Sunday, December 28, 2008

फिर वही, कहीं दीप जले कहीं दिल टाइप..

जाने ब्‍लॉगर पर इन दिनों क्‍या चक्‍कर है कि पोस्‍टों की लिंक की एकदम ऐसी की तैसी किये हुए है. कहीं का लिंक कहीं चिपकाता चलता है. अदबदाकर दूसरे खुद को बचा भी ले जाते हों, मैं जाने कैसे चिपकता रहता हूं. आज निगाह गई तो लाल्‍टू के संजीदा-से पोस्‍ट पर मेरी एक पुरानी चितवन दीवार पर खड़ी हौंक रही थी, पढ़कर मन वैसे ही उदास हो गया जैसे किसी ज़माने में हमें प्रेमपत्र लिखनेवाली, मगर अब बेटी के लिए वर की खोज में वारंगल पहुंची धुंआती रूपसी को गोड़ पर ऑयोडैक्‍स मलते (मगर ज़रूरत के सब काम से बचते) देखकर अभी तो गुज़रे साल एक बार फिर हो गया था. हमने आह भरकर पूछा था हमारा डुयेट याद है? धुंआती रूपसी हंसकर गोड़ नहीं, ऑयोडैक्‍स छिपाते हुए बोली थीं अब गाना कहां गाते हैं अलबंग अंकिलजी?

एनीवे, मैं भी कहां का लिंक कहां क्‍यों चिपका रहा हूं, लाल्‍टू के यहां दीखा तो जाने किस पुरानेपन की स्‍मृति में भावुक हुआ, किसी और की पीठ की जगह अपनी ही दीवार को एक बार फिर से गंदा करने के मोह से बच नहीं पा रहा हूं, लीजिये, पढ़कर आप भी गंदा होइये..

1 comment:

  1. दूगो लिंको पढ़वा दिए - नीक किए ।

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