Saturday, December 27, 2008

गृहस्‍थी..

एक सचमुच का गिरहत्‍थ..



दूसरी बहकी मन की उड़ान..

4 comments:

  1. आपके पुराने फोटो का नया रूप रोचक है। और आपका, वह चाहता हूं... भी।

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  2. लीजिए जी, लाज छोड़कर फिर टिपियाता हूँ...। हे हे हे हे... लेकिन क्या लिखूँ हमतो आपको बूझही नहीं पाता हूँ।

    चलिए छोड़ूंगा नहीं जब तक बुझा न जाय... हे हे हे।

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  3. आपके बनाए स्केचेस भी ग़ज़ब हैं. वाह!

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