Saturday, December 27, 2008

कुबरन के क़ि‍स्‍से..

मालूम नहीं सैदनपुर वास्‍तव में कोई जगह था.. गुंबद, मीनार, मुरझाये घास और बांस के झाड़ों घिरी सूनी- धीमे-धीमे गुज़र रही आंखों देखी अंसारियों की वह कोई असल हवेली थी.. या वह धूमिल, उजाड़लोक कल्‍पना के उनींदे बियाबान से मैंने खुरच-खुरचकर यूं ही बाहर कर लिया था..



खरखराती आवाज़ों के गुमसुम सन्‍नाटे में गली से बाहर लालटेनबत्‍ती की टिमटिमाती रोशनी में कोई सियाह साया बाहर आता दीखता तो हड़बड़ाकर जैतून मियां के ओसारे की दीवार के पीछे छुप जाने से अलग जान बचने की कोई सूरत न होती..



मगर शैतान की मनहूस आंखें पीछा थोड़े छोड़तीं?..



बांस की झाड़ के आगे दांतों पर सुरती रगड़ने की तैयारी करते जैतून मियां फुसफुसाते शैतान-फैतान कुछ नहीं, कुबरन का कसाई मंगेतर है, उन्‍नाव में कवनो फौज़दारी के मुकदमे में उलझाव होय गयी रही, ऊंहवा से भागकर आये हैं..



कुबरन का मंगेतर? सच्‍ची में ताज़्ज़ुबवाली बात नहीं थी कि अकेली पड़ी बड़कन बेगम के दुखियारे दिनों की नौकरानी- न देखे में न सुने में- कुबरन इस बुढ़ौती में अपने बास्‍ते मंगेतर ढूंढ़ लायी थी?..



(स्‍केचेस को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकियाकर दूसरी खिड़की में देखें)

8 comments:

  1. स्कैच से ज्यादा सजीव भाषा लगे
    तब लेखक के हुन्नर को
    ढेरोँ सलाम कहना ही सही है -
    बहुत खूब प्रमोद भाई -

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  2. @लावण्‍याजी,
    ओह, हमारी चिचरीकारी को पीछे धकेल आपने कुबरन की आंखों के आगे हमारा दिल तोड़ दिया?

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  3. अरे ऐसी गुस्ताखी हम कैसे करते ? अब जो सच है कह दिया --

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  4. चलिये, इसी बहाने पता चला- अपने छोर का सच हम भी कह लें- कि आपसे मज़ाक नहीं किया जा सकता.
    लेकिन ये बताइये, आपकी पड़ोसन, या पड़ोस की ग्रोसरन से भी नहीं किया जा सकता?

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  5. प्रमोद भाई ,
    मेरी एक पडौसन बाँग्लादेशी महिला है जो अँग्रेजी ही बोलती है और दूसरी है एक यहूदी ७८ वर्ष की
    (जिसे मैँ अम्मा कहती हूँ) -
    दोनोँ ही हमेशा,
    मुस्कुराती हुई मिलीँ हैँ -
    ग्रोसरनेँ हमेशा अलग ही देखी है- जिस बच्ची को फीस जुटानी हो वह काम करती दीखलाई दे जाती है -
    ("अमरीकन ड्रीम" के सपने
    कडे सँघर्ष से पूरे किये जाते हैँ)
    खैर !
    मेरा कहने का मकसद यही है कि, आप बहुत उम्दा लिखते हैँ
    कई दफे टीप्पणी नहीँ कर पाये
    पर जब भी पढते हैँ
    कुछ नया ही पाते हैँ
    हमारी बहुत सी शुभकामनाएँ आपको और आगामी नव वर्ष २००९ के लिये भी -
    - लावण्या

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  6. स्केच भी सुंदर और कथा ने उन में जान डाल दी है। लगता था 30 साल पहले की कोई कथा पत्रिका पढ़ रहा हूँ।

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  7. शानदार ! हवेली की बुर्जी और जैतून मियाँ की शकल .. लालटेन , साईकिल और छत पर कोंहड़ा, कसाई का कसाईपन ... सब ! सचमुच शानदार .. ग्राफिक नोवेल्ला की उम्मीद रखें ?

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  8. @परलक्ष्‍या जी,
    भगवान के लिए अब इतना, और कितना शानदार भी नहीं है, ऐसे ही हाथ डुलाते हुए ग्रा‍फ़ि‍क नोवेलाज़ लिखे गये तो वह मायापुरी के मायालोक से कहीं ऊपर जायेंगे?

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