Thursday, November 27, 2008

दो तस्‍वीरें..


हमारा समय..
छोटे शहर में छोटा बने रहकर मरना मुश्किल होगा, बड़े में बड़ा होकर जीना. कहीं से कहीं निकलकर घूम आने में दिक़्क़त होगी, आत्‍मा के सूने गलियारों में धुंए के बगूले होंगे धमाकों का अंधेरा होगा. रह-रहकर लगेगा सब शांत हुआ फिर बेचैनियों की पांत से नयी बत्तियां जलेंगी. फुदकन प्रसाद फुदकते फिर सबको ख़बर करते घूमेंगे ढहा दिया उड़ा लिया गिरा दिया. इस रौरव जुगूप्‍सा की वज़ह जाने क्‍या होगी, खुद के चूतड़ के चिथड़े नहीं उड़े का आह्लाद होगा? सवारियां फिर इस गली से निकल उस सड़क पर जायेंगी, स्‍कूल का भारी झोला लिये एक बच्‍चा अपने घर आयेगा, समय और समाज के जंगल में खुशहाली सबसे आंख चुराती-सी होगी. फिर भी जो बचा रह जाता होगा उसके बच लेने में सरकार की कोई भूमिका न होती होगी.

यहीं कहीं..

चिट्ठी कोई पुरानी दबी काग़जों के बीच अचानक उचकती आवाज़ लगायेगी- ओ, हमें सब भूल गये क्‍या? अटकी एक घड़ी अटकती तेरह सेकेंड आगे बढ़ेगी फिर कहेगी अब क्‍या. कुम्‍हलाये त्‍वचा की रूखायी घबरायी सवाल करेगी रात-दिन सुनते हैं मेला-मेला, हमारे जीवन में कहां है. सांझ के धुंधलके में उठेगी हवा अलसायी पीपल के पेड़ से गुज़रती नीम के थपकी लगाती बेर से दुपट्टा बचाती, कृपानरायण दुबे के छत पर सूखने को डले कपड़ों को अंकवार में धरेगी; वैसी ही तेजी से जैसे मनीषा अम्‍मा को बिन बताये पैरों में उल्‍टा चप्‍पल फंसाये भागी मनिहारी की दूकान लाल रिबन देखने के बहाने खुद में रंगीनी भर रही होगी. हज्‍जाम के खपड़ैली दूकान की छत पर अभी-अभी कूदी बिलार जाने किस ओर से निकल आयी हवा का बलजोर महसूसती एकदम देह फटकती कान खड़ी कर लेगी कि अरे, कौन है रे, बद्तमीज़? मां की गोद में सोयी बच्‍ची पता नहीं कहां क्‍या महसूसकर अचानक रोने लगेगी, जैसे प्रताप भैया अपने गेट पर पैर टिकाये जाने क्‍या देखकर मुस्‍कराते होंगे. सबकुछ कितना-कितना तो कुम्‍हलाया होगा, लेकिन फिर भी जैसे पहली-पहली बार प्रकटाया होगा. खिड़की पर अटकी हवा नहीं पूछेगी, मैं ही जाने किससे कह रहा होऊंगा कहीं गया नहीं हूं, अभी हूं, यहीं कहीं.

Thursday, November 20, 2008

साथ चलते, पूंछ ही लिये चलते, मगर फिर भी कैसे चलते?

अच्‍छी बात नहीं अनूप शुकुल हमारी आवाज़ सुनकर आनन्दित होने की बात कह रहे हैं, जबकि सुबह की डली चीज़ को अभी दुबारा सुनते हुए हमें खुद के शर्मिन्‍दा होने की बात कहनी पड़ रही है. लम्‍बे अरसे के गैप के बाद जिस पॉडकास्‍ट को हम पहाड़ से नीचे लाया ऊंट समझ रहे थे, अभी थोड़ी देर पहले जाकर पता चला दरअसल ऊंट की बजाय मैं महज़ उसकी पूंछ ही पहाड़ के नीचे तक ला पाया हूं. माने जिस संगीत-स्‍वरवर्षा को हमने सवा पांच मिनट का समझ अंतरजाल के आईमीम को समर्पित किया था, वह पलटकर मेरे ब्राउज़र में मुझे महज़ सवा मिनट का मसाला लौटाल रही थी! बावज़ूद उसके शुकुल जी आनन्दित हुए तो उनके उत्‍साही ज़ज्बे की कदर होनी चाहिए कि देखो, आदमी की हौसला-ए-मोहब्‍बत कि सुकुमारी की संगत हाथ न आयी तो क्‍या उसकी सवारी की झलकी ने ही सीना-ए-अरमान रंगीन कर दिया! ओह, क्‍या आनेवाली पीढ़ि‍यां नाज़ तो क्‍या, याद भी कर सकेंगी कि हमने अनूप शुक्‍ल को देखा था?

आनेवाली पीढ़ि‍यां क्‍या, घंटा, शायद मैं भी कहां याद कर सकूंगा? शायद यही याद रहे कि वक़्त-बेवक़्त लाइफ़लॉगर कैसे बेड़ा गर्क करती रही है. गर्क बेड़े को सम्‍भालने व सुकूनदेह किसी दूसरे किनारे तक पहुंचाने की तसल्‍ली दिलानेवाले विमललाल फिर बेड़े को बूड़ने से बचाते हैं भी तो ससुरी, बाद में जाकर पता चलता है कि बेड़े की महज़ पूंछ ही बची है. कुछ वर्ष निकल जायें, यह सब याद रहेगा? रह पायेगा? देखिये, सुबह अरसे बाद डाक से वीपीपी में दो किताबें मंगवायी थीं, इतनी जल्‍दी चली भी आयीं, और पॉडकास्‍ट की घिसिर-पिसिर में मैं ऐसे सुखकर समाचार को लगभग भूल-भूल सा नहीं, पूरी तरह भूल ही चुका था. महज़ चंद घंटों के फ़ासले पर अख़्ति‍रयायी किताबों को इतनी जल्‍दी इस बेशर्मी से भूलने लगना शायद अच्‍छे लक्षण नहीं. तब तो और भी नहीं जब किताबी दुनिया के दु:खों की चांदनी का पसराव हो रहा हो. कुछ दिनों पहले ही किसी पोस्‍ट पर 'पहल' के बंद होने की ख़बर पढ़ी थी, आज सुबह किसी और से सुना कि दिल्‍ली के श्रीराम सेंटर वाली किताबी गुमटी बंद हो रही है. ज़्यादा अर्सा नहीं हुआ दिल्‍ली में ‘बुकवर्म’ भी बंद हुई थी. मुंबई में वैसे भी हिन्‍दी किताबों की ऐसी कोई ख़ास उपस्थिति नहीं, जितनी है उसमें ‘पहल’ से जुड़े हिन्‍दी के एक साहित्‍यसेवी जितेन्‍द्र भाटिया की ‘वसुन्‍धरा’ है, तो वसुन्‍धरा पहुंचने पर वहां भी आमतौर पर यही राग सुनने व महसूसने को मिलता है कि जब दिल ही टूट गया तो अब जीकर क्‍या करेंगे..

ऐसे में अच्‍छा है अनूप शुकुल का कलेजा है वह आनन्दित हो लेते हैं, मेरे हाथ केदारनाथ सिंह की ‘कब्रिस्‍तान में पंचायत’ और असग़र वजाहत की ‘साथ चलते तो अच्‍छा था’ लगी है, लेकिन देखिये, मैं उन्‍हें देखने की जगह, पॉडकास्‍ट के टूटे हुए बेड़े के फटे हुए फट्टे हाथ में घुमा रहा हूं. शायद अच्‍छा ही है. क्‍योंकि ‘साथ चलते तो अच्‍छा था’ हाथ में घुमाना शुरू भी करता तो न तो हंसते-हंसते ईरान, या अज़रबैजान पहुंच जाता, न मसिजीवी की तरह आह्लादित होकर घोषणा कर सकने की स्थिति में रहता कि लो, दिन भर में पूरी किताब खत्‍म कर ली! क्‍योंकि खत्‍म की नहीं होती! कैसे की होती जबकि पढ़ना शुरू ही उसे रात में करना होता?

अम्‍मा, माफ़ करो, मैंने झूठ बोला था..

सुआ मासी की उदास संगत में..

अम्‍मा, बिनी झूठ बोलती है. मंटू, सुमेधा और रामगनित सभी झूठ बोले हैं. हम नहीं किये शरीफा कोई और खाये होगा. कांसा का कटोरी का नीचे ढांपा हुआ बेसन का हलुआ भी हम चोरी नहीं किये. फूफा का पाकिट से भी तीन रुपया अस्‍सी पैसा हम नहीं लिये, अम्‍मा. गणेश को कोई कुच्‍छो नहीं बोलता, सबका चोरी हमरे सिर पे डालती हो, खाना नहीं खायेंगे तब जान जाओगी, हां. रातो को नहीं खायेंगे, और फिर सुबहियो भी नहीं, इन फैट, कभीयो नहीं खायेंगे तब्‍ब तुमको अकल बुझा जायेगा. दुबारा बोलके देखो, बोलो, बोलो, घर से उट्ठ के चल जायेंगे, फिर कब्‍बो लौटेंगे नहीं, तब्‍ब?..

souad massi -

Wednesday, November 19, 2008

खेमसिंह की उलझन: चिचरीकथा..

चड्डी पहनकर फूल कहीं खिलते होंगे, यह बिना चड्डि‍यों का एक स्‍केच है. और बस उतना ही है..



(स्‍केच अपने छोटाकार में असुविधाजनक हो रही हो तो उसे चटकाकर बड़ाकार देख सकते हैं)

Tuesday, November 18, 2008

सड़क पर, समय में.. हमारा अपना गोमोर्रा..

एक कामकाज़ी दफ़्तर के गेट से लगे हुए सड़क पर तीन मजदूर हैं गड्ढा खोद रहे हैं. साथ में चार और हैं, उनसे ज़रा दूरी पर प्‍लास्टिक के मोटे पाइपों के भीतर कम मोटे केबल सेट कर रहे हैं. एक ही ग्रुप के हैं, आपस की जिरह-पचीसी सुनकर लगता है तेलुगु या कन्‍नड में बतकही कर रहे हैं. नीले, हरे चिरगिल्‍ले घिसे-पिटे टीशर्टों में मजदूर, पता चलता है टाटा की अत्‍याधुनिक नेटवर्किंग की अंडरग्राउंड केबलिंग कर रहे हैं, अंडरग्राउंड फीटिंग का तरीका अलबत्‍ता उनका तीन सौ वर्षों पुराना लग रहा है. नैनो सपन के रतन का रचा यह दृश्‍यविधान होगा, पचाने में दिक़्क़त होती है. शायद टाटा रतन के यहां इस तरह के छोटे-मोटे टिल्‍ले काम आऊटसोर्स कर दिये जाते हों. लेकिन मजदूरों की केबलिंग के तरीके की ओर आपका ध्‍यान नहीं खींचना चाहता था, अदबद तरीके से ध्‍यान जो खींच रही थी वह उन सबों की- उनमें से हरेक की- ऐंड़ी-बेंड़ी देह थी. सात में एक अकेला मजदूर नहीं था जिसका वाजिब शरीर जैसा शरीर और स्‍वस्‍थ हो! मजदूरों के संबल, रेती, छेनी से थोड़ी दूरी पर काले रंग की एक स्‍कोडा खड़ी थी. दो अफ़सर किस्‍म के लोग गुफ़्तगू कर रहे थे. मजदूरों के वैकल्पिक लातखाये यथार्थ की तरफ़ उनका ध्‍यान नहीं था. वजह भी नहीं थी..

“In the marketplace it’s all or nothing. Win or lose. A rise in salaries has meant better houses and fancy cars. Yet this is not wealth that can be considered collective. This is plundered wealth, taken by force from someone else and carried off to your own cave…”
दिमाग में किसी पहचानी दुनिया की तस्‍वीर बनती है? बनेगी ही, क्‍योंकि ऐसा नहीं है कि समानान्‍तर हम यह दुनिया जी नहीं रहे; शायद ठीक-ठीक उन्‍हीं शब्‍दों में न जी रहे हों जिसका अंश ऊपर मैंने चिपकाया है. एक और टुकड़े का नमूना देखिये:

“The container swayed as the crane hoisted it onto the ship. The spreader, which hooks the container to the crane, was unable to control its movement, so it seemed to float in air. The hatches, which had been improperly closed, suddenly sprang open, and dozens of bodies started raining down. The looked like mannequins. But when they hit the ground, their heads split open, as if their skulls were real. And they were. Men, women, even a few children, came tumbling out of container. All dead. Frozen, stacked one on top of another, packed like sardines. These were the Chinese who never die. The eternal ones, who trade identity papers among themselves. So this is where they’d ended up, the bodies that in the wildest fantasies might have been cooked in Chinese restaurants, buried in fields beside factories, or tossed into the mouth of Vesuvius. Here they were, spilling from the container by the dozen, their names scribbled on tags and tied with string around their necks. They’d all put aside money so they could be buried in China, back in their hometowns, a percentage withheld from their salaries to guarantee their return voyage once they were dead. A space in a container and a hole in some strip of Chinese soil.”
समुंदर के तट के मुंबई नहीं, इटली के नापोली का रिपोर्ताज़ है. रोबेर्तो सवियानो की 2006 में प्रकाशित ‘गोमोर्रा’ का एकदम पहला पृष्‍ठ है. बाद के पन्‍नों पर भी ज़िंदगी के बेमतलबपने के ऐसे वृतांतों की लड़ी बनी रहती है. भले फ़ि‍लहाल कहानी नापोली की चल रही हो, थोड़े समय के बाद लगने लगता है गोमोर्रा ऐसा पराया भी नहीं. हमारा अपना भी है..

Monday, November 17, 2008

किधरकथा: बारह से बीस..

कांव-कांव-क्‍यों?



कब स्‍केचिंग..



कहां स्‍केचिंग..



घर लौटायी..


गिराई..


पढ़ाई..



घर..


या पंडिजी की पंडिताई.. पंडिताईन की दु:खयायी का?..


मगर मन है कि..


(स्‍केचेज़ अपने छोटाकार में असुविधाजनक हो रही हो तो उसे चटकाकर बड़ाकार देख सकते हैं)

चोर-चोर हेंहेंरे थेथर भाई..

स्‍पेक्‍ट्रम क्‍या है? स्‍पेक्‍ट्रम का एलोकेशन? आप कहियेगा हमें नहीं मालूम तो मैं कहूंगा शायद ठीक-ठीक मिनिस्‍ट्री ऑफ़ टेलीकॉम्‍यूनिकेशन को भी नहीं मालूम! अर्द्धशिक्षित समाजों, व अर्द्धशिक्षित सरकारों के साथ यही फ़ायदा है कि जनता हंसते-हंसते लात खाती रहती है कि हें-हें ईश्‍वर का यही विधान है, और लात लगानेवाले जगहों पर बैठे राजा बाबू मंत्री महोदय हें-हें करते कभी मन हुआ तो जवाब देने को उदित होते हैं बकिया पता नहीं कहां अंतर्ध्‍यान रहते हैं कि चिरकुटई किसी से कहां हुई है, ऐसा ही प्रावधान है? इस चिरकुट तमाचाख़ोर प्रहसन में होता यह है कि चंद घाघ कंपनियां पता नहीं अपने फ़ायदों में मंत्री महोदय का कितना तिलक करती-कराती हैं, लेकिन राष्‍ट्रीय खज़ाने का लगभग पचास हज़ार करोड़ घोलकर पी जाती हैं! नतीजे में क्‍या होता है? न किसी को तमाचा मिलता है, न कहीं किसी की वाजिब जवाबदारी बनती है. मिनिस्‍ट्री आफ़ टेलीकॉम्‍यूनिकेशन के इस बड़े घपले की विस्‍तृतकथा यहां पढ़ि‍ये.

Saturday, November 15, 2008

दुनिया को कैसे देखें के कुछ लिंक्‍स..

दुनिया को कैसे देखें? ऐसे देखकर सोच में पड़े फिर जाने क्‍या देखने की सोचते रहें? या क्रिस जॉर्डन की तरह, अमरीकी जमाखोरी, कन्ज़्यूमरियाये हहाये खूंखारी को कलाकारी में बदलकर देखने लगें? और अदबदाकर बोतलबंद पानी पियें, फिर यह भी जान जायें कि कैसे वह पर्यावरण की जय-जय शिवशंकर कर रहा है?

Friday, November 14, 2008

बलरामपुर से गुज़रते हुए: चंद नोट्स

बलरामपुर पहुंचते ही बूदापेस्‍ट में लिखी वर्षों पुरानी अपनी काव्‍य-पंक्तियां एक बार फिर अंदर घुमड़ने लगीं: रे सखी, नेह पुराना होगा/ नयनों के घात/ सयाने होंगे?

बलरामपुर पहुंचते ही सबकुछ अनोखा लग रहा है. अनोखा दरअसल बलरामपुर में मेरी उपस्थिति लग रही है, बलरामपुर तो जैसे दुनिया का कोई भी बलरामपुर लग सकता है वैसा ही लग रहा है. अपने नाम को सार्थक कर रहा है. किसी भी दिशा में कोई भी कदम बढ़ाने के लिए ढेर सारे आत्‍मबल की ज़रूरत पड़ रही है, राम के स्‍मरण की तो पड़ ही रही है. नाली पर उत्‍सर्गावस्‍था, या मुद्रा, में बैठा एक बच्‍चा बहुविध रचनात्‍मकता को सार्थक कर रहा है. माने उत्‍सर्ग तो कर ही रहा है, झाड़ की एक डंडी से ज़मीन पर कलाकारी करता शागाल और ग़ुलाम मोहम्‍मद शेख़ के कान भी उमेंठ रहा है. पीछे हल-हल बहती नाली किलकारी कर रही है. एक दूसरी बच्‍ची है घुटनों तक फ्राक समेटे क्रियेटिविटी को नयी ऊंचाइयां दे रही है. कहीं से लहाये सस्‍ते लिपस्टिक से एड़ि‍यां रंगती उससे आलता का काम निकाल ले जा रही है.

ज़रा दूर पर पाठशाला है. ज़रा दूर से देखते हुए वेस्‍टर्न फ़ि‍ल्‍मों में किसी दुर्घर्ष गोलीकांड के बाद उजड़ा संसार लगता है, लेकिन निकट पहुंचने पर दीखता है एक बकरी व गदहा यहां-वहां छुटी हुई शिक्षा का घास चर रहे हैं. स्‍पेस यूटिलाइज़ेशन के मैक्‍सीमाइज़ेशन की थियरी में दीक्षित चंद नौजवान ताश खेलते हुए एक-दूसरे पर फैल रहे हैं जिससे साफ़ दिख रहा है कि बलरामपुर की रगों में बहता जवान ख़ून अभी ठंडा नहीं हुआ है. गौशालानुमा पाठशाला की दीवार पर दो पुरानी फ़ि‍ल्‍म- ‘जीने की राह’ और ‘साधू और शैतान’ के पुराने पोस्‍टरों के चिथड़े बचे हुए हैं जिसे देखकर पता चल जा रहा है कि बलरामपुर में न केवल नागर संस्‍कृति का ऑलरेडी पदार्पण हो चुका है, बल्कि आगमन के बाद वह अभीतक वहां बनी हुई भी है!

बूदापेस्‍ट में उड़ायी अपनी विदेशी डायरी में ये सारे सोश्‍योलॉजिकल डेटा कंपाइल करता, इसके सिवा और भी जाने क्‍या-क्‍या सोचता, चाय के एक सड़े हुए ठेले पर आकर ढेर होता हूं. बाजू में ज़िंदगी से ढेर हुए एक बुज़ूर्ग मौलवी हैं ठौर लिये चाय सुड़क रहे हैं, दुआ-सलाम की अनौपचारिकता से बचते हुए उनसे सीधा सवाल करता हूं- आपके यहां बच्‍चों के बम-वम बनाने की ट्रेनिंग के कैसे सूरते-हाल हैं? मौलवी साहब सकपकाकर बगलें झांकने लगते हैं, मैं सोचने लगता हूं अगले मोड़ पर मंदिर के बाहर बैठे साध्‍वी व साधुओं से यही सवाल दाग़कर देखूंगा कि वे भी बगलें ही झांकते हैं, या मुझको बलरामपुर छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं?

पर्याप्‍त मात्रा में बगलों को झांक चुकने के पश्‍चात् मौलवी साहब मुझसे मेरा परिचय पूछते हैं. मैं हंसते हुए जवाब देता हूं कि वे मदरसों के मठाधीश हैं, मैं ब्‍लॉगिंग का हूं! मौलवी साहब सवाल करते हैं ब्‍लॉगिंग क्‍या?

मैं सन्‍न होकर सोचता हूं ऐसे ही नहीं है कि बलरामपुर, बलरामपुर बना हुआ है! और बना रहेगा. हद है. तबतक अपने को मेरी पत्‍नी बतानेवाली औरत का फ़ोन आ जाता है कि कहां पहुंचे. भन्‍नाया जवाब देता हूं कि हद है, यार, अभी बलरामपुर ही पहुंचा हूं और तुमने लेसना शुरू कर दिया! चूंकि पत्‍नी है उसका पत्‍नीयाना शुरू हो जाता है कि सच-सच कहो बलरामपुर में ही हो, कहीं इधर-उधर नैन-मटक्‍का नहीं कर रहे? मैं मौलवी जी से आवाज़ बचाकर बदक़ार को जवाब देता हूं- अबे, लिच्‍चड़ी कहींकी, यही भरोसा लेकर हमारे साथ सात फेरे और जनम-जनम हमारी सेवा का प्रण लिया था? बेवक़ूफ़ औरत को चुप कराकर अबकी मैं फ़ोन करता हूं. प्रियतमा चंद्रकला को.

चंद्रकला जम्‍हाई लेकर कहती है क्‍या है. मैं दुखी होकर कहता हूं मैं बलरामपुर की धूल फांक रहा हूं और तुम अभी तक सो रही हो? चंद्रकला ऊबी हुई कहती है फिर क्‍या करूं. मैं कहता हूं मुझे मिस करो, द वे आई एम मिसिंग यू, चैंडी? चंडाल चैंडी चिढ़कर फ़ोन रख देती है, और फिर मेरी कितनी भी घनघनाहटों के बावज़ूद फ़ोन दुबारा उठाती नहीं. जैसाकि ऐसी चंडालस्थिति में स्‍वाभाविक है मेरा मन घबराने लगता है, चैंडी की यादें सताने व अपने पास बुलाने लगती हैं. द जिस्‍ट आफ द मैटर इज़ कि आई स्‍टार्ट हेटिंग बलरामपुर, ऑर फॉर दैट मैटर, एनी पुर, एंड डू माई बेस्‍ट टू गेट आऊट फ्रॉम इट!

वापसी में चंद्रकला के बारे में किसी भी असुविधाजनक स्थिति-परिस्थिति की भयकारी कल्‍पना से बचने के लिए मैं लगातार सोच रहा हूं कि बलरामपुर ठीक-ठीक कहां है? क्‍या वह चाय के ठेले, या गौशालानुमा पाठशाला की दीवार पर छुटे पोस्‍टर के चिथड़ों में छिपा है, या उसके मटमैले अंधेरों का करियाया लालटेन अपनी आत्‍मा में गाड़े मैं कहीं भी जाऊंगा, बलरामपुर मुझसे छूटेगा नहीं?

(उड़ंतू परात उर्फ़ केरल के मोहनलाल की तर्ज़ पर समीर 'सोहनलाल' के लिए. कि खामख़्वाह हमसे मुंह न फुलायें, ज़रा सहूलियत झाड़ सकें!)

Thursday, November 13, 2008

अरे, यायावर, रहेगा याद!

हिंदी में यात्रा संस्‍मरण व आत्‍मकथात्‍मक, अंतरमथात्‍मक साहित्‍य का अभाव दुर्भाग्‍यपूर्ण है. जोसेफ़ हेलर की सहज-सुलभ ‘कैच-22’ या ऐडम स्मिथ की ‘द वेल्‍थ ऑफ़ नेशन्‍स’ जैसी क्‍लासिक रचनाओं का अभी तक दुलर्भ बने रहना तो ख़ैर है ही. एक तरह से देखिए तो हिंदी में क्‍या-क्‍या नहीं है और इस अभावस्‍था की गहरायी इतनी गहरी है, यह लिस्‍ट इतनी लंबी है कि वह खुद में ही एक समूची किताब की सामग्री हो सकती है. हो सकती है क्‍या, है. सवाल है ऐसी किताब भी हिंदी का कोई लाल लिख दे वह भी अबतक कहां उपस्थित है? इट्स रीयली अ वेरी डीप एंड अ वॉल्‍यूमनस अफ़ेयर. ऑर अ बुक. एंड कृष्‍णा सोबती के ‘मित्रो मरजानी’ के आकारवाली किताब नहीं, अश्‍क़ की ‘गिरती दीवारें’ और बीसी वर्मा की ‘भूले-बिसरे चित्र’ के भारीपने वाली! दुर्भाग्‍यपूर्ण है. ऐसी दुखती रग है कि इस चिन्‍ता पर कैसे भी ललित-लेखन में दुर्भाग्‍य शब्‍द के दोहराव का ख़तरा बन जाता है! और एक बार बन जाने के बाद आगे भी निरन्‍तर बना रहता है! आप सौभाग्‍यपूर्ण चंद स्थितिओं का स्‍मरण करें (ओ, हाऊ लिटिल?), पलक झपकायें, और थोड़ा आगे जाकर पाइयेगा कि छोटी लाइनवाली दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍टेशनों का सिलसिला शुरू हो गया है!

क्‍यों है आख़ि‍र ऐसा? आज मसिजीवी के सौभाग्‍यमिश्रित दुर्भाग्‍यवृतांत पर एक नज़र जाते ही मन में कितने और कैसे-कैसे तो गहरे सवाल उठते गये. क्‍या ग्‍लोबलाइज़ेशन के बूम टाइम ने हिंदीवासियों को इतना अवसर भी नहीं दिया कि अज़रबैजान न सही, अमेज़न या एम्‍सटरडम तक की ही वे यात्रा कर सकें? और लौटकर अपना उल्‍टा-सीधा ‘ओहो, कैसा तो अजब, और फिर कितना ग़जब!’ वृतांत राजकमल के हवाले कर राजकमल को बिजी और हिंदीजगत को धन्‍य कर सकें? या समूचे बूमटाइम नोट काट रहे थे, अब डूमटाइम कटे-कटे से विदेश-भ्रमण पर निकलेंगे और उस भ्रमण वृतांत के परायण का सौभाग्‍य हिंदी पाठकों के हिस्‍से चंद वर्षों के अनंतर आयेगा? मगर देश के हिस्‍से एक बूमटाइम आया, और आकर गुज़र भी गया लेकिन अगर उसका तात्‍कालिक लाभ हिंदी को नहीं हुआ है तो यह भी खासा दुर्भाग्‍यपूर्ण ही है!

लेकिन दुर्भाग्‍यपूर्ण तो और भी प्रसंग हैं. एक तो यही कि बूम का इतना बम-बम हुआ मगर राष्‍ट्रीय स्‍तर वाली हिंदी की कोई पत्रिका सामने नहीं आयी. विस्‍तार के नाटकीय छलांग आये, दैनिक भास्‍कर जैसे अख़बार ने खूब सारा पैसा काटा और झोंका, अपने चकमक मुकुट में एक पत्रिका का मोरपंख भी जोड़ा- ‘अहा, ज़िंदगी!’.. ऐसी ज़हीन और पहुंची हुई पत्रिका है कि ‘द न्‍यूयोर्कर’ का एडीटर देख ले तो उसी दिन न्‍यूयॉर्क छोड़कर ऋषीकेश चला जाये और वहीं किसी गुफा में सौभाग्‍य व दुर्भाग्‍य के गहरे विमर्श में अपने को ससुर, वेस्‍ट कर डाले!

मगर एक संभावना यह भी है कि न्‍यूयॉर्कर का संपादक ‘अहा, ज़िंदगी!’ देखने के अनंतर ऋषीकेश जाकर वेस्‍ट होने की जगह भ्रष्‍ट हो जाये, एक ओरियंटल, इरोटिक ट्रेवेलॉग लिख मारे और मुझसे ऋषीकेश व ऋषत्वविहीन लोगों को गरिमापूर्ण साहित्‍य के सौभाग्‍यमणि से भर दे? संभावना है. लेकिन उसके लिए भी पहले ‘अहा, ज़िंदगी!’ का न्‍यूयॉर्कर के एडीटर के डेस्‍क तक पहुंचना ज़रूरी है न? और जबतक ऐसा उद्यम भास्‍करित नहीं होता हिंदी की दुर्भाग्‍यावस्‍था बनी रहेगी.

लेकिन ऐसा नहीं कि लोग पहले ऋषीकेश नहीं गये, इरोटिन न सही, स्‍पीरिचुअल लिटरेचर ही लिख मारते? बाबा, ठीक है, बैष्‍णोदेवी तो गये थे? गुलशन कुमार तक ने इतने सीडी निकाल लिये, आपसे एक यात्रावृतांत न बहिरया गया? और अपने को हिंदी-हितैषी बोलते हैं? समीर लाल को देखिये, कैनडा में खा-खाके फैल रहे हैं, उस फैलाव को ‘टोरंटो में यहां से वहां’ के किसी क्रियेटिव ट्रेवलॉग में कन्‍वर्ट करने की जगह सिर्फ़ यहां और पता नहीं कहां-कहां के ब्‍लॉगों पर की कमेंटबाजी में अपनी एनर्जी फ्रस्‍ट्रेट कर रहे हैं?

खुद मेरी कहानी कम दुर्भाग्‍यपूर्ण नहीं. कैनडा न सही कलकत्‍ता तीन दिनों के लिए तीन मर्तबा ज़रूर गया हूं, ‘ओह, आमार कोलकोता!’ जैसा कोई हृदयविदारक, मर्मांतक नवारुण भट्टाचार्य मोतुन जिनिस लिख मारता, लिखा? कहां लिखा? बनारस, बालासोर, बलांगीर, बलरामपुर सब अनलिखे पड़े हुए हैं. हृदय में कैसी तो कचोट उठती है. हिंदी में सबकुछ कैसा-कैसा तो दुर्भाग्‍यपूण है. क्‍यों है?

इस विषय पर मैं बहुत कुछ और बहुत देर तक बोलता रह सकता हूं, समय मिले तो किताब भी लिख सकता हूं, मगर, समय भी तो, ससुर, एक बड़ी फ़जीहत है, फ़ि‍लहाल बाहर भागना है और देरी हो रही है. इसी लघुलेखन से काम चलाइये.

Wednesday, November 12, 2008

तारा-तारा ज़मीन पर? या व्‍हॉट?

या व्‍हाई आई ऐम थिंकिंग लिटिल लेस दीज़ डेज़?..

पता नहीं इतनी सारी और चीज़ें हैं मगर मैं तारों के बारे में ही क्‍यों सोचना चाहता हूं. कम से कम सिने तारिकाओं की ही सोचता? या ज़्यादा सोचने के गुमान में यही सोच लेता कि आजकल सोचना कम क्‍यों हो गया है. लेकिन ग़ौर करनेवाली बात है सोचना सचमुच कम हुआ है या उस सोच की प्रदर्शनी कम हुई है की महज़ सामयिक लाक्षणिकता है, जैसाकि रियो द जनेरो में एक अदृश्‍य जनसमुद्र के आगे जनसमुद्र का नेता बनने की कामना रखनेवाले कमातोल पियेर रादिकालेंस्‍की ने सही-सही फ़रमाया ही है नियो-लिबरल इकॉनमी का बोरिया-बिस्‍तर उठ गया है जो कह रहे हैं ग़लत कह रहे हैं, वे जन को बरगला रहे हैं जो यहां-वहां बैंको के सरकारीकरण में जननोन्‍मुखता पढ़ ले रहे हैं! नियो-लिबरल इकॉनमी कहीं किसी सरकार की जेब में नहीं गयी, सरकारें अब भी उसी की जेब में पड़ी हैं; इतने सारे हाय-तौबा के बाद बस घड़ी भर को दम ले रही है. दम ले चुकने के इम्मिडियेटली बाद फिर ‘प्रॉफिट-प्रॉफिट!’ करती ठुमकने लगेगी, और इस कॉरपोरेट प्रॉफिट की राह में जिस किसी सरकार ने राष्‍ट्रवाद, जनवाद, या जो कोई भी विवाद किया उसे कुहनैटा मारके तड़ से प्रॉफिटवाद के रास्‍ते पर लिये आयेगी. और राष्‍ट्र हेंहें-लेले करते प्रॉफिटवाद के रास्‍ते तड़ से आ भी जायेंगे. जनता बरबाद होगी तो इसमें किसी और का नहीं जनता का ही कसूर होगा, क्‍योंकि प्रॉफिटवाद के इस बनैले महकाऊ दौर में जनता भी कोई राजनीतिक गोलबंदी नहीं सोच पाती, कभी आत्‍मा के उमेंठे के अनोखे दुर्लभ क्षणों में समाज-राजनीति सोचती भी होगी लेकिन मूल्‍य और जीवन उसका जो है कि प्रॉफिटवाद के गिर्द ही गोलबंद हुआ है.. एक मिनट, एक मिनट!

मैं भी ससुर, कंहवा के गोली केने चलौंली के जाने किन अजाने रास्‍तों पर दागने-दगने लगता हूं. क्‍या कह रहा था? हां, कह रहा था कि नियो-लिबरल इकॉनमी की तरह सोचना तात्‍कालिक तौर पर सेंटर स्‍टेज में दिख भले न रहा हो, है स्‍टेज पर ही. लेकिन जहां भी है वह तारों के बारे में क्‍यों सोचना चाह रहा है? आर दे वर्थ इट? तारे से हमें कुछ मिलेगा? एनी प्रॉपर प्रॉफिट? नहीं मिलेगा तो फिर ससुर तारे की औकात क्‍या! ज़मीन पर रहे चाहे गड्ढे में, हू केयर्स. साथ ही एक सोचनेवाली बात यह भी है कि भारत जैसे देश में एक तारा ज़मीन पर नहीं रहेगा तो कहां रहेगा? तारे को तो अलाने नेता और फलाने बिल्‍डर और इंडस्ट्रियलिस्‍ट का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि पैर टिकाने लायक जगह के नीचे से ज़मीन खींच नहीं ले रहे हैं! आसमान पर तो ऑस्‍कर की फील्डिंग में लगे इन दिनों आमिर रहेंगे, भले ताज़ा माली हालात ऐसे न हों कि खुद ऑस्‍कर भी आसमान में रहना बहुत अफ़ोर्ड कर सके. इंडियन क्रिकेट रहेगी. भले चार महीने बाद ज़मीन पर आ जाये. खुद धोनी साहब क्रिकेट के बंगले से बाहर निकलकर जीवन की वास्‍तविकताओं की झोपड़ी में घुसें और बिहार के रास्‍ते क्रिकेट की सफ़ेदी नहीं बिहारी धूसर पहनकर मुंबई पहुंचे, पलक झपकते में शायद नवनिर्माण वाले उन्‍हें भेया होने की सज़ास्‍वरूप निर्वाणावस्‍था तक पहुंचा दें, तड़ से धोनी बाबू जान जायेंगे आसमान नहीं, ज़मीन पर ही हूं. या यह देश ज़मीन पर है. ज़मीन पर ही रहेगा. आसमान पर सिर्फ़ रिलायंस के ‘कर लो दुनिया को मुट्ठी में’ टाइप के नारे जायेंगे. और इतनी मात्रा में जायेंगे कि आसमान में तारों का रहना दूभर हो जायेगा, अदबदाकर वह ज़मीन पर आयेंगे, और गनीमत होगी ज़मीन पर ग़र थोड़ी जगह बची हुई हो, क्‍योंकि इसकी भी ढेरों संभावना है कि कल को न बची रहे. फिर तारे ज़मीन पर नहीं कहां? नामके फ़ि‍ल्‍म को बनाने की ज़रूरत बनेगी, और हो सकता है फ़ि‍ल्‍म के लिये पैसे निकल आयें, बनाने को मैं तैयार हो भी जाऊं मगर हो सकता है तब झमेला यह रहे कि खुद मेरे नीचे ज़मीन न रहे, किसी पहाड़ में हिंदी कविता नहीं निर्वाण के बिम्‍ब ढूंढ रहा होऊं?..

लेकिन बड़ी मुश्किल है इन दिनों पता नहीं क्‍या है सोच नहीं पा रहा हूं. जबकि आप देखिये, बिना सोचे इतना हेंहें कर रहे हैं. और करते हुए दीख सिर्फ़ इसलिए नहीं रहे हैं कि आपके पैर ज़मीन पर नहीं हैं? सोच आसमान में है और पैर ज़मीन की जगह आपके मुंह में?..

Monday, November 10, 2008

किसका खेत किसकी मूली के बीच बेचारा देश..

जातीयता बड़ा लुभावना प्रेम है. मन में ऐसे-ऐसे मरोड़ उमेंठता है कि बर्मा से अफ़ग़ानिस्‍तान तक के ‘अहो भारत! अहो भारत!’ की पुरानी घिसी छवि के स्‍मरण में हम ठुनकने लगते हैं. अफ़ग़ानिस्‍तान क्‍या ईरान तक पहुंच जाती भारत-भारती की जोत, सिकंदर सा कोई जांबाज दुस्‍साहसी नौजवान होता जाने कैसे-कैसे सोये राष्‍ट्रीय अरमान पेर लेता, पूर लाता? मगर दुर्दिन-दुर्दशा के अहोभाग्‍य, देश के जांबाज दुस्‍साहसी नौजवान देश जीतने नहीं, घर से बाहर नौकरी खोजने निकलते हैं. कल तक अमरीका में खोज रहे थे, अब लौटकर यहां खोजेंगे. चूंकि दुस्‍साहसी हैं उनके खोजने पर उन्‍हें देश और नौकरी दोनों मिल जायेगी (हालांकि नौकरी- किसी भी तरह की- के बारे में इस दावे से कहने में अब थोड़ा संकोच होता है). जो दुस्‍साहसी नहीं हैं उन्‍हें यहां-वहां बिना मांगे लातें ज़रूर मिल रही हैं, नौकरी नहीं मिल रही. भूले से कहीं मिल जाती है तो विगलित भावुक लात खाया मन देशभाव में धन्‍य हो जाता है कि हो धन्‍य क़ि‍स्‍मत, इस देश में एक नौकरी पर तो कम से कम हमारा क्‍लेम निकल आया! बकिया तो सच्‍चायी यह है कि क़ि‍स्‍मतवालों के लिए मुलुक में घर की जोरू और पड़ोस के चार घरों की मोहब्‍बत का आसरा है, और उतना ही आसरा है, भारत-भारती और देश की मोहब्‍बत का नहीं है. देश कहीं बसता है तो रिलायंस इंडस्‍ट्री और रिलायंस मोबाइल और इंडियन बोर्ड ऑफ़ क्रिकेट कंट्रोल के लिए बसता होगा, मुलुक से मुंह उठाये देश की तरफ़ देखनेवालों के लिए गायब हो गया है. राष्‍ट्रीयता ठंडा माने कोला की बोतल में डालकर हम काफ़ी पहले पी चुके हैं. जिज्ञासा-जिज्ञासा जितना करें, शिक्षा की दमक हममें नहीं है, जातीयता की पुरानी ऐंठी हुई ठसक है, तो जातीयता को राष्‍ट्रीयता से कन्‍फ़्यूज़ कर रहे हैं.

जातीयता की इसी पुरानी चोटखायी ठसक में राजस्‍थान के गुज्‍जर भाई बंदूक बाहर करवा के तेल से उसकी सफाई करने लगते हैं, बैठे-बिठाये बंदूक गैंग का निर्माण हो जाता है. महाराष्‍ट्र में अलग-अलग समूह व पहचानों के लोग राज ठाकरे से किसी मवाली के गिर्द गोलबंद होने लगते हैं क्‍यों? क्‍योंकि शहरी परायेपन की तक़लीफ़ में जातीय अस्मिता व अरमानों की हूक उठी है, देश उनको एड्रेस नहीं कर रहा, न उसके पास इनके रिड्रेसल का कोई एजेंडा है, राज ठाकरे के पास गुस्‍सा निकालने का है, तो मराठी माणूस की चोटखायी लहरायी मानसिकता उसके गिर्द लटक ले रही है. यह जातीयता ही है राष्‍ट्रीयता नहीं. ठीक-ठीक की प्रांतीयता भी नहीं है. प्रांतीयता होती तो यह चिंतित मराठी माणूस विदर्भ के किसानों की सोचता. नहीं सोच पा रहा. क्‍यों नहीं सोच पा रहा? क्‍योंकि भारत-भारती का रेकर्ड बजानेवालों ने उसके हिस्‍से की राष्‍ट्रीयता चोरमंडली के अपने गिरोहबंद मुनाफ़ों में खाकर हजम कर लिया है!

भारत ही नहीं, कहीं भी देश किसका होता है? उसकी नीतियां और उसके हित किसके हित में होते हैं. बाबू बुद्धदेव बंगाल में जबरिया जनता के मुंह में उसका हित ठेल रहे थे कि बाबू रतनजी टाटा की सोच रहे थे? सन् अस्‍सी के बाद से रिलायंस की कितनी आर्थिक धांधली और घपलों के मामले हैं, उनमें से कितनों में उन्‍हें सज़ा हुई है. समझौतों की बात नहीं कर रहा, वास्‍तविक सज़ा की कर रहा हूं, कभी हुई है? सहारासम्राट सुब्रत सहारा की? कभी होगी? राष्‍ट्रीय संसाधन, संरक्षा-सुरक्षा इन आठ-दस प्रतिशत लोगों की सेवा के लिए है कि विदर्भ और बिहार के लातखाये भगोड़ों के लिए? बिहारी तो उन्‍नीसवीं सदी के उत्‍तरार्द्ध से ढोर-डंगरों की तरह नाव और गाड़ि‍यों में लदकर रोज़गार की खोज में भटक रहे हैं, बिहार में परायापन महसूसते रहे हैं, बाहर आकर कहां से राष्‍ट्रीय ममत्‍व महसूसने लगेंगे?

महसूसने की भावुकता में कोई बहकेगा तो बहकते-बहकते ज़रा ठहरकर सोचने की कोशिश करे इस राष्‍ट्रीय भूगोल का महज़ कारोबारी विस्‍तार के लिए किसी मुनाफ़ाख़ोर के वकील और एजेंट की ज़बान तो नहीं बोल रहा, क्‍योंकि देश के टूटने का सबसे ज़्यादा नुकसान इन राष्‍ट्रीय कारोबारियों को ही है, पहले से ही टूटे, अंगभंग करवाये आमजन को अब देश की चिंता नहीं, अपनी जातीयता की है. और अकबक घबराहट में कुछ वैसी ही है जैसे किसी भी हद तक हालात खराब करवाकर किसी भी सूरत में अपनी कुर्सी बचाये रखने की महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री विलासराव देशमुख की है, क्‍योंकि वही सबको दिख रहा है, अपनी चमड़ी और ज़्यादा से ज़्यादा अपनी कुर्सी, देश नहीं दिख सकता. देश देखने की समझ व शिक्षा व तद्जन्‍य संस्‍कार पैदा करने में देश चलानेवालों की जब समय था पैदा करवाने की इच्‍छाशक्ति नहीं थी. राष्‍ट्रीय संसाधनों की कालाबाज़ार लूट में आंखें मूंदे तब वे झपकियां ले रहे थे, अब उस बंदर-बांट में अपने हिस्‍से की गारंटी दुरुस्‍त करने की खातिर चुनाव लड़ते हैं, देश दुरुस्‍त करने की खातिर नहीं. देश दुरुस्‍तगी की बातें हमारा-आपका चूतिया काटने की गरज से, या फिर अख़बार व टीवी में महज़ स्‍पेस भरने की गरज से होता है.

Sunday, November 9, 2008

क्‍या रोना किसे धोना..

नीले-लाल कपड़ों में मैं भी ठेले पर लेले उद्धारक, बायें से घूमकर चार कदम दायें और ढलान के बाद के उजड़े मशान पहुंचोगे जीवन सुधर जायेगा क़ि‍स्‍मत चमक जायेगी टाइप कोई समाज-सुधारक होता, गली के छोर पर बकलोलरस बुनता, अलाने हिसिर-हिसिर हंसते फलाने लिसिर-पिसिर धंसते, पान की गिलौरी बंधवाकर लाते- गुरु, क्‍या शॉट लगाया है दुधारु चलवाया है! का लिसराया माधुर्य बटोरता, एक गुलकंद, दो इलायची, तीन सुपाड़ी के टुकड़े दाब चौथे हरे-अरे? की गदर-बदर अलसाहट में प्रस्‍थान करता, किसके यहां क्‍या गिरा रहा हूं की रत्‍तीभर जिन सोचे खुले में फैलकर दिशा-मैदान करता मगर चक्‍कर है हिंदी ब्‍लॉग जगत की चिरकुटइयों पर अब खून-खौलायी क्‍या लोर-बहायी भी नहीं आती. चिरकुटई से तो सहोदरभाव पहले भी पता नहीं कितना था, अब लगता है इस मारकिन की धोती की फींचाई पर कैसी भी सनलाईट साबून घिसायी का क्‍या तुक.. बेहतर है योसारियन के फ़लसफ़ों के सहोदरभाव में खुद को धोऊं!

“Do you know how long a year takes when it’s going away?” Dunbar repeated to Clevinger. “This long.” He snapped his fingers. “A second ago you were stepping into college with your lungs full of fresh air. Today you’re an old man.”
“Old?” asked Clevinger with surprise. “What are you talking about?”
“Old.”
“I’m not old.”
“You’re inches away from death every time you go on a mission. How much older can you be at your age? A half minute before that you were stepping into high school, and an unhooked brassiere was as close as you ever hoped to get to paradise. Only a fifth of a second before that you were a small kid with a ten-week summer vacation that lasted a hundred thousand years and still ended too soon. Zip! They go rocketing by so fast. How the hell else are you ever going to slow time down?” Dunbar was almost angry when he finished.
“Well, maybe it is true,” Clevinger conceded unwillingly in a subdued tone. “Maybe a long life does have to be filled with many unpleasant conditions if it’s to seem long. But in that event, who wants one?”
“I do,” Dunbar told him.
“Why?” Clevinger asked.
“What else is there?”

(छठवें दशक की जोसेफ़ हेलर की चर्चित किताब कैच-22 से उद्धृत)

Saturday, November 8, 2008

किधर-किधर..

कभी लगता है बर्बरता का अंधा जंगल है मैं घबराये, सभ्‍यया का मुखौटा चढ़ाये किसी तरह बच निकलने की कोशिश कर रहा हूं. कभी लगता है सभ्‍य ही हैं पहचानने में मुझसे ग़लती हुई है, मैं महज़ अपनी ग़लतियां बदलने में हारा, ऐसी गजबज सभ्‍यता के आगे बेचारा कभी पूंछ कभी मूंछ टटोल रहा हूं और अदबदाकर फिर घबरा रहा हूं कि दोनों नदारद हैं..


सोचता हूं बचपन की बुरी आदत, पुरानी बीमारी है चिचरियां खींच ही रहा हूं फिर कुछ अपनी खींचूं? लेकिन फिर सोचता हूं यहां-वहां कहां-कहां खिंचे खुद को किस भीड़ से खोज लाऊंगा, नहीं पाऊंगा तो कैसी आंकना उकेर जाऊंगा? समय को पकड़ने की कोशिश करूं उसी में कहीं खुद का सूराग कुछ पहचाने दाग़ मिलेंगे?..


कितने वर्षों पहले घर से बाहर निकला अब तक बाज़ार की ज़द से बाहर हूं..


बाज़ार की ज़द से बाहर जीवन में कितना अंधेरा है, कोई पहचानी आवाज़ फुसफुसाकर कहती है बाज़ार के भीतर मन का है..


अंधेरा..


मुखौटा चढ़ाने-हटाने की रेलमपेल, निर्मम खेल में कुछ बाद फिर कहां याद रहता है कौन असली मैं था, कौन मुखौटा..


(स्‍केचेज़ अपने छोटाकार में असुविधाजनक हो रही हो तो उसे चटकाकर बड़ाकार देख सकते हैं)

Friday, November 7, 2008

एक लघुव्‍यथा लाईनों में..


हमेशा एक एंगल होता है.. हर एंगल में एक स्‍टोरी होती है..


सचमुच होती है?



कोई पूछता किसी दिन..


या क्‍या मालूम समझदार होता, शायद चुप रहता..

Thursday, November 6, 2008

सुबह-सुबह..



क्‍या करूंगा अपनी छिपी लिये प्रतिलिपि की बस में चढ़ जाऊंगा? सुरभि से कहूंगा हंस रही हो इसलिए कि हमने अब तक तुम्‍हारी जहाजी देखी नहीं है. बस में बैठे-बैठे दिखेगा सब ऑलमोस्‍ट आइलैंड ही है? अपने आइलैंड में धीमे बुदबुदाऊंगा हारमोनियम के घिसे कोनोंवाली पुरनिया सीपिया अच्‍छी है. कहूंगा आइलैंड ही सही ऐसी-तैसियों का हिसाब अच्‍छा है? या चंद्रहास से करूंगा हास लचकते लदिगा की भिंडी के पौधे पर कोंहड़ा उगाने की तुम्‍हारी तस्‍वीर अच्‍छी है. कहूंगा राल्‍फ़ नाडर की चिट्ठी, आइलैंड के अकेलेपन में ही सही, अच्‍छी है?

Wednesday, November 5, 2008

यहीं कहीं पड़ा होगा, देश..

कहीं न रुकनेवाली रेल होगी, या कब से बंद पड़ी होगी, घूमता जो दिखता होगा मन के घुमड़ते भाव होंगे, भूले हुए घाव, पहचानी आवाज़ों की अनौपचारिकता के बीच अजानेपन के निर्मम स्‍त्राव होंगे. सवारियां लदती सी दिखती होंगी, चेहरे अपनी जगहों पर अड़े कभी दरकते खड़े गिरते से दिखते होंगे. डूबने से ठीक पहले हचकती नाव के लसर-धसर का अंतहीन विस्‍तार ग़रीब की रोज़ की ज़द्दोज़हज थका हुआ कारोबार होगा.

जबड़े पर हाथ धरे दर्द में दोहरा होता एक ग्रामीण लगभग रोने लगेगा किस जनम के पाप भुगत रहा है, एक औरत मुरझायी बतायेगी फुसफुसायेगी क्‍या करती जितना कर सकती थी, किया फिर भी इस दफ़े त्‍यौहार रह ही गया, जाने बच्‍चे किस हाल में हैं, बाहर सूखने को अदौरी छोड़ आयी थी किसी ने हटाया कि नहीं. कहीं पीठ पीछे घरघराती बुर्ज़ूगवार ज़नाना आवाज़ जाने कौन सी मर्तबा दोहरायेगी अगला टेशन आये तो खबर कर देना, बच्‍चा, शायत यहीं होगा गांव और कितनी दूर होगा. बुढ़ि‍या को कोई जवाब नहीं देगा.

लसर-धसर डोलती हैं सवारियां कहीं पहुंचने का वहम बना रहता है. मैं उनींदे में उंगलियां टटोटला हूं, हाथ, नाक, कितनी खुशी है अपने साथ ही हूं खोया नहीं हूं. हालांकि आंख खुलने पर अब गांव नहीं आता, सिगरेट पर सिगरेट पर सिगरेट धूंकते रहने के बावज़ूद नांव याद नहीं आता. सलीके की गुज़ारिश में एक फीक़ी मुस्‍कान याद आती है, कुछ देर तक बोल लेने की पुरानी आदत, टटोल लेने की हड़बड़ में भीड़ के संगत की ग़लतफ़हमियां बनी रहेंगी नहीं मिल रहा मगर यहीं कहीं होगा- नांव, गांव, सफ़र, अच्‍छे थोड़े कुछ पड़ाव, कोई आख़ि‍र कैसे तो मिल गयी मंज़ि‍ल- एक देश, कहीं यहीं वहीं पड़ा होगा, देर-सबेर मिलेगा?

Tuesday, November 4, 2008

अंधेरों में बात..


मैं कहूंगा किस झोंक में उड़ी आती हो, अनजाने शहर की तंग गली का आख़ि‍री बंद दरवाज़ा हूं, गरदन के रोओं और चमकते बालों पर रहम करो लौट जाओ, तुम कहोगी बरसाती अंधेरिया रात में फटे पाल की नाव होगी तो क्‍या गरीब की कहानी न होगी, सफ़र को रवानी? आह का इक रस्‍ता होगा और हल्‍के नाज़ुक चिड़ि‍या की आंखों की चमक, थरथराती उड़ान होगी अर्थहीन ठहरा हुआ विराम क्‍यों होगा, न होगा. दोनों पंजों में चेहरा ढांपकर मैं कहूंगा कैसी बहकी बातें करती हो, ये आंखें पत्‍थर की हैं और पैर रेत के गढ़े हैं, देखने के हैं चलाने, काम में लाने के नहीं. मारकिन के पुराने घिसे कपड़े की फीक़ी मुस्‍की से चेहरा पोंछ तुम कहोगी साइप्रस, सुरीनाम, सलेमपुर कहां से आती है ऐसी करियायी, भारी कभी की न उतारी उदास हवायें, आकर बजती रहती हैं सूनी दीवारों पर निकलकर कभी जाती कहां हैं, इतना तो कहां-कहां का स्‍नेह बरसता रहता है, कहीं संचय होता है, कैसा सूखा पत्‍थर है सारा फिसलता रहता है? मैं कहूंगा मैं रात में खड़ा हूं तुम दिन को देख रही हो, रात के नज़दीक आओगी फिर मैं नहीं दिखूंगा. तुम कहोगी तुम रात की बात समझती हो, दिन में भी देखे हैं अंधेरे उन अंधेरों के घात समझती हो, लेकिन खुली बरसात इस तरह कटोरी लिये हाथ उदासियां बटोरते रहने की मेरी समझदारी नहीं समझती.

मैं कहूंगा मगर क्‍या कहूंगा? तुम कहोगी लेकिन फिर क्‍यों कहोगी.

Monday, November 3, 2008

गॉड ब्‍लेस द लवर्स..

लड़कियों की आंखों में इतना दर्द कहां से आता है? जबकि आईने के आगे खड़े होकर इतनी मर्तबा मैंनें आंखों को दायें-बायें किया है मगर दिल के अंदर उतर जाये दर्द में ज़र्द नश्‍तर की वह कशिश कभी पैदा नहीं कर सका. सच्‍चायी तो यह है कि एक घिसे हुए ब्‍लेडवाला असर भी नहीं निकाल सका. जबकि मंजरी ने अभी बिसुरना शुरू भी नहीं किया था, जाने दीवार पर किस अदृश्‍य बिंदु को जिगर का ख़ून पिलाती रंजीत को बास्‍टर्ड भर कहा था और मेरे मन में तक़लीफ़ व गुस्‍से की कुछ ऐसी ऐंठ उठने लगी कि देसाई सामने होता तो उसे तमाचा मारने की गरज से मैं कुर्सी से उठ खड़ा होता. या न भी खड़ा होता तो कैंटिन के मैनेजमेंट की नज़रें बचाता ज़मीन पर थूक दिया होता. उसके बाद भी परिस्थिति के उबाल को ज़ाहिर करने में कोई कसर रह गयी होती तो मंजरी का हाथ अपने हाथों में ले सबको सुनाते हुए मैंने जोर से कहा होता- प्‍लीज़ डार्लिंग, ऐसे गंवार और फ़रेबी आर्टिस्‍ट पर आंसू ज़ाया करने से बेहतर है तुम मेरे साथ कहीं क्‍वालिटी आइसक्रीम खाने चलो. या तुम्‍हारी मर्जी हो तो भांग की गोलियां खाकर परेड ग्राउंड की हरी घास पर भी जाकर हम लेट सकते हैं?

मगर दिक़्क़त थी इतना गुस्‍सा ज़ाहिर करने जितना रंजीत देसाई को मैं जानता नहीं था. हाथ थामकर कैंटिन के बाहर चला जाऊंगा से ज़्यादा कैंटिन के भीतर ही उसका हाथ अपने हाथों में ले लूं, मंजरी तक से ऐसी कोई पहचान नहीं थी. फिर दिक़्क़त के साथ इसका असमंजस भी था कि ताप्‍ती, खोसला या नावेद की ग़ैरमौज़ूदगी में मंजरी मुझे अपना हमराज़ समझने की इज़्ज़त बख्‍श रही थी, उनमें से किसी के आते ही शायद मुझसे मुंह फेरकर कुर्सी से उठ जाये. रंजीत का गुस्‍सा मुझपर उतारकर शायद फिर मुझे पहचानने से भी इंकार कर दे?

मगर कैंटिन में ताप्‍ती, नावेद, खोसला कोई नहीं आया, और मेरे परीशां चेहरे को दर्दधुली खाली नज़रों से तकती मंजरी किसी छोटे बच्‍चे के मोज़ों की बिनाई की तरह धीमे-धीमे हाले-दिल की अपनी खुश्‍क दास्‍तां बुनती रही, मैं ड्राई व्‍हाइट वाईन की तरह हौले-हौले उसे पीकर मंजरी का सूना हाथ अपने हाथों में ले लेने को कलपता रहा..

- यू नो व्‍हाट, डियर.. ? अचानक मेरी आत्‍मा को अपनी उंगलियों की नोक पर लिये हों की गड़ती नज़रों से देखती मंजरी ने कहा तो किसी तरह से मेरे खुश्‍क गरदन से आवाज़ निकली- अबरार.. अबरार इज़ माई गुड नेम!

- हां, आई नो.. जानते हो, हाऊ बैडली दैट फ्रेंड ऑफ़ यूअर्स हैज़ बीन ट्रीटिंग मी? ओ गॉड, सोचती हूं तो अंदर आग की लपटें उठने लगती हैं! दिमाग़ में सोच रखा था ऐसा कोई मौक़ा बन पड़ा तो क्‍या कह सकता हूं, लेकिन कुछ कहूं उसके पहले ही मंजरी ने हाथ बढ़ाकर रोक दिया, तमकती बोली- जबकि उस घटिया आदमी के पीछे किस-किस हद तक मैं नहीं गयी? शायद सारे आर्टिस्‍ट इसी तरह पागल होते हैं की सोच उसके पीछे-पीछे रात में रेत पर भागती रही! ऑफिस में सब जानते हैं भागना तो दूर तेज़ चलना भी मेरे लिए हराम है! घुटनों में दर्द के ऐसे टीले बनते हैं कि क्‍या कहूं! मगर सब करती रही, किसके लिए? काम से छुट्टी लेकर घर में मछलियां तलती रही, वापस स्‍कॉच पीना शुरू किया, फ़ॉर हूम? एंड ऑल फ़ॉर व्‍हाट?..

बिना पूरी कहानी समझे मैं समझदारों के मानिंद सिर हिलाता रहा.

- एक दिन मैंने कहा चलो, तीन-चार दिनों की छुट्टी लेकर पंचमढ़ी हो आयें! दो टके के उस बेशऊर खुदगर्ज़ ने जानते हो क्‍या जवाब दिया? कि पंचमढ़ी इज़ प्रिटी बोरिंग प्‍लेस! यस, दैट्स व्‍हाट ही सेड!- गुस्‍से की धमक में गर्म सांसें मेरे चेहरे पर छोड़ती एकदम से चुप होकर मंजरी मुझे घूरती रही. ऐसे मौक़ों पर हाज़ि‍रजवाबी की बड़ी ज़रूरत होती है, लेकिन अक्‍सर जैसाकि होता है मेरी ऐन वक़्त पर गायब हो गयी, मैंने अकबकाकर कहा- और इसी में आपने आपा खोकर हरामी को निकाल बाहर किया?

मैंने निहायत सादा तरीक़े से अपनी बात कही थी, और क़ायदन सादा तरीक़े से ही उसे स्‍वीकारना औरत का फर्ज़ बनता था, लेकिन ऐसी नकचढ़ी बवाल औरतों के साथ भी अक़्सरहां जैसाकि हो जाया करता है, कहीं के रुक्‍के को कहीं के फुक्‍के से जोड़ कुछ का कुछ समझ लेती हैं, और वह मज़े से समझती ही रहें बशर्ते सामनेवाली की ज़िंदगी बख्‍शी रहें. फ़ि‍लहाल ऐसा नहीं हुआ और आगबगूला औरत एकदम से मुझपर चढ़ गयी, और ऐसी चढ़ी कि कैंटिन में मौज़ूद हर कोई हमारी टेबल की ओर देखने लगा!

- व्‍हाट्स रॉंग विद् यू गाइज़? मैं क्‍या इतनी फालतू लगती हूं? एनी टॉम, डिक एंड हैरी गोज़ ऑन कॉलिंग मी आपा, डू आई लुक लाइक आपा मटिरियल? बताओ, जवाब दो मुझे!

मेरे पास नहीं था, जवाब. सिर गिराये मैं चुपचाप सिरचढ़ी औरत का गुस्‍सा बर्दाश्‍त करता रहा. पूछ सकता था रंजीत देसाई को बाहर करने के ड्रामे की रियल स्‍टोरी थी क्‍या, मगर नहीं पूछा. मन ही मन एक जाप पढ़ा- खुदा, मोहब्‍बत करनेवालों पर रहम कर! तब ख़बर नहीं थी बाद में इस जाप को पढ़ने के ढेरों मौक़े और आयेंगे!

(जारी)

सामने दुनिया का सुनहला नक़्शा होगा..

बात कहां से कहां चली जाती है. महीन के बीच भदेस और अच्‍छे के बीच किस आसानी से वीभत्‍स चला आता है. अंतरंगता के ठीक मध्‍य अजनबीयत की कैसी उलझी गांठें फंसी होती हैं. स्‍नेह के बांहबगल सपाट सूनापन, उजले उजास चदरी पर पसरी सियाह लक़ीरें. हंसी की बेवक़ूफ़ी के बाद चुप होकर मैंने खुद को सम्‍हालने की कोशिश की. जुसेप्‍पे की बात का बुरा मानकर तक़लीफ़ के हल्‍के जाम पीता मैं खुशी-खुशी उदास रह सकता था, मगर फिर वह खुद को जुसेप्‍पे से अलग व दूर खड़ा करके देखने की दुनिया होती. और सपनों की झिलमिल महीन रौशनियों में जुसेप्‍पे के संग ऐसा दुराव बरतकर मैं अपने ढंग की फिर कोई दूसरी हिंसा बुनता होता, और सपनों की वह निश्‍छल कोमलता फिर किसी भी सूरत में न होती..

जुसेप्‍पे के सवाल का मैंने जवाब नहीं दिया. न तमारा, बच्‍चों व बीच के महीनों उसकी ज़िंदगी में क्‍या उतार-चढ़ाव आये के बाबत सवाल पूछकर जुसेप्‍पे की परेशानी बढ़ायी. इस हल्‍की नीली उजास रोशनी और पत्‍तों की नमदार खुशनुमा महक के बीच सवालों को इंतज़ार करने की थोड़ी मोहलत दी जा सकती है. जुसेप्‍पे की बात का मुझे बुरा नहीं मानना चाहिये. वैसे ही नहीं मानना चाहिये जैसे वह मुझसे कहता है पज़ोलिनी की भारत के बारे में बनायी डॉक्‍यूमेंट्री का मुझे बुरा नहीं मानना चाहिये. उसकी टेक गिवेन सिचुएशन में प्रॉब्‍लेमेटिक रही हो, उसकी मंशा नहीं रही होगी. जैसे जुसेप्‍पे की नहीं होगी. उसकी व उसकी दुनिया के प्रति मेरी नहीं हो सकती. बुरी मंशा. सवाल ही नहीं उठता. अलबत्‍ता टेक तो फिसल-फिसलकर कहां-कितनी जगहें बदलती रहती है. बदलेगी ही. क्‍योंकि मैं बदलता रहता हूं. जुसेप्‍पे बदलता है, हम सभी किसी न किसी तरह से लगातार बदलते रहते हैं. नहीं बदलते? नहीं बदलते तो अच्‍छी मंशाओं वाले हम कैसे बेवक़ूफ़ लोग हैं? जुसेप्‍पे इस बात को ज़्यादा तफ़सील से समझा सकता है. ही इज़ मोर आर्टिकुलेट देन मी. एनीडे. ही ऑलवेज़ वॉज़. पूछुंगा उससे. बाद में. अभी जुसेप्‍पे को उसकी सुर्ख़ लाल मफ़लर के पीछे की सर्द उदासियों व खुद को सपनीले नीले की बहक में बहकने दूं.

कैसी भी परिस्थिति हो आदमी अपने लिए उम्‍मीद की एक भोली-भली कहानी बुनता चलता है. मेरी तरह का सिनिकल व्‍यक्ति भी. हां, सपने में इस सच्‍चायी की सूरत नहीं बदल जाती. जुसेप्‍पे की हार्डकोर प्रैगमैटिक संगत के बावज़ूद. जुसेप्‍पे को एकदम से यह सब बताकर भोले-भलेपन का मैं ज़ायका नहीं खराब करना चाहता. लेट इट बी फॉर अ व्‍हाइल. फॉर अ लिटिल व्‍हाइल! इट वॉंट हर्ट एनीवन, इट वॉंट ना?

न तुम मुझसे सवाल करो न मैं करूंगा. लेट्स फ़स्‍र्ट कन्‍फ़र्म टू सम बेसिक अंडरस्‍टैंडिंग एंड एक्‍सेप्‍टेंस अबाऊट इच-अदर. ओके? जुसेप्‍पे से यह सब कहने की ज़रूरत नहीं, ही नोज़ ऑल दैट. ही ऊड नॉट इवन माइंड माई बीइंग ऑन माई ओन स्‍टुपिडिटिज़ फॉर अ व्‍हाइल, यू वोंट ना, जुसेप्‍पे माई लव?..

सबसे पहले तो सपनीली, सजीली, नीली यह रोशनी बदल जाये इसके पहले कितने सारे तो सफ़र करने हैं. डकार, बमाको, अल्‍जीयर्स, ट्रयूनिस, फिर ट्यूनिस से नाव लिये पलेर्मो, नापोली, फिर, फिर? सारायेवो, बुदापेस्‍त, ब्रातीसलावा, क्राकोव, विलनियस, मिंस्‍क, तालिनिन, फिर हेलसिंकी में पैर पसारे सेंट पीटर्सबर्ग के बारे में नशीली खामख़्याली बुनना. साथ में आंद्रेई बेली की किताब होगी, कोई डच थ्रिलर होगा और..? नहीं, जुसेप्‍पे, सारा कुछ सब मैं तुम्‍हें एक साथ नहीं बता सकता, नो, इट वोंट बी फ़ेयर, रियली, माई स्‍वीटहार्ट..

(जारी)

सपना होगा.. हक़ीक़त कैसी होगी, जुसेप्‍पे?..

पता नहीं कितना वास्‍तविक वास्‍तविक था, मगर तीन से तीन सौ तक की गिनती के बावज़ूद हवा व पत्‍तों की नमी वैसे ही पहले जैसी बनी रही तो मैं लगभग पैर में लिनेन के मोज़ों व धुली कमीज़ की चिकनायी में वैसे ही यकीन करने लगा जैसे अदबदाकर इन दिनों हर कोई अमरीकी चुनावों में गहरे अर्थ खोज निकालने का दावा कर रहा है. मैं अर्थ की खोज में निकले से ज़्यादा खुदा-खंदा हुआ था, बावज़ूद लिनेन की लहक में लचक रहा था, माने सीधे अर्थों में बड़ा खुश-खुश फ़ील कर रहा था, और चूंकि इस तरह से फ़ील कर रहा था जभी साफ़ हो जाना चाहिये था कि सच्‍चायी नहीं सपना होगा. लेकिन प्रेम के फ़रेब की ही तरह सपनों की धूप-छांव से भी छूटते-छूटते में लोग भौं के बाल व होंठों की लाल जला लेते हैं, मैं होंठों पर हाथ धरे नय्यर और सलिल चौधरी में किसे गाऊं की दुविधा में सुलग रहा था. मगर चारों ओर खुशी थी, खुशी की सुखावस्‍था थी. लेकिन अपने साथ जैसा होने से मैं बचा नहीं पाता, ज़रा पीछे, संशय की बदलियां भी साथ-साथ चल रही थीं, और पैरों के नीचे की हरी घास को रह-रहकर हैरत से देखने व अंगूठे से कुरेदने व मन ही मन बुदबुदाने से मैं बाज नहीं आ पा रहा था कि किसी फ़ि‍ल्‍मी सेट की डेंटिंग-पेंटिंग में बहककर इन्‍हें सच्‍चायी मानने की भावुकता मत करो, बच्‍चा!

लेकिन यह भी सच्‍चायी है कि हवा का असर होता है, फिर सपने की ही हवा क्‍यों न हो, तो उसके असर में सब तरफ सावन के सुहानेपन की छतरी भी थी, सुख के बड़े-बड़े पोल्‍का डॉट्स थे, और उसके नीचे बेवक़ूफ़ दीवाना मैं चहक रहा था. कैसे-कैसे तो बिम्‍ब बुन रहा था.. एक्रीलिक व चारकोल की एक समूची सीरीज़ खत्‍म करने के बाद मैंने दुनिया के खस्‍ता दिमाग़ी हाल पर पाओलो कोएल्‍हो नुमा एक पतली किताब लिखी थी, जिसकी पाओलो कोएल्‍हो नुमा बिक्री तो नहीं हुई लेकिन शोभा दे को जिसने पीछे कर दिया, और अभी आगे चलते-चलते में यूं ही अलसाये एक फीचर फ़ि‍ल्‍म भी बना डाली जिसे इंडियन पैनोरामा ने निहायत बेमतलब व अनुपयोगी बताकर भले खारिज कर दिया लेकिन कान और बर्लिन दोनों ही फेस्टिवल की हतप्रभ सेलेक्‍शन कमिटी ने हाथोंहाथ लोप भी लिया, और मैं नासमझ हूं कि बर्लिन के कांफरेन्‍स में यूरोपियन पत्रकारों को हिंदी के मौत की अ नॉट सो थ्रिलिंग स्‍टोरी बता रहा था!..

ओह, हाऊ मैसमराइज़िंग एंड एनचांटेड वन्‍स मैक बि‍लीव वर्ल्‍ड कैन ग्रो इनसाइड..

कट टू. स्‍वस्‍थ पत्‍ते के गाढ़े हरे रंगोंवाला एक मेंढक फुदकता मेरे पैरों के आगे से गुज़र गया. और उसके पीछे हाथ में पिन, या वैसा ही कोई दूसरा संगीन हथियार लिये कोई वहशी बच्‍चा उसकी जान लेने को नहीं भागा. न ही मेंढक के सामने से गुजरने पर मैं गश खाकर गिरते-गिरते बचा, जिसके न होने की अस्‍वाभाविकता में मन को तभी ताड़ जाना चाहिये था कि गुरु, डोंट गेट फूल्‍ड, इट्स ऑल जस्‍ट अ फेयरी वर्ल्‍ड. तभी पास कहीं फ़ोन के घनघनाने की आवाज़ आयी. बड़ौदा से मुन्‍नी थी. मुझसे कहीं ज़्यादा चहक-उमगभरी. आवाज़ की खनक से फ़ोन आया जैसा नहीं लग रहा था. लग रहा था बाजू में बैठी मटर छीलती (उसकी महंगाई पर झींकती) उमगती आवाज़ में पास के छह घरों तक अपनी जीत दर्ज़ करवा रही हो.

हंसते हुए गुलगुले-विजयीभाव से मुन्‍नी ने ख़बर किया कैसे बिना पैरवी के बेटी का एडमिशन संपन्‍न हुआ. डोनेशन के लिए एक-डेढ़ लाख भी नहीं मांग रहे हैं. मैं चुपचाप सिर झुकाये मुस्‍कराता रहा, बताकर मुन्‍नी की सांझ बिगाड़ना नहीं चाहता था कि इट्स नथिंग रीयल, ईडियट! सपनीले संदेशों में सच्‍चायी पर पूरी तरह परदा मत गिरा लो, भोली औरत, बाद को कलेजे में उमेठे उठेंगे तब हमें कसूर मत देना! ऐसा ही और भी काफी कुछ ब्‍ला ब्‍ला ब्‍ला. तभी कहीं ज़रा आगे चेलो का दबा हुआ संगीत सुन पड़ा और सूखे बालों के गिर्द सुर्ख़ लाल मफ़लर लपेटे, उदासियों के धुंध में लिपटे जुसेप्‍पे पर नज़र गयी. बेसाख़्ता मेरे मुंह से निकला- इट्स ऑल ड्रीमी एंड डेंजरस, लुक वेयर यू आर हेडिंग, फ्रेंड?..

मेरी फंसी आवाज़ का फीक़ापन होगा, या खुद के फ्रेंड पुकारे जाने का ठंडा अस्‍वीकार, गीले पत्‍तों पर जुसेप्‍पे के जूतों के चर्र-मर्र की बेचैनियों में कोई ढीलापन नहीं आया. बज रहे चेलो की आवाज़ अचानक जब बंद हो गयी और मिनट भर में साफ़ हो गया गाढ़े इमोशनल लैंडस्‍केप के धुंधले, दिवालियेपन को दूर करने में सहूलियत का कोई बैकग्राउंड स्‍कोर हमारी मदद नहीं करेगा, इतिहास व समय की अपनी समझ के सीमित साधनों से अलग हमारे नंगे-वल्‍नरेबलपने को ढंकने के लिए कोई, कैसी भी पुड़ि‍या हमारे हाथ न होगी! तभी कभी जुसेप्‍पे ने कदम रोककर गंभीरता से आसपास का नज़ारा लिया, फिर सर्द नज़रों से मेरी तरफ देखा तो मेरी जान में जान आयी, हालांकि सच्‍चायी यह भी थी किस मुंह जुसेप्‍पे से क्‍या बात करूंगा सोचकर मैं भीतर ही भीतर गड़ा भी जा रहा था..

मैंने चहककर कहा तुम्‍हें हाल के दिनों के टीवी कवरेज़ की एक वीडियो दिखाना चाहता था. शर्म, गलाजत व सरकारी मशीनरी के पतन के ऐसे दृश्‍य हमारे जैसे डिजेनरेट, पॉलिटिकली पिछड़े मुल्‍क में ही संभव है- उम्र से ज़्यादा अपनी मेहनत की ज़िंदगी में बूढ़ा हो रहा एक उत्‍तर भारतीय टेंपो ड्राईवर है, अपनी गाड़ी के सामने ये मैं किन लोगों के बीच कहां फंस गया वाले एक्‍सप्रेशन के साथ लॉस्‍ट खड़ा है. बूढ़े को सामने से हटाने की कोशिश करता कोई बाईस-तेईस का मरगिल्‍ला जवान है, हाथ में हाथ भर का पत्‍थर लिये है, जिसे लपक-लपककर वह टेंपो के शीशे की तरफ ले जाना चाह रहा है, लेकिन बूढ़ा ऐन रास्‍ते में खड़ा है. कहानी आगे यह होती है कि मरगिल्‍ला जवान घुमाकर एक चपत बूढ़े के लगाता है, फिर दूसरा, तीसरा, उसके बाद और. बीच शहर में सरेआम डिफेंसलेस खड़ा खोया बूढ़ा गाल पर पड़ते इज़्ज़त के तमाचों का बुरा नहीं मान रहा, अंदर ही अंदर मान भी रहा हो तो वह उसके चेहरे पर शर्म व तक़लीफ़ की शक़्ल में ट्रांसलेट नहीं हो रहा, बेचारा फ़ि‍लहाल सिर्फ़ अपनी गाड़ी को बचाने की मिन्‍नतों की कहानी बना हुआ है..

- फिर? बिना मेरी ओर देखे जुसेप्‍पे की सर्द फुसफुसाहट सुन पड़ती है.

- फिर क्‍या, मैंने हंसते हुए आगे बताया, दो कौड़ी का एक लौंडा एक कमज़ोर, लाचार, मददहीन बूढ़े को सरेआम बेइज़्ज़त करता रहा, फिर उसे एक ओर ठेलकर हाथ का पत्‍थर गाड़ी के शीशे पर गिराता आसपास नयी राजनीतिक हक़ीक़त का ऐलानिया बयान देता रहा, टीवी वाले इन तस्‍वीरों को घुमा-चलाकर उस हक़ीक़त को मान्‍यता व विस्‍तार देते रहे.

- तुम्‍हारे साथ कुछ नहीं हुआ? तुम भी तो कमज़ोर, लाचार, मददहीन.. अजनबी शहर में पराये हो? गीले पत्‍तों पर जूतों की चर्र-मर्र करता जुसेप्‍पे दसेक कदम आगे गया.

(जारी)

Saturday, November 1, 2008

अबरार और मंजरी: छह

जाने क्‍या वजह थी मैं चंद महीनों के लिए गायब रहा. शायद चारा काटनेवाली मशीन की अहमद की सेल्‍समैनी से जुड़े किसी फ़साद की सुनवायी में उसकी अदालती मदद की बाबत सहारनपुर गया था, फिर जाने अदालत के झमेले थे, या पड़ोस के बच्‍चों की संगत में ईख पेरने, या पतंगें उड़ाने पर अचानक कुछ ऐसी ज़ि‍म्‍मेदार नेह उमड़ती रही कि मैं बाहर का सब भूल, बीस हाथ की उस छोटी दुनिया में अटका रहा. इसी दरमियान भिनसारे खेतों में टहलते हुए किसी कीड़े ने काटा या जाने क्‍या, कान के भीतर एक बड़ी फुंसी निकल आयी, शुरू-शुरू में दीपू और रहमत सबके मज़ाक की चीज़ रफ़्ता-रफ़्ता मेरी जान लेने लगी. रात को बदहवाशी में मैं कान पर हाथ दाबे बत्‍ती जलाकर बवाल करने लगता. रफत बी हाथ में अल्‍मूनियिम का कटोरा लिये मेरे पीछे-पीछे यहां से वहां कमरों में टहलतीं और मैं बुदबुदाता-बकता चलता कि हाथ में तीन महीनों की ज़िंदगी बाकी है, बाकी अपनी स्‍टोरी का दी एंड हुआ, बी! या मैं किसानी करना चाहता हूं, या गांव में आपके नाम की एक बेकरी खोलना चाहता हूं, सच्‍ची, आपकी कसम, बी!

सुबह कंधे पर कंबल गिराये धूप में चाय सुड़कते अहमद मियां हौले-हौले मुस्‍कराते ज़ाहिर करते कि मेरी चिड़ीमारी से वे किस कदर आजिज़ आ गये हैं. रफत बी हमारे सिरहाने बिना दुआ-सलाम के चाय रख जातीं, फिर धूप में सूखने को कपड़े डालते हुए जाने किससे कहतीं मुजफ्फरनगर में उनकी एक ममेरी बहन है, ऐसी हसीन कि देखकर चांद भी शरमा जाये! मैं कान पर हाथ डाले चिढ़कर भुनभुनाता- अपनी पगलैटी बंद करो, रफत बी, और हमारे इस पजामे में एक नाड़ा आबाद करो!

उस टुटहा घर और घर से सटा बाहर नीम का एक बुर्ज़ूगवार पेड़, गांव की सस्‍ती, पथरीली मिठाइयां और कान की फुंसी पर हाथ धरे नहर के बाजू-बाजू की टहल. कभी बच्‍चों की हुड़दंग से खुश-खुश घर लौटता और चहकता हुआ रफत बी को ललकारता- तुम भी पूरे होशो-हवाश में कान खोलकर एक बात सुन लो, रफत बी!

- सुनाइए, सुनाइए? रफत बी होशो-हवाश खोयी-खोयी, मुस्‍कराती अपनी बहक में हमारी तक़लीफ़ बढ़ाये चलतीं.

- कुछ नहीं, छोड़ि‍ये, जाने दीजिये. अचानक जाने किस कमज़ोरी के असर में मैं एकदम हारी हुई मुर्दा आवाज़ में बुदबुदाता.

- ऐसे कैसे जाने दें, मियां, अब तो आपको कहनी ही होगी..

मैं ख़ामोशी के सूत कातता रफत बी का सीधा, सरल चेहरा देखता ताज़्ज़ुब करता रहता कि ऐसे मामूली चेहरे में इतनी नूर कहां से आती है.

अख़बार में लौटने पर ख़बर हुई हमारी ग़ैरमौज़ूदगी से फर्क़ पड़ा था न हमारी वापसी से कहीं कोई उत्‍साह की लहर दौड़ रही है. ज़माने की ऐसी इंतहा मोहब्‍बतों की पुरानी आदत थी सो उसकी खराशों के बनने का सवाल नहीं था, मगर सोच रखा था इतनी बड़ी ग़ैरहा‍ज़ि‍री में नैयर साहब की मेज़ पर दरख्‍वास्‍त रखने की कवायद करनी होगी, कुछ रोना-बिसुरना होगा, तो उसकी भी नौबत नहीं आयी. पहली मर्तबा नज़र पड़ते ही मैं माफ़ी मांगूं, उसके पहले ही भले आदमी का भोला सा सवाल था- पड़े-पड़े तुम्‍हारा जी उकता गया होगा, हमारी ओर से मैनपुरी एक शादी अटेंड कर आओ! जाओगे न?

पता नहीं किसकी शादी थी, मैं मैनपुरी शादी भी अटेंड कर आया. लौटकर कुछ अर्से बाद एक दिन कैंटीन में आपा दिखीं. खोयी-खोयी, उदास-उदास. ज़्यादा ग़ौर करना मैंने मुनासिब न समझा, अपनी में रहा, मगर आपा करवाना चाह रही होंगी जभी खुद मेरी मेज़ पर चली आयीं, बिना किसी स्‍वांग के सीधे सवाल किया- और तुम्‍हारे उस अजब दोस्‍त रंजीत देसाई के क्‍या हाल हैं?

- रंजीत? मैंने तो समझा था आप उसकी ख़बर दोगी? अहमदाबाद लौटकर ख़बर नहीं की?

दर्दघुली नज़र पर एक फीक़ी मुस्‍कान का फ़ीता चढ़ाकर मंजरी ने एक हल्‍की नज़र मुझे देखा, फिर सूने दीवार को पढ़ती बुदबुदाकर बोलीं- लौटा नहीं, मैंने अपने यहां से निकाल बाहर किया. बास्‍टर्ड, आई थिंक ही वॉज़ मोर इन लव विथ मोल्‍स ऑन माई बॉडी देन द रीयल वल्‍नरेबल मी!

(जारी)