Tuesday, April 29, 2008

क्‍या राष्‍ट्रीय हित.. कैसा राष्‍ट्रीय इतिहास?..

क्‍या ऐसा महज़ भोलेपन की अज्ञानता में होता है कि जिन आत्‍महत्‍या कर रहे किसानों का बोझ कम करने के लिए सरकार कर्ज़ माफ़ी का ऐलान करती है, उन किसानों को उस कर्ज़ माफ़ी का सबसे कम फ़ायदा मिलनेवाला होता है? जिन्‍हें मिलनेवाला होता है वह सरकार की नीतियों को प्रभावित करनेवाले, व पहले से ही फ़ायदे में रह रहे किसान होते हैं? या यह भी अज्ञानता की बेवक़ूफ़ी में ही होता है या सुचिंतित, सुनियोजित नीतियों की राह होती है कि टैक्‍स का ज़्यादा पैसा उन्‍हीं की सुरक्षा व सहूलियतों पर खर्च होता है जो यूं भी पहले से सुरक्षित हैं? या तब जब सरकार उच्‍च विशिष्‍ट तकनीकी शिक्षण केंद्रों के लिए तो कहीं न कहीं से पैसे मुहय्या करवा लेती है, मगर प्राथमिक शिक्षण की बदहाली दूर न कर पाने में हमेशा उसके पास पैसों के रोना की कहानी तैयार रहती है? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिन्‍हें हम ठहरकर, ज़रा गौर करके देखना चाहेंगे तो उसके पीछे की परतदार सच्‍चायी दिखेगी. दिखेगा कि "राष्‍ट्रीय हित", "राष्‍ट्रीय हित'" का जब डमरू पीटा जाता है तब ऐसा कोई प्रॉपरली डिफाइंड सबके हितवाला कोई राष्‍ट्रीय हित नहीं होता, किन्‍हीं वर्ग विशेषों के ही वे हित होते हैं. सबके हितों की बात झूठ और फ़रेब होता है. तब फिर राष्‍ट्रीय इतिहास क्‍या हुआ? इतिहासकार व नाटककार हावर्ड ज़ि‍न इस मसले पर कुछ दिलचस्‍प बातें करते हैं..

इधर-उधर कुछ नाम बदल देने पर यह किसी भी दूसरे देश की कहानी हो जायेगी. फ़ि‍लहाल ज़ि‍न अमरीका की कह रहे हैं.. राजा का बाजा बजानेवाले ऐतिहासिक नज़रिये से अलग अपना नज़रिया क्‍यों और कैसे तय किया, हावर्ड ज़ि‍न उसका अपनी मशहूर किताब के ठीक शुरू में ही खुलासा कर रहे हैं.. इस खोल को ज़रा आप भी अपने देश पर चढ़ाकर देखिए, बहुत अस्‍वाभाविक नहीं लगेगा.. और सीधी अंग्रेज़ी है, और मैं घटिया अनुवादक हूं.. इसलिए प्‍लीज़, अनुवाद क्‍यों नहीं किया का रोना न रोइये..
It is as if they—the Founding Fathers, Jackson, Lincoln, Wilson, Roosevelt, Kennedy, the leading members of Congress, the famous Justices of the Supreme Court—represent the nation as a whole. The pretense is that there really is such a thing as “the United States,” subject to occasional conflicts and quarrels, but fundamentally a community of people with common interests. It is as if there really is a “national interest” represented in the Constitution, in territorial expansion, in the laws passed by Congress, the decision of the courts, the development of capitalism, the culture of education and the mass media.

“History is the memory of states,” wrote Henry Kissinger in his first book, A World Restored, in which he proceeded to tell the history of the nineteenth-century Europe from the viewpoint of the leaders of Austria England, ignoring the millions who suffered from those statesmen’s policies. From his standpoint, the “peace” that Europe had before the French Revolution was “restored” by the diplomacy of a few national leaders. But for factory workers in England, farmers in France, colored people in Asia and Africa, women and children everywhere except in the upper classes, it was a world of conquest, violence, hunger, exploitation—a world not restored but disintegrated.

My viewpoint, in telling the history of the United States, is different: that we must not accept the memory of states as our own. Nations are not communities and never have been. The history of any country, presented as the history of a family, conceals fierce conflicts of interest (sometimes exploding, sometimes repressed) between conquerors and conquered, masters and slaves, capitalists and workers, dominators and dominated in race and sex. And in such a world of conflict, a world of victims and executioners, it is job of the thinking people, as Albert Camus suggested, not to be on the side of the executioners.
(हावर्ड ज़ि‍न की किताब 'ए पीपल्‍स हिस्‍टरी ऑव द यूनाइटेड स्‍टेट्स' के पहले अध्‍याय से. ऊपर का चित्र 'न्‍यूऑर्क टाइम्‍स' से लिया है)

खेम सिंह दसाना के लिए

Monday, April 28, 2008

अनर्गल की लोरी..



|| एक ||
अचक्‍के में कई बार लगा है निकलती रेल की खिड़की पर दीखी थी शायद, या कोई खराब दांतोंवाली बुढ़ि‍या बकवास कर रही थी बाद में होश हुआ, मगर उस बाद में तब बुढ़ि‍या कहां थी. या फिर धूप में बच्‍चों के खिलौने बेचता फेरीवाला, या किराये की हुज्‍जत के दरमियान अनजाने कोई बड़ी गहरी बात कह जाये रिक्‍शे के आगे-पीछे ज़िंदगी नचाता एक सींकिया नौजवान. इन्‍हीं आड़े-तिरछे तरीकों से तमाचे पड़े हैं समझ के, मिली है दुनियादारी. बहुत दिनों के अंतराल पर किसी दोस्‍त की स्‍नेह-संगत में देह ऐंठते, या देर रात सीढ़ि‍यों पर धीमे-धीमे अकेले नीचे उतरते उदासी मिली है, आत्‍मा नोंच खानेवाला बंजर मिला है समझदारी के भरम मिले हैं, समझदारी नहीं मिली है. पता नहीं समझदारी किस पेड़ पर उगती है. जिस पेड़ के नीचे जाकर हम खड़े हुए हैं बहुत मर्तबा आदत मिली है, समझदारी की छांह नहीं मिली है.

|| दो ||
सब सही-सही चल रहे हैं की समझ ज़रूरी नहीं सब सही ही चलाती हो. हमें लगता है गा रहे हैं जबकि बाहर से देखने पर साफ़ दीखता है हवा में कंकड़ और मुंह में मिट्टी चबा रहे हैं. मुंह में राख़ और कलेजे में आग हो तो शायद यही अच्‍छा है कि गुस्‍से की सनसनी बजाने की जगह हम सन्‍नाया सयानापन तान लें, ज़रा वक़्त के लिए राग गुमसुम की महफ़ि‍ल बहाल लें..

Friday, April 25, 2008

सब जगह, ससुरी, चढ़ रही है, बस हाथे को छोड़े हुए है!..

ताज़्ज़ुब की बात नहीं. ऐसी गरमी पड़ रही है तो चढ़ेगी ही. खुजली. सुबह से खौरियाये दिमाग़ को चैन नहीं है. रुक्‍खड़, पसिनियाये गाल, गरदन, कंधा सब खुजला चुका हूं, लेकिन हलक में गिलास पर गिलास पर गिलास पर गिलास पानी उतारते रहने के बावजूद जैसे आत्‍मा को चैन नहीं पड़ता, तमाम खजुलाहटोंपरांत मन भी है, ससुर, तृप्‍त नहीं हो पा रहा. जबकि हाथ में खुजली नहीं हो रही. हाथ में होती तो पता चलता पैसा आनेवाला है. शायद इसीलिए हमें पहले से ही पता चल गया था कि हाथ में नहीं आयेगी, तो इस तरह से कम से कम देह के एक हिस्‍से की खजुलाहट से हम निश्चिंत हैं. बकिया सब कहीं गुलज़ारीबाग़ है.. चिन-चिन-चिन ता धिन ता धिन घिन घिन घिन एक तरह की अजब घिन्‍नाहट है. कहने का मतलब चिनचिनाहट है. देह पर ईंटें का चूरा रगड़कर सूखे टंकी के बसाइल पानी से नहाने का जैसे एक रुमानी सपना मन में लहलहाये लेटा रहता हो, और रह-रहकर एक हुमस के साथ उमड़ने लगे, कुछ वैसे ही मैं लगभग-लगभग हौंड़ाये हुए रुमानी हो जाना चाह रहा हूं..

ख़्याली पंखे के ख़्याली डंडी से कंधे का कोई ख़्याली हिस्‍सा खुजलाते हुए मैं किसी सपने में डूबे रहना चाहता हूं.. मगर नहीं डूब पा रहा. पता नहीं क्‍या है. शायद ख़्यालीलोक में भी पानी की किल्‍लत मन हदसाये हुए है. फिर पैर की उंगलियों के बीच अचानक लगता है मानो लाल चींटियां मेला टहलने निकली हों! अबे, कुछ तो शरम करो? रहम?.. शायद हरमखोरों को मज़ा आ रहा हो.. मगर, माफ़ कीजिए, मैं मौज़ नहीं ले पा रहा. अनूप शुक्‍ल की तरह एसी ऑफिस में नहीं बैठा हूं. ऑफिस में बैठा होता तो कम से कम चपरासी को बुलाकर थप्‍पड़ मार देने की सहूलियत होती. या दिन तरंग में होता तो लीला चटर्जी हमें चप्‍पल मार देतीं? माने कुछ तो नाटकीय हुआ होता. लेकिन कहां हो रहा है. मैं बस खुजला रहा हूं. और गरमी जो है चभक के बैठी हुई है. अलबत्‍ता ठीक-ठीक कहां बैठी हुई है, हमारी पकड़ में नहीं आ रहा. आ रहा होता तो अपन चार कदम अलग हटकर बैठते. या खड़े ही हो जाते? या गरमी पर थूक आते. काफ़ी बार थूक आया हूं भी. मगर या तो गरमी अपने को बचा ले गयी है, या जैसाकि हमेशा मेरे साथ वैसे भी होता ही है- हम सही दिशा तय करने में गड़बड़ा गये हैं. गुलमोहर बानो की बजाय हमारी चिट्ठी गुड्डी मारुति की गोद में जाकर गिर गयी है!

ओह, कोई इस बदकार को परे नहीं हटा रहा. न खुद बेशरम हट रही है! ऐसा नहीं कि चंदामामा, इंद्रजाल कॉमिक्‍स लेकर किसी पीपल, बरगद, जामुन के नीचे जाकर अपना कोई नया ठौर करे, हमारी जान छोड़े? लेकिन कहां. बेहया हटने से रही.. मैं हटकर कहां जाऊं? आपके पास चला आऊं? या हड़बड़ाकर ज्ञानजी के बंगले पहुंच जाऊं?..

Wednesday, April 23, 2008

समझदार, गंभीर व गहरे लोगों की खोज में लड़की की दिक्‍कतें..

मैं हमेशा कोई नया एंगल पकड़ने की कोशिश करता और पकड़ नहीं पाता, और एक हारे-हारे से अहसास में बेचारगी महसूस करता. जबकि लड़की थी वह सारा कुछ पकड़े हुए थी और उस पकड़े को लगातार पीटती चलती. जब न पीटती होती तो पिट रही होती, मगर तेवर और पिच में विशेष फर्क़ न आता. मुंह खोलते ही वह व्‍यास की तरह चालू हो जाती कि यह सही है वह ग़लत है, मैं ऐसी हूं और वैसी हूं और दुनिया कितनी गंदी है और इसमें सांस लेना दूभर है और इस पर बम फेंक देने का मन करता है आदि. और इत्‍यादि. और इसके बाद वह निश्चिंतभाव एकरस घाराप्रवाह बम फेंकने लगती. दु‍निया जस की तस अपनी जगह बनी रहती, बस मेरे चिथड़े होने लगते. कभी इस भयानक थकाऊ ऊब को तोड़ने के लिए मैं हंसने लगता. फिर सहमकर चुप भी हो जाता कि मैं किसी और पर नहीं, महज अपने अज्ञान पर हंस रहा हूं. क्‍योंकि मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पाता था कि लड़की चाहती क्‍या है. जबकि लड़की तैयार घड़े की तरह सब समझी हुई थी. कुछ भी उसके ऊपर, या अंदर, गिरते ही उसका पीटना चालू हो जाता. या पिटना. सब एकदम मशीनी मामला था. और जीवन के जोड़-घटाव में मैं भले एकदम मशीनी हो गया होऊं, इस मशीनी मार-प्रतिकार के आगे मैं पूरी तरह अबस हो जाता. और किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ..

लड़की के नोटबुक में तीन बटे चार गुना दो भागा सात दुनिया का गणित एकदम साफ़ था. ये अच्‍छे हैं वो बुरे हैं फलाने नीच हैं ढिकाने अधम हैं और यही दुनिया है और इसी दुनिया में उसे रहना है और ओह, कैसे वह रह नहीं पा रही है! कभी मेरी इच्‍छा होती कि उससे कहूं वह बांग्‍लादेश चली जाये? बुरकिना फासो.. या राबर्ट मुगाबे के जिम्‍बाव्‍वे? शायद उन देशों में उसे चैन पड़े? मगर यह सब कहने की नौबत न आती.. क्‍योंकि लड़की ने आलरेडी बम चलाना शुरू कर दिया होता.. मेरी दुनिया की शांति, मूढ़ता, मेरे चेहरे के बाल सब उस आग में जलकर खाक़ हो रहे होते!..

अजब गोरखधंधा था. माने नौकरीपेशा लड़की बिना नौकरी के जीवन जी नहीं सकती थी, और नौकरी की जगहों पर सब कहीं उसे चिरकुट ही चिरकुट नज़र आते जिनके बारे में उसे जानने की कोई ज़रूरत नहीं थी क्‍योंकि वह तो दरवाज़े से दाखिल होते ही जान गयी थी कि ये चिरकुट हैं और चिरकुटों को इंडल्‍ज करना उसका नेचर था नहीं. ऐसा लड़की साफ़-साफ़ शब्‍दों में जानती ही नहीं थी, साफ़-साफ़ शब्‍दों में ऐलान भी करती थी. ऐसी दुनिया का फ़ैसला धुआं में उड़ाकर करने के अनंतर वह अपने शहंशाही फ़रमान पर लौट आती- कि मैं केवल समझदार, गंभीर व गहरे लोगों से बात कर सकती हूं! मैं सहमकर सांस लेता कि चलो, अच्‍छा हुआ वह बांग्‍लादेश, बुरकिना फासो और जिम्‍बाव्‍वे वाली सलाह मेरे मन में ही रह गयी. क्‍योंकि मैं नहीं चाहता कि लड़की मेरे कहने पर किसी ऐसी जगह पहुंच जाती, फिर वहां जाकर पीटना शुरू करती कि ये चिरकुट समझदार, गंभीर व गहरे हैं?..

पता नहीं किस मोह में मैंने अब तक स्‍वयं को बचाया, छिपाया हुआ है.. लेकिन घबराहट में लगता है अब किसी दिन अपने बारे में भी सार्वजनिक घोषणा कर ही डालूं कि क्षमा करो, प्रिये, मगर सच्‍चायी है मैं समझदार, गंभीर व गहरा नहीं हूं?.. आख़ि‍र बमों को बर्दाश्‍त करने की एक सीमा होती है.. हर कोई इराक नहीं होता..

Tuesday, April 22, 2008

ऊंट के मुंह में क्‍या..?

आनेवाले वक़्तों में शहरों व देहातों के बीच बढ़ती दूरी की खाई- और तद्जन्‍य उपजे व उबलते तनावों, टकरावों की कहानियां एक कंटिन्‍युअस डिस्‍टर्बिंग थीम बनी रहनेवाली हैं. विकास के जिस मॉडल का अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भोंपा बज रहा है, और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जाने कौन-से राष्‍ट्रीय चरित्र की सरकारें उसे समूचे देश पर ठेल रही हैं, उस विकास की एक ख़ास पहचान है कि वह देहातों का ‘मोलभाव’ करने से अलग- उसे अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहती.. इच्‍छाशक्ति का अभाव है जैसी बात नहीं, उस ऑल-इंक्‍लूसिव विकास का वह विचार ही अनुपस्थित है.. जैसे यहां और वहां का पैसा ले-लेकर सरकार उच्‍च शिक्षण संस्‍थाओं में खूब-खूब पैसा झोंकेंगी, मगर आज़ादी की इतनी लम्‍बी अवधि के बावज़ूद, प्राथमिक शिक्षा की ज़ि‍म्‍मेदारियों से हर स्‍तर पर पल्‍ला झाड़ते रहने का हर संभव प्रयास भी करेगी.. और जुड़े दिखने की कोशिश करेगी भी तो उसका चरित्र शुद्ध लफ़्फ़ाजी से ज़्यादा कुछ न होगा.. क्‍योंकि कंगले देहात के कंगले बच्‍चों के चौतरफे आत्‍मनिर्भरता की बजाय खाते-पीते कॉरपोरेट व सर्विस सेक्‍टर- राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय दोनों- की सेवा के लिए सिपाही तैयार करने में उसकी असल चिंता ज़्यादा होगी.. जो वह उत्‍कट उत्‍साह से कर ही रही है.. आनेवाले वक़्त में नये-नये आईआईएमआईआईटीज़ खुलें तो ऐसी ख़बरों से अपनी बांछें खिलाने के पहले आप एक बार राष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्राथमिक शिक्षा की बदहाली व उसके दो कौड़ी के बने रहने पर भी एक मर्तबा पहले सोच लीजिएगा.. क्‍योंकि वह चित्र भी इसी राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य का हिस्‍सा होगा!..

मगर फिर इतनी बड़ी संख्‍या में देहाती दुनिया व उस बड़ी आबादी का होगा क्‍या? क्‍योंकि सारा विकास अगर शहर केंद्रित हुआ और देहात उसके हिस्‍सेदार न हुए तो बेचारे वहां के लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे तो रहेंगे नहीं.. और न सब कर्नाटक, आंध्र, महाराष्‍ट्र के दिखाये जाजल्‍वयमान रास्‍ते पर उत्‍साह में आत्‍महत्‍या करने लगेंगे? फिर?.. रोज़ग़ार के मोह में जीवन की न्‍यूनतम व्‍यवस्‍था के लिए भाग-भागकर शहर आयेंगे कि शहर में राज ठाकरे के ठुल्‍ले लाठियों व गालियों से उनका स्‍वागत करें? या गांव में खैनी पीटते, ताश खेलते किसी महापुरुष, मदर टेरेसा.. या अपने बीच के किसी ‘बड़का’ हो गये की दयानतदारी के भरोसे बैठे रहेंगे जो विदेशों में कमाये पैसे से आकर उनका उद्धार करने कभी आयेगा?.. हमारे गांवों की बेहतरी अब महज़ ऐसे ही इंडिविज़ुअल एडवेंचर्स के ही आसरे चलेगी?..

शतुरमुर्ग की तरह हम विराट देहाती परिदृश्‍य से आंखें न मूंदे रहें.. और उसकी याद सिर्फ़ चुनावों के दौरान ही न करें.. विकास में कैसे उसकी भी हिस्‍सेदारी हो यह सब सोचनेवाली बातें है.. या फिर.. जैसाकि ढेरों लोगों ने, सामाजिक स्‍तर पर उम्‍मीद छोड़कर, उसे निजी सेवाभाव के आसरे छोड़ दिया है, जो आज के उदास वक़्त में खुद में स्‍वागतयोग्‍य बात ही है- जैसाकि साथ के इस लिंक में विश्‍व बैंक में कार्यरत उड़ीसा के दिलीप रथ की सदिच्‍छाओं की खुदबयानी की कहानी में आप देख सकेंगे.. मगर ऐसे उद्यमों का वृहत तस्‍वीर बदलने में ऊंट के मुंह में जीरा से ज़्यादा क्‍या असर होगा? होगा?..

Monday, April 21, 2008

मैं कूबा हूं.. अथ कुत्‍ता मनोभाव के कुछ चित्र..

मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्‍यार में ऐ कविता.. या सविता? कि नमिता?.. वैसे मुझ से क्षुद्र व छिद्र-सज्जित, जाने किस तरह की मनई के लिए, शायद अच्‍छा यही हो कि मैं वंचिता के प्‍यार में ही जो बनना हो, बनूं.. प्रैगमैटिक और डॉगमैटिक दोनों ही रुपों में यह रास्‍ता संभवत: सबसे कम रिस्‍की रास्‍ता रहे?.. शायद?.. वैसे क्‍या यह सही नहीं कि- वंचिता और संचिता तो बाद की बात हैं- प्‍यार में तो कुत्‍ते के भी पड़ना कम रिस्‍की नहीं होता? मुझसे नहीं, विमल से पूछिये. कुत्‍तों से प्‍यार के विमल के विहंगम व ज़्यादा गहरे अनुभव हैं. मेरे अनुभव ज़्यादा कुत्‍ता-अनुभव ही हैं. माने बड़ी सीधी बात है कि नौकरी छूटते ही संवेदी समाज जैसे आपको फेसबुक की अपनी लिस्‍ट से (चुपके से) हटा देता है, तो कुछ उसी तरह से किसी कविता (या सविता) के जीवन में आते ही आप (पता नहीं किसको) कुत्‍ते की तरह काट खाने को विकलने लगते हैं! अब दिक्‍कत यही है कि वह लव-बाइट कम होती है, मोस्‍टली कुत्‍ता-बाइट होती है. मोस्‍टली हमें आज तक यही सुनना पड़ा है कि आदमी की तरह नहीं काट सकते थे? आदमी हो या कुत्‍ते?.. मैंने हमेशा पलटकर जवाब देना चाहा है, मगर हमेशा पलटकर जवाब देने से रह भी गया हूं.

कहने का मतलब नमिता, या वंचिता के प्‍यार में कवि, या कुत्‍ता, होना मज़ाक नहीं! कवि होना ज़्यादा ख़तरनाक है. क्‍योंकि कवि होते ही आप अपने को गंभीरता से लेते हुए कवितायें लिखना चाहने लगते हैं, जबकि बाकी लोग आपको गंभीरता से लेना बंद कर देने लगते हैं.. परिणामत: अदबदाकर आपका कटखनापन उभर आता है, और आप कवि होवें उसके पहले कुत्‍ता हो जाते हैं?..

कुछ इसका वे-आऊट होगा. मैं कवि होता तो आपको बताता भी, मगर हा: जीवन, कवित्‍व के रास्‍ते कहां, कुबा के रास्‍ते यह हतभागा भागा गया.. एक एंगल उसका यह भी है.. जो है, सुनिये.. कल रात एक मित्र ने साठ के दशक की एक मशहूर क्‍यूबन फ़ि‍ल्‍म 'सोय कुबा' की डीवीडी आंखों के आगे झुलाया.. और मैं चट् से जीभ बाहर निकालकर कुत्‍ता होने लगा! अनंतर बतिस्‍ता सरकार के दिनों क्‍यूबन लोगों के शोषण के मार्मिक किस्‍सों से भरी फ़ि‍ल्‍म को देखते हुए भी तन व मन में कुत्‍ताभाव बढ़ा ही, कम नहीं हुआ. देर रात घर लौटा तो ख़बर हुयी जो पॉडकास्‍ट की पोस्‍ट अपन चढ़ाकर घर से बाहर निकले थे उसमें तकनीकी लोचा है, और कोई माई का लाल (या लाली) उसे कान उल्‍टा करके भी नहीं सुन सका है. मेरे मेल में चार महीन किस्‍म की निजी शिकायतें थीं. महीन थीं या मोटी थीं, थीं शिकायतें ही. कहने का मतलब यही कि ऐंड़े-बेंड़े किसी शक्‍ल में मैं कवि होने के रास्‍ते पर गलती से पहुंच भी गया होता तो पलटकर एकदम से कुत्‍ता मन:स्थिति में लौट ही आता. लौट ही आता क्‍या लौट आया ही..

और अब सोच रहा हूं सविता, या वनिता के प्‍यार में कविता करने की जगह सबसे पहले उस पोस्‍ट को काट खाऊं जो अब तक बिना मुंह खोले मुझे चार जगह (दूसरों को पता नहीं कितनी जगह) घायल कर चुका है!

अच्‍छा नहीं लग रहा.. मतलब सुबह शुरू करने का यह भला कोई तरीका है? आदमी की तरह काटने की जगह कुत्‍ते सा काटना.. तरीका? या सलीका?..

Saturday, April 19, 2008

कहां-कहां से गुज़र गया..

इटली के वामपंथी बुद्धिजीवी और माइकल हार्ड्ट के साथ 'एंपायर' और 'मल्‍टीच्‍यूड' के प्रसिद्ध सह-लेखक अंतोनियो नेग्री पर कल रात एक डॉक्‍यूमेंट्री देख रहा था. उस पर बात करने का फ़ि‍लहाल मुझे धीरज नहीं है, न अभी ऐसे किसी गंभीर विमर्श की मन:स्थिति, या तैयारी. लेकिन नेट पर नेग्री संबंधी खोज-खंगाल में कुछ जो दिलचस्‍प लिंक हाथ लगे, उन्‍हें आपके साथ शेयर कर रहा हूं. एक तो खुद में समूची 'एंपायर' किताब ऑनलाइन यहां उपलब्‍ध है. ऑनलाइन नेग्री भी उपलब्‍ध हैं, मगर मेरे लिए सिर्फ़ मुस्‍करा रहे हैं, देखिए, आपके लिए उससे कहीं आगे जा रहे हैं या नहीं.. ग्‍लोबलाइज़ेशन और कम्‍यूनिकेशन पर यूरोज़ीन से हार्ड्ट और नेग्री का यह एक मज़ेदार लेख है. वहीं इधर-उधर भटकते हुए आज दार्शनिकों के लिए नीत्‍ज़े और बॉब डीलन की कविताई का मतलब क्‍या है से लेकर चीन के ब्‍लॉगिये तक पर कुछ दिलचस्‍प टुकड़े दिख रहे थे. आप भी नज़र मारकर आनंद लेना चाहते हों तो लें. वैसे मेरी सलाह है कम से कम नेग्री और हार्ड्ट की 'एंपायर' की एक कॉपी अपने कंप्‍यूटर में सेव करके ज़रूर रख लें, और ज़रा फ़ुरसत का माहौल बने तो लगे हाथ उसे पढ़ भी डालें.. और हां, चलते-चलते एक नज़र इसे भी देख लें..

Thursday, April 17, 2008

ज़ि‍न का जिन्‍न..

जैसा नेट सर्फिंग में आमतौर पर होता है कि आप एक जगह से भटकते हुए दूसरी जगह जाकर अटकते हैं, मैं पिछले तीन-चार दिनों से कुछ लेखक हैं, किताबें हैं, सरक-सरककर उनके बीच पहुंच रहा हूं. हार्ड कॉपी नहीं, सॉफ्ट कॉपी, वह भी ई-बुक्‍स से ज़्यादा ऑडियो बुक्‍स की शक्ल में. ई-किताबें ज़्यादातर चॉम्‍स्‍की साहब की हैं (जिसे चाहिए ई-मेल लिखकर मुझसे प्राप्‍त कर ले. क्‍योंकि मैंने भी प्राप्‍त ही किया है, कंप्‍यूटर के स्‍क्रीन पर कोई राइट-अप पढ़ने में ही कांखने लगता हूं, तो किताब, और वह भी चॉम्‍स्‍की साहब की, कब पढ़ूंगा, मेरे लिए शुद्ध रहस्‍यवाद है).. ऑडियो किताबों की शुरुआत हुई थी अपने मोतिहारी की पैदाइश बाबू जॉर्ज ऑरवेल के ‘1984’ की एक सन्‍न कर देनेवाली रिकॉर्डिंग से. लगा, गुरु, यह तो बड़ा मज़ेदार मामला है? उसके बाद से अपन तफ़रीह में जुटे पड़े हैं. बहुत सारे चिंतकों और उनकी पिनकों का हमने कंपाइलेशन कर लिया है. नाम नहीं गिना रहा क्‍योंकि नहीं चाहता कि सुबह-सुबह आपका हाजमा बिगड़ जाये. मगर दूसरी दिल जुड़ानेवाली चीज़ों के साथ एक जो काम की चीज़ हाथ लगी है, वह हॉवर्ड ज़ि‍न की ‘ए पीपुल्‍स हिस्‍टरी ऑव द युनाइटेड स्‍टेट्स’ के आखिरी के हिस्‍से की मैट डेमन की आवाज़ में रिकॉर्डिंग है. उस हिस्‍से के एक टुकड़े की झलक आप यहां देख सकते हैं. पहले के हिस्‍सों में से, दूसरे चैप्‍टर की सैंपलिंग यहां है. पतली-दुबली क्षीणकाया ज़ि‍न साहब के जोश से अपने भीमकाय समीर भइया को निश्चित ही सबक लेना चाहिए. मैंने पहले ही ले लिया है, इतिहास की गुरु गंभीरता को एनिमेशन के अगंभीर चश्‍मे से देखने की कोशिश कर रहा हूं. आप भी अपनी औकात अनुरूप दृष्टि व कोण तय कीजिए..

Wednesday, April 16, 2008

आमतौर पर छेरते रहनेवाले बचपने के विरुद्ध..

आमतौर पर बच्‍चे अच्‍छा होना चाहते हैं. मगर बहुत बार नहीं हो पाते. बहुत बार यह इसलिए भी होता है कि वे अपने बचपने की जगह यहां-वहां लटके आमों के पीछे भागते हैं.. भागते ही नहीं, मुंह भी मार आते हैं, और उस फोड़ा-फुंसी वाले मुंह से इधर-उधर फोड़ा-फुंसी फेंकते हुए उसीको अपनी पहचान बना लेते हैं.. और इस तरह अच्‍छा बच्‍चा होने से रह जाते हैं.. ऐसे बच्‍चे की दिक़्क़त होती है कि बहुत टेरता है, जहां ज़रूरत न हो वहां पहुंचकर छेर आता है.. घर में घुसते ही कहेगा पेचिश है, जबकि बाहर निकलते ही ठेलना शुरू कर देगा कि हमको ‘जाना’ है? कक्षा में इसे अदबदाकर जाना पड़ता रहता है. मिस और माट्साब ही नहीं, बकिया के बच्‍चे तक आज़ि‍ज़ आ जाते हैं कि देखो, अब टुन्‍नुआ जाने की बात करेगा? देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती, टुन्‍नुआ चट् से अपनी बेंच पर खड़ा हो ही जाता है कि सरजी, हमको जाना है! या चाचाजी, मौसाजी, भैयाजी.. सामनेवाला विशेषण कुच्‍छो बदल जाये, जाने की बात अपनी जगह अटल बनी रहती है!..

ऐसा नहीं कि बच्‍चे छेरते नहीं. छेरना बच्‍चा-स्‍वभाव है. मगर टुन्‍नू बच्‍चा-स्‍वभाव की विशिष्टिता है वह निहायत नाटकीय परिस्थितियों में भी प्रेडिक्‍टेबल बना रहता है. ऐसा नहीं कि कक्षा में कोई नयी मिस लाल या मिस मोइत्रा आ गयीं और उनकी खूबसूरती के असर में टुन्‍नू लाल का हाजमा किसी नयी चाल पर निकल ले. ना, वह असंभव होगा. वह टुन्‍नू प्रकृति के विपरीत होगा, टुन्‍नूपने के विरुद्ध होगा. वह जो होगा फिर टुन्‍नू नहीं होगा. टुन्‍नू तो यही होगा कि मिस लाल या मिस मोइत्रा उसे कक्षा के अंदर गंदगी करने के लिए बरजें तो टुन्‍नू बाबू दरवाज़े पर छेर आयें. या नींबू के झाड़ के गिर्द घेरेवाले ईंटों के पास, और भले मिस लाल या मिस मोइत्रा समस्‍त छेराई प्रसंग भूल गयी हों तब्‍बो टुन्‍नू मियां क्‍या मजाल की उन्‍हें भूलने दे जायें? नज़दीक आकर उनकी उंगली थाम लें कि मिसिस, नहीं आप समझ नहीं न रही हैं, अरे, नहीं, कच्‍छा में नहीं, नींबुआ का झारी का पास झारा छेरे हैं?..

बच्‍चा और बचपन बड़ी सुहानी चीज़ें हैं. आमतौर पर उसकी ओर मुंह करके जीवन के आशामय होने की सहज प्रतीति होती है, मन जुड़ाता है. लेकिन यह मत भूलिये कि आमतौर पर कह रहा हूं, हरतौर पर नहीं. हरतौर में बहुत सारे ऐसे टुन्‍नू और मुन्‍नुओं की भी शुमारी होती है कि वह कैसी भी महफ़ि‍ल को अपनी छेर से सजाने चले आयेंगे. और सजायेंगे ही नहीं, लेंस नचा-नचाकर बार-बारके सबको दिखाते भी रहेंगे कि देखो, कैसा अच्‍छा छेरे हैं न, जयदीप भइया? बहुत चिनुर-चिनुर कै रहे थे, हमने कहा देखिये, बोलते हैं, चुप रहिये नहीं त् अभिये चुपवा देंगे तब बुझा जायेगा? लेकिन काहे ला, नहीं चुपा रहा था, भइया, तब हम आव देखे न ताव, नारा खोले और वहिंये छर्र-छर्र छेर दिये, सब महफ़ि‍लये डेगमेगा गया, हं!

इस दुनिया के टुन्‍नू.. और मुन्‍नू.. सचमुच धन्‍य हैं. कभी-कभी सोचता हूं क्‍या करना है मुंह लगके, अपने वैसे ही इतने टंटे हैं, और क्‍या पता हमने मुंह खोला, हमरे मुंहें पर ससुर छेर जायें.. तो अच्‍छा-बुरा सोचकर चुप रह जाते हैं.. मगर कभी-कभी फिर ससुर नहीं भी रह पाते.. छेरने के विरुद्ध बोलते-बोलते हम भी अंतत: छेरते ही होते हैं.. इस महकाइन के लिए माफ़ कीजिएगा..

Tuesday, April 15, 2008

दु:ख के प्रकार..

मुंह पर हाथ ढांपे मैं हैरानी से डाक्‍टर को देखता हूं. जबकि डाक्‍टर बिनहैरानी मेरा हाथ सरकाता बेशर्मी से मेरे दांतों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है. दिमाग़ में एक दु:स्‍साहसी ख़्याल आता है- कि ससुर के खींचकर कुर्सी पर पटक दूं, और अपने दांतों की जगह इनके को नुकीले औज़ारों से खोदना शुरू करूं?- लेकिन दांतों की जगह पता नहीं मैं और कहां-कहां क्‍या खोद और मरोद डालूं, और दांत के दर्द के साथ हाथ में जाने कैसा एफआईआर का नया मर्ज़ चढ़ जाये, तो दु:स्‍साहसी ख़्याल पर रहम खाता उसे निकल भी जाने देता हूं. बेशर्म डाक्‍टर मुस्‍कराकर सवाल करता है- यहां दर्द हो रहा है? ऐसे तक़लीफ़देह क्षणों में मुंह जितना अलाउ कर सकती है, उतने अलाउडनेस में लाऊड होकर बरसता हूं कहां नहीं हो रहा है? डाक्‍टर मुस्‍कराता रहता है. और चित्रा सिंह नहीं, प्रमोद सिंह रोता रहता है, दर्द बढ़कर फुग़ां न हो जाये?..

घुटना मोड़ो तो मुड़े हुए घुटने को तक़लीफ़ होती है. न मोड़ो, किसी सहारे से हवा में ऊपर टांगे रखो तो कुछेक देर में एक अजीब सी सनसनाहट होती है (कानों में होती है, वह अलग है), टांगे हुए को ज़मीन पर उतार दो तो तलुओं में एक आग-सी फैल जाती है! अरे, क्‍यों हैं जीवन में इतने दर्द? टोटल कितने हैं? बुद्ध ने शॉर्टहैंड में एक लेंड़ी लाइन कह दिया था- जीवन में दु:ख है- और चुप्‍पे से ससुर बिहार और यूपी टुअर पर निकल गए थे! जबकि मुझे लगता है आज निकलने की नहीं, ठहरकर प्रॉपरली दु:खों के लिस्टिंग की ज़रूरत है! बारातियों को पकवान के कितने प्रकार पेश किये जायेंगे पता रहता है, टुच्‍ची हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का जानर पता रहता है, फिर चुनाव हुए तो इस तरह या उस तरह किस-किस तरह हम नये लात खानेवाले हैं इसकी स्‍पष्‍ट प्रतीति होती है, फिर दु:ख के प्रकारों की क्‍यों न हो? मैं चुन्‍नू की मम्‍मी नताशा त्‍यागी की साड़ी पकड़ता हूं- भाभी, जीवन में कितने दु:ख हैं, ज़रा उसकी लिस्टिंग समझाइए?..

नताशा त्‍यागी मुझे ऐसी चोटखायी नज़रों से देखती हैं मानो उनकी साड़ी पकड़ने का मेरा तरीका उन्‍हें दु:खी कर गया हो. चुप रहती हैं. मैं चिढ़कर कहता हूं- अरे, आप पकवान बनाती हैं, उसके प्रकार होते हैं कि नहीं? फिर दु:ख के क्‍या होते हैं, बताइए मुझे?

मिसेज़ त्‍यागी अच्‍छी भाभी की तरह मुझ बुरे देवर का हाथ अपने हाथ में लेकर दुलार से कहती हैं- पकवान सिर्फ़ दो तरह का होता है. प्‍यार में पकाया हुआ, या बेगार से बनाया हुआ.. दु:ख का मैं नहीं जानती.

गुस्‍से में हाथ छुड़ाता मैं तुनककर कहता हूं- कैसे नहीं जानतीं? और दो ही तरह का कैसे होता है पकवान? शिष्‍टाचार के व्‍यभिचार में नहीं बनता पकवान? वह नयी किस्‍म नहीं हुई? और वह जो इतवार को बनता है? चुन्‍नू के फादर जो लास्‍ट टाइम बीमार पड़े थे, और आपने ख़ास बीमार का पकवान बनाया था, उसका क्‍या?..

उसका कुछ नहीं. भाभी निर्मोही होकर मेरा हाथ और साथ छोड़ देती हैं, मैं सिर घुनने को अकेला छूट जाता हूं.. मगर इतना अकेला भी नहीं छुटता हूं. कॉरीडोर में फुसफुस कर रही उस उम्र की चार-पांच देसी लड़कियां हैं जो एक-दूसरे को कोंच-कोंचकर फुसफुसाहटों में पूछ रही हैं- रेनु, तेरे को वो वाला गाना याद है, बोल ना? अच्‍छा, वो वाला? मैं मौक़ा-ऐ-नाज़ुकी का ख़याल करके संजीदा बने रहने की जगह डपटकर बरसता हूं, अबे, ये गाना-टाना छोड़ो, बताओ मुझे जीवन में कितने दु:ख होते हैं? पूरी लिस्‍ट दो, अभी!..

इस अप्रत्‍याशित आक्रमण से लड़कियां एकदम सन्‍न. फुसफुसी बेचारियां एकदम ढेर हो जाती हैं. एक के मुंहासाभरे उदास चेहरे पर किसी तरह एक पोस्‍ट-बीमारी रंगत लौटती है, और वही है जो सिर झुकाये मेरे सवाल का फुसफुसाकर जवाब देती है- जीवन में दु:ख तो एकीच है, अंकल.. कि अभिषेक ने मेरे को अपना नईं बनाया!..

जीवन में बेवक़ूफियों का अंत है? या दु:खों का? फिर भी मैं हूं कि भावुकता के आशावाद में उनकी लिस्टिंग के सपने संजो रहा हूं. क्‍या मालूम, शायद सचमुच कोई दिन हो जब तकिये के नीचे पूरी लिस्‍ट रखकर आश्‍वस्‍त हो सकूं, घोड़े या जो भी पास में हो, बेचकर चैन से सो सकूं.. कि मालूम रहे कि सपने में दु:ख आकर ऊटपटांग छलांग नहीं मारने लगेगा.. और मारेगा भी तो मैं डांटकर उसे बरज सकूंगा कि ससुर, तुम लिस्‍ट में एक्‍ज़ि‍स्‍ट नहीं करते तो खामखा फुदको मत? और दु:ख बेहया मुंह गिराये ज़मीन पर चला आयेगा और मैं गर्व से मुंह उठाये मज़े में सो सकूंगा?..

ओह, कितना आह्लादकारी दिन होगा, मगर पता नहीं कब होगा? अभी तो लिस्‍ट वाली बात लटकी ही हुई है.. ग़लती से कहीं आपके पास तो नहीं? दु:ख के प्रकारों की ऑथेंटिक लिस्टिंग?..

Monday, April 14, 2008

दो चुनावी नतीजे..

दो देशों में ताज़ा चुनाव सम्‍पन्‍न हुए हैं. नेपाल के लाल नतीजे संभवत: लम्‍बी पारी में देश की बेहतरी का सबब बनें, वहीं इटली में बहके व बेलगाम बेर्लुस्‍कोनी का उछलना, जाननेवाले समझते होंगे, देश को किधर की ओर उछालेगा. जिनके पास इन निहायत विपरीत परिणामों को देखने का कुछ उत्‍साह व धीरज हो, वे यहां और यहां नज़र मार सकते हैं..

Saturday, April 12, 2008

धूप में दिन..

चमकती धूप में चिटकता है दिन. धीमे-धीमे चढ़ती है गरमी बालों में, चिनकती है त्‍वचा, ललकते हैं गाल. सां-बां शोर के सुलगते धुओं के बीच फैलती चली जाती हैं तपती मोरम पट्टि‍यां, एक लयहीन लय में बेआवाज़ मद्धम-मद्धम चिटक रही चट्टि‍यां. कहीं बैठकी लगी थी, बजा था लेकिन अब हटा लिया गया है बाजा की तर्ज़ पर हल्‍के बिम्‍ब बनते हैं गर्म हवाओं में घुलते हैं. अच्‍छे कामवाला एक टूटा मटका, झुलनी नेकर में खुद की लफंगई में हारा लड़का, खूले में झुलस रहे कुछ रद्दी के समाचार, प्‍यास में पस्‍त व लम्‍बे इंतज़ारों में ध्‍वस्‍त शनै-शनै एक बेमतलब होता प्‍यार. आहिस्‍ता तन रही एक घनघनाती ख़ामोशी का फैल रहा जंगल है, तमककर उद्वि‍ग्‍न मन खुदी में छिनकता, खुद को उठा-उठाकर पटकता है. कहने का मतलब एक बड़ा आमफहम, सामान्‍य लाचारी के सिलसिले हैं, तपते बुखार का कारोबार है. चमकती धूप में चिटकता है दिन.

Friday, April 11, 2008

विज़नरी पप्‍पूजी का दिखाया रास्‍ता..

पप्‍पूजी, ज़रा कष्‍ट करें, देखिये, लगता है बात फिर उलझ गयी है, कृपया उसे साफ़ व स्‍पष्‍ट करें. आख़ि‍र यह हो क्‍या रहा है? हम चल रहे हैं, चल रहे हैं लेकिन कहीं पहुंच रहे हैं, कि बस यूं ही घलुआ में टहल रहे हैं? वैसे टहलना बुरी बात नहीं, थ्‍यूरोपैटिक होता है से ज़्यादा अन्‍य वजहें हैं जिनके पीछे वेर्नर हर्जोग और ब्रूस चैटविन बड़के टहलवैया थे, मगर पप्‍पूजी यह भी जान लीजिए कि हम न वेर्नर की तरह पगलेट हैं, न चैटविन की तरह हमारा इत्‍ती जल्‍दी अल्‍ला मियां से डेट है. तो बउआ, प्रताप न पाने का संताप भले हो मगर टहलते-टहलते हम टीले से डुलडुलाते फिसलना नहीं चाहते. अभी टू डू वाले लिस्‍ट में बहुत सारी बातें हैं, पप्‍पूजी, कितनी झमझमाती बरसातें, कड़कड़ाती सर्द रातें हैं. बैंगन के, ओहो, बजके, आंबड़े का अचार, बुंदिया में लपेटकर पूड़ीवाली बेहया बरातें हैं. कहां से कहां के रेल सफ़र और ज़ीनत बेगम की छुटकी बहिनी से भेदभरी मुलाक़ातें हैं?

समझ रहा हूं हम बहक रहे हैं लेकिन उसी की हुड़क में तो आपको टोका किया, पप्‍पूजी? बसवाले भाई साब ख़ामख़्वाह हमारी नासमझी पर नाराज़ हो रहे थे. इतनी ज़रा सी चौपाल ठीक से समझ नहीं आती हम कहां से नेपाल का हाल सल्टियाते? रास्‍ता काटने को भले थोड़ी देर और बकबक करते, लेकिन दूध का दूध और पानी का पानी कर लें, ऐसा क्‍या खाक़ समझ लेते, बतियाते? पता नहीं लोग इतना अधीर क्‍यों रहते हैं, पप्‍पूजी, ज़रा मन बहल जाये की हंसी की कोई बात कह लो, उस पर जाने इतनी लंबी तक़रीर क्‍यों करते हैं?

मगर यह हम किधर जा रहे हैं, पप्‍पूजी? कि आ रहे हैं? हद है अभी कितना पहले की बात है, सोचते थे झोले में चार कपड़े लेंगे अरुणाचल घूम आयेंगे, देखिये, क्‍या मालूम था कि घग्‍घा और तीन कटोरा की कच्‍ची सड़क और सूखी गड़ही के पास ही गोड़ हिलाते पाये जायेंगे? बाबू, माना हम क्रेडिट कार्ड पुरोधा, बड़के मणिरत्‍नी जोद्धा नहीं, मगर इस तरह हमारे सपनों का मज़ाक मत बनाइये, हुलु-हुलु करके हमको खाली छुच्‍छे गोले में फलतुव्‍वा मत घुमाइये! अरे, यह ज़नाना तो पहचानी लग रही है, पप्‍पूजी, एक आंख की कानी, जनरदना की नानी लग रही है? अरे, हम नाख़ून कटवा रहे हैं कि जी, कान में भर्र-भर्र कड़ुवा तेल गिरा रहे हैं?

बोलें? बोल दें, बुरा नहीं न मानियेगा? सच्‍चाई ई है, पाहुन, गरम दुपहरिया का ताप में आप टुट्टल पानदानी जइसा अपना फलतू देमाग़ चला रहे हैं!

खुशी क्‍या ग़म क्‍या..



महंगे जूतों की दुकान में कल दिखा सुख.. हाथ में नाओमी क्‍लाइन की नयी किताब लिये चहकता-चमकता.. कुछेक फर्लांग की दूरी पर ही वह भी रहा होगा.. अरे, वही, अपना पुराना पहचानी- दु:ख.. पटरी पर सस्‍ते हवाई चप्‍पलों को हारी हसरत से तकता.. पता नहीं कहां क्‍या-क्‍या खिचड़ी पकाते रहे हैं दोनों पुराने यार.. धमक, कसक के खिंचे, तने.. फंसे-फंसे तार.. आप भी एक नज़ारा लीजिए..

Thursday, April 10, 2008

छोटे-छोटे काम..

अख़बार पर यूं ही आंख घुमाना, या इस ओर खड़े सड़क के उस पार जाना. दीवार पर का कैलेण्‍डर हटा लें या अभी रहने दें का असमंजस, आज अचार आम का खायें या कटहल का- या अरे, कब से नहीं है अचार? फिर जुगड़ि‍याना होगा? कहां से लायें की पीर अपार. यह तौलिया उल्‍टा किसने डाल दिया, या गाड़ी तिरछी ठेल दी, या चप्‍पल दरवाज़े के पीछे फेंक दिया. इस पजामे का नाड़ा कहां गया? अच्‍छा, चलो, लाओ, आज घड़ी बनवा ही लायें, या टिंकु को डॉक्‍टर के हियां दिखलवा लायें? देखो, फिर तुम्‍हारे ब्‍लाऊज़ की सिलाई उघड़ी हुई है, या यह यहां कैसा कागज़ गिरा हुआ है? फ़ोन पर तिन्‍नी दी क्‍या बोल रही थीं? यह तार पर कौन चिड़ि‍या है? पेड़ पर किसका फूल? लो, ससुरी, पैर की नस फिर खिंच गयी. यह कुर्सी इतने दिनों से ठीक चल रहा था हमारे ज़रा से बोझ से, देखो, भसक गया?

बड़े कामों का वक़्त कब निकलता है. छोटे-छोटे इतने कितने तो काम होते हैं. छोटा जीवन इतना तो बझा-बझा होता है. बड़ा जीवन हाथ कब आता है?

सोचने के एडवेंचर्स..

कल के पोस्‍ट में बीबीसी की हिंदी सेवा के कुछ ऑडियो फ़ाइलों का लिंक दिया था. भारत के आंतरिक क्षेत्रों में सरकारी स्‍कूलों की दशा-दुर्दशा पर वह सहज व ‘रेस्‍ट्रेंड’ तरीके से काफी मार्मिक टिप्‍पणियां करती है. बीबीसी के पास ढांचा है, लोग हैं, पैसा है, ज़रूरत समझेगी तो ऐसे उद्यमों से चार कदम आगे जाकर वह और रोचक कामों को अंजाम दे सकती है. लेकिन वह बीबीसी की, विकराल कॉरपोरेट उद्यम के संभाव्‍य कसरतों की बात हुई. सोचने को मैं सोच रहा था एक माइक और कोई सरल रेकॉर्डिंग डिवाइस की सहायता से ऐसी जाने कितनी, और किन-किन स्‍तरोंवाली कसरत हम भी तो अंजाम दे सकते हैं? अगर हमें देश के भविष्‍य की चिंता हो, उन चिंताओं में अपनी उपस्थिति व भूमिका में हमारा किसी तरह भरोसा बनता हो? जैसे फ्रंटलाइन के ताज़ा अंक में महंगाई की कवर स्‍टोरी की अलग-अलग टिप्‍पणियों को पढ़ता पेंचदार मसले की परतों को थोड़ा समझता लेकिन ज़्यादा में अटकते मैं सोच रहा था यही मसले अगर इंटरेक्टिव, बातचीत की शैली में चंद विशेष जानकारी रखनेवालों की संगत में होता तो हमारी तरह की ले और लोढ़ा समझवाले अब तक ज़रा जेनुइन समझ बना चुकते कि महंगाई, किसानी, इंटरनेशनल ट्रेड और बड़े कॉरपोरेट्स का रिटेल मार्केट में आना आपस में किस-किस तरह से गुंफित हैं. अभी जो है कि कुछ जेनरलाइज़्ड सूत्र बुनते हैं, समझ नहीं बनती..वह समझ कहां, किन रास्‍तों से बनेगी?

मसलन यही लीजिए कि खाद्यान्‍न की हमारी बेसिक ज़रूरतें क्‍या हैं, आज़ादी के बाद से अब तक सप्‍लाई का सीन क्‍या रहा है. जन वितरण प्रणाली काम कैसे करती थी, और धीमे-धीमे उसमें से सरकार के हाथ खींच लेने के बाद किन-किन स्‍तरों पर खाद्य वितरण व उपभोग में फर्क आए हैं? खाद्यान्‍न का मार्केट ठीक-ठीक काम कैसे करता है? जेनरल ग्राफ़ क्‍या बन रहा है- हम कुछ बेहतरी की तरह बढ़ रहे हैं, या डिसास्‍टर की तरफ़ दौड़ रहे हैं?

इसी तरह से शिक्षा, सड़कों का इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, शहरों की बुनावट, उनकी कार्यप्रणाली- समाज व देश के ऐसे कितने प्रसंग हैं जिसमें इस तरह के छोटे-छोटे उद्यमों की सहायता से हम आपस में दिमाग़ की कितनी खिड़कियां, व दरवाज़े खोल सकते हैं! क्‍योंकि उनके खोलने का काम अब हमारे ये राष्‍ट्रीय अख़बार और ख़बरिया चैनल्‍स तो करने से रहे. वे हमारी समझ बनाने व शिक्षा के दायित्‍वबोध से बाज़ार में नहीं आये हैं, धंधा करने आये हैं. और उसमें कुछ अस्‍वाभाविक भी नहीं. लेकिन हम मोटी चमड़ीवालों को रोशनी कौन दिखायेगा? वह तो, अगर ऐसी चाहनायें होंगी, तो हम ही दिखायेंगे न, हुज़ूर? सम्‍यक, सूचनात्‍मक और जितना संभव हो भावुकता से परे ऐसे उन सभी विषयों पर जो हमें चिंतित व उद्वि‍ग्‍न करते हों- हम छोटी-छोटी सधी तैयारियों के बाद उसका एक जगह ऑडियो-वीडियो संकलन करते चलें. फ़ि‍लहाल उसका सीधा मतलब स्‍वशिक्षा ही होगा, आगे धीरे-धीरे तय करते रहें कि उसका वृहदाकार किन-किन शक्‍लों में इस्‍तेमाल हो. हिंदी में कुछ तो हो, भइया? या बहिनी? कम से कम ज़रा जेनुइन, विहंगम हुड़दंग ही हो?..

बोलिये, बोलिये, इस तरह चुप मत रहिये.. फ़ील्‍ड में भागादौड़ी व सांगठनिक कसरत के लिए कौन-कौन हाथ उठा रहा है?..

Wednesday, April 9, 2008

आदमी और भेड़-बकरी का फर्क..

आदमी और भेड़-बकरी में कोई फर्क है? अपने यहां सरकार इस बात का विशेष ख़्याल रखती है कि ऐसे किसी भ्रामक भेदभाव से समाज गंदा न हो. कांजीहाउस वाली गंदगी किसी मानवीय संसाधन के क्षेत्र में भी न दिख रही हो तो मानो सरकार का दिल टूट सा जाता है. आप अभी भी किस्‍मतवाले हों, और महानगरों की जगह किसी छोटी दुनिया में टूटा हुआ दिल लिये बसर करते हों तो ज़रा उपक्रम करके आसपास के किसी सरकारी अस्‍पताल, स्‍कूल की एक मुआयनामारी कर डालें, देखिए, कितनी जल्‍दी आपका टूटा हुआ दिल एक दहले हुए दलदल में बदल जाता है!

अभी थोड़े दिन पहले विमल ने मेरे मेल में एक फ़ोटो फॉरवर्ड किया था. किसी भाई ने, कोई पश्चिमी इलस्‍ट्रेशन होगा, उस पर देवनागरी की एक चिप्‍पी लगा होली के संदर्भ में उसे एक मौजूं इलस्‍ट्रेशन की शक्‍ल दे दी थी. लेकिन ज़रा कल्‍पनाशील होकर देखिए तो चिप्‍पी हटाकर यह रेखांकन ढेरों दूसरी सामाजिक तक़लीफ़ों के रुपकों के नमूने के बतौर भी इस्‍तेमाल में लाया जा सकता है! माने भारी रस्‍सी बच्‍चों की विकराल दुनिया मान लें और खाली बाल्‍टी वह सरकारी सरंजाम जो उन्‍हें शिक्षित करने के नाम पर इकट्ठा किया गया है? या फिर रस्‍सी देश के आंतरिक हिस्‍सों में घटिया सेहत स्थितियों का प्रतीक है और रस्‍सी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के संसाधनों का?

इन दुरव्‍यवस्‍थाओं का अंतत: उपचार क्‍या है? कि आप कोशिश करें कि किसी भी तरह आपका बच्‍चा किसी अमीर घर में ही पैदा हो? कि किसी सरकारी तंत्र में उसके नाक रगड़ने की किसी भी सूरत में गुंजाइश ही न बचे, और होश संभालने के साथ ही- मतलब नाक साफ़ करना सीखते ही- वह यहां की छोटी दुनिया में लात खाने की जगह विदेशों में गाल बजाने चला जाये? क्‍या उपचार है?.. या कि आप अपने को बेचकर, पड़ोसी की गरदन काटकर लगातार इतना पैसा लहाते रहें कि आपकी संतान प्रचुर मात्रा में सब्‍सीटाइज़्ड होकर शिक्षित होती रह सके? इस देश में गरीब आदमी आखिर क्‍या करे? घटिया सूरते-हाल से बचने के लिए बांग्‍लादेश भाग जाये?..

बीबीसी की हिंदी सेवा ने भारत के अलग-अलग प्रदेशों में सरकारी स्‍कूलों की स्थिति पर एक सीरीज़ बनायी है, कुप्रंबधन पर छोटे-छोटे अच्‍छे ऑडियो निबंध हैं; आप भी सुनिये- बस इतनी कोशिश कीजिएगा कि गुस्‍से और क्षोभ में ‘देश सही जा रहा है!’ गानेवाले किसी उत्‍साही की जान न लें!..

Tuesday, April 8, 2008

हाल-चाल: एक

बड़के का सटका हुआ और छुटके बेटे का भटका हुआ में फंसी है दीदी, मुझे फ़ोन कब करती, मगर करती तो यही कहती शकरकंद खाने के बारे में कही थी, खा रहे हो कि नहीं, दीदी बोल रही हूं? मैं किसी दफ़्तर के संकरे वेटिंग लाउंज में अपनी बारी की राह तकता ‘चांदनी बेगम’ की महीन ज़बान- सनअती तमद्दुन में इंसान की तनहाई और बेचेहरगी- फरिया रहा होता, चौंककर कहता दीदी? किसकी? और दीदी तमककर बोलती तुम्‍हारा दिमाग़ चल गया है, संटु? सामने दीवार पर घड़ी देखकर सोचता यहां आये मुझे ठीक पैंतीस मिनट हुए हैं अलबत्‍ता किसलिए आया था अब इसकी याद नहीं, छूटकर अलबलाया फ़ोन पर जवाब देता अरे, मज़ाक कर रहा था, दीदी. कहने का मतलब यही कि दीदी, दद्दा, दीन सब गजर-मजर हुआ खड़ा, मेरी पकड़ से बहुत बड़ा हुआ पड़ा है. पटाखे के रॉकेट की तरह फुर्रर्रर्र छूटी दिन ससुरी जाने कहां सूं-सनाक् किये फिरती है. हम पीछे-पीछे उड़े, ज़रा मुहलत पाये तो हकबकाये फेसबुक और आरएसएस फीड में खुद को खोजते फिरते हैं, और जब अंतत: दिन की चिंदियां उड़ चुकती हैं तो हम किसी बुक लायक होते हैं, न हमारे फेस की कोई फीड होती है. फीलिंग्‍स की तो नहीं ही होती. बड़ा रायता है, डियर, मुंह में कलाकंद धरने के बाद भी, सब कड़वा जायका ही है, सर. उस छोर पर आपका दिन कैसा चल रहा है, खरगोश की चाल से कछुए को पछाड़ रहा है, या मगरमच्‍छी मुंह में आपको लीले खंगाल रहा है? हें-हें-हें, वेरी फ़नी ना? आई अम आलमोस्‍ट फीलिंग लाइक अ डमी ना.

Monday, April 7, 2008

नायपॉलियन नेल्‍स..

आंदोलनकारी आधार और खालिस जीवन-व्‍यापार बहुत दुरुस्‍त न हो तो आदमी के लगातार तीन कदम दायें और चार कदम बायें निकलते रहने के ख़तरे बने रहते हैं.. एक्‍सेलरेटेड स्‍टार्ट के तत्‍काल बाद भान हो कि शुरूआत एक्‍चुअली फॉल्‍स स्‍टार्ट था तो ताज़्ज़ुब नहीं.. मैं हर तीसरे नयी योजना बनाकर चौथे दिन उसे खारिज करता चलता हूं, रियल भुक्‍तभोगी हूं, तो इस ‘झमेले’ को अलग से कहने-समझने की ज़रूरत नहीं.. शायद दिलदार-समझदार लोग इसी को बिन पेंदी के लोटे की नियति कहकर चिन्हित करते होंगे.. और जिसे सुनकर मेरी तरह लोग प्रतिकार में हाथ-पैर छोड़, फिर किसी दूसरी ओर लुढ़क अपनी हार स्‍वीकार भी करते रहते होंगे?..

ख़ैर, लुढ़कने के पीछे इतना लड़ि‍याने की कोई वजह नहीं है. हिलगने की ज़रा-सी वजह इतनी भर है कि अपने को मेरा दोस्‍त बतानेवाले (और मेरे मान लेनेवाले) चंद हलकों से एक नया प्रस्‍ताव आया है.. और नैचुरली, मैं लुढ़कने के पहले के उड़नेवाले फेज़ में हूं.. और जबर्ज़स्‍ती ऐसे उत्‍साहित हो रहा हूं कि प्‍यार से किसी को तमाचा जड़ दूं तो मानकर चल रहा हूं कि बेचारे को उसे बुरा मानने की वजह नहीं होनी चाहिए!..

तो दोस्‍त का सुझाव यह है कि अपनी सारी ऊर्जा ब्‍लॉग पर झोंकने की जगह एक ऐसी वेबसाइट खड़ी करूं जो अपने समय के सवालों, संदर्भों और स्‍वरों को एक जगह सुव्‍यवस्थित तौर पर संकलित करता चले- प्रगतिशील, पतनशील- दोनों मोर्चों से. और सिर्फ़ टेक्‍स्‍ट न हो, साऊंड, वीडियो सब तरह के फ़ाइल्‍स हों.. एंट्री ठेलनेवाला मैं अकेला ही न होऊं, देश और देश के बाहर जहां-जहां से आवाज़ और लोगों के मिज़ाज मिलें, लोग अपनी-अपनी चिन्‍तायें और कील ठोंकें! सीधा सहभागी सुर इतना भर हो कि सहयात्री मानते हों कि इंडिया नेक्‍स्‍ट एशियन और वर्ल्‍ड जायंट होने का टिल्‍ला सुर छेड़ते रहने के साथ-साथ उन लोगों की भी ज़रा बात करता चले जिनके लिए रेल पटरियों से अलग शौच की जगह मुहैय्या नहीं.. या अभिषेक बच्‍चनों व लल्‍लनों को देख-देखकर ही जो अपना दिन और जीवन धन्‍य होता नहीं मानते रहना चाहते?

फ़ि‍लहाल जब तक लोटे में पानी का कुछ भार है, उछलने व उत्‍साहित होने में क्‍या हर्ज़ है.. लेकिन, फिर भी, देखिए, मैं अभी सोच ही रहा हूं, जबकि नायपॉल साहब ने अपने एंड से चंडीगढ़ जाने के रास्‍ते अपनी एंट्री आल्‍रेडी दर्ज करवा रखी है- और अभी नहीं, सन् नब्‍बे में ही करवा रखी थी:
“Always in India this feeling of a crowd, of vehicles and services stretched to their limit: the trains and aeroplanes never frequent enough, the roads never wide enough, always needing two or three or four more lanes. The overloaded trucks were often as close together as wagons of a goods train; and sometimes- it seemed to depend on the mood or local need of drivers- cars and carts same in the wrong direction. Hooters and horns, from scooters and cars and trucks, sounded all the time, seldom angrily…”
(इंडिया: ए मिलियन म्‍युटिनिज़ नाऊ से)

Saturday, April 5, 2008

सबक लेने में हर्ज है?..

रह-रहकर मन में उठती ऐसी-वैसी जाने कैसी-कैसी की तर्ज़ वाली यह भी एक वह अबूझ तरंग ही उठती है कि जीवन में हम सबक लेते हैं? कब लेते हैं.. किससे? स्‍वयं से भी लेते हैं? शायद आप ज़्यादा समझदार हों, समझते होवें.. हम तो यही समझने में हारते रहे हैं कि जीवन बाजू से निकलती रही, हम धुआं छोड़ फुर-फुर फुदकते रहे.. मालूम नहीं खुद से भी सबक कितने लिये!.. लेकिन नहीं लिये तो यह कोई अच्‍छी, इतरानेवाली बात नहीं.. और नहीं तो कम से कम मन की मासूमियत तो बनी रहे.. कि देर-सबेर शायद कभी लें. सबक. और जब यह सीख लें तो शायद कुन्‍नूर, केरल के कलेन पोक्‍कुदन से भी कुछ सीख लें.. कंक्रीट में बदलते इस देश के सूखे उजाड़ का भला ही होगा.. दक्षिण की बनिस्‍बत शायद उत्‍तर का पूर्वी संसार ऐसा सदाशयी और समझ बनाने, बुननेवाले जीवनदृष्टि का पक्षधर नहीं.. फिर भी.. पोक्‍कुदन से सबक लेकर उम्‍मीद बुनने में क्‍या हर्ज़ है? प्‍लीज़, ज़रा सा आप भी लीजिए..

(तहलका से साभार)

तेल, नून और तिब्‍बत..

हम तेल ओर नून की सोचते तबाह रहते हैं, तिब्‍बत की कहां सोच पाते हैं? पैट्रिक फ्रेंच कहते हैं शांतिप्रिय तिब्‍बत की छवि सन् पचास के बाद के सोशे हैं, भारत आने के बाद दलाई लामा ने गांधी की अहिंसा अपनायी, अलबत्‍ता गांधी का अहिंसक प्रतिरोध सीखने की जगह हॉलीवुड में हुलु-लुलु करके तिब्‍बत सेंकते रहे. वर्ना तो पहले ल्‍हासा की सड़कों पर भी प्रतिद्वंद्वी मठों में जमकर हुआ करती थी सिर-फुटव्‍वल, मगर इतनी-कितनी बातें हैं उन्‍हें सोचने का सुभीता कब है?

देश में उच्‍च शिक्षा पर उच्‍च खर्च की मंज़ूरी मनवाने को मानव संसाधन राज्‍यमंत्री डी पुरंदेश्‍वरी राज्‍यसभा में सरेआम झूठ का पुलिंदा पढ़ती हैं मानो अमरीका में नासा और अस्‍पताल महज़ भारतीयों के बूते ही चल रहा हो, मगर उस झूठ की गिरेबान थामने कौन जाये? या तमिलनाडु के धरमपुरी और सालेम का सच का सुर समझने- जहां माएं अनचाही शिशु कन्‍यायें सरकारी सहाय्य स्‍कीम के सुपुर्द कर आती हैं, फिर सरकारी क्लिनिक से उन बच्चियों का विस्‍थापन किन दुनियाओं में होता है, इसकी तथ्‍यात्‍मक रपट किसी के पास नहीं, न है कोई सरकार से पूछवैया..

तो भैया, न सोच पाने की जाने कितनी वजहें हैं, और सोचो तो सोचना भी ससुर, अंधेरे में सिर घुसाना है, तक़लीफ़ की परतदार खटिये पर ढिमिलयाते रहना है, दबी आवाज़ में लाहौल विला कुवत बुदबुदाना है. पाकिस्‍तानी फ़ि‍ल्‍म ‘खुदा के लिए’ फ़ि‍ल्‍म तो क्‍या है, खासी चिरकुटई है, मगर जिरह के कुछ पेंच दिलचस्‍प हैं- कि भई, आज अच्‍छा और नेक़ मुसलमां होने के मानी क्‍या हैं, और सच्‍चा होना तो सचमुच बड़ी टेढ़ी खीर है! जैसे जिम्‍बाव्‍वे में ज़िंदगी चला लेना, मुगाबे की सरकार से पार पा लेना हंसना नहीं लोहे के चने चबाना ही होगा, या कि फिर उसके लिए भी तरस जाना? आदमी सोचे जिम्‍बाव्‍वे की तो फिर खाये क्‍या? तिब्‍बत, धरमपुरी, सालेम जाये ही क्‍यों? सुनता रहे सितार परम पताका पुरंदेश्‍वरी की, अनसुना करे खाद्य संकट के जाने कहां के बेमतलब किस्‍सों को, हें-हें करे, गाल बजाये, किसी तरह, भइय्या, दिन से पार पाये?

Friday, April 4, 2008

देखिए, एक बुचिया मंच पर जा रही है.. ज़रा हौसला अफजाई कीजिए!..

गुड़ि‍या, अच्‍छा नाचना, भई.. वैसे मेरा यह कहना चिरकुटई ही है मगर टेढ़े आंगन में गिरे हुए हम नाचकर तो दिखा नहीं सकते, कहकर बेमतलब की अपनी इल्‍लम-गिल्‍लम बता ही सकते हैं.. तो स्‍वामी सत्‍यरत्‍न बाबा की तर्ज़ पर अपनी ठेल रहे हैं, दांत चियारे तुम झेल लो.. फिर हमारी सब चिलिर-बिलिर भूल- भागकर मंच पर चढ़ना और इस छोर से उस छोर तक इंद्रधनुष बन जाना! हुमसकर नाचना, तरंग में.. समूची आत्‍मा से नाचना.. तुम्‍हारी उम्र का यही तो फ़ायदा है कि ससुरी, चाहो भी तो कहीं मिलावट नहीं होती.. सब हुमस में और समूची आत्‍मा से ही होता है.. हंसना और रोना सब तरंग में उमगता, छूटता रसप्‍लावित होता चलता है!

प्‍यारी गुलिरिया, कुछ ऐसा समां बांधना कि हमारी बुड्ढी थकी आंखें रंगबहार की कल्‍पना में जुड़ा जायें.. अपने कर्महारेपन में लजा जायें! कि हम सबसे बचाके भी कहें तो बुदबुदाके इतना ज़रूर कह दें कि उम्‍मीद बाक़ी है!.. कि कोशिश को उसकी हदों तक न जिये की नाउम्‍मीदी हारे हुए अंधेरों का दस्‍तावेज़ नहीं, फक़त मुंह चुराये के भगोड़पने की लतखोरी है? हां, ऐसा नाचो कि हम भी हिल जायें.. और हिले रहें.. इतना हिलें कि फिर नया संगीत बन जायें!.. ताज़्ज़ुब करें कि देखो, एक नन्‍हीं सी लड़की ने हमारा मनकल्‍प कर दिया?..

ओहो, गुलिया, बुचुरकी, गुनी-गुनी गुलिरिकी.. सोचकर कितना अच्‍छा लग रहा है कि तुम अपनी नन्‍हीं ज़ि‍म्‍मेदारी में नयी रंगीनियों का फेंटा बांध रही हो.. अभी उमगते व दमकते चेहरे से एक नज़र दुनिया को निरखोगी और पलक झपकते में गुरुत्‍वाकर्षण का नया सम-ताल बुनने लगोगी.. मैं उछल जाऊंगा.. थोड़ा बहल जाऊंगा.. मगर फिर जल्‍दी ही खुद से बेदखल जाऊंगा?..

Thursday, April 3, 2008

फूलमतिया आयी है!..

पता नहीं उन सपनों के रास्‍ते आयी थी जो विमल के लिए फंसावट बनते रहे हैं.. या चंदू के लेखक की उस मिट्टी से होकर जो चंद सौभाग्‍यशालियों को मिलता है, बकिया के अभागों को कहां मिलता है?.. या उस धूप से जो अपना रास्‍ता बदल लेती है.. या बतकुच्‍चन के उन ढेलों से जो सीधे कपार पर चोट करते हैं? रचना की तक़लीफ़ या असंतोष से.. या डाक साहब जिसे सिरिफ़ अवसाद जनित मानसिक डायरिया कहके चिन्हित करते हैं? मालूम नहीं क्‍या वजह रही होगी.. मैं इतना अनुसंधानक नहीं कि हर वजह की खोह तक पहुंचकर बिल का बैलेंस-शीट बराबर कर लूं.. बहुत मर्तबे जानना बाद में होता है, पहले बस मन महसूस करता है.. वही कर रहा था. महसूस. कि फूलमति आयी है!..

गजर-मजर, गदर-बदर, गम-गम, बम-बम.. इनारा पर लखन बो पुरनका रस्‍सी की पुरनका बाल्‍टी से पानी खींच रही थी, झटका में बाल्‍टी छूट गया, खुद इनारा में छूटते-छूटते बचीं.. रामकदम हल्‍का-हल्‍का पछुआ बयार लेते हुए नीम का नीचे बकरी को पतइ खिला रहे थे, झांवर-झांकी में अइसा उझिराये कि बकरी कान्‍धा पर गोड़ भिड़ाके, आंख कइसे तो फूटते-फूटते बच गया, बाबू रामकदम को ज़मीन पर गिराके मुंह में पतइ दाबे उड़ गयी! सनीचरा के मझिलका कका मंदार ओझा छत पर खपड़ा का मरम्‍मती के लिए चढ़े थे, नज़ारा देखके अइसा चिंहुके कि खपड़ा सब खटर-खटर नीचे आवे लगा, ऊ हुंवे हवा में चिहुंके अटक गये.. मुंह से फुर्र-फुर्र आं-बां का हावा फेंकने लगे.. कहने का मतबल फूल‍मतिया सबका छाती छेंकने.. मन का अरमानी सेंकने आ गयी थी!

बिल्‍लेसुर का मौसी का दुकानी में अब रेस्‍कोना साबून का टिकिया खुदै ले चहुंप जायेगा.. फूलमति थोड़े ले पूछेगी, खुदै अलता-बिंदी-टिकुली का सुनहला संसार गुलज़ार हो जायेगा.. राधेमोहन ठेंहुना का ऊपर टूटही कटोरी में बैंगन का बजका सजाके बेमतलब सबको राम-नाम बोलके बेमतलबे चाह का न्‍यौता देंगे कि जरका-सा खबर लगे कौन छौंड़ी फूलमतिया का केसी में जवाकुसुम का तेल डारी थी.. कि कौन कलर का प्‍लास्टिक का चटाकी कीनाया है शहर का हाट-बजारी से! बिन्‍नू बो के बेमरिया भसुर ओसारा में पसारे छींट का हरियर साड़ी पे पियरका-पियरका फूल देखके धन्‍न हैं.. हरियर पेटीकोट और ललका बिलाऊज अन्‍नरे पसारल है, बहरी उसका झलकी मिल जाता तो मालूम नहीं केतना जवान- अऊर बूढ़-पुरनिया हुंवे ठाड़े-ठाड़े फेन्‍टी- फेन्‍ट हो जाते.. मज़ाक बात नहीं है, जी, फूलमतिया आयी है!..

हवा केतना नीमन-नीमन लग रहा है.. मन और मुंह का स्‍वाद अच्‍छा जिमन-जिमन.. जीवन धन्‍न नहीं है, जी, कि फूलमतिया आयी है?..

Wednesday, April 2, 2008

तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं..

एक मोड़ पर आकर रत्‍ना और ओनिर दूसरे पर निकल रहे हैं. निकलनेवाले विपसना या समीरलाल भी हो सकते थे.. या सुधीरलाल.. असल बात यह नहीं कि मोड़ पर आकर दूसरे पर निकल रहे हैं.. असल बात है ऐसे मोड़न मुकाम पर आकर जो मुंहजोर मुंह से निकल रहा है! इन ख़ास मौक़ों पर आदमी (औरत भी) नमूना बनने से कहां बच पाते हैं?.. ख़ैर, तो नमूने हैं.. नोश फ़रमाइए..

हाऊ कैन यू इवन मेंशन सच अ थिंग?.. सो मीन.. सो चीप ऑफ़ यू!.. अरे, रहने दो, रहने दो.. जैसे आप बड़ी दूध की धुली हैं? गंगा नहाके निकली हैं! हंह.. नाइंटी सेवन में वो जयपुर वाली पूरी कहानी मालूम है मुझे! आई माइट बी डंब बट नॉट एज़ डंब एज़ यू हैव बीन टेकिंग मी फॉर! ओह, शट अप! क्‍यों, भई, क्‍यों शट अप, भई? इसलिए कि अपनी सच्‍चाई सुनके आपको मिरची लगने लगी? और हमारे बारे में महीने भर से जो सोशल नेटवर्क पर आपने बहार फैला रखा है, वो कुछ नहीं? आपने समझा सब सुनके हम अनसुना किये रहेंगे?..

आई डोंट वॉंट टू टॉक टू यू एनिमोर! लाइफ़ का बहुत सारा साल वेस्‍ट कर लिया.. ओहोहोहो? भूल गयीं मनाली में मेरे सिर से सिर सटाके जनम-जनम के जो वादे किये थे? (नकल करते हुए) तुम्‍हारे बिना मैं एक दिन नहीं रह सकती! सब निकाल के फेंक दिया नाली में?.. वो फ़्रेम क्‍यों उठा रही हो? दैट इज़ नॉट यूअर्स!.. हू सेज़ सो? सिंस व्‍हेन यू स्‍टार्टेड टू कीप ऑर अंडरस्‍टैंड एनि आर्ट?.. यही है, यही है! मंदा और जन्‍मेजय गलत नहीं कहते! बिना अपने बैगेज का झंडा लहराये तुमसे एक सिंपल पादना तक नहीं हो सकता! ओह, शट अप! जैसे तुम ईडियट वैसे तुम्‍हारे दोस्‍त! और तुम्‍हारे दोस्‍त आइंस्‍टाइन हैं? वो अंकित साला नाक में और टांग में हमेशा उंगली डालके फनफनाता रहता है इज़ ही यूअर इं‍टैलिजेंट आइडल?..

मैंने कहा न, मुझे तुमसे बात नहीं करनी! वुड यू बी प्‍लीज़ काइंड इनफ़ कि मैं चैन से अपना सामान कलेक्‍ट कर लूं? नहीं, तुम वो लेवी स्‍त्रास नहीं उठाओगी! और वो इनसाइक्‍लोपीडिया भी वापस रखो! तुम्‍हारे बाप ने नहीं खरीद के गिफ़्ट किया था, पांच किलो का वज़न मैं ढो के लाया था लखनऊ से! डोंट मेंशन माई फादर इन यूअर चीप एंड स्‍टुपिड जारगंस.. तुम हमेशा के चीप थे और हमेशा के रहोगे! रहने दो, रहने दो, तुम तो ससुर, निष्‍पाप कुमारी हो! तुम्‍हारे करमों का ज़ि‍क्र छोड़ना शुरू कर दूंगा तो यहां बैठना मुश्किल हो जायेगा!..

इट्स नॉट यूअर फ़ॉल्‍ट.. मुझे यहां अकेले आना ही नहीं चाहिए था! अरे, तब लेके आयी होतीं न अपने उस मिष्‍टी मॉलय को? तुम समझती हो मुझे मालूम नहीं है? आई नो एवरी डैम थिंग अबाऊट यू, स्‍वीटहार्ट! डोंट यू स्‍वीटहार्ट मी.. एवर अगेन? व्‍हॉट आई डू एंड हूम आई मूव विथ इज़ कम्‍प्‍लीटली माई बिज़नेस! अरे, तो थूको न! हम कहां कह रहे हैं कि हमारे मुंह में आके थूको? बहुत थुकवा लिये एक जीवन में, अब माफ़ करो, बाबा, आगे बढ़ो! तुमसे बात करना इम्‍पॉसिबल है!

हमारे साथ बात करना क्‍या, अब सांस लेना भी इम्‍पॉसिबल होगा.. सांस में तो कोई और चढ़ा हुआ है न! यू नो नथिंग! यू नेवर अंडरस्‍टुड एनिथिंग! अरे, रहने दो, रहने दो, नब्‍बे चूहा भकोस के बिल्‍ली रानी हज को चलीं? मैं तुम्‍हें वॉन करती हूं, डोंट क्‍वोट मी यूअर पथेटिक प्रोविंशियल क्‍वोट्स!

उस घड़ी को हाथ मत लगाना, दैट इज़ नॉट यूअर्स! साली तुम्‍हारे पीछे ज़िंदगी वेस्‍ट कर दिया और यहां घड़ी और घोड़ा का हिसाब कर रही हैं! आई नेवर लव्‍ड एनिवन सो मच! एंड फॉर व्‍हाट? ओह, आई वॉज़ सच अ फ़ूल.. आई ऑल्‍वेज़ हैव बीन.. ओह, गॉड!

(पता नहीं क्‍यों साट रहा हूं, मगर चूंकि अब साट ही रहा हूं तो फ़ुरसत लगे तो ज़रा यह लिंक भी देखते चलें.. जीवन की ऐसी चिरकुटइयों का कोई अंत क्‍यों नहीं है?)

Tuesday, April 1, 2008

अंतत: मुझे मिलना ही था.. मिला.. नोबेल!

तो अंतत: मुझे नोबेल मिल गया. बहुप्रतिक्षित था (दूसरों के लिए नहीं, मेरे ही लिए था.. जैसे नायपॉल साहब के लिए था, मगर वह दो कदम आगे रहे थे- नोबेल पाने के पहले दूसरी बीवी व्‍याह लाये थे. इस लिहाज़ से मैं चूक गया हूं. अब पा गया हूं तो कोशिश करूंगा, जल्‍दी ही दूसरी के पीछे-पीछे तीसरी ले आऊं, इस तरह पिछड़ने की कुछ भरपायी हो सकेगी).. हालांकि सुन रहा हूं इस्‍तांबुल में हडंकंप है. मेरे नोबेल पाने से बाबू ओरहान पामुक बहुत प्रसन्‍न नहीं हैं. यहां (काहिरा) और वहां (कोपेनहागन) कहते फिर रहे हैं कि नोबेल को इसी छिछोरे स्‍तर पर गिरना था तो उन्‍हें अपने पा लिये पर ताज़्ज़ुब है? अपने यहां काम करनेवाली बाई के मुंह से जबसे मैंने पामुक के ये उद्गार सुने हैं, सन्‍न हूं. दुनिया, ससुर, कहीं से कहीं पहुंच जाये, दो कौड़ी की साहित्यिक टुच्‍चई अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई! मैंने उस तुर्क का क्‍या बिगाड़ा था, लेकिन, देखिए, चोट्टा सार्वजनिक रूप से मेरे साहित्‍य पर उंगली और डण्‍डा चलाता फिर रहा है! अभी एक किताब लिखी नहीं जब ये हाल हैं, इंटरनेशनल बुकशेल्‍फ़ों में दस टाइटल ठिल जायेंगे तो पता नहीं कहां-कहां मुंह छिपाते फिरेंगे ये सारे के सारे साहित्‍यबाज! पामुक के बाद गुंटर ग्रास, दारियो फो, हेरल्‍ड पिंटर और मोहतरमा डोरिस लेसिंग की ख़बर लेनी है कि ये भले लोग(?) मेरे पाले में हैं कि पामुक के साथ सुर व स्‍वर मिलाके गंद रेंक रहे हैं?..

पता नहीं ऐसे गंदे व संकीर्ण विचार रखनेवाले चिरकुटों को साहित्‍य अबतक कैसे झेलती रही है? सोचकर मन खिन्‍न हो जाता है. जबकि आज खिन्‍नावदिवस मनाने की कोई ज़रूरत नहीं. जोशिम ने आलरेडी अग्रिम में बधाई दे रखी है, अनामदास चाहते थे मैं बीबीसी हिंदी के लिए उन्‍हें इंटरव्‍यू दे दूं तो मैंने उन्‍हें तमककर मना भी कर दिया कि नोबेल जैसी चीज़ मिलने के बाद अब मुझसे हिंदी-टिंदी बहुत मत टिलिआओ! और सबसे पहले तमीज़ से बात करो! बेजी भी बधाई दे रही हैं, लेकिन मुझे लगता है इस बधाई में राज व अर्थनीति है- क्‍योंकि वह औरत विदेश में कंगलों की एक क्लिनिक खड़ी करने के सिलसिले में डॉनर्स खोज रही है.. तो मेरे हाथ में दसेक लाख डॉलर्स आते ही वह अज़दक-अजांग की आरती बना-बनाके हर दूसरे घंटे कविता सजाने में लगी हुई है! ऐसे लोगों से, खास तौर पर महिलाओं से, आज बहुत संभलकर रहने की ज़रूरत है.. हालांकि अपनी पुरानी प्रवृत्ति के अनुरूप मैं संभले हुए भी थोड़ा बे-संभला रहना चाहता हूं. हालांकि उसके ख़तरे भी हैं. जैसे एक्‍साइटमेंट में आज प्रैस वालों के लिए तैयार होते हुए मूंछ की जगह मैंने भौं शेव कर लिया है.. और प्रैसवाले बाद में होंगे, मैं स्‍वयं बहुत खुश नहीं हूं!

बैठे-बिठाये वैसे बड़ी टेंशनवाली चीज़ हो गयी है. अब ये दसेक लाख डॉलर्स का आखिर मैं करूंगा क्‍या? ठीक है, बेजी-टेजी या किसी भी केजी में पढ़नेवाले को नहीं दूंगा वह बात समझ में आती है, फिर भी? हालांकि ये सोचकर अच्‍छा लग रहा है कि फ़ोन और बिजली-टिजली के बिल भरने के लिए इस और उस मेहमान के घर कोई कीमती सामान उड़ाकर झट से झोले में डाल लेने के झंझटी दिनों का अंतत: अंत हुआ! चाय के लिए भी अब दूसरे नहीं, मैं खुद पैसे दे सकूंगा. ये सब मेरे लिए ह्यूज अ‍चीवमेंट है! रियली..

सोचते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है कि जिस ऊंचाई तक बाबा तॉल्‍सताय और जीनियस जॉयस नहीं पहुंच सके, मैं लेटे-लेटे वहां तक लंगी मार आया? और आप चिरकुट लोग हैं कि एक फकत बधाई तक नहीं दे पा रहे? आप पर धिक्‍कार है.. एक मिनट, अभी-अभी शारूख का एक बधाई वाला एसएमएस आया है. कहता है उसे मालूम नहीं था देश में इतना बड़ा मैथेमेटिशियन छुपा हुआ है?.. अबे?.