Friday, December 5, 2008

शाबास दिबाकर!

पिछले दिनों मुंबई में हुए आततायी हमलों के आगे राष्‍ट्रीय किंर्तव्‍यविमूढ़ता (ज़्यादा मूढ़ता) व सन्‍नीपातावस्‍था की कूंजी मीडिया-माहिर लोग अरब सागर से लेकर पाकिस्‍तान के बीच बहुत बिंदुओं पर खोजते रहेंगे, मैं उसकी कूंजी एक एवरेज़ बी-ग्रेड किच वाले डिज़ाईन में बनी हाल की ‘ओय लकी! लकी ओय!’ में देखकर सन्‍न हो रहा हूं.

हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍मों का, व हमारा बतौर दर्शक, दुर्भाग्‍य है कि वह हीरो-हिरोईन की टुटपुंजिया प्रेम-कहानियों को टेरती दम तोड़ देती है. दिबाकर बैनर्जी ने इससे पहले ठीक-ठाक ‘खोसला का घोंसला’ बनायी थी, ‘ओय लकी! लकी ओय!’ में अपने स्क्रिप्‍टराइटर उर्मी जुवेकर के साथ वह ठीक-ठाक कहानी कह लेने के अरमान जीने की जगह खौरियाये सांड़ की मुद्रा में हैं. कहानी महज़ लकी नामके एक चोर चरित्र के होने के, दिल्‍ली के बड़े परिदृश्‍य, व एक तरीके से हमारी समूची राष्‍ट्रीय मानसिक बुनावट में सींग घोंपती-घुसाती आगे बढ़ती है. चोर तो बेचारा एक औसत निम्‍न मध्‍यवर्गीय सिख परिवार का औसत भला-‘हूनरमंद’ अपने पैरों खड़ा हो गया बच्‍चा है, जो अपनी इच्‍छा-आकांक्षाओं में बहुत यप्‍पी भी नहीं हुआ- चोरी उसका पेशा है- मगर अपने छोटे सुखों में सुखी रहना जानता है. दिक़्क़त वह नहीं, उसके आसपास का तथाकथिक समूचा सभ्‍य परिवेश है. घर-परिवार, पास-पड़ोस, यार-दोस्‍त सब मुंह से जो भी ज्ञानभाव बकते रहें, सारी भक्ति व सब रिश्‍ते अंतत: अपना स्‍वार्थ व अपने धनसेतु को दुरुस्‍त करने की है. और अपने को साधते चलने का मूल्‍य, या लाचारी, जो कहें, ही सबसे बड़ा सत्‍य है, बाकी जगराते की बकवास है..

फ़ि‍ल्‍म देखते हुए- फ़ि‍ल्‍म में दिल्‍ली, व अपने समय की परतों में झांकते हुए- समझने में फिर परेशानी नहीं होती कि क्‍यों हम ऐसे हारे हुए लोग हैं. जो है पैसा है और उसे और-और पाने की तिकड़म व चतुराई है, उससे परे का समाज हमारे लिए साबुन की झाग है, इस्‍तेमाल की वस्‍तु है, या फिर लात खाने या लात लगाने की जगह है. यह बड़े शहर के निचले तबकों का यथार्थ है, ऊपरले तबके के यथार्थ पर आज सुबह मैंने एक्‍सप्रैस से विनय सीतापति का एक लिंक दिया था. ऐसे मुल्‍क के खाज कैसे भरेंगे? भर सकेंगे?..

आपके शहर में आयी और आकर गयी न हो तो आपभी एक नज़र दिबाकर रतन ‘ओय लकी! लकी ओय!’ पर मार लें, अपना मुल्‍क व समय बड़ा गाढ़े रंगों व अर्थों में पकड़ में आयेगा.

4 comments:

  1. मुल्‍क व समय को पकड़ने की बात है तो कोशिश करते हैं फिल्‍म पर एक नजर मारने की..

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  2. जरूर देखेंगे महाराज , जरूर।
    सीडी तो मिल जाएगी ना?

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  3. ओय लकी ओय देख डाली है ।
    सहमत हैं आपसे ।

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  4. ... फिल्म देखने का प्रयास किया जायेगा।

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