर पान की पीक दे रहे होंगे; अचानक मौका निकल आये तो शब्‍दों की दलाली की कमाई खानेवाले नौजवान हैसियतखार ‘आह’ और ‘ओह’ का मौज़ूं समां बांधते तालकटोरा से तृप्तिमार्ग के बीच भले गाल बजाते घूमते फिरें, फ़ि‍लहाल उन्‍हें याद, व चिंता नहीं होगी कि क़ुर्रतुलऐन हैदर के आत्‍मकथ्‍य, सफ़रनामे उर्दू से हिंदी में अभी भी आने बाकी हैं, पता नहीं आयेंगे भी? एक उपन्‍यास ‘गर्दिशे रंगे चमन’ कभी आया था, जाने कैसा अनुवाद था, बहुत समय से वह भी सर्कुलेशन में नहीं है.

ख़ैर, मालूम नहीं है अच्‍छा है या नहीं कि मैं इस तरह भावुक हो रहा हूं. आपा रहतीं तो शायद न होतीं. ‘चांदनी बेगम’ के एकदम शुरुआती पैरा में ही, उपजाऊ मिट्टी की खुशहाल ज़िंदगी की तारीफ़ करते-करते आपा कह जाती हैं: ‘भुरभुरी मिट्टी के अंदर केंचुए अपने काम में लगे रहते हैं- सारी उम्र अपने काम में मसरूफ़. ख़ैर, केंचुओं की क्‍या उम्र और क्‍या ज़िंदगी..’ कहते-कहते कहां से क्‍या, और किस अंदाज़ से कह जाने का सलीका कोई आपा से सीखे. कहीं आगे अचानक एक टुकड़ा आता है: ‘सारे इंसान मुहरबंद लिफ़ाफ़े हैं. कोई एक-दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानता. बंद पार्सल. दमपुख्‍त हांडियां. कुछ पार्सलों के अंदर टाईम-बम रखे (होते) हैं.’

एक नन्‍हीं चिड़ि‍या गरदन मोड़ अपने पंखों के बीच कुछ ढूंढ़ती फिरेगी. एक नर्स हॉस्‍टल के गलियारे में खड़ी जाने किस चीज़ को ढूंढती सांझ का धुंधलका तकती होगी. मां सोचती होगी इतना समय हुआ बेटे के सपनों में जाने से बच रही हूं, कहां भटक रही हूं. मैं पाई-पाई जोड़ता सोचता बैठता होऊंगा कि कुछ किताबें दिख तो रही हैं दीवानगी जगाने को: “Other Rooms, Other Wonders”, “The Brief Wondrous Life of Oscar Wao”, “Curfewed Night”, उन तक पहुंच पाऊंगा? कब घर लाऊंगा? ओह, क़ुर्रतुल आपा, आप कहां हैं? कैसी हैं? आप होतीं तो भागा-भागा शायद इसी, किसी बहाने नोयेडा आपके हुज़ूर में पहुंचता? मगर जानेवाले कहां रुकते हैं? 2008 भी क्‍यों रुकेगा? वेल, गुडलक एंड गुडबाई.

यह क़ुर्रतुलऐन हैदर से उनकी ज़ि‍न्‍दगी के आख़ि‍री दिनों में हुई बातचीत का एक लिंक है. यह 'चांदनी बेगम' के छपकर आने के बाद बीबीसी के परवेज़ आलम से हुई उनकी मज़ेदार बातचीत का ऑडियो लिंक रहा..

चलते-चलते, आपा की ज़हीन-हसीन आवाज़ की संगत में हमारे एक पुराने ऑडियो- ऑडपोस्‍ट को चेंपना क्‍या किसी तरह संगत होगा? मगर, फिर क्‍या मालूम, ऐनी आपा होतीं तो कहतीं हमारी हसीन महफ़ि‍ल में तेरे केंचूकास्‍ट को लेकर क्‍या इतना बिसुरना, चल, बज जाने दे.. बहा अपनी बयार, खा हमारा कपार?

और चलते-चलते कोई बंधु यह भी बताता चले कि लाईफ़लॉगर में अटके अपने पॉडकास्‍टी भटके प्‍लेयर को हम अन्‍यत्र कहां, कैसे प्राप्‍त करें. या पॉडकास्‍ट-निर्वासित ही रहें?

3 comments:

  1. किताबें ही संवारेंगी हमें मित्र...किताबें ही उभारेंगी...डूबते - उतराते जाने से...इन्हीं संगियों को समर्पित हैं हमारी आनेवाली कई सदियां ... बीती एक सदी में जो इन्होने मुझे पाला-पोसा उसका शुक्रिया किए देता हूं...आपकी ओर से भी कर दूं ?
    अच्छी पोस्ट...

    ReplyDelete
  2. @सही अजीत भाई,
    किताबों की एक चांदनी तान लें? भोपाल, और जाने कहां-कहां, कैसे बेतुके अकाल, और बंबई के बीच के दरमियान पसरे घाम को थाम लें?

    ReplyDelete