Sunday, March 30, 2008

जनता के एक महामहिम से एक लघु बातचीत..

श्री श्री सर्वेश्‍वर विमल सुकेसर प्रोफ़ेसर पांड़े जी गुणी ज्ञानी आदमी हैं.. अद्भुत मेधा पुरुष हैं, महा-महापुरुष हैं और जाने तो क्‍या-क्‍या हैं.. मगर इस सबसे ज़्यादा और सबसे पहले जनता के आदमी हैं.. बाबू पिरमोद कुमार गंगोली को उनसे सत्‍संग का एक संक्षिप्‍त अवसर प्राप्‍त हुआ, उसके पुष्‍प आपके समक्ष अर्पित किया जा रहा है.. दोष जो भी होंगे, बाबू पिरमोद के ही होंगे, क्‍योंकि विमल सुकेसर प्रोफ़ेसर पांड़े जी जनता के आदमी हैं और किसी भी तरह के दोष से मुक्‍त हैं.. तो लीजिए, यह ज्ञानात्‍मक, संवेदनात्‍मक, विवेचनात्‍मक, जनतात्‍मक विमर्श.. और लाभान्वित हों..

सरकलमख़ुद?.. क्‍यों?..

अनामदास की घबराहट समझदारों के समझ आयेगी, मगर किस डाक्‍टर ने कहा है कि हिंदी ब्‍लॉगिंग में समझदार लोग बसते हैं? या बसेंगे? बकलम-बकलम करते कुछ वडनेरकर टाइप भी चले ही आयेंगे और जैसाकि अनामदास ने कहा ही, सिर कलम करवाने की ज़ि‍द से बहुतों का खाना और जाने क्‍या-क्‍या हराम कर जायेंगे! फिर भी लोग बेशर्म हैं मुस्‍करा-मुस्‍करा के फ़ोटो खिंचवाये जा रहे हैं, इतने से खुश नहीं हैं ऊपर से क़ि‍स्‍से भी सुनाये जा रहे हैं!.. मानो स्‍कूल के सालाना फैंसी ड्रेस जलसे की रिहर्सल कर रहे हों.. जबकि सिर कलम करवाने की आशंका की जबसे मुझे ख़बर हुई है, मैं चेहरे पर रूमाल लिये टहल रहा हूं कि पता नहीं कौन असल को फैंसी से कन्‍फ़्यूज़ करके फ़ोटो उतार ले!.. कहने का मतलब घिग्‍घी बंधी हुई है.. और अजित बडनेरकर हैं कि शब्‍दों को समझ लेने का दावा करते हैं, मगर गरीब और सलीब की ‘सटल’ मुश्किल समझ नहीं रहे हैं?

मैं अनामदास सा धूर्त और खिलंदड़ा होता तो हाय-हाय वाली एक पोस्‍ट लिखकर सबकी सहानुभूति भी पा लेता और बडनेरकर की फरमाइश को बैठे-बैठे लंगी दे लेने का सुख लेता सो अलग! मगर मैं अनामदास नहीं.. ग़ुमनामदास भी नहीं.. और ऊपर मैंने पहले ही कह दिया कि हिंदी ब्‍लॉगिंग में समझदारों का आना कम हुआ है. तो अजित के इसरार में उलझकर मैं पहले ही ओखल में सिर दे चुका हूं.. और बडनेरकर ने सहर्ष ले भी लिया था!.. मगर फिर जाने फ़ोन पर विमल ने क्‍या उल्‍टी-सीधी सूतली पकड़ायी कि अजित बाबू ने निर्दोष भाव से मेरे सरकलम को विमल वर्मा का बकलमख़ुद बनाकर अपने ब्‍लॉग पर चढ़ा दिया! और हिंदी ब्‍लॉगजगत के लोग- जैसाकि उनकी नासमझी में स्‍वाभाविक ही है- उस पर दाद भी देते रहे.. और विमल जैसाकि बेशर्म वह है, लेता भी रहा? इसका लब्‍बोलुवाब यह कि हम अभी भी अपने हाथों अपना सिर लिये ओखल ताक रहे हैं.. और ताकने के साथ-साथ कांप भी रहे हैं!..

हद है. क्‍या बिना तीन-पांच के, बिना अपनी पीठ में छुरी घोंपे हमें एक कदम आगे बढ़ने का हक़ नहीं? मगर साथ ही यह बात भी है ही कि अपनी या किसी और की पीठ में छुरा घोंपने का मलाल बना रह जाये तो फिर वह खाक़ हिंदीब्‍लॉगिंग की दुनिया हुई! हालांकि विमल का मेरे जीवन का मसाला अपने नाम से जारी कर लेने के इस छोटे से अंतराल के बाद अब समय आ गया है कि मैं स्‍वीकार लूं कि स्‍वयं के संबंध में ढेरों तथ्‍य थे जिसको मैं दबाकर पी गया था! माने हिंदी में ‘अच्‍छी-अच्‍छी बातों का ब्‍लॉग’ की तर्ज़ पर अजित बाबू ने भी जोर नहीं दिया था कि अपने बारे में गंदी-गंदी बातें लिखकर मैं अपना मुंह काला करवाऊं, मगर उत्‍तर-आधुनिक यूरोपीय साहित्‍य के सहज संपर्क ने मुझे गहरी भ्रांतियां भी दे रखी हैं कि वह कैसा बकलमख़ुद हुआ जिसमें सिरकलमखुद न हुआ?..

जैसे मुझे यह समझ नहीं आता कि कैसे कोई पूरबिया समझदार आदमी अपने अस्तित्‍व के रहस्‍यवाद को सार्वजनिक प्रकाश में लाने की हठधर्मी करेगा. अस्तित्‍व का आ जाना ही पर्याप्‍त हठधर्मी न हुआ? अब उसके अनंतर उसके रहस्‍यवाद के साथ भी चीर-फाड़? हद है? लेकिन चूंकि मैं मौलिक हूं सो आपको बताता चलूं कि इन ऊलजुलूल हदों को पार करता कैसे मैं मां से रहस्‍यवादी सवाल करने से बाज नहीं आता था..

माने स्‍कूल की कापी या कलम के लिए पैसे मांगने पर उसके हाथ खड़े कर देने पर फिर चिढ़कर कह ही देता था कि यह सब पहले सोचना चाहिये था न? हमने नहीं कहा था हमें अस्तित्‍व में लाओ? मां ऐसे उत्‍तरों से हतप्रभ रह जाती थी, बाबूजी हतप्रभावस्‍था से बाहर रहकर लात छोड़ने लगते थे.. या गालियां! मेरे दोस्‍तों के लिए भोजपुरी में एक उनकी प्रिय गाली थी- ससुर, तोर महतारी के बियाह करूं! चूंकि ये गालियां न परम्‍परा-पोषित थीं न प्रयोगधर्मी.. ऐसे पारिवारिक संस्‍कार पाकर मैं भी वैसा ही बन गया.. माने न परम्‍परा का हो सका न प्रयोगी-उपयोगी प्रयोग का.. तो इसे विज्ञ व मूर्ख लोगों द्वारा नोट किया जाये कि मेरे अधकचरे बने रहने में मेरे बाबूजी की गालियों का विशेष योगदान रहा है..

दूसरे, चूंकि बच्‍चों पर पैसा खरचने के सवाल से बाबूजी मुंह चुराते थे, मैंने बहुत जल्‍दी मंदिर व अन्‍य सार्वजनिक स्‍थलों से चप्‍पल चुराने की कला सीख ली थी, और सीखे रहा.. मगर ये ऐसी बातें हैं जिन्‍हें किसी अजित या कुलजीत के इसरार पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता! पता नहीं लोग क्‍यों नहीं समझ रहे कि जिन-जिन स्‍कूलों (या कॉलेजों) में रहा, वे मेरे खिलाफ़ चुराये व उड़ाये चीज़ों की एक लंबी रिपोर्ट जारी कर सकते हैं, या वह लड़कियां जिनका जीवन मैंने चुराया (और अपना बुड़ाया)! इतनी और ऐसी ही जाने कितनी तो अन्‍य दूसरी क्रांतिकारी धांधलियां हैं, अजित बाबू क्‍या चाहते हैं सब प्रकाश में लाकर हम खुद को अंधेरे में डाल दें? सरकलमख़ुद करवा ही लें? अनामदास की घबराहट से, समझदार न भी हों, तो सबक न लें? पता नहीं क्‍यों मुझे बड़ा असमंजस महसूस हो रहा है..

(ऊपर की तस्‍वीर मेरी है, और अस्‍सी नहीं, नब्‍बे के दशक की ही है, लेकिन मुझे भय है कि उसे अजित फिर विमल की कहकर इस्‍तेमाल न कर लें?)

Saturday, March 29, 2008

रोज़ फुदुर-फुदुर..

लड़की हंसेगी चुपा जायेगी, मैं ठिठुराया ठंडे पानी से नहाकर निकलूंगा कि इसके बाद अब. फुदुर-फुदुर अकुलायी चिड़ि‍या घूम-फिरकर आखिर कहां जायेगी? जंगले से उड़कर खंभे के तार पर और अधबने छत की मुंडेर, टूटही चबूतरे पर मौसाजी के छोड़े अख़बार पर? आकाश अनंत नहीं होता जैसे रोज़ हम संत नहीं होते और कहनेवाले कहते होंगे लेकिन जो गिरे हैं पंक में जानते होंगे प्‍यार भी हमेशा पंथ नहीं होता. रोटी रोज़ मीठी होती होगी या हथेली पर गुड़ धरा मिलता होगा? कि झोले में चार कपड़े खोंसकर निकल जाने की सुगमता किताबों और फ़ि‍ल्‍मों से होकर जाने जीवन में कैसे आती होगी. और नहीं आती होगी तो जीवन विशद विषाद में सुगम लय-ताल कहां से पाता होगा? भागती हवाओं व उझरायी दिवाओं में कितने पत्र व पुस्‍तकों के पृष्‍ठ फड़फड़ाते छूटते छुटे रहते होंगे? और सांसें? सवाल. संझायें? कितनी पुस्‍तकों का मज़बूत कवच जीवन के झंझावात से पार पाने का सबल हथियार बनता होगा? या वह भी ख़ामख्‍वाह पढ़वैयों की दिलदारी होती होगी? महज पुस्‍तक-दरबारी? हिलगकर जीवन के पास फिर कैसे आना होता होगा? चह‍कते ठुमकते हुए फिर नया कुछ जान लेना. बताना?

Friday, March 28, 2008

सांझ को मोटे तारों में मद्धम..

जंगले की जाली में फंसी उंगली होगी, या हारा झूलता हुआ हाथ. अटक-अटककर बताओगे ज़रा-सी, ज़्यादा रहोगे छुपाये- बात. भटकी आंखें सब बचाकर निकल जाना चाहेंगी दूर कहीं लेकिन हारके- बार-बार लौट आयेंगी वहीं नीचा तकतीं. जैसे उड़ने को व्‍याकुल चोट खायी चिड़ि‍या धरती पर उठती-उठती रह जायेगी पलटती. सांझ की हूक सी उठेगी बदहवास कुछ पतिंगे टकरायेंगे. कांपता कोई स्‍वर फुसफुसायेगा इस तरह जी छोटा करने का क्‍या मतलब, ओह, सबका अंत नहीं हुआ है- और खुद की ही सूखी फीकी हंसी में रीत जायेगा.

Thursday, March 27, 2008

मन मेरे..

झोंटों के उझराइल में कब तलक हौंड़ाये रहोगे, चिल-चिल धूप की नहाइल में, बालू गड़ें गोड़ की गड़ि‍याइल में? कब. कभी पलकों पर सरसराती, थरथराती बयार उतरेगी? छाती में उजियार? बरसेगी? कि सब बिछिलते, बहिते-बहिते दिन में रात और रात में झंझाबात जइसन बीतेगा?..

Wednesday, March 26, 2008

आर यू अ ट्रू भारतीय? आर यू श्‍युअर?..

आपका यह लगना कि चूंकि भोगौलिकता में आप भारत में हैं, आपके भारतीय होने का वास्‍तविक प्रमाण नहीं है. जैसे चंदामामा के बाजू में ‘सत्‍य के साथ मेरे प्रयोग’ की एक प्रति सजाकर मुग़ालता पाल लेना कि आप गांधीवादी हो लिए.. या तकिये के नीचे मनोहर कहानियां रखकर मनोहारी, साहित्यिक-संसारी होने का भरम?.. ऐसे उपयोगी प्रयोग किम्‍बा प्रयोगी उपयोग आपको क्‍लेश व कलुषता की ओर ले जायेंगे, भारतीय मार्मिकता किम्‍बा मर्मांतक भारतीयता की ओर तो कतई नहीं.. हो सकता है जीवन में ग़लत उपादानों की उपस्थिति आपको भारत में भी मोरक्‍कन किम्‍बा मैडागास्‍केरियन बनाये रखे.. विभ्रांतियों से दबाये रखे! मर्मांतक भारतीयता के लिए आपको जीवन में निर्दिष्‍ट अवयवों का ध्‍यान धरना होगा.. ध्‍यान ही नहीं, घर निर्दिष्‍ट अवयवों से भरना भी होगा! वे अवयय क्‍या हैं इसकी सूची नीचे जारी की जाती है टिल द स्‍टॉक लास्‍ट्स. गो एंड फिल यूअरसेल्फ!.. आई मीन यूअर हाऊस?

सबसे पहले घर के कोने-अंतरे जांचकर देखें ब्रांड बाटा का चप्‍पल है या नहीं. बाटा न हो तो केरोना.. या लखानी? तदोपरांत कॉलगेट.. या हिंदुस्‍तान लीवर का कोई साबुन.. लाइफ़ब्‍वॉय वुड बी द बेस्‍ट सॉल्‍यूशन! आपकी संदिग्‍ध भारतीयता के विरूद्ध ये बड़े स्‍पष्‍ट भारतीय उद्घोष हैं! घर में इनकी उपस्थिति से आप अपनी राष्‍ट्रीयता अश्‍योर कर सकते हैं. इसके बाद जांच करें घर में घोड़ा छाप माचिस है या नहीं.. या मोर छाप अगरबत्‍ती? कछुआ छाप कॉयल? प्‍लास्टिक की बाल्‍टी और स्‍टील की थाली आल्‍सो इज़ मस्‍ट. द सेम अप्‍लाइज़ विद् प्‍लास्टिक कुर्सी. ऑर कुर्सियां. एक नारियल की व दूसरी फूलदार झाड़ू हो. नारियल की चटनी न भी हो तो कम स कम नारियल का तेल हो फिर. या केयो कारपिन.. किम्‍बा आंवला शिकाकाई? बरनाल, बोरोलीन, बोरोसील, बोरोप्‍लस और इसी तरह के कुछ अन्‍य बोरो. व बोरे. ज़रूरी हैं.

दाद व खुजली से कुछ गुप्‍त रोगों की गुप्‍त दवा बाथरूम में कहीं इधर-उधर छुपाके ज़रूर रखी पड़ी हो. अमृतांजन. झंडू बाम. गणेशजी की फ़ोटो. हल्‍दीराम. अचार की दो किस्‍में दिखें. व्‍यभिचार वाले एक भी नहीं. अत्‍याचार संदिग्‍ध बना रहे. एनासिन, क्रोसिन जैसी कुछ दवाइयां हमेशा एक्‍सेसिबल रहें. खांसी का सिरप. रूह-अफज़ा. रूहे-तासीर अनुप जलोटा, पंकज उधास. बच्‍चों के लिए दिलेर दलेर. अमर चित्र कथा टाइप लिटरेचर. सम लिटिल चटाई. खटाई. खटिया एंड फोल्डिंग बेड. ए पलंग ऑल्‍सो मस्‍ट बी देयर. दॉ नॉट फोल्‍डेड.

सोना. गोल्‍ड. घर में होना ज़रूरी है. भले सौ ग्राम हो. दस तरह के ताले. कुछ छिपे हुए आले. आईना प्रचुर मात्रा में हो. शादी के वक़्त खिंचवाई तस्‍वीर. कोई बाबा प्रदत्‍त शांति. भ्रांति. इतनी सारी चीज़ें घर में ठेले रखिए फिर देखिए, कौन माई का लाल आपके भारतीय होने पर संदेह करता है! फिर भी संदेह करने से बाज न आये तो उसका समाधान सामान-संवाद नहीं हाथ और लात ही है?

Tuesday, March 25, 2008

एक फ़ार्मासिस्‍ट और दारु की दुकान के बीच कहीं.. कछुआ..

एक पुराने मोज़े की टेंट में क्‍या क़ि‍स्‍से होते होंगे? या उतारकर फेंक दी गयी कमीज़ के हिस्‍से? क्‍या सोचता होगा, कि किसी कोने पड़ा ख़ामोशी से अपने अंत की राह तकता होगा? या इस बात को तरसता कि कोई माचिस की तीली बालकर झटके में उसे खत्‍म क्‍यों नहीं कर देता? एक घड़ी जो वर्षों से पहनी नहीं गयी, एक बाजा जो बदलती ज़रूरतों में बेमतलब हुआ. एक खिलौना जो जैसलमेर की रुमानी मुहब्‍बत की याद था एक चुनरी जो..

मेज़ की अनछुई दराजों के पीछे, जाने कहां से खरीदकर लाये लिहाफ़ के नीचे, कहां-कहां छिपी होती है दबी पुरानियां. कहानियां? सहमी, सकपकाई, शायद अब भी किसी कोने थोड़ी उम्‍मीद सहेजे. उम्‍मीद और बिसराहटों के बीच इक ज़रा-सी ज़मीन भर तो होती है जहां जाने कब किस मिजाज़ से बे-लिखे उनकी किस्‍मत लिख ली जाती है. फिर कोई पुराना दोस्‍त उन्‍हें खोजने नहीं आता, कोई पुरानी याद दुबारा उनकी सोच पागल, कातर, बेबस नहीं होती!

पीठ पर सूखी कीच लिए अक्‍वेरियम से बाहर निकल आया हथेली भर का कछुआ घर के सूने-बीहड़ अंधेरों में खोजता है घर में अपने हिस्‍से की कहानी.

Monday, March 24, 2008

कैसे कटें रैन.. तोरे बिन.. किसना?..

होली बहाना रहा होगा, नानान आई थी. पिछले दो दिनों से अपनी कल्‍पनाओं व बीमारी में बिछावन पर हलकान होता सलोना, स्‍नेहसिक्‍त चेहरा सामने देखकर खुश होना चाहिए था, मैंने चिढ़कर कहा- अबे, तू अकेली आई है? व्‍हेयर इज़ यूअर मदर? मुझे सूप-टूप कौन पिलायेगा? बालों में हाथ कौन फेरेगा? गोद में गोड़ लेकर कौन दबायेगा? पूरा चीन ‘लेने’ पर पिला पड़ा है.. ‘देने’ की बात क्‍या तुमलोगों ने संस्‍कृति से उठा ही लिया है?..

नानान के आगे फैलना कवर-अप था, चिढ़ा तो मैं खुद से था. अपने महकते बाल, बिछावन, बसाइन चादर, बढ़ी दाढ़ी, दो समूचे दिनों की पस्‍त देह, मुंह का कसैला स्‍वाद चूंकि अब बात निकल ही गई थी, उसे थोड़ी दूर खींचे रहने, निकाल देने में हर्ज नहीं था. आं-बां करता, मसनद का सहारा लेकर किसी तरह देह ऊपर करता मैंने लड़की से शिकायत की- क्‍या-क्‍या नहीं किया मैंने उस औरत के लिए? मेरा सब पूण्‍य धोकर पी गई.. और देखो, बेटी के चेहरे पर गिल्‍ट की एक महीन रेखा तक नहीं?..

कमरे के तनावी बिखराव के बीच अपेक्षाकृत एक कम गंदा कोना झाड़-पोंछकर किसी तरह अपने बैठने लायक लड़की ने दुरुस्‍त किया, फिर सहज होकर मुझसे मुखातिब हुई- व्‍हेन विल यू लर्न टू टेक रेस्‍पॉंसिबिलिटी फॉर यूअर लाइफ़? मेरी बेचारी दुखियारी मां आके तुम्‍हारा झाड़ू-पोंछा करेगी इस मुग़ालते में तुम बीमार हुए? पता नहीं लास्‍ट टाइम खाना कब खाया था (कब खाया था?).. देख रही हूं दवाइयों का भी कोई हिसाब-किताब नहीं है.. थोड़ी देर में पता चलेगा प्रॉपरली तुम किसी डॉक्‍टर के पास तक नहीं गए?..

नानान कितनी तेज़ी से बड़ी हो रही है (लड़कियां क्‍यों इतनी तेज़ी से बड़ी होती हैं?).. इच्‍छा हो रही थी किसी तरह देह में जान आ जाये कि छौंड़ी की उंगलियां थामे उसे अपने साथ लेकर किसी दोस्‍त के घर जाऊं, बेबात उसकी हर बात पर खिलखिलाकर हंसूं, हंसता रहूं.. करीने और अदब से अपनी प्‍यारी नानान को सड़क पार करवाऊं, घास के किसी मैदान में कुहनियों के बल लेटे उसकी बेमतलब की बेवकूफियों के किस्‍से सुनूं और आवाज़ भारी बनाकर उसे अपनी भारी-भारी समझदारी दूं (न लेना चाहे तब भी उसके सिर पर सवार होकर अपनी ठेलूं!).. यह सब करने की जगह अपने चीखने की बेहया, बोरिंग स्‍ट्रेटेजी पर टिका रहा- अबे, स्‍टॉमक इन्‍फ़ेक्‍शन में खाने की बात करती है? किस स्‍कूल गई है तू? यही पढ़ाया है तेरी मां ने?.. भगवान भला करे इस ससुरी चीन का!..

लड़की चुपचाप गाल पर हाथ धरे मेरी बकलोली सुनती रही तो मेरा हौसला बढ़ा- सुन बेटा, होली के दिन कहीं कोई गुजिया, दही-बड़ा के लिए पूछता सो तो अलग.. ससुर टोटल दिन फोन कंपनी की या तुम्‍हारे मां के श्राप का प्रताप था, ससुर अपना फ़ोने बंद पड़ा रहा.. तीन-चार दिन से कंप्‍यूटर बंद है.. मेल-टेल की कवनो ख़बर नहीं.. तू यह सब ज़रा दुरुस्‍त कर दे, फिर मैं तुझसे रियल डायलॉग करता हूं!

- तुम्‍हारे सुधरने की उम्‍मीद करना फिजूल है.. कहकर नानान उठी और कंप्‍यूटर का उल्‍टा-सीधा ठीक करने में जुटी.. बीमारी की नीमबेहोशी में भी जानता था कंप्‍यूटर के आगे बैठी मेरी वह दुलरिनी नानान सच्‍चाई नहीं सपने का ही एक फेर थी.. लेकिन जाने क्‍यों मगर उसके सपने में होने का भी संतोष मुझे किसी सच्‍चाई सा ही हुआ.. मेरे नाचते मन-मयूर के पंख थाम बदतमीज़ लड़की मुझे छेड़ती हुई बोली- तुम्‍हारी 'वो' पुरानी रुना लैला दिख रही है, कहो तो उसकी अलल-बलल की टोंटी खोलके तुम्‍हें थोड़ी देर के लिए सुखी कर दूं?..

Wednesday, March 19, 2008

इराक में अमरीकी घुसपैठ के पांच साल..

आज की रात इराक के अलग-अलग हिस्‍सों में ढेरों कहानियां होंगी.. ढेरों आवाज़ें, तकलीफ़ों के उलझे पुलिंदें होंगे.. जाने कोई उन्‍हें सुननेवाला होगा या नहीं.. मैं भी नहीं सुन रहा.. बस उजाड़ में किसी कहवाघर का एक ऊलजलूल कल्‍पनालोक गढ़ रहा हूं.. बेमौसम की बरसात, बेतुका हारमोनियम और कुछ यूं ही मन के उठते जलज़लों का..

काली सफ़ेद फ़ि‍ल्‍म के जंगल में..

किसी पुरानी बिसरायी काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍म की छवियां थीं या बीहड़ में रास्‍ता भूली घबरायी किसी रेल की आत्‍मा का भौंचकपन, सांस रोके मैं एक-दो-तीन गिनता रहा. उन नीम अंधेरों में सपने के भीतर सपने का क्‍या कैसा भेद है गहरा, गुनता रहा. बारुदी सुरंग नहीं थी फिर भी बीच-बीच में धमाका होता, ज़ोरदार. धुएं के चमकते बगूले उठते पैरों पर जले पत्‍ते गिरते, फौजियों की सधी पदचाप घास पर तैरती फिरती तन् तनी तनाक्. हथेली पर गिलहरी-सी जान बचाये मैं इस पेड़ के पीछे से भागकर उस झाड़ तक आता. मां की फुसफुसाती आवाज़ आती बेटा, तू कहां फंस गया है. मैं हकलाकर जवाब देना चाहता तुम्‍हीं बूझती रहीं समझदार, मैंने कब दावा किया था. जाने क्‍या तुक होता कहां से छठवीं जमात की वह सांवली लड़की सामने चली आती, मुस्‍कराती, इस अंधेरे से उस अंधेरे में कहीं मेरा मज़ाक बनाती गुज़र जाती बचपन में जिसकी चोटी गूंथने को ओह, कैसा तड़पता रहा था मैं. कुछ काले घोड़े कुछ भूरे भागते पानी में हदर-बदर मानो बांध टूटने के अंदेशे से भागते हों, मेरी बेहोशियों को रौंदते हुए. नशे में सरोबार कोई आवारा आरमेनियन अकोर्डियन की बंजारा लोरी बजाता जैसे अंधेरी दुपहरियों में निकला हो थपथपाने, भटके सपनों को जगाने. अचानक जंगल में शोर उठता, रेल भक्‍क-भक्‍क धुआं उगलती मैं सांस रोके बुदबुदाता एक-दो-तीन.

Tuesday, March 18, 2008

देश सही जा रहा है..

लोग कमा रहे हैं. तेल-साबुन लगा रहे हैं. गांव से छूट-छूटकर शहर आ रहे हैं. हैसियत बनती है तो गोल बना रहे हैं, वर्ना खाने की पुरानी आदत है लात खा रहे हैं. जो थेथर हैं जमे हुए हैं (ज़्यादा थेथर ही हैं, ज़िंदगी ने बना दिया है); हाथ में रोटी आने पर अब भी जिनकी चमकती है आंखें, ऐसे बकिया ग़लत गा‍ड़ि‍यों पर चढ़कर वापस गांव भी आ रहे हैं! गांव की धरती ‘सोना उगले, उगले हीरा-मोती’ की लीक पर उबल रही है. बहुत सारे गांववाले जल रहे हैं. ज़मीनों के भाव बढ़ रहे हैं. पूरी दुनिया का यही हाल है. लात खायी दुनिया के मूर्ख, ज़ाहिलों, गंवारों की ज़मीनें कौड़ि‍यों के मोल खरीदी जा रही हैं. देश सही जा रहा है. आप भाग्‍यवान हैं आपको ख़बर होगी, मगर मैं समझ नहीं पा रहा किधर जा रहा हूं. अलबत्‍ता यह तेज़ी से भूल रहा हूं कहां से आ रहा था! पैसा और हाय-हाय की कोई ऊंची इमारत है जिसकी लिफ़्ट में घर्र-बर्र घबरा रहा हूं. या ईएमआई की ठंसी हुई रेल है जिसमें बेदम, बौखला रहा हूं, लेकिन साथ ही साथ रेल में बसे धंसे रहने के नोट भी बना रहा हूं. अंधेरे में आईने के आगे जाकर कभी-कभी लगता है खुद पर कितना तो इतरा रहा हूं. सही जा रहा हूं. देश सही जा रहा है. ‘मेरा गांव मेरा देश’ बकवास फ़ि‍ल्‍म थी, अब ‘डेटेड’ हो गई है, ‘मेरा शहर मेरा घरइज़ मोर रीयलिस्टिक. मेरे बच्‍चे, मेरी बीवी मेरा स्‍पेस मेरा मेरा मेरा! सब स्‍वस्‍थ है. मेडिकल इंश्‍युरेंस हैज़ बीन टेकेन केयर ऑफ़. वी बाइ ऑल अवर बेदिंग वॉटर. यू हर्ड ऑफ़ दैट अमेज़िंग गुड शॉप व्‍हेयर दे सेल स्‍लीप? सम वन जस्‍ट मेंशन्‍ड दे आर गोइंग टू स्‍टार्ट सेलिंग शिट. आई अम गोइंग टू बाइ इट! बाइ इन माई सपना, बाइ इन माई स्‍लीप. बाइ बाइ बाइ. टिल आई डाय. ओह, सो मेसमैराइजिंग, आई कांट टेल हाऊ हाई आई फ्लाई. आई डोंट रिमेंबर व्‍हेन वॉज़ द लास्‍ट टाईम आई आस्‍क्‍ड व्‍हाई. व्‍हाई बॉदर, गेट वेस्‍टेड एंड ट्राई? देश सही जा रहा है. बच्‍चे ज़्यादा समझदार हो गए हैं, मां-बाप के यार हो गए हैं. लड़कियां भी धारदार हो गई हैं. सेक्‍स वॉज़ नेवर सो एक्‍साइटिंग बिफोर. व्‍हॉटेवर वॉज़ सो एक्‍साइटिंग अर्लियर, यू बगर, रिटार्डेड, बास्‍टर्ड? हंसते-हंसते आप मुझे गालियां दे सकते हैं, चलती रेल से ठेल कर गिरा सकते हैं, गिराने का कैसा दु:ख हुआ है उसपर फिर टीवी के लिए एक शो भी बना सकते हैं. हाथ-पैर पटकूं तो ताज्‍जुब कर सकते हैं, घर के अंदर बनायी अपने मंदिर में ओम जय जगदीश गा सकते हैं. आपके इरादे नेक़ हैं. आप दायें बायें कहीं भी दे सकते हैं हमें फेंक. सब सही होगा. क्‍योंकि देश सही जाता होगा..

नीचे उड़ाये हुए संगीत से कुछ धुन जैसा सजाने की कोशिश की है.. मर्द आदमी होंगे तो शर्तिया मेरी रेंकाइयों को झेल जाइएगा

Monday, March 17, 2008

एज़ पर..



पता नहीं क्‍या बात है क्‍यों है ऐसा, कहीं भी जाता हूं वापस एज़ पर चला आता हूं. तुम कहती हो संभल सकते हो, बचके चल सकते हो, मैं अविश्‍वास में पलकें झपकाता सुनता हूं, खुशी-खुशी बहलता हूं हल हल हललता हूं. मगर ज़्यादा वक़्त नहीं होता फिर कहीं लुढ़कता, पैंट झाड़ता सिहरता सकपकाया खड़ा होता हूं. तुम मुस्‍कराकर कहती हो हद है, दुनिया-ज़हान की इतनी ज़मीन है और तुम खड़े नहीं हो पा रहे हो. सबकी आंखों में मुझे छोटा बना रहे हो! तुम चोट खायी एक नज़र देखती उंगलियों से इत्‍ता-सा छू लेती हो, मैं पेड़ की फुनगी पर फाहे की तरह उड़ने लगता हूं. अनजानी ज़बानों में रेंकने जाने कैसी-कैसी स्निग्‍धताओं में स्‍वयं को सेंकने लगता हूं. तुम नेह में उमड़ती मुझे बहुत दूर रखकर बहुत करीब लाती हो, हल्‍के-से फूंक देती हो, मैं हवा में अलबलाने लगता हूं. पैर ऊपर सिर नीचे बजाने लगता हूं. जाने कैसा दिन होता है कैसी रात, एज़ से छूटकर निकला वापस एज़ पर आता हूं.

(ऊपर की तस्‍वीर: डेविड जे नाइटिंगेल)

Sunday, March 16, 2008

किस चिरकुट ने कहा होली आती है..?

किसने कहा.. शायद आपके लिए आ रही हो? या आपकी पटाखा पड़ोसन के लिए?.. हमारे अज़ीज़ बंशीधर चौबे और कयामत अली के लिए तो नहीं ही आ रही है.. आखिरी मर्तबा कभी आई होगी तो उसे लंबा ज़माना हुआ.. क्‍या मालूम तब के. आसिफ साहेब ने अनारकली के रोल के लिए मधुबाला को पक्‍का किया था या नहीं.. या जनाब राजेश खन्‍ना साहब किस कक्षा में थे.. या कच्‍छे में भी थे या नहीं.. कहने का मतलब आखिरी मर्तबा के बाद जीवन के दूसरे मर्तबे आते हैं.. ऐसे मौके भी आते हैं कि कयामत और बंशीधर बाबू की बाख़ साहेब चिरकुटई संगत करें.. बैकग्राउंड में किसी लतखोर ठुमरी ठेलवैये को भी सिर झुकाये झेल जायें!.. जो इस मुगालते में रहते हैं कि यह आता और वह नहीं आता उनके हिस्‍से और कुछ भले आये, समझदारी नहीं आती.. और आती है तो वैसी ही आती है कि हमारे क़ि‍स्‍से उनकी समझ में न आ सकें!.. मगर ऐसी आती है? होली? कमअज़कम बंशीधर चौबे और कयामत अली तो कुछ ऐसा ही बता रहे हैं...

Saturday, March 15, 2008

एक पतित पति (जापानी) के नोट्स..

कभी-कभी समझ नहीं आता मैं किधर देख रहा हूं.. या सोच रहा हूं.. दफ़्तर में बोनितो के उलाहने के पीछे क्‍या चाल छुपी थी की बात सोचते हुए अपने बड़े बेटे कदोमा की पढ़ाई के खराब नतीजे की सोचने लगता हूं.. और अभी यह मसला दिमाग में सुलटा भी नहीं होता कि बैंक वाले फ़ोन करके क्‍यों बुला रहे हैं की बात परेशान करने लगती है.. और अभी बैंकवाला क़ि‍स्‍सा साफ़ नहीं होता कि बीवी नात्‍सुको बीमार पड़ी क्‍यों मेरी जान खा रही है की चिंता खौलाने लगती है.. या बीच सड़क ट्रक से लड़ाने!.. जो अभी होते-होते एकदम-से रह गया!.. चार सेकेंड की और देर होती और बीमार नात्‍सुको की जगह अपनी ओर गिरे आ रहे तीन सौ गैलन वाले निस्‍सान ट्रक का नहीं सोच लिया होता तो यहीं सड़क पर मेरी समाधि बन जाती?..

तेजी से आगे निकल गए ट्रक को इतमिनान से मां-बहन की सुनाने और एक पुलिसवाले को अपनी ओर आता देख उतनी ही तेजी से एक लेन में खिसक लेने के बाद मैं नात्‍सुको की जगह डोंबुरी से भरे एक बाउल की सोचने लगता हूं.. साथ में साशिमि और सुकीयाकी का भी एक-एक प्‍याला मिल जाये तो क्‍या कहने!.. मगर यह सब अकेले बाहर खा लूं इतने पैसे कहां हैं? यही झमेला है घर में इतने झमेले रहते हैं कि वहां पहुंचते ही भूख मर जाती है.. और बाहर भूख के डमरू बजते हैं तो जेब में पैसा नहीं बजता!..

अगले सेमिस्‍टर कदोमा का रिज़ल्‍ट खराब हुआ तो उसे लात मारके घर से बाहर कर दूंगा.. जा साले, सड़क पे भीख मांग? होश ठिकाने आ जायेंगे हीरो के! लेकिन नात्‍सुको के क्‍यों नहीं आ रहे? बीमार पड़-पड़के क्‍या दिखाना चाहती है? चाहती क्‍या है कि चौबीस घंटे घर पड़ा मैं उसकी देखभाल करूं?.. कल पड़ा तो था घर में.. नात्‍सुको भी बाजू में गिरी पड़ी थी.. चेहरे का रंग उड़ गया है.. देह पर ज़रा भी मांस नहीं बचा.. उसके साथ सोने के ख़्याल तक से अब ऊबकाई आती है! पता नहीं मेरे बारे में यह औरत कुछ सोचती क्‍यों नहीं.. ठीक है कि कल बच्‍चों के अलग हटते ही मेरे बालों में हाथ फेरती रही थी लेकिन सेक्‍स? वो क्‍या मैं अब बाहर जाके पाऊंगा? और उसके पैसे कौन नात्‍सुको का बाप देगा? उसका भाई भी देने की हालत में नहीं.. उसकी भी साले की भिखमंगों वाली हालत हो गई है!.. पता नहीं क्‍यों बाहर के लोगों को लगता है जापान में बहुत पैसा है.. उन्‍हें एक दिन के लिए मेरे घर आकर देखना चाहिए! काइतो और काकु भी हर घड़ी अपनी मां के किमोनो से लगे रोते-कलपते रहते हैं! भुक्‍खड़ों को जैसे कभी खाने को नहीं मिलता! नहीं ही मिलता होगा लेकिन तो मैं क्‍या करूं?..

नाकानो से निकलकर अभी नरिमा पहुंचा ही था कि घर से कदोमा का फ़ोन आ गया.. कि भागके आओ, मां मर रही है!.. ये साली ज़िंदगी कहीं जो चैन लेने दे! और वह औरत भी रोज़ मरती रहती है.. ऐसा नहीं कि एक दिन मरके छुट्टी दे दे?..

नात्‍सुको को गालियां बकता, झींकता घर पहुंचा तो वहां पहले से ही काउंटी का बूढ़ा डाक्‍टर एक जवान नर्स के साथ पहुंचा हुआ था. नर्स देखने में बुरी नहीं थी, और मैं वही देख रहा था, कि बुड्ढा डॉक्‍टर मेरी जान खाने लगा- कि इसे सम्‍भालो.. इसकी (माने नात्‍सुको की) आंख लग गई तो ये बचेगी नहीं! एम्‍बुलेंस आने तक इसे किसी तरह से जगाये रखो.. कुछ करो! मैं क्‍या करता, सब नात्‍सुको ही कर रही थी? ज़मीन पर आंखें झपकाती ऐसे कराह रही थी मानो महीने भर से किसी ने सोने न दिया हो! जबकि बुड्ढा कह रहा था सोओ मत, सोओ मत!- और यह हरामख़ोर आंख मूंदने से बाज नहीं आ रही थी! और गंजी-कच्‍छे में इधर-उधर गिरे-लेटे बच्‍चे घर की गरीबी का अच्‍छा पोस्‍टर बनाये हुए थे! मैं क्‍या करता- डॉक्‍टर से झगड़ता या अपनी बेवकूफ़ बीवी से? अदबदा के नात्‍सुको पर बरसना शुरू किया- तू कर क्‍या रही है, हरामी.. बीच दिन झपकी ले रही है? लाज-शरम सब धोके पी गयी है, बदकार? बच्‍चे यहां भूखे मर रहे हैं और तू नींद ले रही है? उठके सबके लिए सुशी बना, चल?..

मेरा हड़काना था, बच्‍चे रोने लगे.. मगर बदकार औरत एकदम-से पटरी पर आ गयी! कराहते-कराहते किसी तरह उठी, चावल, सब्‍जी बाहर किया, विनेगर की बोतल बाहर की, सुशी तैयार किया.. फ़र्श पर प्‍लास्टिक सजायी, खाली बाउल लगाये.. बच्‍चे चिंहुकते हुए सुशी पर टूटे.. और मुझको भी भूख लगी ही थी.. बुड्ढे डाक्‍टर को समझ नहीं आ रहा था कि मामला हो क्‍या रहा है.. जबकि मुझे खूब समझ आ रहा था.. अंदर-अंदर नात्‍सुको भी समझ रही थी.. बेचारी के चेहरे पर कितना संतोष था कि बच्‍चे आखिरकार खाना खा रहे हैं.. और अपने हाथ का मुझे खिलाकर तो बेवकूफ़ को हमेशा खुशी होती ही है.. मैंने भी लड़ि‍याने वाले अंदाज़ में कहा- आज सुशी बुरा नहीं बना! नात्‍सुको के चेहरे पर कैसी तो खुशी तैर गई.. और उसी क्षण भद्द से वह एक ओर कटे कुम्‍हड़े की तरह गिर भी पड़ी.. बुड्ढा झपटकर उस पर गिरा.. बेवकूफ़ ने घबराकर मुझे इत्तिला की- कि आपकी पत्‍नी हैज़ जस्‍ट पास्‍ड अवे!

बच्‍चे इस खबर को सुनते ही भां-भां रोने लगे.. मुझे भी बात अजीब लगी.. लेकिन जो भी लगना था वह सुशी का बाउल खत्‍म करके ही मैं लगाना चाहता था.. रोते हुए बच्‍चों में से भी किसी ने अपना बाउल हटाकर अलग नहीं किया..

Friday, March 14, 2008

ब्‍लडी-श्‍लडी, हार्डली स्‍टेडी..

कुरते की जेब में भांग की गोली लिये तमोली के ठेले पे बबुनी के बोले पे हम क्‍या महीन-महीन मुस्कियाये थे. चार कदम झूमके चले सातवीं पे लहिराके थमे तीन कदम पीछे लौट एक झड़ी ग़ज़ल गाये थे. हाय, खुद पे कितना शरमाये थे? मगर वह कल की बात है, आज तो कोंते का सर्राटा और कोंते से ज़्यादा अपना कांटा लिये इनको डरा रहे हैं उनकी उड़ा रहे हैं, जाने किस बात पे चहक रहे हैं फुदक के कहां जा रहे हैं. हंसते-हंसते सकपकायेंगे तो आजू-बाजू क्‍या पायेंगे? कि मालिक वह चार मर्तबा पढ़े गए और तुर्रे तह बारह बार? और हमने भी भले कर ली ज़रा टिल्‍ल-टिल्‍ल अंतत: गए एक समूचा दिन हार? बप्‍पा हो, ब्‍लॉग के कितने झमेले हैं कहां-कहां की फटही टंगेले हैं? आदमी कहां से कितना उत्‍साह सोहायेगा, ऐसा कैसे होगा कि दिन में चार दफे लात नहीं खायेगा? ओह, हिंदी क्‍यों ऐसी मरगिल्‍ली है कि कभी-कभी लगता है, गुरु, ब्‍लाग अपना अब्‍दाली के बाद की लुटी हुई दिल्‍ली है? शीर्षक में बिना ब्‍लाग, वाणी, ब्‍लडी, व्‍यू‍टी, वॉयलेंस, वाद, बलात्‍कार के पत्‍ता क्‍यों नहीं खड़कता. जब जहां खड़कता है तो क्‍यों कैसे खड़कता है ऐसे कि हम सहमे खड़े-खड़े रह जाते हैं? कि हंसते-हंसते लरबराने लगते हैं बेबात घबराने लगते हैं. कि दीवार की दूसरी ओर कूद जाने में ही अपनी खैर मनाने लगते हैं?..

किसी से बात करना संभव है?.. पाओलो से?..



इतालवी जैज़ के बड़के बाप पाओलो कोंते को इटली के बाहर भी काफी सुना जाता है.. फ्रांस में उनका खूब दौरा होता है.. लेकिन मुश्किल है इतना सुने जानेवाले पाओलो खुद किसी की नहीं सुनते.. खास तौर पर जब मैं बात कर रहा होऊं.. और हिंदी में कर रहा होऊं.. और हिंदी से ज़्यादा गाते हुए कर रहा होऊं.. आप चुप नहीं करा सकते? कम से कम पाओलो को तो चुप करा ही सकते हैं?..

यानी आप अच्‍छे दोस्‍त नहीं? मेरा मज़ाक बनता देख आपको अच्‍छा लग रहा है?.. व्‍हॉट अ बैड टाइम वी आर लिविंग इन.. आई मीन एट लिस्‍ट आयम लिविंग इन..

Thursday, March 13, 2008

सब छेर रहे हों तो आदमी, मतलब मैं खड़ा कहां होऊं?..



पता नहीं ईश्‍वर सब अच्‍छा-अच्‍छा करते हैं या नहीं.. और करते हों भी तो शायद सबके लिए तो नहीं ही करते.. कम से कम किसी दुखियाये पुरनिया गवैया या चिलबिलाई लइकी या गुस्‍साइल नाक से धुआं छोड़ते-छेरते महाशय के लिए तो नहीं ही कर रहे दिख रहे.. पता नहीं ईश्‍वर ऐसे क्‍यों हैं जैसे हैं? मगर फिर बाकी लोग भी तो पता नहीं वैसे क्‍यों हैं जैसे हैं?..

ख़ैर, खुदी सुनिये..

Wednesday, March 12, 2008

ब्‍लॉगवाणी बुड़बकई टिड़बकई एटसेट्रा..

जिन्‍हें अपने लिखे, सोचे की चिंताओं से मोह है, ज़ाहिर है वो ब्‍लागवाणी के मुखपृष्‍ठ के क्रिया-कलापों से प्रसन्‍न नहीं होंगे.. ब्‍लागवाणी के मुखपृष्‍ठ की सार्थकता की व्‍यर्थता बतानेवाले भी होंगे.. मगर उसे पढ़कर भी कोई प्रसन्‍न न हो रहा होगा.. क्‍योंकि कुछ होंगे जो अपने विचारों की टिड़बकई और फुदर-फुदर की फुदकन में ब्‍लागवाणी के मुखपृष्‍ठ से सबको मुंह बिरा रहे होंगे.. भले उस बिलाव-बिराव की लगातार हास्‍यास्‍पदता बन रही हो.. मगर शायद अभी उनके पास पर्याप्‍त मात्रा में फुरसत बची हो.. खीर बची हो? अलबत्‍ता इस बीच दूसरी जगहें लोग दूसरे दुखों से दुखी हो रहे हों.. ‘आई! आई!’ और ‘यू!-यू?’ कर रहे हों!..

या इसे शालीन ज़बान में शायद ऐसे कहें?.. ‘अरे हट हट, हट न.. मेरी जगह, आप हटो .. हटो यार?.. ऊपर जाने दो.. अबे, दूं क्‍या एक कुहनी? मारूँगा स्‍साले!.. हटो म्‍यां.. बधु कर क्या रहे हैं आप, रुकिये हद है, शालीनता का ज़माना नहीं? चले आ रहे हैं मुँह उठाये, बदतमीज़! मेरे पैर.. उफ्फ, कचड दिया , उई माँ?.. पहले वाली जगह मेरी है मेरी है! मेरी है अरे क्या मेरी मेरी?.. दिखाते हैं, ससुर!.. तेरी मेरी सब पता चल जाएगा अभी! पहुँच गया चहुँप गया, हुर्रे हुर्रे मेरी पसंद पर टॉप टॉप! झक्कास.. ब्लॉगवाणी मेरी पसंद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद!.. अरे ये पीछे से मुर्दाबाद कौन बोला रे?.. .अरे मइय्या गे, अभी ले त् ऊपरी था एतने में नीचे ले कहंवा से आ गिया रे?. सब बकवास है जी.. हमें क्या ऊपर क्या नीचे क्या?.. अरे बंधु, सही कहा.. सब बकवास!.. महोदया, चलिये चलिये यहाँ से.. ऐसे भीड़भाड़ में आपका क्या काम?.. चलिये हटाईये.. भाई जी पॉडकास्ट करियेगा? पॉडकास्ट?..

ओह, पॉडकास्‍ट.. पता नहीं मैं अभी क्‍या-क्‍या करूंगा?..

Tuesday, March 11, 2008

एक मामूली कविता की किताब..



मामूलीपने का क्‍या महातम? वह रोज़-रोज़ बनती.. रोज़-रोज़ बिगड़ती चलती है.. इसी बुनावट-बसावट को उकेरती चंद पंक्तियां.. पिछले वर्ष अक्‍टूबर में कभी पोस्‍ट पर चढ़ाया था.. सांगीतिक के मोह में उसी दुलरन से फिर लिपटने को.. अबकी वोकल में दोहरा रहा हूं..

Monday, March 10, 2008

दिन में दिन दिखे ऐसा भी दिन कभी दिखता है, बनवारी?..



- रहते-रहते ऐसी भूख लगती है कि मुंह में गप्‍प कौर न लिये तो बेहोश होके गिर पड़ेंगे ऐसा लगता है.. इत्‍ती भूख क्‍यों लगती है, मां?
बेतरतीब, असुविधाजनक खटिये की गहीर में मंटू सोया रहता है.. बेतरतीब, असुविधाजनक खटिये की गहीर में कोई कैसे सो सकता है का ख़्याल मंटू को नहीं आता.. जैसे आंगन में नाली के गड्ढे पर टिके पटरे पर उकड़ू बैठ दांत मांजने से मंटू को भय नहीं होता.. कि पटरे से छलककर गड्ढे में गिर पड़े तो?.. हालांकि मंटू खेदन चाचा की साइकिल की कैरियर से छलककर सड़क पर गिर सकता है, या ज़्यादा हुआ तो गड्ढे के पानी से छलककर पटरे पर बाहर निकल मेंढक मंटू को डरा सकता है!..

जाने इसकी और उसकी किसकी भरी बोरियां, टिन के कनस्‍तर, बल्‍ली से लगी रेंगनी पर लटके कपड़ों के अंधेरों में मंटू को भय नहीं होता.. घर के निरर्थक निर्जन सूनसान में भी नहीं.. अलबत्‍ता घर से बाहर पैर धरते ही बनवारी के बाद वाली गली में पनचक्‍की की आवाज़, कुएं के मुहाने पर प्‍यासी आवारा घूमती बकरियों का इधर-उधर मुंह मारना मंटू को पता नहीं क्‍यों कभी-कभी एकदम असहज करने लगता है.. जैसे अस्‍पष्‍ट, अजानी आवाज़ों के जादुई संकेतों में कोई उसे लपेट रहा हो और जिसके असर में थोड़ी देर बाद वह खिंचा चला, जाने कहां गायब हो जायेगा और फिर बाबूजी, खेदन चाचा, दीदी और अम्‍मा कितना, किधर-किधर उसे खोजते रहेंगे मगर खोज नहीं पायेंगे.. और मंटू मदद के लिए चीखना चाहेगा लेकिन उसकी हलक से आवाज़ न निकलेगी?..
- कुएं के काले अंधेरे के भीतर क्‍या जादू छिपा है, दीदी?..
कंदील और बत्‍ती की रोशनी में और सूरज के अंधेरे में घर जैसा दिखता है उससे अलग और भी किसी तरह से दिख सकता है का ख़्याल मंटू को नहीं आता.. जैसे बाहर इमली के पेड़ के बाजू पुरानी बड़ी सलेटी इमारत और पाठशाला के रास्‍ते में बांस के जंगल की निर्जनता से अलग बाहर की कोई और दुनिया भी हो सकती है का ख़्याल.. सबकुछ वैसा ही दिखता है जिसे देखने का अभ्‍यास करते बड़े हुए और देखने की आदत बनाये इस दुनिया से विदा होंगे?..

कटहल का पेड़ कटहल के पेड़ जैसा दिखता है और जंगली बेर की झाड़ जंगली बेर की झाड़ की तरह.. सूखे बालों के झोंटे के साथ हेमलता शामलाल की दुकान से दो रुपये का मसाला खरीदकर घर लौटती दिखती है, तेल लगायी बाल संवारे कभी मेले से लौटती नहीं दिखती.. हंसुए पर लाल साग काटती अम्‍मा अचानक कराहकर कमर पर हाथ रख लेती है दिखता है, बिना कराहे लाल साग काट ले कभी ऐसा नहीं दिखता.. बाबूजी बोलते हैं बहुत तमाशा हो गया एक दिन शहर के बड़े अस्‍पताल लेकर चलेंगे दिखता है, सचमुच शहर के बड़े अस्‍पताल लेकर जायें ऐसा नहीं दिखता..
- जो जैसा दिखता है उससे क्‍या, कैसा-कैसा अलग दिख सकता है? दिख सकता है.. तुम जानते हो, संपूरन?..

- रात के बाद दिन दिखता है, दिन में रात दिखती है, दिन में दिन दिखे ऐसा भी दिन कभी दिखता है, बनवारी?..
(विनोद कुमार शुक्‍ल से क्षमायाचना सहित)

Saturday, March 8, 2008

जब आता है कैसे आता है.. सुख?..



कैसे आता है सुख? आकर किन नज़रों से देखता है? कि उस ज़रा-सा देखने के छोटे पल के दरमियान ही उसकी टेक बदल जाती है? हमारी संगत में घड़ी भर साथ रहने का ख़्याल सुख को शर्मिंदा करता है? किसी कातर, दुखियारिन बिरहन की तरह हम निहोरा करते हैं इतने दिनों बाद दिखे हो.. आज मन थोड़ा थिर हो जाये तब जाना?.. जवाब में सुख ऐसे देखता है मानो ग़लत पते पर आ गया हो!.. जैसे कभी हमसे दिल लगाया था आज उस दिन की याद से शर्मसार होता हो!.. इच्‍छा होती है सुख के मुंह पर तेजाब फेंककर उसे भूल जायें.. हमेशा-हमेशा के लिए!.. जैसे ग़लती उससे नहीं, हमसे हुई थी कि सुख-से बेग़ैरत से कभी दिल लगाया था! मगर भुलना कहां हो पाता है? और दुष्‍ट सुख भी हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो जाऊंगा, ऐसे क़रारनामे पर दस्‍तख़त करके कहां जाता है?.. अचक्‍के में, जब एकदम उम्‍मीद न हो, सपने के भीतर सपना के किसी सूराख से झांकता यकबयक सामने चला ही आता है.. कैसे आता है?..



(ल के लिए)

Friday, March 7, 2008

आज की पसंद में ऊपर कैसे चढ़ें?..

शब्‍दों का यह छोटा-सा छेड़छाड़ी गुलदस्‍ता उन स्‍नेहाकांक्षियों के लिए है जो ब्‍लागवाणी की बेल से लटकते हुए पाठकीय हेलमेल की दुनिया में पींग (हाथ, आंख, गोड़ या अपनी अन्‍य बेचैनियां) मारते, पटकते हैं आदि-इत्‍यादि.. ऐसे मृदुभाषी, सकुचाइल चेठाकार भी होंगे जिनका स्‍वर ब्‍लागवाणी में मुखरित-प्रज्‍जवलित नहीं हो पाता.. जिनकी निरीह उद्घोषणाओं के कातरघोष की कमज़ोर तीलियां, अगरबत्‍तीलियां चिट्ठाजगत और नारदीय दहलीज पर जलती है (या कहें वे ब्‍लागवाणी से जलते हैं.. मैथिलजी को देखके हुलसते हैं कि दिल्‍ली से मथुरा बहुत दूर नहीं है.. या अल्‍मदाबाद!).. या सीधे कहें वे दबे, दबाये हुए हैं, ब्‍लागवाणी की पसंदगियों की तिकड़मों को अभी ठीक-ठीक बूझ नहीं पाये हैं.. आज की पसंद के कदमों तले दबे हुए, मेरी तरह घबराये हुए हैं?..

धत्‍त् तेरे की.. हम भी कहां से निकलके कहां चल जाते हैं!.. एनिबेस, लब्‍बोलुआब यह कि हमारा यह छेड़छाड़ी गुलजस्‍ता ब्‍लागबानी के कैलेंडर से जुड़े बिलायगरों के वंचितों के लिए है.. हमारी ही तरह का कोई अन्‍य सहृदय टिप्‍पनकार होगा वह ऐसी ही ज्ञानवर्द्धक चिट्ठाजगत व नारदीय टिप्‍पनी से हमें ज्ञान पूरित करेगा.. फ़ि‍लहाल बात ब्‍लागबानी की हो रही है और बानी के रचे आज की पसंद की.. तो हम अपना उत्‍साह, अवलोकन व मन का बीहड़ अंधकार उसी तक सीमित करते हैं..

सबसे पहले पहली बात.. आज की पसंद में ऊपर कैसे जायें? सबसे पहले तो इसी तरह जायें कि ब्‍लागवाणी में हमारी प्रविष्टि देखते ही पसंद पर आगा-पीछा सोचे बिना आप किलिक कर दें! और तब तक करते रहें जब तक ब्‍लागबानी बरज के आपको रोक न दे कि आपका मत पहले ही दर्ज किया जा चुका है! दूसरी बात गूगल चैट पर जमे रहिये, बाहिर मत निकलिये, जैसे ही कोई पहचान का क्‍लायंटेल पकड़ में आया लपक के पूछिये, गुरु, हमारी प्रविष्टि देखे? अरे, हम्‍मों क्‍या चिरकुट सवाल कर रहे हैं, वो तो देखे ही होंगे! पसंद पे क्लिकियाये कि नहीं?.. अरे, अभी तलक नहीं क्लिकियाये? और अपने को हमारा साथी और समानविचारधारवाहक बोलते हैं?.. ऐसे में ज़ाहिर है क्‍लायंटेल लरबराके आपकी प्रविष्टि पे क्लिकियायेगा.. जब तक न क्लिकियाये, छोड़ि‍ये नहीं! चैट बॉक्‍स से काम न चले तो दू गो फोन मार दीजिए! कुछ कीजिए, क्‍योंकि खाली बैठे ऐसे ही हाथ डोलाये से आज की पसंद में आपका कोई चांस नहीं है! कल की पसंद में भी नहीं है..

मगर इस स्‍ट्रेटेजी में ये रिस्‍क भी है कि सहजोगी प्रार्थी गूगल चैट में ऊपर अइबे न करे? सैकड़ा परसेंट रिस्‍क है.. तो उसका काट भी है.. अपनी प्रविष्टि संबंधी एक लाईन का मेल और अटैचिंग में पसंद क्लिकियाने का रिक्‍वेस्‍ट ठेल दीजिए! मेल पानेवाले आदमी के अंदर थोड़ी भी शरम होगी तो ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसको खाके वो आपकी प्रविष्टि के पसंद पर क्लिक न करे! ज़्यादा संभावना है घबराके आपके विरोधी पोस्‍ट पर भी क्लिक कै आवे!.. ऐसा दो बार से ज़्यादा कर दे तो आप डांटके उसे ऐसा करने से रोक सकते हैं..

आपकी पसंद में ऊपर चढ़ने का एक अन्‍य महत्‍तम रास्‍ता है आपके सात बच्‍चे हों. पोस्‍ट चढ़ाते ही सब बच्‍चा लोग को काम पे लगा दीजिये कि पसंद को ऊपर चढ़ाने के काम में जुट जायें.. सात बच्‍चा नहीं हो ता सात बीविये हो.. या प्रेमाकांक्षी, प्रेमदुलारिन? या आप ग्रुप बिलाग चलाते हों.. कि ‘दतुअन से दांत धोने के दस फायदा’ जैसा निरीह पोस्‍ट भी चढ़ायें, आधा घंटा का भीतर उसको सात पसंद का ईनाम मिल चुकता है! बहुत बार ऐसा भी होता है कि तीन लोग पढ़े होते हैं और पांच लोगों को पसंदगी से नवाजा गया होता है! ग्रुप बिलागन की महिमा अपरंपार है.. कितने टूटे मन और कपार हैं सो तो आपने देखा ही, पसंदगी में भी वह सबको फेल किये आगे-आगे दौड़ती रहती है! तो एक तो हमारी आपको यह सलाह है कि भले आप ‘मैं और मेरी गाय’ नामका ब्‍लाग चलाते हों, इम्मिडियेटली उसको ग्रुप बिलाग बना लें, क्‍योंकि इससे ग्रुप के किसी अन्‍य मेंबर को लिखने का बहाना बनेगा कि आप कितने पहुंचे हुए पर-बंधक हैं, साथ ही पसंद क्लिकियाने के नये-नये हाथ पैदा होंगे सो एडिशनल फायदा..

खाली मत बैठिये, दिमाग लड़ाते रहिये.. देखिए, आज नहीं तो कल की पसंद में आप ऊपर चढ़ जायेंगे ही! नहीं चढ़ेंगे तो हमारे बिलाग पे चढ़ जाइएगा.. मगर पहिले हमारी पोस्टिंग पर अपनी पसंद को क्लिकियाना मत भूलियेगा!

Thursday, March 6, 2008

सिडनी बेशे का ट्रंपेट और जीवन की रेल..



जनाब सिडनी बेशे का ट्रंपेट कहां पहुंचता है? या जीवन की रेल? कहीं पहुंचती है? या रोज़-रोज़ की हमारी बेचैनियां?.. ठोड़ी पर हाथ धरे की गंभीरता.. या हदबद कुछ कर लें, कहीं पहुंच लें की निरीह हास्‍यास्‍पदता? पता नहीं क्‍यों मन खुद को लात लगाने की जगह दूसरों पर फेंकने लगता है.. या बहककर हंसने.. हालांकि वहां भी हास्‍यास्‍पदता से मुक्ति कहां मिलती है?..

आप भी कोई रास्‍ता नहीं बताते.. या आगे बढ़कर चुप कराते? खैर, लीजिए, आधुनिक बोध की दीवार पोस्‍टर नुमा कवितायें सुनिये.. और जनाब सिडनी बेशे की क्‍लैरिनेट..

एक गिरहत्थिन की रात.. और दिन..

“कौन है, जी, उधर? बाड़े के उधर कौन लुकाइल खड़ा है? को है, जवाब काहे नहीं देते?.. बहरी आते हैं कि हम अभी टार्च बालें?”.. कहां से बालेंगे टार्च, बैटरी है?.. मगर कौन दरकार है बैटरी का, टार्च का? कौनो जीव-प्रानी नहीं है ऐसे ही झुट्ठल शंका में पसीना हो रहे हैं.. मालूम नहीं कैसा मुलुक है, यहां का कुत्‍ता सब बात-बेबात शोर करता रहता है! और एक हम सीरियल बुद्धू हैं कि जरा सा कौनो खड़का हो, बेचैन होने लगते हैं.. कोई नहीं है लेकिन खट् से उठके बहरी भागे आये.. कौन उम्‍मीदी का पीछे? हमदर्द का आस में बहरी आये थे?.. कि दर्द जगानेवाला दुश्‍मन?..

कोई तो नहीं है.. सब सूना.. ओर से छोर तक सूनसान! थोड़ा रात चढ़ जाये तो बुझाता है जैसे आदमी जात का यहां वास ही नहीं.. पापाजी के टाइम में रात को कारखाना के गेट पर जैसे भारी ताला लगता था और उसके बाद आजू-बाजू सब तरफ पिन ड्राप साइलेंस वैसी ही खमोशी इहंवो छा जाती है.. अपलोड-डाऊनलोड सब क्‍लोस.. सारा दोकानदार लोग का शटर डाऊन! हम्‍मों औंजा के सोचते हैं बहुत हुआ, अब बत्‍ती बुताके जायें, सोयें तब तब इनबाक्‍स में खटका होता है.. या पता नहीं होता भी है या बस वहम होता है और फिर आंख से नींद एकदम गायब!.. रोज-रोज वही किस्‍सा!.. पता नहीं कैसा बहकल माथा है कि खाना-रांधना फरिया के, कॉलनी के सब घर की तरह हम भी शट डाऊन काहे नहीं कर लेते.. जाने कौची का उम्‍मीद में अटके बैठे रहते हैं.. और अकेली जान बैठे रहते हैं तो चुप्‍पे-चुप्‍पे बैठना कहां होता है?.. फिर वही विजिट, टेंटलेट, एलिमेंट, एचटीएमएल में आंखफोड़ी.. ढंग से कुच्‍छो सपरता नहीं लेकिन मालूम नहीं कौन जिद में आंख उझराये रहते हैं.. और बैठे-बैठे कब दो घड़ी रात निकल जाती है खबर ही नहीं होता! सुबह भारी-भारी माथा लेके उठते हैं तो चैटबाक्‍स के नल के नीचे जाके पता चलता है काम का पानी आया था, आके निकलो गया.. हम आंख पर आंचल ढांपे सोये रहे, हमको खबरो न हुआ!..

जबसे बिला नगरी में गोड़ धरे हैं रोज का यही किस्‍सा है.. सपना, सलहज, सखी, संदेसा कंहियो मन नहीं अटकता.. बिलाक का जांत में आत्‍मा पिराये रहती है! दीन-दुनिया, लइका-लहंगा सब गोड़ का नीचे दाबे पहिले पोस्टिन बाक्‍स में उलझे रहते हैं, अऊर हुआं से निजात मिलता है तो इनबाक्‍स का अंधारा में जाके भटक जाते हैं! पता नहीं एतना मरद-जनाना है कइसे इतना पोस्टिन, कमेंटिन हैंडलिन करता है.. हम तो इतना थोड़े में दुनिया-जहान, मैका-महेसर सबसे कट गए हैं.. लगता है कौनो माता-देवी का श्राप था कि हमको बिलाग का अंधारा कुआं में ढकेल दिहिस हैं.. अऊर अब हाथ का सहारा देके कोई ऊपरियाये वाला नहीं है!..

ओ माताजी, बंदगी करूं, ई बिलाग-प्रेत से मुक्ति दिलाओ, देबीजी?
.. खौरियाये मन झाड़ू लेके जंगला, दुआरी साफ करते हैं.. इच्‍छा होती है बिलाग बिलाक कर दें, एर्गीगेटर से अपने को डिलीट करके मेटा दें कि न रहेगा बांस न बांसरी बजावे का मोह रहेगा.. लेकिन बरतन, झाड़ू, पोंछा, नहाना, माताजी का अगरबत्‍ती जलाके, चूल्‍हा पर दाल का पानी रखते ही मन जाने कैसा तो चंचल होने लगता है.. खुद को समझाये का लाख जतन करें, फयदा कहां होता है? भागके एर्गीगेटर पर तांक-झांक करते हैं, दीवारी का दूसरा बाजू मंजु दीदी को अवाज लगाके आंगन में बुलाते हैं.. दीदी का चेहरा पे मुस्‍की हुआ तो वैसे ही हमारा दिन खराब हो जाता है.. मगर दीदी तो हैं ही इस बास्‍ते कि हरमेशा मुस्‍कराती रहें.. तो आज भी छींट का ब्‍लू साड़ी में मुस्‍की काटती हमको काट रही मिलती हैं.. हम लब खोलें, ओके पहले खुदै जवाब देती हैं कि मालूम है, लवली, आज इनबाक्‍स में केतना कमेंट आया है?..

हमको नहीं जानना है केतना कमेंट आया है! क्‍या करेंगे जानके? मंजु दीदी के कमेंट से हमरे घर का बक्‍सा तो नहीं खनकेगा न? मगर मंजु दीदी को या किसी को हमरी चिंता थोड़े है?.. अपना लदर-बदर में लीन हैं.. मन करता है उसी क्षन दीवारी से हटके भाग जायें, कि मंजु दीदी का भी रोज-रोज का हमको इंजेस्‍सन देने का टार्चर का एगो सबक मिले.. सन्‍न होके पूछे पे मजबूर हो जायें कि कौन बात है, लवली? कौन बात से तोका एत्‍ता हर्टिन कै दिये?.. मगर हम बुरबक अइसा महीन नाटक फैला सकें, इतना सिच्छित कपार कहंवा है हमरे पास!.. मंजु दीदी की मुस्‍की के जवाब में सकुचाये सवाल करते हैं- आप ही सजेसन कीजिये, दीदी.. आज कौन बिसय का पोस्टिन चढ़ायें?..

(ऊपर का चित्र: सुबोध गुप्‍ता का इंस्‍टालेशन)

Wednesday, March 5, 2008

तुम कहोगी..



[1]
तुम हुमसकर नज़दीक आओगी, पूछोगी पूछना चाहती हूं कुछ, पूछ सकती हूं. मैं हंसता माथे के पीछे हाथ बांधकर कहूंगा पूछो-पूछो. तुम कहोगी छोड़ो, जाने दो, मेरे मन की बात है, तुम कहोगे कहां-कहां से खोदकर बात लाती है, बेवजह सिर खाती है. मैं चेहरे पर मचलने का बच्‍चों-सी मासूमियत चढ़ाऊंगा अरे, यह कौन बात हुई, बात उठाकर दबाती हो, उठाया है तो अब निपटा ही डालो, चलो, पता नहीं क्‍या वहम है अंदर बाहर निकालो. तुम कहोगी खामख़्वाह बुरा मान जाऊंगा, बैठे-बिठाये बेमतलब का झंझट, गुम्‍मा मुंह फुलाऊंगा. मैं करवट बदलकर बुरा मानने का चेहरा बनाऊंगा कि बकोगी भी कि बस लच्‍छे बुनती रहोगी. तुम कहोगी ठीक है, नज़दीक आओ, एक बात बताओ.. अब भी तुम्‍हारे अंतर्तम को मुझसे रोशनी मिलती है? कितनी मिलती है, अब भी बचा है तुम्‍हारी बेचैनियों में मेरा ‘मिस्‍टीक’ कितना बचा है, बताओ न! मैं कसमसाकर, तुमसे ज़्यादा खुद से नज़रें बचाकर कहूंगा- क्‍या?

[2]

कितनी बार कितनी-कितनी बार हम फिर उसी अंधेरे में आकर खड़े होंगे जिससे बाहर निकलने को हम मिले थे इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस. तुम हारकर कहोगी इतना अंधेरा क्‍यों है, मैं जाने किस घिसी बौद्धिकता में दोहराऊंगा कहां जायेगा इसी में तो बड़े हुए हैं, नींद से बाहर और खिडकि‍यों के परदों पर डोलता रहता है, असल बात यह नहीं कि अंधेरा है. असल बात है तुम उस अंधेरे में कैसे अपनी रोशनी तैयार करती हो, कितना समझती हो कहां दबी-छुपी है तुम्‍हारी ताक़त, अपनी बैटरी चार्ज करती हो. तुम कहोगी थक जाती हूं हर बात में तुम्‍हारी बुद्धि सुनकर. कभी कुछ और सुना नहीं सकते, मेरे हिस्‍से की थोड़ी बैटरी जला नहीं सकते? मैं अपनी दुलरायी, जंगखायी बुद्धिमानी में हंसने लगूंगा. तुम्‍हारी खाली आंखें और अपनी हंसी की बेहुदगी देख किसी दिन क्‍या मालूम शायद उसी क्षण खुद से डरने भी लगूंगा. अंधेरा कहीं नहीं जायेगा और हम दो कमज़ोर जान आखिर इतने बड़े अंधेरे का क्‍या बिगाड़ लेंगे. कुछ नहीं बिगाड़ेंगे, कहीं कुछ नहीं बदलेगा, बस धीमे-धीमे अंधेरे में ज़रा आगे तक हम साथ चलेंगे.

Tuesday, March 4, 2008

भइयाजी, एगो घुघनी तो निकलता है?..



बिसंभरा चोन्‍हा रहा है. माने एगो पिलेट घुघनी का मोह में अरबरा रहा है. निमन-निमन बइठ के बबीता का सोंदर्ज-पान कर रहा था, मन ही मन नहीं, सीधा-सीधी कुलजीत को मां-बहिन का गारी सब पहिना रहा था.. कि मालूम नहीं कवन दुर्घड़ी में रतलामी जी का हिंदी बिलाग का गड़ही में गोड़ डाल दिया.. और तब्‍बे ले गरबराये हुए है.. भइयो जी चार गो बीड़ी जेतना बिराये हुए हैं.. सुनिये, सुनिये, आप खुदै बूझ जाइयेगा..

मन पाकल कोंहड़ा जइसन बसाइन होने लगे तो इहंवा बबीता को देख के धन्‍न हो लीजिएगा..

जंगल में मोर नाचा किसने देखा?..

लोग पता नहीं अतीत से बाज क्‍यों नहीं आते? लोग माने रघुराज बाबू को ही देखिये, सुबह-सुबह अतीत के राज़ खोलने में उलझ रहे हैं.. मुड़-मुड़के देखने से बाज नहीं आ रहे! और पारुल भोंसले, जिसे दिन में खुल्‍लम-खुल्‍ला कुछ अच्‍छा करने की सोचनी चाहिए- मतलब पक्‍का नहीं तो कम से कम लाइट क्‍लासिकल की खोज-खबर लेनी चाहिए- वह करने की जगह पता नहीं रातों को चोरी-चोरी चांद उस्‍मानी के पीछे जाने क्‍या करने गयी हैं!.. इट्स नॉट फ़नी एट आल.. माने रीयली, हम अतीत की छत से कूदकर वर्तमान के रूखे फ़र्श पर चले क्‍यों नहीं आते? कुछ हड्डि‍यां टूटेंगी.. या मन के कुछ चिरगिल्‍ले कोमल भाव? मगर टूट-बिखर कर हम फिर मुस्‍कराते खड़े तो हो लेंगे?.. जंगल में मोर नाचा होगा- कब? किसके साथ? किस मन:स्थिति में- जैसे गूढ़ प्रश्‍नों का कोई वैलिड सर्वे होगा अपने पास (या आपके पास).. लेकिन हम सर्वे कलेक्‍ट कहां कर पाते हैं? जंगल में मोर नाचा किसने देखा.. पता चलता है हमने नहीं देखा.. हम गोरी की गोल-गोल अंखियां शराबी, कर चुकी हैं कैसे-कैसों की खराबी देखने में फंसे रहे!.. उससे थोड़ा वक़्त बचा तो हरे-हरे नोट और बूट-सूट-कोट के सवाल सॉर्टआउट करते रहे.. लब्‍बोलुवाब यह कि शैलेन्‍दर भैया, सलिल बाबू, रफ़ी साब और जॉनी ज़िंदगीबाज़ वॉकर के साथ जाने कहां-कहां टहलते और ढुलकते रहे, ससुरी जंगल के मोर का नाचना न देख सके!..

इसी को कहते हैं फटे में टांग का फंसना.. या अतीत में धंसना.. और ऐसा नहीं है कि इसमें पारुल भोंसले अकेली हैं.. कि एक गाना मुंह पर (या जहां कहीं पर भी) चढ़ गया तो चार मर्तबा टेर कर उतर जाये! नहीं, ससुरा, चढ़ा ही रहता है (मुंह पर या जहां कहीं पर भी)! अब इसी को देखिए, कुछ दिन पहले की बात है- दान सिंह की दया थी, मुकेश महाराज का मीठा-मीठा-सा दर्दीला गाना है- वो तेरे प्‍यार का ग़म- तो हमपे चढ़ गया था (मुंह पर ही चढ़ा था).. और उतरने का ससुर नाम नहीं ले रहा था, साथ में एक परिचित थे, अंत में हारकर मेरे मुंह की जगह अपना सिर उन्‍होंने कार की स्‍टीयरिंग व्‍हील पे दे मारा.. और इतने पर भी हारे नहीं तो घबराके कहा- अब तक बीस बार सुन चुका हूं, कुछ और नहीं रेंक सकते? मैंने मुस्‍कराके, थोड़ा लहराके, जवाब दिया- वो तेरे प्‍यार का.. !

कहने का मतलब कि पता नहीं क्‍या है कि हम अतीत से बाहर नहीं आ पाते.. सुबह-सुबह अतीतवाद माने बकवाद ठेलना चालू कर देते हैं.. और सुबह के बाद भी रात तक वही ठेले रहते हैं.. जबकि जीवन में इतने सारे काम- और नहीं तो सूट-बूट-कोट और हरे-हरे नोट वाला- करने को बचे रहते हैं.. या वह नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम जंगल में मोर नाच रहा है उसे तो देख आने का तो बचा रहता ही है.. तो मेरे चक्‍कर में मत रहिये, आप देख आइए.. तब तक मैं कुछ दूसरी सार्थक चीज़ें निपटा आऊं.. मसलन आईने में जाके देख आऊं कि अभी अच्‍छा लगता हूं कि अतीत में अच्‍छा लगता था.. अरे, आप अभी तक जंगल में मोर नाचा देखने नहीं गए?..

Monday, March 3, 2008

फिलिम देखिएगा?..

कि सुनियेगा.. सुनिये न?



महेसी जी का है.. भट-भट वाला.. बिना भटभटाये कवनो काम कहां चलता है.. सगरे मवादो है, बिसादो है.. अऊर भइयाजी तो हइये हैं.. मन भर देखिए अब, चाहे सुनिये..

फ़ोन का चुप रहने की कुछ भावुक पंक्तियां..




[1]

सब चकाचक है, गुरु!’ के बहले मन की खुशहाली, गोड़ पसारे की ऐंठ और नहाये चेहरे की लाली नहीं है फ़ोन का चुप रहना. उमंग की तरंग में दौड़ते बच्‍चे को अधबीच लोप अंकवार में उछाल लेना नहीं है फ़ोन का चुप रहना. घर से ताज़ा-ताज़ा विदा हुई बेटी के बाद के उजाड़ घर के खालीपन-सा खाली-खाली होता है फ़ोन का चुप रहना. सूने आंगन की सूनी, आवारा हवाओं में किवाड़ों का रह-रहकर हिलना, फिर सूने अचकचाये तने रहना. जाने कैसी काम की बात होंठों पर आते-आते रह जाये जैसे, तकिये में मुंह धंसाये फिर उसे सबके आगे कहने के ख़याल तक से लाज आये और न कहके खटका बना रहे आगे बाट में जाने कौन गड़बड़ आये की तरह सांस में अटका-अटकता रहता है फ़ोन का चुप रहना..

[2]
ऐन ज़रूरत के वक़्त उत्‍साह में हिलगते सवारी गाड़ी रुकवाकर उछलते बैंक पहुंचना औ’ नोटिस पढ़कर ‘वी आर क्‍लोज़्ड टुडे’ चौंक जाने जैसा घबराया होता है फ़ोन का चुप रहना. या उस लड़की की चुप्‍पी की तरह जो मुंह पर चुन्‍नी ढांपे किसी के कंधों पर उंगलियों से अपना नाम लिखती रही, मन ही मन मिस्त्री की डली बनी गलती, हंसती, बहकती और महकती रही. और जिस गुमान के गालीचे पर थिरकती रही वह एक दिन जो गायब हो जाये और वापस दुबारा लौटकर न आये और लड़की की गरदन में कितनी सारी हिचकियां अटकती रहें और फ़ोन अपनी चुप्‍पी में चुप्‍पा थरथराता रहे. बजता तो यह दुनिया कितनी अलहदा होती लेकिन नहीं बज रहा हूं और यह भी दुनिया है के भाव में बिन बजे डसता रहे.. या किसी हंसमुख-सी लड़की का घर से भागकर किसी अजनबी शहर पहुंचना और सब आसरा लुटाकर सन्‍न रह जाना है फ़ोन का चुप रहना.

[3]
फ़ोन चुप होता है तो ढेरों सपने खेत की बालियों, छत के खपड़ों और कुएं की घास में जाकर चुप-दुबक-छुप जाते हैं. मां बार-बार झोला बाहर करती है चप्‍पल निकालती है और अमरूद के पेड़ तक जाकर वापस लौट आती है. धूप में डाली रजाई को सूंघता है कोई आवारा कुत्‍ता और इधर-उधर डगरता गरदन उठाये पेशाब करता है, घर से दौड़कर उसे हांक लगाने नहीं आता कोई जब फ़ोन चुप होता है. फ़ोन के चुप रहने पर बड़की काकी हंसते-हंसते ठहर जाती है, सिर झुकाये धीमे बुदबुदाती है- हम भी कैसी बुद्धू हूं!

[4]
फ़ोन चुप रहता है तो बहुत बार घबराकर फ़ोन के भीतर झांकता हूं कि खराब है क्‍या है इस क़दर चुप क्‍यों है. काम करता है फिर बजता क्‍यों नहीं. या मेरे बजने में वह संगीत नहीं कि ठोढ़ी पर हाथ धरे चार लोगों का नेह जगाये नज़दीक लाये ओह, किसी तरह इस बेग़ैरत की घंटी बजाये. या समाज का घिसा पुराना जोड़-घटाव है कि जो चढ़ नहीं रहे चढ़ा नहीं रहे उनकी घंटी घटती घिसटती चली जाती है, घुट-घुटकर किसी तरह सांस लेती, ज़िंदगी का दाम असफलता का ईनाम लेती है? बाज वक़्त लगता है बस बजेगा अब्‍भी बजेगा मगर खामख़याली साबित होती है, मेरा तना रहना फ़ोन का चुप बने रहना बना रहता है..

Saturday, March 1, 2008

आइए, गंद में मुंह मारें..

बॉलीवुड और दुनिया के अन्‍य मुल्‍कों की फ़ि‍ल्‍मों में एक मूल फ़र्क यह है कि बॉलीवुड की कहानियों में एक हीरो होता है, एक विलेन, बकिया के सब जूनियर आर्टिस्‍ट होते हैं. कैरेक्‍टर आर्टिस्‍ट होते भी हैं तो उनमें कैरेक्‍टर कम, भेड़-बकरीपना ज़्यादा होता है. फ़ि‍ल्‍म के अलग-अलग प्रसंगों में वे रोने, मरने, इसके या उसके पीछे खड़े होकर दांत चियारने के लिए होते हैं. माने करते वे चाहे जो भी हों, होते भकुए ही हैं. लब्‍बोलुआब यह कि चमड़े के भले होते हों, उनका चरित्र नहीं होता..

तो बॉलीवुड सरितसागर के ज्ञानरत्‍न से धन्‍य भये हमारे समाज के ज्ञानपिपासु ब्‍लॉगसमाज में वही भकुआ बयार इस छोर से उस छोर तक बह रही हो, और गुणीजन- माने भकुआ जूनियर आर्टिस्‍ट- फुदक-फुदककर इसने ये कहा, अच्‍छा? के बाद उसने वो कहा तो फिर अच्‍छा?- के वैचारिक पंजीरियों से पौष्टिकता प्राप्‍त कर रहे हों, तो इसमें किसी को ताज्‍जुब नहीं होना चाहिए.. चुटकुले, भंड़ैती, गालियां, दोगलई के विहंगम विशदगानों से हमारी भारतीय आत्‍मा हमेशा पुलकती रही है, और पुलककर जुड़ा जाती है.. हर तरह के मवाद और किड़ि‍यों की अंगूठी व मुकुट की नौटंकियां जीकर हम हंसते हुए घर लौटते हैं.. हाथ-गोड़ धोकर ‘शुद्ध’ होकर जीमते हुए चरमानंद को प्राप्‍त होते हैं.. अभी थोड़ी देर पहले का मवाद और पेशाब याद नहीं रहता! अगले उन कुछेक घंटों तक वह याद भूली रहती है जब फुदक-फुदककर इसने ये कहा, अच्‍छा? तो उसने क्‍या कहा के खेल में दुबारा फिर बालसुलभ उत्‍साह के साथ शिरकत न करने लगें!..

भंड़ैती और ऊबकाई से आपका मन नहीं भिन्‍नाता? उसे बिना क्लिकियाये, बिना गंद में मुंह डाले ब्‍लॉगसमय सार्थक नहीं होता? आज इसने उसे गाली दी और उसने फिर इसे ऐसा नंगा किया के सिवा सुबह से ब्‍लॉग में कुछ और पढ़ा.. किसी और पाठ की याद है? हिंदी के ब्‍लॉग पर फ़ि‍नलैण्‍ड के बच्‍चों की शिक्षा संबंधी एक मज़ेदार रिपोर्ट छपी थी कितने लोगों की नज़र गयी उस पर? नहीं गई होगी.. इतने क्रियेटिव हाथ-पैर फेंके जा रहे हैं, उसे पढ़ते हुए शिक्षा-टिक्षा के बारे में पढ़ने की किसे फ़ुरसत है!

भौं के बाल नोंचते हुए बल्‍गेरियाइ औरतों का एक शोकगीत चढ़ा रहा हूं..

माओ की बतकुच्‍चन के बाद दुनिया..



माओ ज़ेदोंग ने कहा था साइकिल, रेडियो, हाथघड़ी और सिलाई मशीन से ज़्यादा आदमी चाहता है तो व्‍यर्थ चाहता है. मगर माओ के कहे के बाद यांग्‍त्‍सी में काफी पानी बह चुका है. चाहना के बीहड़ जंगल में उनींदे भाग रहे भटकौवे लोग भूल गए हैं क्‍या चाहना ऑथ़ेंटिक चाहना क्‍या अपने में बत्‍ती बालना है. जो नहीं भूले हैं हंसी व व्‍यर्थता के पात्र हैं. दे आर वेस्‍टेड, जैसाकि अंग्रेजी में कहावत है, उन्‍हें दुनिया भूल गई है.