Tuesday, December 29, 2009

दिसम्‍बर की बीतती सांझ

बदले मौसम में चेहरे पर अचानक गिरे तमाचे की ठंडी झुरझुरी है, आंखें समझना चाहती हैं कि सब कैसे कितना कहां बदलता है, लेकिन कहीं भी तकने से डरी अपने ही भय में भरी, भारी मुंदी-मुंदी सोचतीं, देखने के वक़्त हर कदम कितना गिरी-गिरी हैं. उंगलियां डोलती हैं बेहयायी में और शर्मिंदा होती हैं, मानो भूखा बच्‍चा भूले से पड़ोस की रसोई घुसा आया है और बेमौक़ा अपनी भूख में शर्मिंदा है. त्‍वचा कहती है इस तरह हमारे ही आसरे भरो, हमें भरमाओ-भरभराओ नहीं, उठो, बेमुरव्‍वत बाज़ार फैला है दूर-दूर, मेरी ही तरह दिखेंगी दूसरी, किसी और के कंधे गिरो किसी और को फंसाओ, जाओ. दिल कहता है, दिल कहता है कहां है हम, ये भूरी-भूरी दीवारों पर धीमे-धीमे पसरता धुआं, यह किसका घर है, कौन पंजों में दबाये हमें भगाये लिये जा रहा है, ऐसी नर्म अकुलायी सांझ किस जनम का कौन दुश्‍मन है, आवारगी का ब्‍लूज़ गाये जा रहा है?

Wednesday, December 23, 2009

आ मेरे हमजोली आ, बरजोरीये आ!

क्रि‍समस आ रहा है. आ क्‍या रहा है लगभग सिर पर खड़ा है (कुछ भेंट-सेंट लेकर नहीं आया है घंटा, बट दैट्स अनादर स्‍टोरी. बट दैट्स ऑल्‍सो फ़नी कि देयर इज़ ऑल्‍वेस वन अनादर स्‍टोरी, नहीं?). क्रि‍समस निकलेगा नहीं कि बाबू नवका साल दांत चियारे, सवालों का झोला पीटते हुए सामने खड़े दीखेंगे. और कुछ लगभग उसी अनुपात में, मैं रोता, दीखूंगा. भागकर आंसू पोंछने चली आये ऐसी कोई कमउम्र लड़की ख़्यालों में आह भरकर उठती, बीच-बीच में गुज़रती मिलेगी, लेकिन सामने आकर, ठोस भौतिक सुख का सबब बने इस भौतिकता में दीखने से स्‍वयं को बचाती फिरेगी!

कहने का मतलब, मतलब बने इस तरह लइकी नहीं आएगी. क्रि‍समस ससुर और उनके यार, नवके बहार, हाथ झुलाते हाज़ि‍र हुए जाएंगे. कोई बतानेवाला मिलेगा नहीं कि भई, ये नेमत- या आफ़त- आख़ि‍र रहते कहां गायब हैं कि एक दिन धप्‍प से सामने हाज़ि‍र हो जाते हैं? और आने की बेहया ज़िम्‍मेदारी से इसी कदर बंधे होते हैं तो अपने पीछे-पीछे एक बैंक लेकर आते? फटेहाल, लुटाहाल अनबैंकेबल बैंक ऑफ़ बिलासपुर ही होता, मगर बैंक तो होता? भीतर भारतीय विलास-समर्थ हिन्‍दुस्‍तानी करेंसी न होती तो भी हम बुरा न मानते, मोहब्‍बत से समझते, समझाइश देते कि इस चिरकुट देश में हज़ार चिरकुट दिक्‍कतें हैं, ठीक है, भई, चूल्‍हे पर उबलता रहे ये मुल्‍क, हमें आप ढाका या काठमांडू की तरफ़ ही ठेल दो, कबतक और किस-किससे शिकायत करते फिरें, अपना नया साल हम वहीं खेल लेंगे? उधर तक भी अगर इसी चिरकुट बमचक का नज़ारा रहा तो हम तो सियाह घाना के घनों की ओर भी निकल चलें, बस हमारे मलिन आयतन को नीचे बैंक का समझदार संबल मिलता चले, आं, ठीक फ़रमा रहे हैं न?

लेकिन फलतुए की बहक है, पुराने अनुभव से कमोबेश अंदाज़ा है अपने झुलने में नवका साल गुलाबी बेगम की अदाओं में नौटंकी फैलाने चली आएगी, और पीछे-पीछे तो क्‍या, अपने से दस गांव की दूरी तक अपने साथ बैंक ऑफ़ बिलासपुर तो क्‍या, बैंक ऑफ़ तबाहधूर भी नहीं लाएगी! सस्‍ते संतरा के शरबत और तलत महमूद के सदाबहार गानों से ‘अब लगता नहीं जी उजड़े दयार में’ के फलकट इंतज़ाम खुदी करने होंगे.

यही तो अनूठे, अनोखे मौके होते हैं जब हमारी तरह का समझदार, मर्मधनी अंधा पाठक आगे लपककर बाबू अल्‍बेयर कामू और उनके अस्तित्‍वबर्बाद को लोप लेता है, या वहां भी घबराहट होने लगती है तो फिर, चार कदम आगे, लक्ष्‍मीकांत-प्‍यारेलाल, जितेंदर और लीना चंदारवरकर वाले आदर्शपरात में सिर बोड़कर लता मंगेशकर के रहस्‍यवादी सवाल, ‘मैं आऊं? मैं आऊं? आ जाऊं?’ पर मोहब्‍बत रफ़ी की तरह हारकर फ़ैसला ले ही लेता है, ‘आ जाSS!’ (फिर स्‍वगत: देर तक नामुराद! बुदबुदाने से भी बाज न आयें बट देन, अगेन, दैट वुड बी अनादर स्‍टोरी..)

Friday, December 18, 2009

जै जमरुदपुर, जै ज्‍यूरिख़

नई बात नहीं हुई. यह अक्‍सर होता है. कि खोजने निकले थे पेंसिल, कलम लेकर घर आए. तो कौन पेंसिल खोजने निकले थे अब यह प्रासंगिक नहीं, किताब की शक्‍ल में जो कलम लेकर लौटे वह यह है. कुल बारह ग्राफ़ि‍क कथाओं की इस किताब में स्वित्ज़रलैंड और हिन्‍दुस्‍तान दोनों तरफ़ के लोगों का काम है, थोड़ी मिली-जुली दुनिया है, एक स्विस सिपाही के दिल्‍ली में बिताये चन्‍द दिनों के अनुभव-लोक से आप बहरियाते हैं, तो ठीक बाद कोई बंगाली अपने यूरोपीय अनुभव को गाता मिलता है, मैंने पशोपेश में पैसे फंसाये थे, तो उस लिहाज़ से गरीबी को शर्मिन्‍दा करनेवाली खरीदारी नहीं साबित हुई. मज़ेदार फिर यह भी है कि बारह कहानियों में बारह अलग-अलग शैलियों से सामना पड़ता है, एक तरह की चिचरीकारी आपको माफ़ि‍क न जमे तो दूसरी पसंद आने लगती है. निजी तौर पर में क्रिस्‍तोफ़ बादू और काती रिकेनबाख़ की लकीरों में उलझता रहा. आप भी थोड़ा उलझ आयें इसके लिए यह एक और लिंक चिपका रहा हूं, एक-दो चिचरीकृत्‍य आप देखें और उतना तो यहीं देख लें, दोनों नज़ारे दिल्‍ली के हैं..


साथ ही ब्‍लाफ्ट का एक ठेठ दक्खिनी काम भी उठाया, कभी पहले अपने यहां पोस्‍ट में चर्चा भी की थी, अप्‍पुपेन के 'मूनवर्ड' के बीसेक पन्‍नों से गुज़रते हुए सच कहूं, सचमुच निराशा हुई. बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी की जगह बात कहीं निकलती ही नहीं..

Wednesday, December 16, 2009

नीली सड़क..



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गीक..



फेसबुक पर विनय का पोस्‍टेरस डॉट कॉम का एक इबो (ओगो, सोत्‍ती?) लिंक दिखा, पुरानी आदत के मारे, मुफ़्ति‍या माल दिखते ही तड़ देना हम जेब में साटे उड़ लिये.

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Tuesday, December 15, 2009

इतिहास-चक्‍कर, या व्‍हॉटेवर..

‘देह का सत्‍य-तत्‍व कहां बसता है, प्रभु? और अंधेरे वन में अंधेरी आंख, कैसे तकती है?’ कल्‍पना के जापानी मांगाओं में उलझे ऋषिपुत्र सुकुमार तपोधन विशाखकुसुम प्रश्‍न करें, व प्रश्‍नोपरांत लम्‍बी सांस लेने का अवकाश टटोल रहे ही हों, कि जो साक्‍को की ग्राफ़ि‍क कथा ‘गोरात्‍ज़े’ की शांत घाटियों में एक बार फिर सर्ब सर्वनाशी हरमख़ोर मशीनी बंदूकों की बेशरम शोर कांपती तड़तड़ाहट गूंजने लगे, धुंधलके के बगूलों में ‘तड़-तड़-तड़-तड़..’ की तान छूटे, देर तक कहीं कुछ उखड़ता, दरकता, टूटता रहे. दूर तक.

राममनोहर लोहिया के जाति व इतिहास-चक्र से अनजान, अर्ल लवलेसनमक’ के रास्‍ते अपनी जातीय पहचान के दिशाहारेपन में देश का बिगड़ा नसीब क्‍यों है कैसे है का नोट लेते उस बिखराव को संवारने निकलें, और आगे जाकर कहीं किन्‍हीं दूसरे धुंधलकों में खो जायें. भिलाई इस्‍पात कारख़ाने के बाहर चाय की गुमटी लगानेवाले किसी सीनियर, ‘ओल्डियर’ शंकर गुहा नियोगी समर्थक के हाईस्‍कूल फेलियर छोकरे रंजीत कुमटी के मुंह से बहुत बरसों बाद दक्षिण दिल्‍ली के बेर सराय क्षेत्र में अनमने सुनने को मिले, ‘बड़का लोकन से उलझके का होता है, मास्‍टर? लैफ़ का लंगी लगत है, इतिहास का काया-कलप कौनो थोड़े होता है?

कल्पित समुदाय’ के अमरीकी रचयिता बेनेडिक्‍ट एंडरसन अपने इरानी प्रकाशक से पूछें हमारी रचना का चीनी, कोरियाई अनुवाद आ गया, ठीक है, मगर मान्‍यवर, नेपाली और मणिपुरी में कब आएगा? कुनैन की कड़वाहट मुंह में लिए इंटरनेट की नाव पर सवार आगरा का हिन्‍दी प्रकाशक नवीनमोहन प्रामाणिक आंख मूंदे जाने कितनी सदी पीछे लेटे, एक ऊजबक दिखते भले अंगरेज से टकरा जाये, और टकाराते ही एकदम फैल जायें, ‘अच्‍छे अदम स्मिथ हो, खामखा हमारा पुश्‍तैनी प्रकाशन खा रहे हो, मथुरा में रहते तब देखता अर्थव्‍यवस्‍था देखते-देखते कितनी आसानी से कबिता भी बना रहे हो?’

Monday, December 14, 2009

कोई मतलब बचा है? अख़बारों का?..

अख़बारों का अब भी कोई मतलब है? मतलब दूसरी जगहों में शायद बचा हुआ हो, मगर हमारे देश में? या वह महती प्रगतिशील हिन्‍दी साहित्‍य की तरह है, प्रकाशकों और पैसा कमानेवालों के लिए है, छपकर सुखी हो जानेवालों के लिए भी है, लेकिन पढ़ाने और समाज को कहीं आगे पहुंचाने के लिए, है? मालूम नहीं, मगर सवाल है. वाज़ि‍ब सवाल है. आपके पास तैयार जवाब होगा, मेरी जेब में नहीं है. जवाब का 'ज' भी नहीं है. कहनेवाले कहेंगे ब्‍लॉगिंग की हलचलों को देखो, दीखेगा हिंदी कहीं से निकलकर कहीं पहुंच रही है, कुछ उत्‍साही क्रांतिधर्मी गदाधर कार्यकर्ता लपककर सामने आएंगे, कहेंगे ओ बटनधारी बदमाश, हिंदी चल नहीं रही, दौड़ रही है! (घर के बच्‍चों को हम अंग्रेजी स्‍कूलों में भेज रहे हैं उसका गोबर उछालकर यह सुहानी, दीवानी तस्‍वीर गंदा न करो!) ख़ैर, मैंने पहले ही कहा एक सवाल है, कुछों के पास इसका तैयार जवाब होगा, कुछों के पास टेम्‍परेरी, कुछों के पास कुछ नहीं भी होगा. जैसे मेरे पास नहीं है. कि अपने देश में अख़बारों का क्‍या मतलब है. ख़ास तौर पर हिन्‍दी अख़बारों का तो सचमुच, अगर आप अपनी बेटी के व्‍याह के लिए वर्गीकृत विज्ञापन न छपवा रहे हों, या राखी सावंत किसकी बांह से निकलकर किसकी बांह की तरफ़ बढ़ी का अपडेट लेने को न अकुला रहे हों? मतलब है? हिंदी ही क्‍यों, मालूम नहीं किसी भी अख़बार का कोई मतलब है या नहीं. मालूम नहीं. मैंने निजी तौर पर लगभग चार महीने हुए, जितने लिया करता था, सब अख़बार बंद करा दिये, मगर चूंकि आदमी आदत का मारा है, और एक वक़्त के बाद वही रुटिन पीटता रहे तो पकने लगता है, तो हम भी पकने लगे और दस दिन हुए, अख़बार दुबारा चालू कर लिया, लेकिन सच बतायें, इन दस दिनों में शायद ही दो 'अग्रलेख' और डेढ़ पृष्‍ठलेख पढ़े होंगे, तीस पन्‍नों को उलटने और शीर्षकों से गुज़रने तक में थकान होने लगती है, और हमेशा की तरह, सुबह के भूले शाम को पता नहीं किसके घर लौटे की तर्ज़ पर यह ख़्याल मन में घुमड़ने लगता ही है कि इस काली छपाई का सचमुच कोई मतलब है? सुचमुच?

फिर दोहरा रहा हूं मालूम नहीं. जर्मनी में किन्‍हीं उत्‍साही सज्‍जन ने किसी दूसरे किस्‍म का गुबार निकाला है, अपने लिए उसका लिंक चेंप रहा हूं, कि बाद में पलटकर देखने आऊं कि भाई साहब को कहां, क्‍यों, कोई मतलब दिख गया..

हद है.

(अक्‍टूबर, 1945 नुरेमबर्ग मुकदमों की ख़बर पर आंख गड़ाये उत्‍साही जर्मन अख़बार-पढ़वैये, चित्र यूरोज़ीन से साभार)

भूरा, हरा और नीला..





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लोग.. शीर्षकहीन..



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Saturday, December 12, 2009

ड्रॉपबाक्‍स

पता चला, अच्‍छे ही पता चला, अंतरजाल पर मुफ्ति‍या 2 जीबी के आपको ऑनलाइन स्‍टोरेज की जगह मिलती है, और उतने मात्रा में आप अपने पीसी का 'माल' बिना किसी पेनड्राइव में ढोये किसी दूसरे पीसी पर ड्रॉपबाक्‍स की खिड़की से उठा सकते हो, या फिर जिसे चाहो, मेल से आमंत्रित करके उसके साथ अपने पीसी की फ़ाइल शेयर कर सकते हो, कैसे काम करता है की जिज्ञासा में मैंने छोटी नहीं, एक बड़ी डॉक्‍यूमेंट्री की फ़ि‍ल्‍म avi फ़ाइल दस-बारह परिचितों के बीच शेयर करने को भेजा, और बड़ी खुशी हुई कि पता चला, जहां भाइयों ने शेयरिंग को मंजूरी दी, वहां फ़ि‍ल्‍म की बड़ी फ़ाइल वैसे ही खुल रही थी जैसे एक चिंदी केबी साइज़ का मेल खुलता. तो ड्रॉपबॉक्‍स मज़ेदार है, इसलिए मज़ेदार है कि जयपुर या पलेर्मो की जोवान्‍ना को हम तड़ देना अपने कोटा में का उपलब्‍ध स्‍पेस में से फ़ाइल शेयर करवाना चाहते हैं तो वह खेल मिनटों में यह ले और वह दे के अंदाज़ में रपटन-रपटन संभव हो रहा है, मगर.. हां, मंगर.. मगर चक्‍कर है, चक्‍कर यह है कि इतनी आसानी से सब अच्‍छा ही हो तो फिर उदासी का गाना हम किस पेड़ पर चढ़कर गायें? गायेंगे?

मज़ाक दरकिनार, ड्रॉपबॉक्‍स का आप भी फ़ायदा उठायें, मेरे ख़्याल में तो मस्‍त चीज़ है, मगर एक प्रकट दिक्‍कत यह है कि आपने पैसे अदा करके अगर ज्‍यादा जगह नहीं खरीदी है तो फिर दिक्‍कत है, दिक्‍कत इस शक्‍ल में है कि जितने लोग आपके संग फ़ाइल शेयर करेंगे, उनके पीसी में घिरी जगह आपके पीसी की भी अलोटेड जगह का घिराव बनती चलेगी और देखते-देखते आपका ड्रॉपबाक्‍स 'जगह कम है, गुरु!' की उदासी गाने लगेगा!

इसका समाधान, जितना मुझे अपने अज्ञान में अभीतक समझ आया, वह यह है कि जो भी फ़ाइल शेयरिंग में आपको अपने ड्रॉपबाक्‍स के फ़ोल्‍डर में मिली, उसे तड़ से अपने पीसी में अन्‍यत्र कहीं कॉपी करके चिपका लें, और ड्रॉपबाक्‍स के वेबसाइट के अपने अकाउंट वाले मेनु से उस कॉपी हो चुके फॉल्‍डर को 'अनशेयर' करके घेरी हुई जगह को खाली कर दें, इस तरह आप अपने पीसी में ही जगह नहीं खाली कर रहे होंगे, जिस भले आदमी से आपको फ़ाइल प्राप्‍त हुई है उसके पीसी में भी जगह को राहत की सांस भरने देंगे, अदरवाइस फ़ाइल भेजनेवाले के लिए संभव ही न होगा कि वह ज्‍़्यादा वक़्त तक (शायद समूचे एक दिन तक भी?) एक फ़ाइल ड्रॉपबाक्‍स के वेबसाइट पर शेयर करने को छोड़ सके.

आई कुछ बात समझ में? अरे, खाली घुघूती का लिखना ही समझ आता है? हद है.

Friday, December 11, 2009

एक चित्रित बहक..




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Thursday, December 10, 2009

हरमख़ोर रात कब, कहां?..


गरीब की लड़की का जी जुड़ा जाये जितना माथे पर चूते तेल की मानिंद ढलान पर ढिलमिलाती, बिछलती चली जाती साइकिल की रपटन-सी ज़िंदगी में इतनी सारी दोस्तियां बनती हैं, कितनी सारी? कैसी हंसियों की हांक बनती है, सूने दोपहर के अंधेरे, दिल में चाकू के चार फांक? दीवारें फंदवाती है अमरुदें चुरवाती, कांख में तीन नोटबुक दाबे बेटिकट पसेंजर रेल के सफ़र में लालबहादुर शास्‍त्री की भावुकता गवाती है, ‘अम्‍मां, तुमको बहुत दु:ख दिये, लेकिन अब सुधर जायेंगे’ की बेलय-तानहीन, बेबस प्राणहीन ग़ज़ल, गूंजाती? हाय-हाय की सारंगी पर सायं-सायं का तबला दौड़ाते, भगते-भाग  आते जीवन में दोस्तियों का दादरा जामुन के पेड़ में छन कटहल के कोयों में उतरता है, गुड़ के झाग और फगुए की आग में हुमसता चीख़ता ज़िंदगी में दोस्तियां बनती हैं कितनी सारी, इतनी सारी?

मगर ऐसा कब कोई मिलता है, दोस्‍ती, छनकर जाड़े की सुबह खिड़की पर धूप के टुकड़े की तरह थम जाये? जिसके आगे समूचे आत्‍मा के जंगखाये रेजगारी की थैली उलटकर धर दें, पलटन अपनी पलटा जाये, कि बाबू, यही मामलाए-माल है, चाहे बाराती जितने हों, अब आगे का हिसाब करो, हमको हमारे सायों से निकालो बाहर, आज इस क़यामत की हरमख़ोर रात घिसकर साफ़ करो?

Tuesday, December 8, 2009

उदासी..

गुमसुम, ग़ायब रहती है, महीनों ख़बर नहीं होती कहां भागी, या हुआ, सारे सम्‍बन्‍ध खत्‍म कर लिए? के ख़्यालों में दबे, पुराने दु:खों की तरह लगभग भूल-भुला जाती है, और जीवन अनजानी हवाओं व सड़कों पर पहचानी आदतों के बासी रुमाल में लिपटा किसी उडूपी रेस्‍तरां में दोपहर के सस्‍ते खाने और बझे हुए हैं के बेमतलब बहानों में बीतता चलता है, तभी एकदम दीखती है सामने की खाली कुर्सी पर, फीकी मुस्‍कान का एक बेग़ाना गाना फुसफुसाती, थाली के निवालों में अटकी उंगलियों की कंपकंपाहट पढ़ती, आत्‍मा के अभेद उजाड़ों को कैसे, कितनी जल्‍दी बेमतलब किये जाती.

ठीक है वह सब फिर, मगर बात जो है वह यह कि उदासी के पास कहने को ख़ास कुछ नहीं होता, थोड़ा जो कहती बहकी-बहकी बोलती है, फिर देर तक चुप रहती, चुपचाप तकती है. रिश्‍तों के चुक चुकने के दरमियान की जो अस्‍पष्‍ट तनावभरी ख़ामोशियां होती हैं, कुछ वैसे में ही खिंची-खिंची ख़ामोश बींधती रहती है. उंगलियों के पोर ऐंठने लगते हैं, धुंधलके की दीवानगी में कभी किसी क्षण खड़े गिर पड़ेंगे के एहसास में हारकर मन दोहराता है, ऐसा क्‍या है यहां, क्‍या लेने आती हो? उजाड़ की इतनी बड़ी दुनिया है किसी और ठिकाने क्‍यों नहीं जातीं?

लातखाया ग़रीब उधारी की शरम भूल जाता है की तरह बेहया बटुये से सस्‍ती लिपस्टिक निकालकर रसहीन होंठ सजाती है, हाथ से हाथ सटाकर बताती है, एक बार दिल जुड़ने के बाद मोहब्‍बत पूरी उम्र कहां जाती है..

Monday, December 7, 2009

हलफनामा..

हां, भोर उनींदे सपना-न्यूज़ में
ख़बर आई है, झूठ नहीं, खांटी
सैकड़ा प्रतिशत सच है, एकदम
रिबन-चोटी की लम्बी रस्सियां
झूल, डकैती करने ही चढ़ा था
बच्चों की खिलौना-रेलगाड़ी में
फिर ग़लती हुई जाने, या कि
पुरानी यादों के प्रेत होंगे
जागे के सपने में दीखे
प्लास्टिक के खेत होंगे
बहका, आंख मूंदे किसी पगलोल
बुढ़ि‍या की लोरी सुनने लगा
हारा, आदत का मारा तीन कविता
में जीवन की पहेली और आदर्श
के पंचांग बूझने लगा, डोले-डोले
ऊंघने लगा, यहीं हुई कि जाने
शुरुआत से ही ग़लती के
सिलसिले थे, इतने में तो मामला
पेरु से निकलकर पेराम्बूंर पहुंच
चुका, इतने में तो हरामख़ोर
हमसे चौदह दर्जा होशियार बच्चे
लुटे डकैत की आंख में धूल फेंक
फेर किये, हमको घेर लिये
धड़ाम-धड़ाम बैलून का बम फोड़े
बेरहम डकैत को वहीं ढेर किये.

Sunday, December 6, 2009

एक सरल सिंप्लिसिटी के उलझाव..

गुम: छह

झामतला-बेनाडिनी के बीच की कोई पैसेंजर रेल थी, दुलुक-दुलुक की चाल ऐसे चल रही थी मानो कोई मंज़ि‍ल हो भी तो उस तक पहुंचने के लिए अनंत तक का समय हो. मुझे एक इंडोनेशियाई लोकगीत (जिसने कीरगीज़ गांवों की भी कभी भटकी, भूली घुमाई की हो) गुनगुनाता छोड़, जुसेप्पे डिब्बे के मलिन चेहरे और सस्ती छपाई की बांग्ला विज्ञापनों की चिप्पियों में दैहिक ताक़त और आत्मा की समृद्धि पाने के आसान नुस्खों की ‘बीटवीन द लाइन्स’ का समाजशास्त्र सुलटाता रहा.

एक सूखे बालों वाला कभी हंसमुख बच्चा रहा होगा, अब बीमार कैशोर्य का भोपाल गैसपीड़ि‍तों के वृत्‍तचित्र का स्थिर, अस्वस्थ-चित्र हो रहा था, दरवाज़े की रेलिंग से बाहर को झूलता जाने किसे बता रहा था कि तेज़ हवा उसके रुखे बालों में क्यों किसी तरह का बयार जनमाने में असमर्थ होगी.

घुटनों पर दोनों हाथ बांधे जुसेप्पे ने पीदमोंते वाली पहाड़ी ज़बान में मुझसे गुज़ारिश की, ‘इससे बोल अंदर चला आये, किसी से टकराकर, कटकर गिर पड़ा तो इसकी मां किसके पास जाकर रोएगी?’

मैंने चीख़कर लड़के को बंग्ला में डांटा, ‘अबे, तुझे सेवन-अप जमता है या स्प्राइट?’

लड़के ने एक उड़ती नज़र मुझे घूरा, कहा नहीं लेकिन बांग्ला में पर्याय होता तो बिना कहे मुंह में वह ‘घंटा!’ ही बुदबुदा रहा होता, फिर चुपचाप एक सीट के कोने बैठकर पि़डली की दाद और नाक खोदता, टाइमपास करने लगा.

कोचिंग से फ़ुरसत बनते ही जैसे पंद्रह साल के बच्चे पड़ोस की कटरिना कैफ से मोहब्बत करने लगते हैं, दोपहर के टेलीविज़न प्रोग्रामों से बाहर आकर कस्बे की गृहस्वामिनियां सांझ को औलादीन की शिक्षा की चिंता, कुछ वैसे ही लड़के के रुखे संसार से अपने को बाहर निकालकर मैंने जुसेप्पे से शिकायत की, ‘क्या ज़रुरत थी खामख़ा इस क्लैरि‍नेट-कुसंग में उलझने की, अच्छा-खासा अपनी अलसाहटों में उल्टा जैज़ के कुछ सपने देख रहा होता, या साठ के दशक की किसी हंगैरियन फ़ि‍ल्म में अपने, ‘अपनों’ को देख रहा होता?’ फिर चिढ़कर मैंने ठेठ भोजपुरी में उलाहना दिया, ‘इट्स ऑल शीयर टाइम वेस्ट, व्हॉट वी आर डुइंग इन दिज़ गॉड-फॉरसेकेन पैसेंजर ट्रेन? जिसका न कोई पास्ट है ना फ्यूचर, जिसकी अदद एक बत्ती तक सलामत नहीं?’

जुसेप्पे ने दुर्गापुर के रास्तें में खरीदी होगी तो मैंने देखी नहीं थी, अभी देखा कि वह डिब्बी खोल, उसमें कानी उंगली बोर, नाक में ‘नसनी’ सूंघ एक बार फिर अस्तित्ववादी रहस्यवाद के हवाले हो गया, फुसफुसाकर मुझसे बोला, ‘व्हाई कांट यू सी कि यही जैज़ है जिसे हर वक़्त तुम अपने दिमाग़ में बजता सुनते हो? हेडेन का व्योला, डिज़ी का ट्रंपेट, ड्यूक का पियानो, सब यहीं है, यू जस्टु हैव टू फ़ील इट!

‘बकवास मत करो, दोस्त, आयम रियली गेटिंग वरीड,’ मैंने थककर आंखों को दोनों पंजों से ढक लिये जैसे फेबर एंड फेबर की अपनी लेखों की किताब ‘इमोशन पिक्चर्स’ के कवर पर विम वेंडर्स ने ढंका हुआ है.

(बाकी..)

Saturday, December 5, 2009

सपने से बाहर

पहाड़ से उठे दिनों गिरी स्याही की तरह समय बीता जाता है. गिरी हुई दुनिया में लौमहर्षक फुंकार पर सवार एक सफ़ेद, साफ़ घोड़े के भागने के बिम्ब क्या होंगे का भोले मन मनन करता हूं, पिटे सामर्थ्य और समझ की फंसी रेल में थोड़ा अटकता, बिछलने से अब गिरा तब गिरा की बचावें बचता, तुम्हारी नेह की मोहब्बत में कभी बहका, ये गया वो गया की तर्ज़ कभी भागा सचमुच आगे भी निकलता हूं..

रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं, विवेक की भाषा के दुलार में चेंप रहा हूं, देखनेवाले एक नज़र मारकर फिर अपनी हारों, या स्वार्थों का, तबला बजाने- आत्‍मा की मरोड़ को पुचकारते- दिन की दौड़ का भूगोल सजाते कहीं से कहीं निकल जाएंगे, मतलब समाज कहीं नहीं जाएगा.

पंक्तियां 1982 में छपी ‘लोग भूल गए हैं’ की ‘फ़ायदा’ शीर्षक कविता से है.
इतिहास की व्याख्या करता हूं
हमदर्द सुनते हैं और अपनी उन्नति की सोचते रहते हैं
उस समय
उन्हें मतलब नहीं कि वक्त ने समाज के साथ क्या किया है
वे जानना चाहते हैं कि वक्त ने जो हालत की है समाज की
उसमें वे सबसे ज़्यादा क्या पा सकते हैं.

Friday, December 4, 2009

फिर भाषा..

एक भाषा होगी संगत में समूचा आसमान होगा
लेकिन फिर उसकी एक सामाजिकता होगी
जिसमें चार लतीफ़े और नौ कुंजियां होंगी
पंडों का पंचांग, क्षेत्रीय सरकारों, अख़बारों
की विज्ञप्तियां होंगी, गांव की सड़क पर रात
आठ के बाद का सूनसान, अपने को कवि
बताते किसी सिरफिरे का करुण-रुदन, एकांतिक
आख्यान होगा, बड़ी दुनियाओं की मौज़ूदगी का
एक गंवई उन्वान होगा, बहरे कभी रात सारी
जगे रहे अपनी धुन में घने रहे तो सुन लेंगे
भाषा की हारमोनियम पर कितना लंबा
मर्सिया-गान हुआ, संभावनाओं नहायी
हंसती-दौड़ती बच्ची थी, ओह, देखते-देखते
किस आसानी, अपने ही आंगन अवसान हुआ.

सिर्फ़ एकवचन के सपनों में दीखता बारिश
के बाद का धुला, खुला चमकता मैदान होगा.

भाषा के तो वास्तविकता में अदरवाइस
फोड़ी होगी, गड़ेगी गड़ती रहेगी, कपड़ों
की गिनकर दो जोड़ी, चेहरे पर अकाल
की गरीबी दुर्निवार, सजीले सुहानों में
श्यामवर्ण की कठुवाई मार, फक्क हंस
देने की बेहया नासमझी, बेज़रुरत शऊर
पैरों पौन तीन रुपये के आलता का
सिगरेट की डिब्बी में धरे पान के बीड़ा
का घटिया सिंगार होगा, शोहदे हंसते
चलेंगे, जैसे आंखमूंदे पंडे बकते
जब-तब उपवास करेगी, भाषा बारह बार
व्याही जाएगी, कोख भरा है भर जाएगा
का शास्त्री जी आशीर्वाद देंगे, आंख मूंदे देते रहेंगे

आशीर्वाद की सरकारी नाव पर फिर जर्मनी
और सुरिनाम जाएंगे, पूरी-नाम और डॉलर
का ईनाम जीमेंगे, बुनिया के पत्तल पर दांत चियारे
राम और बलराम का मशहूर वीडियो बनेगा, इस
दरमियान घर के अत्याचार औ’ पड़ोस के व्यभिचार
में भाषा तीन बच्चे जनेगी, दो अभागी श्यामवर्ण
बेटियां होंगी, एक मुंहजोर बेटा होगा, गली में नून
की दुकान पर नून होगा तेल खरीदने के पैसे न होंगे
हिंदी में अंग्रेजी स्कूल का हिज्जों की गलतियों
से गंजा इश्ते्हार होगा, चीनी सेलफ़ोन पर
आप आए बहार आई’ की चीख़ती अश्लीलता होगी.

Thursday, December 3, 2009

बहुत भूख लगनेवालों की कहानी..

गुम: पांच

बूढ़ी दिखी तो बोलती हुई ही दिखी. जाने संबलपुरिया बोल रही थी या गंजाम वाली ज़बान. जुसेप्पे‍ गौर से कभी उसे तो कभी धीमे-धीमे हमारे गिर्द इकट्ठा होती भीड़ को पढ़ता रहा, जबकि मेरे मन में बुढ़ि‍या के तंबाकू से एकदम काले पड़ गए दांत कहीं गड़कर फिर वहीं अटके रह गए थे, मैंने पास खड़े एक बीसेक वर्ष के लड़के के कंधे को उंगली छुआते उससे कटकिया उड़ि‍या में सवाल किया, ‘क्या है, लोग अभी तक तंबाकू से दांत मांजते हैं?’ जुसेप्पे ने टोककर मुझे चुप कराया और तंबाकू रंगे पोपले मुंह वाली बूढ़ी की बातें कोई हमें समझा सके इसके लिए हीरो होंडा भेजकर सात किलोमीटर दूर पड़ोस के गांव से मेडिकल के छात्र बिबेक परिड़ा को बुलवाने की व्‍यवस्‍था हुई.

विवेक कानों में एमपी थ्री का ईयर-फोन लगाये बाइक की पीछेवाली सीट से उतरा, जुसेप्पे को देखकर उत्साह में ‘जोसेफ सर, जोसेफ सर!’ पुकारता उसका एक सीनियर सिडनी में डॉक्टर हो गया है और बैंक से लोन की व्यवस्था हो गई तो वह भी ऑस्ट्रेलिया की ओर निकल जाएगा के किस्से सुनाने लगा, उसके बाद ‘इज़ ऑस्ट्रेलिया रियली भेरी रेशियल, सर?’ जैसे सवालों की चिंता. मैंने बच्चे को पुचकारकर उसे जुसेप्पे से अलग किया, उसके कंधे पर हाथ धरकर उसे खांटी कटकिया में समझाया, ‘बेटा, हमलोग बहुत दूर से आए हैं, बुढ़ि‍या क्लैरिनेट बजानेवाले की कहानी कितना और क्या जानती है, यह जानने आए हैं, तेरा गाना उसके बाद सुन लेंगे, इज़ दैट ऑल राइट?’

बिबेक को मेरी अंतरंगता रास नहीं आई, न अपनी जगह जाने किसी क्लैरिनेट बजानेवाले की कहानी में हमारी दिलचस्पी, लेकिन जुसेप्पे को मुस्कराकर सिर हिलाता देख उसने कुछ वही किया जैसा मैं उससे करने को कह रहा था, मतलब बूढ़ी की उखड़ी बातों को वह ध्या‍न से सुन रहा है की सस्ती एक्टिंग करने लगा.

कुछेक मिनट बाद बिबेक ने छोटे स्त‍र के जिम्मेदार सरकारी कर्मचारी की तरह हमें इत्तिला दी कि बुढ़ि‍या अपने दोनों बेटों से नाराज़ है. बड़ा कलकत्ते में अनाज की मंडी में किसी सेठ के यहां नौकरी करता है, छोटा कटक के किसी प्रिंटिंग प्रैस में है, शादी करने के बाद दोनों बदल गए हैं खाते-पीते नौकरीपेशा औलादों के रहते बुढ़ि‍या शिकायत कर रही है उसके पास तंबाकू खरीदने तक के पैसे नहीं रहते, भिखारियों से बदतर वह जीवन बसर कर रही है, क्या ईश्वर के यहां न्याय नहीं है?

मैंने ऊबकर एक सिगरेट जलायी, बूढ़ी के हाथ सौ के दो नोट रखे, विवेक से कहा उससे पूछे क्लैरिनेट बजानेवाले के बारे में क्या जानती है?

बिबेक ने बुढ़ि‍या के आगे मेरा सवाल दोहराया तो वह नोट करीने से संभालकर अपनी मैली साड़ी के किनारे गांठती एकदम एनिमेटेड होकर बात करने लगी.

थोड़ी देर बाद बिबेक ने टूटी-फूटी अंग्रेजी, और उससे भी खराब हिंदी में जो बताया उसका लब्बोलुबाब था: बाजा बजानेवाले को एक नहीं बुढ़ि‍या ने बीसियों मर्तबा देखा था. दिखने में बहुत हद तक वह मुझ सा ही दिखता था, सिगरेट भी मेरी ही तरह जल्दी-जल्दी पीता. जब बाजा नहीं बजाता तो सिगरेट पीता होता, या फिर अपनी राह जाते लोगों को छेंककर उनसे सवाल करता कि वह इस पर क्या सोचते हैं और उस पर क्या. क्या इतने छोटे जीवन में चैन से कुछ वर्ष गुज़ार सकें, हमें इतने तक का अधिकार नहीं जैसी बेमतलब बातें. फिर बच्चों के लिए गांव में एक अच्छा स्कूल होना चाहिए जैसी बहकी योजना के पीछे वह चरवाही और मजूरी में लगे गरीब किसानों को दिक् करता रहता. बीच-बीच में कुछ दिनों के लिए गायब हो जाता और लौटता तो हंसते हुए दरवाज़े से अंदर आकर चिरौरी करता, ‘काकी, घर में जो भी रांधना है खिलाओ, बड़ी भूख लगी है!’

फिर उसके सूराग में पीछे पुलिस आने लगी, शिकायत होने लगी कि बिगड़े तत्वों को अपने यहां शरण देकर बूढ़ी गांव गंदा कर रही है. बुढ़ि‍या घबराकर कुछ महीनों के लिए अपनी बिधवा ननद के गांव चली गई, उसके बाद से ‘बाजा-बजैया’ को फिर कभी देखा नहीं. मालूम नहीं कहीं और चला गया, पुलिस धरकर लिये गई, क्‍या हुआ. लोग एक बार चले जाते हैं उसके बाद कभी उनका पता चलता है भला?

गांव के शिक्षित बुजूर्ग नंदी बाबू हैं. कभी कटक में वकालत किया था, तीन कमरों वाला एक मकान अभी भी शहर में है, वकालत की कमाई से ही खरीदा था, लेकिन मातृभूमि का मोह होगा, ज़्यादा वक़्त अब गांव में ही रहते हैं, पान का एक ताज़ा बीड़ा मुंह में दाबकर अपने दालान में पंचायत की खटिया खींचकर फैलकर बैठते हुए बोले, ‘बु‍ढ़ि‍या की बातों को गंभीरता से मत लीजिएगा, वह चोट्टी है, कुछ नहीं जानती. हमारा गांव नेक और अच्छाम है, कोई बाजा-टाजा बजानेवाला यहां क्योंह गड़बड़ी फैलाने आएगा? और हम किसी हरामी को अपनी मातृभूमि में घुसने देंगे?’

वकील साहब के घर पर हमारे लिए चाय और नमकीन का इंतज़ाम हुआ था, प्लास्टिक की नई नीलकमल कुर्सी में फंसे जुसेप्पे ने अभी चाय का पहला घूंट भरा भी नहीं था कि नंदी बाबू उत्साह में छूटकर पूछे, ‘ये सब फालतू की गप्प छोड़ि‍ये, मिस्टर, बताइये, आपके डॉलर का आजकल भाव क्या चल रहा है?’

जुसेप्पे ने चाय एक ओर बगल में टिकाकर मासूमियत से जवाब दिया, ‘मालूम नहीं, डॉलर क्या, अपन युआन की सेहत से भी एकदम अनभिज्ञ हैं. और अपनी यह चाय आप रहने दीजिए, कहीं से हंड़ि‍या-सड़ि‍या पिलवाइये, थोड़ा मिज़ाज़ तर हो, क्यों ?’

यह ‘क्यों’ जुसेप्पे ने मेरी तरफ देखकर कहा था, मैं जवाब देने की जगह नंदी बाबू के चेहरे का उड़ा रंग देखता रहा, मगर ज़्यादा देखने की ज़रूरत न हुई क्योंकि इसी बीच जुसेप्पे ने जेब से एक घिसा हुआ माउथऑरगन निकालकर बजाने लगा था, और इधर-उधर की जनता, नंदी बाबू के रसूख और ठेलुआहट को नज़रअंदाज़ करती बड़े चाव से बाजा सुनने भी लगी थी.

(बाकी..)

भागना..

धूप की अझुराई चोटी में रात की बारात के तीन अनजाने फूल
और अपना दीवाना मन गूंथ निकल भागना, दोस्तं,
भागती रहना, भागती भागती.

चीन की दीवारें होंगी, रात की गहरी सियाह ख़ूंखारें
न समझ आनेवाली, किसी अनजाने देश किसी पराये सपने
से उधार लिया हो जैसे दीखेंगी बीच-बीच कभी चमक का जगमग गिराती बहारें
पैर जवाब देते होंगे, सिर चकराता आकर हाथ में गिरता-गिरता होगा
होंठों की पपड़ि‍यां सूख-सूख अंतर्मन के धन को बेमतलब बनातीं
मन के बारह मन के बोरों पर गिरी आती होंगी
पहचानी पुकारें पीछे छूटी पुकारती, कभी तसल्ली़
और चैन का आश्वासन देती कभी धमकियों के चोट में
हुंकारती होंगी, मुड़कर पलट-बंसी बजाना नहीं, मदन
सांझ की लम्बी सलेटी उबासियों पर दौड़ता
निकल गया एक लड़का, दूर तक पसर गया लाल साड़ी का किनारा
और एक दिल तोड़ देनेवाली ठुमरी की तान की मानिंद दौड़े
दौड़ना, दूर बहुत बहुत दूर निकल जाना, दोस्‍त

कविता के पोस्टर के सारे हरफ घुल जायें
घुलते जायें, फिर तब भी दीखता रहे
भागते दीखे थे तुम, दर्द में ज़र्द, ओफ़्फ़, लेकिन
नज़रों में कैसे तो खुद को सजाते, मुस्कराते.

Wednesday, December 2, 2009

छुक छुक छुक छुक..

कालीबाड़ी की भीतर की गलियों में जाने इसाइयों के किस पंथ की एक पुरानी, ललहर, साहबों की बंगलानुमा इमारत है, होंठों के ऊपर एक भूरा, भारी मस्सा और हल्के उग आये मूंछों की सजावट वाली एक बूढ़ी नन से जुसेप्पे जिरह कर रहा है, मैं गांजे की टुनक में उनींदा मिशन-पुस्तककालय के पुराने जिल्दों के बीच की अनकैटालॉग्ड शोधपत्रों को पलट रहा हूं; एक शीर्षक पर नज़र जाती है: “सत्रहवीं सदी के प्रथमार्द्ध में भारत में पुर्तगाली उद्यम से नीलाहाट के सामाजिक जीवन में आए बदलाव”, सस्ते स्कूली नोटबुक के कागज़ पर सात-आठ पृष्ठों की एक हस्तलिखित दूसरी रपट का शीर्षक है- “ईश्व‍रीय अंधश्रद्धा और पैरासीटामोल पर अगाध विश्वास दोनों ही हमारे लिए बराबर रुप से नुकसानदेह हैं.”

हाइनरिश हाइनस्त्रास, बर्लिन में 1889 का मैनुफैक्चर्ड एक घिसा हुआ पुराना ग्लोब है, उस पर धीमे-धीमे उंगलियां फेरते हुए, और एक अच्छी नक्काशी का बनारस में बना पीतल का पानदान है, इसे क्यों न उड़ा लिया जाए के मीठे अरमान से जूझता बुदबुदाता हूं, ‘मेरी जान जा रही है, स्वीटहार्ट, लेट्स गेट आउट ऑफ़ हियर!’

पूरी रात रेल का सफर, गैस-बत्तियों की रौशनी को बुझा देने के बाद के तेलियर अंधेरों की महक, झपकियों में आती नींद और खिड़की के बाहर सरसराये ताड़ के पत्तों की महीन हवादार आवाज़ से अगले ही क्षण उचट भी जाती नींद..

अंधेरे में आंख मलता, उंगलियों से टटोलता घुटना पाकर मैं चौंकता हूं किसका घुटना है, कैसा समय है? अतीत का बिसराया कोई क्षण, या भविष्य की खूंटियों पर टंगे किसी भगोड़े, कातर-राग के बिम्ब?

जिस दशक अमरीका में पहली मर्तबा मोटर उद्योग की ज़रुरतों के मद्दे-नज़र सड़कों के निमार्ण में नाटकीय निवेशों की सरकारी मंज़ूरी हुई, ठीक उसीके गिर्द जब श्री महावीरजी प्रसादजी द्वि‍वेदीजी ने अस्वस्‍थता में हिन्दूसभा के एक प्रांतीय अधिवेशन की अध्यक्षता में असमर्थता जताई थी, ठीक उसी दौरान जब हंगरी के तिरपन-वर्षीय इस्तवान मांदेलस्ताम, जो पिछले नौ वर्षों से एक छोटे ग्रांट की आस लगाये बैठे रहते और हर वर्ष उससे महरूम होकर कुछ जल्दी और ज़्यादा बूढ़े हो रहे थे, अंतत: इस बार पैसों की मंज़ूरी से आश्वस्त अपनी बेथलेहम की यात्रा का सुखद समाचार अपनी तीसरी और सबसे दुलारी बेटी मार्गारिता वॉन बांदेवाउन को देने उस बेकरी की ओर भाग रहे थे जहां वह चार घंटों की पार्ट-टाइम मजदूरी करती थी और अपने पिता से बेतरह स्नेह रखती बशर्ते वह बेथलेहम के सफर की पागल सनक से बाहर आ जायें और सबका जीना दूभर न करें..

ख़ैर, कहने का मतलब बेटी की मोहब्बत और संभावित सुख के उत्साह में दौड़कर सड़क पार करता इस्तवान मांदेलस्ताम ने जर्मन घड़ी के व्यापारी की टमटम के नीचे आकर अपनी जान भले बचा ली, अपने बायें पैर से हाथ हमेशा के लिए धो लिया. यह वही दिन था जब नेपाल की तलहटी में गोरखपुर के रास्ते धीमाल नामके गांव में, बाढ़ की चपेट में, कुल एक दिन में इकसठ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, ठीक इसी दिन दांतेवाड़ा के एक फ़कीर ने हवा में अनुपस्थित, मगर अपनी नज़रों में दिख रहे, मखमली कोमलता में लिपटे संगीत को पहचान लेने और उड़ीसा के मयूरभंज में एक पोपले मुंहवाली बुढ़ि‍या के नज़दीक ‘वह’ कहीं पाया जाएगा का सूराग दिया था.

रातभर रेल के सफर के तीन दिन बाद, जून की गर्म दोपहर मयूरभंज की इस और उस, जाने किन-किन गांवों की खाक छानते हुए मैं और जुसेप्पे एक वहशी दीवानेपन में पोपले मुंहवाली उस बुढ़ि‍या की खोज में लगे रहे जो हमें हमारे क्लैरिनेट के संगीत तक पहुंचने का रास्ता बताती, और अंतत: दिन ढलते-ढलते वह मिल ही गई..

(बाकी..)

गुम के पहले के बाकी टुकड़ों का लिंक: एक, दो, तीन.

Tuesday, December 1, 2009

दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!

अपने-अपने मन की अनूठे, अंगूठी के जादू में खोये जन, गन को इससे क्या फर्क़ पड़ता कि वह पुराने मखमल के टुकड़े में लपेटे क्लैरिनेट कुरियर को जानते थे, नहीं जानते थे? जानते थे तो कितना जानते थे और नहीं जानते थे तो क्यों नहीं जानते थे. हां, निकोलस यादव को पड़ता था, इसलिए कि बात जांच, उसके काम, जीवन की उसकी पहचान से जुड़ी थी. और मुंशी सियाबुर तइब अली से लेकर तपोधन महेश्शर राखाल की संगतों में निकोलस बेमौका, कहीं का तार कहीं जोड़, पूछने से कभी बाज नहीं आए कि जीवन ठीक-ठीक हमसे चाहती क्या है, तपोधन बाबू? या, ‘काम की राह सीधे चलते हुए एक दिन सत्य का साक्षात होगा, इसकी कभी आश्वस्ति बनेगी, मुंशी तइब साहेब?’

इस सत्य तक पहुंचने का अलबत्ता कोई सूराग नहीं कि निकोलस यादव को उसके प्रश्न के वाजिब उत्तर कभी मिले या नहीं, या अंततोगत्वा यही कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे बिहार और बंगाल के सूने मैदानों और उदास जंगलों में भटकते पथिक की अपनी रसधुनी खोज को यादववंशी निकोलस आखिरकार किसी मुकाम तक कभी पहुंचा सका या नहीं.

निकोलस का तीसरा बेटा जो ढेरों वर्ष अंकगणित में माथा फंसाये रखने के अनंतर अंतत: इंग्लिश कंपनी के बिजली विभाग में पंजाब में दूसरे दर्जे का अफ़सर नियुक्त हुआ और सारी उम्र तपेदिक की शिकायत और भय में रहने के बावजूद मौत जिसकी मेंहसाना, जिला- होशियारपुर के एक सब-स्टेशन की मरम्मत के दौरान बिजली के झटकों में उलझकर हुई; उसकी बड़ी बेटी की चौथी औलाद जो एक एंग्लो-इंडियन आया की मोहब्बत में सबकुछ दावं पर लगाकर हांगकांग (या शायद सिंगापुर) भाग गया था, खुदरा कपड़ों के धंधे में जिसने जो थोड़े पैसे कमाये, उसके कहीं दुगने से ज़्यादा शराब और मांदारिन बालाओं पर तबाह करके एक निहायत बेवक़ूफ़ और बरबाद मौत मरा; उसकी फूफीजाद बहन के पोते की इकलौती औलाद, इलियाद क्‍वेंतिन, जो क्यूबेक, कैनडा में इन दिनों लंबी बेरोज़गारी के बाद पिछले तीन महीनों से एक पब्लिक सर्विस कंपनी की वकीली करता पाया गया, उसके काग़ज़-पत्तरों में मास्टर, वीज़ा कार्ड और वोदाफ़ोन जैसी कंपनियों के अपनी सर्वविदित सार्वजनिक पहचान से अलग, पोर्नोग्राफिक सर्विसिंग से कमाई अकूत कमाई के ढेरों गुप्त आंकड़े हैं, लेकिन डेढ़ सौ पन्नों के उस बड़े फोटोकॉपीड और प्रिंटेड अंबार में कहीं एक जगह भी क्लैरिनेट-मैन का ज़ि‍क्र तक नहीं है. अंग्रेजी में जैसी की कहन है, दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!

हालांकि दूसरी ओर, आश्चर्यजनक रुप से महाराष्ट्र और दिल्ली की मैट्रोपॉलिटन ‘चमकाइयों’ से बाहर निकलते हुए मीडिया में मधुर भंडारकर ने ऐलान किया है कि कॉरपोरेशन, फ़ैशन और जेल के जंगले में झांकने के बाद अब उनका इरादा उड़ीसा की जंगलों की ओर कूच करने का है. मीडिया का एक धड़ा इसे माओवादियों में उपजी नई दिलचस्पी और हिंदी सिनेमा में नई संभावना के बतौर पेश कर रहा है, जबकि मीडिया का ही एक अन्य सनकी ग्रुप इसे क्लैरिनेट-मैन की मुख्य धारा में वापसी के सिने-शाहकार के क़यासी रंगों से रंगते थक नहीं रहा है. मालूम नहीं भोर का शुरुआती क्षण है, या बीच दोपहर भूख के अंदेशे की पहली चोट, अवचेतन में कहीं मैं एक दबी बुदबुदाहट सुनता हूं, ‘सच नहीं सपना होगा, और सपना होगा तो उसका ठीक मतलब क्या होगा?’

पंद्रहवी सदी के स्पेन में एक अबादेल ज़ोहराब मसूदी नाम के अध्येता हुए गए, ‘सभ्‍यताएं कैसे बाज़ार के रास्ते गईं’ विषय पर जनाब ज़ोहराब मसूदी ने चार महत्वुपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें अब लगभग सभी अप्राप्य हैं, एक बिगड़े पॉलिश अनुवाद की कुंजी के फुटनोट्स में अलबत्ता तीन जगह मसूदी का ज़ि‍क्र है, अंग्रेजी में अनुदित एक उद्धरण भी है, “a dream is a garden of devils, and all dreams in this world were dreamt long ago. Now they are simply interchanged with equally used and worn reality, just as coins are exchanged for promissory notes and vice versa, from hand to hand…”

मगर ताज़्ज़ुब की बात, क्लैरिनेट-मैन का ज़ि‍क्र यहां भी, कहीं एक बार भी, नहीं है!

(बाकी..)

Monday, November 30, 2009

समय पीछे जाकर भी कितना पीछे जाता है?..

एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल की सीढ़ि‍यां उतरते नयनमोहन घोषाल ने थके-हारे स्वर ऐलान किया, ‘क्या फरक पड़ता क्लैरिनेट-मैन किदर गुमा, कोन समय गुमा. हम हामारा बाड़ी सोब दिनेइ होताम, किंतु सोत्ती‍ अगर आप जिग्या‍सा करेन, क्वेश्चेन पुट करेन तोमाय कोथाय पावा जाबे, नोयोनमोहोन? बाड़ी थाको तो तुमि? तो आप क्या सोचते हामारा पास कोनो स्ट्रेट आनसार आछे की? नेइ. सेइ तो आमादेर सोबार लाइफेर बिग क्वेश्चन. केउ जाने ना कोथाय बास आमादेर! रियल वी, बुझेछेन तो?’

पुनकी नेतराम को कुच्छो नहीं ‘बोझाता’. घोषाल बाबू के पान, तंबाकू और सुराही में ठंडे पानी के इंतज़ाम और साहब लोगों के चमकते जूतों और मेमिन जान के सजीले छातों के गोपनीय लोक में मुंडी फोडते रहने से जब उसे फ़ुरसत मिलती है, वह दूसरे गुमाश्तों की संगत में गोटी खेलने की जगह अपने परिचित प्रश्नलोक में लौट आता है और फिर अकल भिड़ाये भेद फोड़ने की कोशिश में जुटा रहता है कि आखिर वह कैसा फर्क़ है कि गिलहरी बराबर ज़रा सी नौकरी में घोषाल बाबू के चेहरे की रंगत उड़ी रहती है, जबकि बड़के लाट प्रिंसेप साहब सारा दिन टकसाल में माथा फोड़े के बाद भागे-भागे सोसैटी आते हैं, और पहुंचते ही पोथी-पतरों में खुद को ढांप लेते हैं और समूचे चेहरे पर, मनोहर किरिया, ‘खिलन’ खिली रहती है!

तीस-बत्तीस पन्नों की खुद की तैयार की रिपोर्ट पर नज़र फिराते निकोलस यादव के चेहरे पर ऐसे हिकारती भाव बनते हैं मानो इस उम्र में वह किस लड़कपन में समय खराब कर रहे हैं, थोड़ी देर तक होंठ भींचे रहने के बाद बुझी हुई पाइप वह मुंह में फंसाकर बुदबुदाते हैं, ‘इट्स ऑल नानसेंस, एक अर्द्धविक्षिप्त वृद्ध भिक्खु की सेवा में अजामिलकुसुम आश्रम, गोपेश्वर में एक लंबे अंतराल पर ‘वह’ देखा गया था, इस बात की कोई तस्दीक नहीं किसने देखा था, और जब देखा था तब क्या क्लैरिनेट मैन वॉज़ प्लेइंग हिज़ क्लैरिनेट? नहीं, यहां उसका उत्तर नहीं. इस तरह से यह जांच कहीं नहीं जा रही, हम कहीं नहीं जा रहे. डैम इट, यादव!

जुसेप्पे, चुप है. मेरे नहीं टोहने पर वह कुछ नहीं कहता. कलकत्ते में सारे दिन की आवारागर्दी के बाद अपने लिनेन का घिसा जैकेट उतारकर एक कुर्सी की पीठ पर फेंक, कैनवस के गंदे जूतों को लिये-दिये जाने किस ज़माने के पुराने पलंग पर चित्त ढेर हो जाता है, अंतत: मेरी ख़ामोशी तोड़कर सवाल करने पर कि प्रिंसेप की डायरी मिली? के जवाब में मुस्कराकर इंकार में सिर हिलाता है. मैं चिढ़कर, पूरी कोशिश से अपना गुस्सा दबाये फिर, पूछता हूं, ‘तो सारे दिन इसी नहीं मिला की खोज में लगे रहे?’

जुसेप्पे कनपटी को हाथ का सहारा देकर उठंगा लेटता है, शरारत से मुस्कंराता है, ‘मैं कुछ और पीछे लौट गया था, विलियम जोन्स और चार्ल्स विल्किंस की कहानियों की टोह में निकल गया था. नहीं, तुम हल्ला मचाने से पहले मेरी बात सुनो, सुन रहे हो? समय क्या है? उसे कितना भी पीछे खींचो, वहां जाकर भी यही दिखता है कि समय के बड़े फलक का वह कितना लघुतम बिंदु है, समझ रहे हो?

मोतीहाराना से ग्यारह वर्ष की कन्या, सोनाबिनी, जो नयनमोहन घोषाल के यहां आई थी, यह उसका दूसरा व्याह था. पहले व्याह के वक्त उसकी उम्र आठ वर्ष थी, और जिससे हुई थी इसके पहले कि वह उसे देख पाती, अभागा बाढ़ की नदी में नाव पलटने से काल-कवलित हो गया था. स्वयं से उम्र में तिगुने नयनमोहन को देखने की कन्या में कैसी कामना थी, इसका उत्तर देना भी कुछ उतना ही मुश्किल है जितना यह जानना कि नयनमोहन घोषाल स्वयं क्लैरिनेट-मैन को कितना जानते थे, जानते थे? सचमुच?

(बाकी..)

गुम..

सन् अट्ठारह सौ तीस के आसपास की घटना है, या शायद कल रात के आखिरी पहर के दरमियान की कभी, कहना मुश्किल है. तथ्यत: मुश्किल इसलिए भी है कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे दक्षिणी बिहार में भटकते जिस शख्‍स का किस्सा है वह अभी भी लापता है. नयनमोहन घोषाल मामले पर कुछ प्रकाश डाल सकते थे लेकिन जेम्स प्रिंसेप की मातहती में ब्राह्मी लिपि संबंधी कागज़-पत्तर सहेजते हुए वैसे ही इन दिनों वह मानसिक रुप से कालाजारग्रस्त हैं, अंग्रेज की पागल सनक में घर में मोतीहाराना से ग्यारह वर्ष की कन्या विदा होकर आई है, ठीक से उसका मुख देखने तक का अभी अवकाश नहीं बना, ऐसे में टमटम के काफिले पर पश्चिम बंगाल के तीन जिलों की धूल फांककर लौटे पुलिस सुपर निकोलस यादव की खिन्नता, झुंझलाहटों का किस तरह, क्या खाकर सामना करें? फिर हरे चमड़े की मेज़ पर कुहनी धंसाये, सूखी कनपटियों में उंगलियां गड़ाये बाबू नयनमोहन को लगता जीवन में सुख देखना शायद उनके नसीब में नहीं, अच्छा होता बचपन के संस्कृत पाठशाला के सखा पूर्णज्‍योति की तरह, वह भी सोलह वर्ष की अवस्था में अघोरी साधुओं की संगत में गोरखपुर, नेपाल की तरफ भाग गए होते, कलकत्ते के काले बुखार से रोज़-रोज़ की इन भारी लड़ाइयों से निजात मिल जाती..

पुराने कपड़े में लपेटकर धरा क्लैरिनेट, यही तो? बांसुरी नहीं था, क्लैबरिनेट ही था, पक्का?..

कहानी है गुमनेवाला कभी आदिवासियों की संगत में ‘बजा-बजानिया’ की बहकी-संझाओं की लम्बी-लम्बी तानें छेड़े रहता था? बांसुरी नहीं, क्लैरिनेट की संगत में करता था? आश्चर्य..

“आश्‍चर्य तो यह भी है कि दीवाने, बहकबिहारी के झोले में ओवी विजयन का वह पतला, पहला मलयाली उपन्यास ‘खसककिंते इतिहासम्(द लिजेंड्स ऑव खसक) क्या कर रहा था. कब छपी थी, साप्ताहिक मातृभूमि में सिलसिलेवार 1968 और किताब की शक्ल में 1969 में?” सूखे ललिहर मैदान की उदास सांझ निकोलस यादव अपने लिए खासतौर पर बेल्जियम से मंगवाये दूधिया टेंट में अपनी खास ब्रांडी का घूंट भरकर फुसफुसाते और माथे के सवालों का धुंधलका साफ़ नहीं होता तो हारे मन धीमे मेज़ पर उंगलियों की थाप देने लगते.

पुराने कपड़े में लपेटकर धरा क्लैरिनेट, यही तो? बांसुरी नहीं था, क्लैरिनेट ही था, पक्का?..

क्या कहा निकोलस यादव ने, बहकबिहारी तो? यह कैसा विशेषण हुआ भला? लेकिन बहकबिहारीजी गुमे किधर.. किस समय में?



(बाकी..)

(क्‍लैरिनेट की ऑडियो का टुकड़ा वॉल्‍कर श्‍लोनदोर्फ़ की 1971 की जर्मन फ़ि‍ल्‍म, "द सडेन वेल्‍थ ऑव द पुअर पिपुल ऑव कॉमबाख" से)

Tuesday, November 24, 2009

कविता के सूनसान, मैदान, में..

सुनती हो सुन रही हो, कविता? रिक्शे का कोना लिये, गोद में दोना, बात-बात पर मुँह फुलाती, वस्त्र यही पहनूंगी और भाषा मेरी बेस्ट फ्रेंड है उससे प्रॉपरली बिहेव करना के तानों का गाना गुनगुनाती किस दुनिया बहलती, बहती रहती हो, कविता? यही होगा, यही, और ‘यही’ के बाद ‘वही’ की बही के बस्तों पर कब तक गाल की लाली करोगी, ज़ुबान की जुगाली, हूं? कुछ बहकन आती है समझ, बात और वक़्त का बीहड़? फिसलन की ढलान, अंधेरों में छूटे कितने, कई सारे बाण? घुप्प अंधेरिया रात की अचानक कौंधी बिजलियां, करियाये लाल के कई दिनों की जख़्मसनी पसलियां? कि सिर्फ़ अपनी सहूलियत का चिरकुट लैमनचूस चूसना जानती हो, मोहल्ले की गली और गुमटी की रंगीनी में खुद को पहचानना? अपने गुमान की आग में चिनकती कभी शर्म के फूटते कोयलों में भी जलना जानतीं, कविता? मेरे प्रथम पुरुष का दर्प दिखाती, चिन्हाती रहती हो, उसके उदास परायेपन के क़ि‍स्से तार-तार सुलझाके साहित्यिक रवानी का एक अलग ही संगीत बुनना भी ज़रा जानतीं? कभी? कभी अपने लबर-झबर व्यास और केदार-सम्मान के रिक्शे से उतर मुहब्बत की उमग के उस सहज असाधरणता की साइकिल- सवारी करतीं, सामाजिक गलबंहिया न सही, फुसफुसाकर मीठी नज़र के तीन छोटे टेक ही लेतीं, कि तुम्हारी दिलदारी, समय-समाज की गहिन बेक़रारी, और अपनी चोटखायी साहित्यकारी, यारी, में कुछ कहीं यक़ीन होता, कविता?

Saturday, November 21, 2009

पहाड़ पर मुठभेड़..

सपने में दिखे वॉग्नर, मुख्य सड़क से हटकर कहीं अंदर गए टीले की नोक पर के चिरकुट सजावटी रेलिंग पर कुहनी गड़ाये सस्ती सिगरेट धूंक रहे थे. सामने, नीचे दूर तक फैले घाटियों के विस्तार की अथाह उदासियां थीं, गजर-मजर बादलों के धुंधलकों की अराजकता एक बेमतलब मोहब्बत की भावुकता की तरह उन पर धीमे-धीमे चू रही थी. मैं वही देखता पागल बना रह सकता था, लेकिन घबराकर मैंने यह थाहने की कोशिश की कि संगीत-सरदार पनामा पी रहे हैं या चारमिनार!

दांत निपोरे-निपोरे मैं हर्षकातर दीखा, ‘देखिए, अर्दोनो वाली किताब जाने कब किसके यहां से चुराये रहने के बावज़ूद आपके संगीत को आजतक भले नहीं पहचान सका, आप मगर पहली ही नज़र में पकड़ा गए! लेकिन हुज़ूर, बात समझ नहीं आई, वियेना के बाजू किसी पहाड़ी रेसॉर्ट में दीखते, यहां हलद्वानी के सस्ते तलछट में क्या ढूंढ़ने आए हैं? यहां संगीत का ‘स’ भी नहीं मिलेगा, मंगलेश की कविता भी दिल्ली में ही अपने शब्दं सहेजती है?’

वॉग्नर बाबू चुप्पे –चुप्पे तकते रहे. उन नज़रों में प्रूस्त ने रिल्कें को जिन नज़रों तका होगा वह दंग अंतरंग मनभावनता भी नहीं थी, एक प्रैग्माटिक डकैत की सूनसान आंखों का घिसा घसियारापन था, फुसफुसाकर कुछ देर तक एक लंबे मंत्र सरीखा बोलते रहे, गुरुवर फ्रेंच में बोलते तो थाह भी लेता, लेकिन यहां तो खालिस जर्मन बीयर बह रहा था, मैंने घबराकर हाथ जोड़ दिये- क्षमा करें, मालिक, ताज़ा-ताज़ा पटना से लौटा हूं और फिलहाल ‘चखना’ बंद कर रखा है!

‘कब था आखिरी बार जब हमें सुने?’ यह संगीत-सरदार ने खांटी संस्कृत में कहा, हम समझ गए मगर साथ ही यह भी समझ आया कि हम सरीखे संस्कृतिविहीन के लिए सांगितिक सुरबहार की जिरह में उतरना कैसी टेढ़ी खीर साबित होनेवाली है!

मैं एकदम से हंसने लगा. वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार का मामला सामने आते ही भारतीय नेता उच्च रक्तचाप और छाती में तक़लीफ़ की शिकायत करके जेल की जगह अस्पताल की शरण में निकल जाता है, या हिंदी प्रदेश की लड़कियां बौद्धिकता का सीधे सामना होने पर अकेलेपन के बीहड़ रास्तों पर निकलने के, मुस्कराती शादी के सहूलती संसार की तरफ गोड़ बढ़ा लेती हैं..

आंख खुली तो देखकर राहत हुई कि चलो, ससुर, अपना ऑईपॉड नहीं ही काम कर रहा, क्या ज़रुरत थी, खामखा पिटे हुए पहाड़ पर संगीत-शिखर से ठिलने पहुंच गए?

Friday, November 20, 2009

दुनिया रोज़ बदलती है?

कहीं कवि कह गया है तो उसके कल्पना-विधान में बदलती होगी ही. वैसे भी हिंदी में भौतिक जगत पर रुमानी भाववाद आरोपित करने का भयकारी, लगभग उन्मादभारी, प्रगतिशील प्रचलन काफी पुरातन रहा है. सारे कवि लाइन से बताते नहीं थकते कि हे इहलोक के जाने किन अंधारकोनों में छिपे, पसिंजर रेलों में फंसे कराह-कुमुद जनसमुद्र, घबराना नहीं, दुनिया बदिल रही है, समाजबात, बाबू, धीरे-धीरे पसिंजर गाड़ी में पीछू-पीछू आय रही है! ‘छुक-छुक.. दुनिया.. छुक-छुक.. रोज़.. छुक-छुक.. बदिल.. छुक-छुक.. रही है.. छुक-छुक..’ मुंगेर और मोतिहारी में डेढ़ सौ कबिता के सर्कुलेशन और राजधानी पटना और महाराजधानी दिल्ली में एगो गोष्ठी निष्पादन से ‘दुनिया बदिल रही है!’ का एगो महानुष्ठान, क्रांतिधारी पोस्टंर तैयार हो जाता है. एक बच्चे की शादी के सिलसिले में मैं पिछले पांच दिनों पटना के पड़ोस, मसौढ़ी में था, दुनिया बदलने के इस विज्ञान की बहुत थाह नहीं ले सका. अलबत्ता बांह में तीन जगह और पैर में दो चोटों के महीन सिंगार के अवसर वैसे ही सहज-सुलभ हुए जैसे आमतौर पर बिहार की फिसलनभरी सड़कों पर हमारी तरह के सुलझे पथिकों को हो ही जाते हैं, फिर भी विवाह जैसे सामाजिक गैदरिंग के अवसर पर यह अफ़सोस बना रहा ही कि स्कोर्पियो, बोलेरो की झांकियों की ‘नवके’ सजाव में बराती के ‘पुरनके’ भेड़-ठंसाव में हम समाजोत्थान की परिघटना का ठीक-ठीक अनुशीलन कर क्यों नहीं पाये?

आखिर क्या वज़ह रही होगी कि हिंदी का कवि एक मुस्‍कीभरी नज़रों में जो पढ़ जाता है, वह हम बारहा चश्मा़ पोंछ-पोंछकर भी देखने से रह गए? इसलिए कि हाईस्कू‍ल में अंकगणित में अट्ठारह नंबर पाये थे? और शायद इसीलिए भी कि सायंस फ़ि‍क्‍शन में अपनी कभी गति बना नहीं पाये? सोचकर गुस्सा् आता है कि गुणाकर मु‍ले ने विज्ञान पर इतना लिखा, ‘विज्ञान के वंचितों के नुकसान’ वाली भी एक किताब लिखकर छोड़ गए होते? लोग पढ़ते नहीं, ठीक है, लेकिन लिखकर कहीं छूटी तो रहती?

मगर ‘हेने’ और ‘होने’ ‘जेकरा-जेकरा’ और ‘जेतना’ सब जो ‘बदिल’ रहा है (झारखंड में मधु कोड़ाई करके सब ले गए वाले कौड़ाओं का तो बदले गया है!) के विज्ञान को ठीक से पढ़ पाने का चश्मा जाने पटना के किस सुपरमॉल में बिक रहा है, हम दु:खीमन ‘अकनालेज’ कर रहे हैं ‘नवका’ बना बाथरुम का ‘बिछिलाहट’ देख लिए, ज्ञानधन का ‘चमकाहट’ लोकेट नहीं कर सके! अशोक राजपथ पर थोड़ी देर के लिए राजकमल प्रकाशन की ‘दुकनिया’ में भी कुल जमा चार गो टाइटिल जो ‘कीने’ वो भी ज्ञानपिपासा का सांति से डेस्पेरेशन का खांसी का कंट्रोलिंग ‘डेभाइस’ कहीं ज़्यादा था!

दुनिया रोज़ बदलती है. अरे? देखिए, फिर ले खांसी का दौरा सुरु हो गया!

Wednesday, November 11, 2009

उलझन..

सीधे कहूं या बात घुमाकर कहूं? किसी जाननेवाले ने कहा सीधे कहने की बात मत ही कहना क्‍योंकि तुम्‍हें जाननेवाले (जितना जान सकते हैं) समझ ही लेंगे मज़ाक कर रहे हो, टेढ़ा ही कहो मगर भगवान के लिए चंद्रबिंदु ताक पर रखकर मत कहा करो! मैंने नाराज़ होकर एकदम टेढ़ेपन में कहा, "हे हमें पहचाननेवाले, मेरे लिखने में चंद्रबिंदु की अनुपस्थिति मेरे भाषायी प्रयोग की पैदावार नहीं, हिंदी रेमिंग्‍टन की की-बोर्ड में दर्ज़ सीमाओं का संसार है, रवि रतलामियों और देबआशीष की नाक़ामियों के मद्देनज़र है, लेकिन हमारे ब्‍लॉग पर चांद का मुंह टेढ़ा तो क्‍या कभी चांद का कैसा भी मुंह दिखा जैसी बात उन्‍होंने कभी की कहां है?" मुझे जानने का भरम रखनेवाले भाई साहब ने मुंह टेढ़ा करके कहा- सीधा नहीं कह सकते? कुछ भी? मैंने सीधे सोचने की कोशिश की, एक छोटे पॉज़ (पाज़, ऑक्‍तावियो नहीं. भारत नहीं, मैक्सिको व इतिहास के बारे में उनकी एक किताब है, बड़ी अच्‍छी है लेकिन इस वक़्त नाम याद नहीं पड़ रहा, जबकि गुलशन नन्‍दा के सभी टाइटल्‍स एकदम ज़ुबान पर धरे हुए हैं? स्‍मृति इस तरह के भद्दे मज़ाक क्‍यों करती है? आपके साथ करती होगी, ठीक है, वैसी ही आपकी चिरई-बुद्धि है, लेकिन मेरे साथ?) के टेक पर मैंने कहा, "दोस्‍त (कहां का दोस्‍त? कैसा दोस्‍त?), एक के बाद एक दो सामाजिक फ़ि‍ल्‍में देख ली हैं, समाज और हिंसा दोनों से लबरेज़, संभवत: उसी के असर में दिशा लड़खड़ा गई है, वर्ना आप मुझ जैसे सीधवे में कुछ ज्यादा ही टेढ़ा प्रक्षेपित कर रहे हो, वह हूं नहीं जो दीखता हूं, और जो दीखता हूं वह कभी कहां हो पाता हूं?"

मुझे जानने का स्‍वांग रचनेवाला, जैसे कभी हमें जाना ही न हो की अदा में मुंह सिये आगे निकल गया. पीछे से मैंने आवाज़ लगायी, 'वैसे आपकी चंद्रबिंदु वाली बात जायज़ है लेकिन उसका मुझसे ज़्यादा कसूरवार हिंदी में माइक्रोसॉफ़्ट के एजेंट रवि रतलामी की शैतानी है..' तो ज़ाहिर है मैंने आवाज़ लगायी और उसका अपेक्षित असर न हुआ, आवाज़ वापस मेरे पास लौट आयी, और फिर मेरे पास ही बनी रही.

सोचनेवाली बात है अपनी हिंदी रेमिंग्‍टन वाली गैरहा‍ज़ि‍र चंद्रबिंदु का क्‍या किया जा सकता है, या सीधी बात को टेढ़े तरीके से कहने के अपने तरीकों का. इतनी देर से सोच रहा हूं मगर जवाब नहीं सूझ रहा. इतनी देर से सोचने पर याद आया कि अब तो थोड़ी देर में यह नौबत भी आ सकती है कि सोचने लगूं इतनी देर से सोच क्‍या रहा हूं? सचमुच, इतने दिनों से आखिर क्‍या सोच रहा हूं? सोचते हुए अपने को इस तरह सोचता देखने के बिम्‍ब-बमकारी ख़्याल से काफ़ी घबराहट हो रही है. ऐसी कोई किताब हाल में बाज़ार में नहीं आयी है जिसे उलटते-पुलटते जाना जा सके कि इन दिनों मैं क्‍या सोच रहा हूं? सम बुक? एनी डैम बुक?

क्‍या करुं सोचने से बचने के लिए घबराकर मिलोराद पाविच को ही पढ़ना शुरु कर दूं? लेकिन मेरे पास जो इकलौती किताब की प्रति थी वह किसी भाई ने उड़ा ली है (हो सकता है हरामख़ोर किसी भगिनी ने ही उड़ायी हो, मगर देखिए, देखिए, देखिए हमारी उदारता कि ऐसे गाढ़े वक़्त में चाहकर भी हम स्‍त्री जन-दुर्जन के प्रति अनुदार नहीं हो पा रहे!), टेढ़ायी का फिर दूसरा काम क्‍या करें?

Saturday, November 7, 2009

एक सवाल..

हैं तो बहुत सारे, फ़ि‍लहाल इसी एक को आगे कर रहा हूं. एक भोली उम्‍मीद है दूसरे बहुत सारे आगे-पीछे इससे जुड़े चले आएंगे. कुछ पैसों के अनसुलझे, विहंगम रंगीन कैलेंडर हैं, बहुत सारा तो लगता है जैसे क्‍या मेरे जन्‍म के पहले के हैं- इधर मैंने जन्‍म लिया, उधर कैलेंडर की गड़बड़ छपायी शुरु हो गई- कितने सारे तो गड़बड़ एलिमेंट हैं, जाने कब सोर्टआउट होंगे, कभी होंगे भी या नहीं? लेकिन फिर यह उतना व्यक्तिगत भी कहां है? एशिया और अफ्रीका में जाने कितने सारे मुल्‍क होंगे, बीसवीं सदी की उनकी पूरी उठा-पटक ही संभवत: इन एलिमेंटों को दुरुस्‍त करने की कसरत रही हो, तो उस लिहाज़ से हम कहां किस खेत की कोई ख़ास मूली हुए? (अलबत्‍ता इतने के ज़ि‍क्र से महसूस हो ले कि हमने बात-बात में देखो, एक बड़ा परिदृश्‍य, चित्र ठेल दिया! मुझे हो रहा है, हो सकता है आप कहें क्‍या बकवास रो रहा है..). पैसों का ही एक दूसरा, सबसिडियरी, फिंका हुआ एक और एलिमेंट है कि कंधे पर प्‍लंबिंग का एक मुगदर गिरा हुआ है- कैसे सुलझाएंगे मालूम नहीं, लेकिन जवाब हासिल कर नहीं पाये जानकर रोज़ रात सोते हुए धन्‍य होते रहेंगे. रोज़ 'इतनी' मात्रा में लिखना है की अंडरस्‍टैंडिग है लेकिन 'उतनी' मात्रा तक में न लिख पाने का असंतोष भी साथ उसके नीचे घुसा हुआ है. पास में अच्‍छे मोज़े नहीं हैं. मोज़े होते तो पास में अच्‍छे जूते कैसे हों उनकी फिर एक रुमानी स्‍वप्‍नकथा बुन सकता. कॉर्डरॉय की एक मटियायी, खाकी पैंट, कछुआ-गर्दन एक क्रीम कलर का स्‍वेटर, मेरे छरहरेपने और घोड़ा-जुल्‍फ़ों में चार चांद लगाता, आज किसी कला-मिलन में क्‍योतो, तो कल किसी काव्‍य-पाठ के लिए हवाना पहुंचाता?

देखिए, ठीक से एक निहायत छोटी बात कह दूं, उस बात का 'ब' उच्‍चरित न हुआ, और मेरी बहक बहकने लगी? सुबह-सुबह बिना कोई अच्‍छा संगीत सुने, या किसी छोटी बच्‍ची से इसरार में नाक लड़ाये बगैर, कहां से इस तरह मन मचलने लगता है? क्‍यों? जबकि बात जैसी कोई बात करनी भी न हो, एक अदद सिंपल सवाल सामने रखना हो? सचमुच, सोचकर इससे भी दंग होता रहता हूं कि मैं क्‍यों इस कदर बेहद हूं!

ख़ैर, सिंपल सवाल पूछ रहा हूं, और उम्‍मीद करता हूं आप थोक में जवाब देंगे, और शर्माना होगा तो अपनी पत्‍नी और मियां बाबू से लजायेंगे, हमसे नहीं शर्मायेंगे..

हां, तब बताइए. आपके दिमाग में इस सवाल का जवाब क्‍या बनता है: जीवन कैसे जियें?

Friday, November 6, 2009

कहां है द रियल वन?

एक बाबू भोलानाथ तिवाड़ी थे, बीन-बीनकर शब्द बांचते रहे, और जाने कितने वर्षों की मेहनत के बावज़ूद ले-देकर एक पतली किताब ही पैदा कर सके- शब्दों का जीवन! ज़ाहिर है गागर में सागर समाने का मुहावरा हो सकता है, शब्दों का जीवन की पतली किताब में सारे शब्द नहीं समा सकते, नहीं समाये, कपूर की तरह उड़ते रहे, उड़-उड़ बिलाते रहे, बहुतों का अब तक पूर्ण विलोपन हो भी चुका! बंद किवाड़ी पर इस बेमतलब की ठक-ठक के तिवाड़ी-खेल से होनहार, समझदार सबक ले सकते थे, हिंदी समाज ने लिया ही, किवाड़ी के पार के रहस्यलोक को समझने, साधने की ज़ि‍म्मेदारी से हाथ झाड़ लिया, लेकिन हर कहीं कुछ जीत कुमार होते ही हैं, हमारा दुर्भाग्य यहां भी हैं, हाथ में मसहरी लिए शब्दों की गहरी में बूड़ते रहते हैं, नतीजा? मिलता-जाता कुछ नहीं, खामखा के सवालों में सिर गांजे दिन खराब होता है!

मैं पूछता हूं ऐसे दुष्टामियों के खिलाफ़ समाज कोई सीधी कार्यवाही नहीं कर सकता? जैसे पज़ोलिनी की एक फ़ि‍ल्म है उसमें आदमियों की आवाज़ वाला एक कौवा है, मिनट-मिनट पर सवाल करके एक देहाती बाप-बेटे का जीवन हलकान किये हुए है, तो आखिरकार हारकर बाप के इशारे पर इधर कौवा सवाल दाग़ने के लिए मुंह खोलता है, उधर बेटा झपटकर उसकी गर्दन पर टूटता है, अगले दृश्य में दिखता है कौवे के सारे सवाल कपूर होकर उड़ गए हैं, और कौवे की जो देह थी बाप और बेटे के हाथ और मुंह में बोटियों की शक्ल में बदल गई है! बड़ा अच्छा प्रतीकात्मक खेल था, जीत कुमार भी चार कदम दौड़ने के बाद आगे कहीं लड़खड़ाकर गिरेंगे, अपना और समाज का सारा खेल खुलकर सामने आ जाएगा तब शायद इनकी बुद्धि खुले, अभी कहां खुल रही है? अभी तो ये ले और वो दे पूछ-पूछकर हलकान करने से बाज कहां आ रहे हैं? आज जैसे अभी सर्वजन ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ़ तीन रनों की हार से उबरा भी नहीं था और इन्होंने दन से पूछ लिया, ‘क्या होता है मातृभाषा का मतलब?अरे? हू आर यू, भाई, क्यों बतायें आपको अपने घर की प्राइवेट बात? मातृभाषा का मतलब! आप जो इधर-उधर घुस-घुसकर यहां-वहां खोजते रहते हो, इसका मतलब आपको समझ आ गया है? जो मैं जीवन और समझ में रोज़-रोज़ इधर चार और उधर बारह लात खा-खाकर भयानक निराशावादी हो गया हूं, और अभय को ताज्जुब होता है कि समाज के पिटाये, घिघियाये लोगों के प्रति मूर्ख भावुकताभरे स्त्रैण करुणा का लतखोर राग पीटते रहने की जगह, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का स्वागत करके सरकारी सुर में सकल समाज आशावादी हो सकता है, फिर भी नहीं हो पाता? क्यों नहीं हो पा रहा है कैन बी अ वैलिड क्वेश्चन!

देयर कैन बी अ हंड्रेड एंड सेवेंटी वन वैलिड क्वेनश्चन, और हो सकता है जवाब ठीक-ठीक किसी एक का भी हमारे पास न हो! कांग्रेस, सीपीएम, बसपा, भाजपा, माकपा के पास हो, थोड़े श्री श्री रविशंकरों के पास हो, हमारे पास बयाम-भर सवाल हों और नाद-भर गुस्सा हो, संतोष की तृप्तिदायी प्रीतकर जुगाली न हो? क्या फ़ायदा फिर बुद्धिवैभव का जो समझने के मुग़ालते देती हो, जवाब की जगह सूप में सिर्फ़ पानी परसती हो?

बड़ी तक़लीफ़ है. सचमुच. लेकिन तक़लीफ़ के साथ यह इच्छा भी है कि एक दिन हीगल, कांट, नीत्शे सबकी किताबों के बगल खड़े होकर केवल फैबइंडिया वाले कुरते में एक जावेद अख़्तर टाइप समझदारी वाली फोटू ही न खिंचवाऊं, बात-बात में हीगल और मार्क्स और हाबरमास को कोट कर पा रहा हूं जैसी एक वीडियो भी छपवाऊं! लेकिन इच्छा ही है, सच्चायी यह है कि कोट कर चुकने की अभी तक की अप्राप्य प्रतिभा के बावज़ूद मन की हदस जायेगी नहीं कि जवाब ठीक-ठीक आ नहीं रहे, सवाल जो हैं दिमाग़ में सोये पड़े हैं, कहीं जा नहीं रहे!

सचमुच सवाल है एक के बाद दो के बाद तीन के बाद चार वाली सफ़ाई आदमी में कहां से आती है? और नहीं आती है तो कैसे नहीं आती है? क्या जवाबों का न पाना और सवालों के धुंधलके में इसी तरह खोये-खोये खुद को गंवाने का नाम जीवन है?

क्या मतलब है पूछने का क्या होता है मातृभाषा का मतलब? जीवन का? राजनीति का? ममता बनर्जी से पूछिये उनके पास सीधा जवाब होगा. या कालिया की ममता के? मेरे पास नहीं हैं. मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं अलबत्ता, लेकिन वह मैं किसी और दिशा में ठेल देना चा‍हता हूं, मगर फिर उठानेवाले सवाल उठा ही/भी सकते हैं कि तुम्हारे सवालों की दिशा की राजनीति क्या है, पार्टनर?

Wednesday, November 4, 2009

हंसता हुआ वाम बुद्धिजीवी..

कौन है यह हंसता आदमी? यह हंसी अश्लील है या समझदारी की भेदभरी? खुद को हीगल, मार्क्स और ज़ाक लकां के रास्ते का पथिक बताते माटसाब स्‍लावो ज़ीज़ू साइबरस्पेस, मीडिया, राजनीति, सिनेमा सब पर राय बनाते, बहुतों की नज़रों में दर्शन का एल्विस स्टाइल गाना गाते, यहां और वहां सबकी चुहल का झुनझुना बजाते दाढ़ीवाले हमारे समय को बूझे बाबा ठीक-ठीक कह क्या रहे हैं? एक फटाक कहन का नमूना यह रहा:

“..You get a kind of abstract, moralistic politics in which you focus on groups which are obviously underprivileged - other races, gays and so on - and then you explode in all your moralistic rage. This has to do with what you might call our cultural, post-political capitalism, in which the most passionate struggles are cultural ones. A large majority of the left doesn't question liberal democracy and capitalism as such. In the same way that when we were young we wanted socialism with a human face, what a large part of today's left want is capitalism with a human face.”
मालूम नहीं. अभी थके माथे ऐसे उत्कट, प्रत्यक्षावलोकन को पचा लेने की दिमागी सफ़ाई नहीं. बाद में सोचकर तय करुंगा बुद्धिबाबा कितना ज्ञान और कैसा संधान बोल रहे हैं. हो सकता है पेचीदिगियों की ढेरों परतें तब भी पल्ले न पड़ें. ज़्यादातर अब नहीं ही पड़ती हैं, सबके बीत चुकने के बाद असमंजसीय अकुलाहटों की कुछ खुरचन बची रहती है. देखते हैं ज़ीज़ू साहब के पीछे क्या बचता है. अभी, आज रात सिनेमा और विचारों की एक थकी खंगाल में पहली मर्तबा यह नाम कहीं से फुदककर सामने आया, पीछे-पीछे जो चीज़ें आईं उसे महज़ इस मोह में लिंकित कर रहा हूं कि बाद में तसल्ली से नज़र मारुंगा. हालांकि तय करना मुश्किल है कि यह बाद में कितने बाद आएगा.. ज़ीज़ू की दुनिया इस दरमियान पता नहीं कहां-कहां किस-किस तरह सुलगने लगे? मैं क्षोभ में हदसता रहूं, ज़ीज़ू बाबू और-और हंसने लगें?..

वैसे ज़ीज़ू अपनी उड़ाते, फाइनांसल टाइम्‍स के जॉन थॉर्नहिल के साथ लंचियाते का एक लिंक और मिला, एक दूसरा यह पूरे ज़ीज़ू बिरादरी का..

Sunday, November 1, 2009

चिदम्‍बरम साहेब की लड़ाई..

एक निबंध है, लंबा और अंग्रेजी में है् मगर चाहता हूं आपलोग पढ़ें. इसलिए नहीं कि दिल तोड़नेवाले ढेरों तथ्‍यों से रुबरु होने की ज़रुरत बनेगी, इसलिए भी, कि लेख को पढ़ते, सोचते हुए लगता है आनेवाले दिनों में इन चिंताओं से और-और दो-चार होते रहने की ज़रुरत बनेगी.. बनी रहेगी!

देखते-देखते निगाह गई इसी जिरह का एक टेलीविज़न बातचीत की शक्‍ल में विस्‍तार ब्‍लॉग पर कहीं और भी उपलब्‍ध है, एक नज़र यहां भी देखें.

Saturday, October 31, 2009

एक मुस्‍कराती औरत के चित्र..

ग्यारह साल की बच्ची ने बुरा मानकर मुंह बनाया, ‘व्हॉट? मालूम है आप मेरे आनसर से हैप्पी नहीं हो, ठीक है फिर, आप बताओ?’

औरत मुस्कराकर बच्ची के गिरे मन को ऊपर उठाने की कमज़ोर कोशिश करती बोली, ‘हो सकता है, बेटा, मैं अपने आनसर से भी हैप्पी न होऊं, देन? मैं सिर्फ़ इतना कह रही थी..’

लेकिन बच्ची तब तक मुंह फेरकर, पैर पटकती कमरे से बाहर निकलकर ज़ाहिर कर चुकी थी कि अपने को मंद, बंदबुद्धि दिखाये जाने के लिए वह अपनी मां को दोषी मान रही है.

औरत के चेहरे पर चली आयी मुस्कराहट अब भी अपनी जगह वैसे ही अटकी पड़ी थी, हालांकि किसके लिए मुस्करा रही हूं का अहसास अब स्टुपिड भी लग रहा था, फिर भी जैसे एक ज़ि‍द में, औरत मुस्कराती रही.

बच्ची ने ऐसा क्या कह दिया था, या उसकी काट में औरत ही क्या़ बोल गई थी असल प्रश्न वह है भी नहीं. असल मुश्किल है प्रश्नों के किसी एक निश्चित भूगोल का न होना. उस भूगोल के बदलते ही प्रश्नों की प्रकृति, अंतर्वस्तु भी नाटकीय तरीके से बदल जाती है, ऐसे में स्थितिबद्ध, इस तरह के एकांगी ज़ि‍रह, वह भी एक छोटी बच्ची को उलझाये हुए, का मतलब क्या? कुछ अनासक्त भाव से सोचना संभव बनाती औरत सोचती और मुस्कराती उदास बनी रही..

***

औरत सुखी है. समाज ने सुख की जैसी जो दुनिया बनायी है, औरत उसी सुखी दुनिया में अवस्थित है. सुखी घर, सुखी बच्चे, सुखधन्य पति सबकी सुखी-सुखी सा‍माजिक पहचान है, फिर भी रह-रहकर जैसे किसी नशे में सरोबार औरत का क्लांत, उदासी में नहाया मन कहीं अकुलाया भागना चाहता है, किस दु:ख की पहचान में किस सागर की ठांव दौड़ता है? वहां पहुंचकर, फिर उस भूगोल में अवस्थित, व्यवस्थित होकर सुखी बन सकेगा, बना रहेगा? औरत सोचती है, और सोचते हुए समझती है उसके पास वाजिब जवाब नहीं, और फिर अपने में हारी मुस्कराती रहती है.

दरअसल यह सच नहीं, पूरे तौर से सच नहीं. ऐसे कोई दु:ख नहीं जिनकी ठीक-ठीक पहचान करके औरत ने कोई लिस्ट तैयार कर रखी हो, नहीं. इसलिए यह कहना ज़्यादा सही होगा कि औरत सुखी है, लेकिन यह भी सही है कि अपने आसपास भौतिकता के अनुराग में जागते, सोये समाज के ख़्याल से उसे विरक्ति होती है, इस सबके बीच धंसे होने और आगे का सारा जीवन यूं ही गुज़रेगा के बोध में सांस उखड़ने लगती है, हाथ गोद से उठाकर बालों तक ले जाना पहाड़ होने लगता है.. और औरत, जैसा बचपन के अपने एक अज़ीज़ को पत्र लिखती, लेकिन अब लिखने से बचती है, स्टुपिडली मुस्काराती रहती है!

***

पति और बच्चों के पीछे खोयी एस्कलेटेर के रेलिंग पर हाथ टिकाये औरत सर्द सांस लेकर सोचती सुपर मॉल्स से सब सुखी हैं फिर उसे इतनी क्यों नफ़रत है. डिब्बाबंद खाना, किसी विंडो पर बजता गाना, कॉफ़ी बार, चकमक कपड़ों की बहार सब उसकी आंखों पर जलते कोयलों की मानिंद झरते, गिरते रहते हैं, औरत उसी क्षण सब भूलकर वहीं मर जाना चाहती है, कि कहीं और, किसी नये तरीके से, एक नये जीवन में ज़िंदा हो सके..

औरत शहर के शोर से दूर किसी पहाड़ के सूनसान में अपने को पाकर संभाल लेना चाहती है, जैसे वह अभी ताज़ा दुनिया में आयी चिड़ि‍या का बच्चा हो और उसे हर बुरे असर से बचा लिये जाने की ज़रूरत हो, फिर यह सोचकर औरत का मन हदसने लगता है कि पहाड़ पर वह साफ़ पानी कहां पायेगी? साफ़ सैनिटेशन, एक अदद साफ़ स्पेस (गंदी जगहों में औरत का माथा चलने लगता है), पहाड़ में अपना आईपॉड ले जाना नैतिक रुप से सही होगा? औरत सोचती है और दु:खी होकर फिर मुस्कराती रहती है..

***

एक अन्य वर्ज़न. वही कहानी है, बस औरत की जगह इस बार हम आदमी को मुस्कुराता, अपने मुस्काने में घबराता देखते हैं.

Friday, October 30, 2009

कुएं के..



टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र


टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र

टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र
टर्र टर्र, टर्र टर्र

Thursday, October 29, 2009

पराये में अपनों की ज़मीन और आसमान..

एक ही दिन मन चार छोर खड़ा हो चौदह किस्मों की चित्रकारी करे, सात रंगों की शरबत पिये का भी जीवन कैसा, क्या अजीब खेल है. अपने एंड पर एक पारिवारिक खबर से सुबह चित्त उखड़ा, दोपहर ढलते-ढलते तक दो जिरह में उलझकर डेढ़ झगड़े कर लिये, और सांझ की ढलान पर दिन का हिसाब लगाने बैठें तबतक किसी अप्रत्याशित कोने से एक मुंहजबानी रेल और पीछे-पीछे मेल आया कि तुम्हारी फलानी चीज़ पढ़ी, और ढिमकाने स्तर के सस्ते दारु सा आनंद आया! सुनकर-पढ़कर बाग-बाग और बाघ होने की जगह, और शायद इसलिए भी कि आमतौर पर हमें कड़वी जलेबी की गोलाइयों से खुद को नपवाते रहने की आदत-सी हो गई है, सो आदत से मजबूर, स्‍वभावत: हम संशयग्रस्त होने लगे, फिर चूंकि देर रात आंख फोड़ने की आदत से मज़बूर हैं सो इस बार किसी और की जगह, अपनी से ही फोड़ते रहे, और फिर थोड़ा ताज्जुब ही हुआ कि फोड़ते में आंखों के साथ-साथ मन को भी ऐसी तक़लीफ़ नहीं हो रही थी!

ख़ैर, यह फिर ठिलाई का इंट्रो हुआ, आगे की बात यह कि कुछ जो फलतुआ हैं, आंख और दिल फोड़वाने से जिनको गुरेज नहीं, एक संयोग में दुबारा की यह याद उनके लिए है कि चाहें तो वे भी कभी आयें, इस कोने लटकें.. संभवत: अनुभव ऐसा निरानंदी नहीं होगा..

Tuesday, October 27, 2009

मुलाक़ात..

मन का पतंग किसी खूंटे उड़ता होता, भाग्य पढ़ने की किताब किसी झोले छुटी होती, वैसी नाउम्मीदी में सुख टकराता ऐसे ही किसी मामूली राह, भूली पगडंडी पर, और फिर इसके पहले समझें अचक्के हुआ क्या, यह कैसा फेर, गुरु, सचमुच मिले सुख से ऐसा अपना नसीब, कि जाने किन जलेबी हवाओं की कैसी तो खड़खड़ाहट में पानी का गिलास उलट जाता, पुराने दीवार का पलस्तर दरककर गिरता, टूटते खपड़े ख़ामोशी में अपना गुस्सा निकालते, सारे दिन धीमे-धीमे धूल बरसता चलता, ज़माना हुआ गए मौसी को लेकिन उसकी आवाज़ गूंजती, तू किसी और गांव चला जा बच्चा!..

Monday, October 26, 2009

महाजनी पथ की घिसटती सांझ पर लड़का-लड़की..

हाथ में हाथ नहीं था लेकिन लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. चूंकि कथा है और लातखाये प्रदेश की पिटी हुई ज़बान के रंजन हेतु है, आगे ठिलने के लिए लड़की और लड़के का चयन ही अभीष्ठ था. और अच्छा था कमसिन, कोमलांगी थे, चालीस से ऊपर के होते उससे कथा के स्पोंडिलाइटिस और डाइबीटिक-व्यथा में बदलने के ख़तरे होने लगते, बेचारा हारा प्रेमातुर लोलुप मन मेडीकल ऊबटन में गंधाने लगता, श्रृंगार की सारी बहार कपूर की तरह उड़ गई होती- वैसे ही जैसे देखते-देखते हिंदी का समानांतर सिनेमा भुर्र हो गया, सन् अस्सी के दरमियान से हिंदी के राष्ट्रीय अरमान!.. ख़ैर, तो लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. उसी महाजनी-पथ पर जा रहे थे जिस पथ पहले मार्केटियर्स गए और आगे जाकर अदिदास, नाइके और रेलायंस फ्रेश की सजीली, सुरीली झांकियों में जीवन चकमत होता नहीं भी तो किसी दिन होगा ही की चमकभरी संभावना दीखती रहती. महाजनी ताप में दिप्-दिप् दमकूंगी किसी दिन की उत्कंठा में मचलती लड़की सोचती प्रेमपथ चलकर आई है उसीके आंच में मन ऐसे घनघन रौशन हो रहा है, एकबारगी चौंककर ऐलान करती, ‘कितना अच्छा लग रहा है न?’

कभी एक टीवी शो में गुलज़ार साहब के लिए ताली पीटनेवाले लड़के का मन अभी लड़की के प्यार की लपकती बिजलियों में नहीं, ऊपर आसमान में टंगे एक फ़ोन के विज्ञापन की बदलियों में खोया होता, चौंककर सिर हिलाता, ‘हां, हां, वेरी.’

और जोड़े दिखते. स्क्रिप्ट नहीं, बाज़ार की ज़रुरत में ज़्यादा सुखी दिखते, उनको सुखी देख लड़की गुमसुम फुसफुसाकर कहती, ‘लेकिन आज जल्दी लौटना है! शाम घर पर मुझे देखने आनेवाले हैं..’

इसके बाद लड़की एक कार की बंद खिड़की के शीशे में अपना सौंदर्य आंकती लड़के के जवाब की राह तकती, लड़का अन्यमनस्क हाथ के सेलफ़ोन को तकता कि आधे घंटे से ऊपर हुआ यह बजा नहीं, कैसी दुश्वारी है हम हैं मगर हमें कोई याद क्यों करता नहीं?

फिर लड़के का ध्यान लड़की के तने चेहरे की ओर जाता, ‘तुम्हें मालूम है हमारे पास समय कितना कम है?’

लड़का हारकर कुछ उसी संज़ीदगी से- जिस संज़ीदगी से राजेश खन्ना ने कभी पज़ोलिनी की कविताएं और बेर्तोलुच्ची के ‘द स्पाइडर्स स्ट्रेटेजम’ को एक नज़र देखकर उलट दिया होगा, फिर ‘द रेड रोज़’ की सुर्खी मापने लगे होंगे- इस अटके रोमान के अस्त को थाहते चोट में कहा, ‘मालूम है. एक ब्लॉगपोस्ट और एक प्यार की उम्र क्या हो सकती है!’

बाशो और हाइकू के शुद्ध अज्ञान में धंसे लड़के ने ऐसा कुछ कहा नहीं, लेकिन नहीं कहा तो भी प्रेमनहायी लड़की ज़रुर समझ जाएगी की नज़रों ख़ामोश लड़की को तकता रहा. लड़की ने भी फ्लॉबेयेर और तॉल्स़तॉय नहीं पढ़ी हूं इसका यह मतलब नहीं कि रोज़ अपने भीतर अंतर्द्वंद्व जीती नहीं की नज़र लड़के का देखना देखती रही.

एक-दूसरे के बाद लड़का और लड़की चुपचाप अपना आसपास तकते रहे. असित सेन के ख़ामोशी के राजेश खन्ना के नाव पर सफ़ेद कपड़ों में लिपटी वहीदा रहमान को उदास गाने में रंगने की तरह सांझ नज़दीक आती रही की ही तरह पोस्ट भी कहीं जाती ही होगी की एक खुशफहम भोली उम्मीद बनती रही, इतना तो बन ही सकता था, ख़ास तौर पर जब प्रेमीजनों की उपस्थिति इतनी ज़्यादा नज़दीक हो, जिनका होना यूं भी इस और उस उम्मीद की उंगली पकड़कर चलने में ही होता है..

लेकिन तभी कोई ‘मां!’ कहकर चीखा, या कि चीखा जैसा लगा, लड़की एकदम से लिखनेवाले की ओर पलटी.. लिखनेवाले ने अदबदाकर ‘पब्लिश पोस्‍ट’ पर उंगली पटकी..

पुनश्‍च: एक नज़र यहां मार लिया जाए, इसे समझने के लिए मयुरासन भी नहीं करना होगा.

Saturday, October 24, 2009

कैसी लिखाई, कहीं पहुंचाई?..

लिखो, लिखो, लिखते चले जाओ. चले जा ही रहे हैं, भौतिक रुप से कहीं पहुंच न रहे हों तो भी शब्दधन, और अंधारवन का विस्तारण तो हो ही रहा है! वैसे यह सवाल भी दिलचस्प है कि कहीं पहुंचना दरअसल कहां पहुंचना होता है? हो सकता है? कभी? उसकी एक्चुअल मार्किंग हो सकती है, एवर? जहां पहुंचना था अनिल अंबानी और शह और मात ख़ान चहुंप गए हैं या अभी और आगे गाना है? आगेवाला गाना कितना बड़ा फ़साना होता है, दो सौ करोड़, बारह, चौबीस, बहत्तपर करोड़, ऑर स्टिल मोर? ये ‘मोर’ मांगनेवाला दिल किस, किसी मोर के ठोर पर आकर कभी ठहरता है, ठहरेगा? हाऊ बिग इज़ रियली द बिग? अदरवाइज़ मन के आंतरिक कंगलेपने का यह कैसा निर्मम साम्राज्यावादी विस्ता़र है?

एनीवे, मैं लिखाई की, और लिखते-लिखते की बढ़ाई की कह रहा था, कि अगड़म-बगड़म-तगड़म ससुर लिखे जाते हैं, इनको गिरा दिया, उनको पटक दिये, अरे? सचमुच? ऐसी पहुंच है शब्दों की, ऐसे शब्दसिद्ध आप कि ऐसा भावुक भोलापन कि आप शब्दों के साथ दौड़ रहे हो और पीछे-पीछे सब सध रहा, सेटाय रहा है? चार अख़बार और तीन बहार की झलकी लेकर ‘देख लिये दुनिया, समझ गए जीवन’ का ऐसा भोथरा, चिरकुट गुमान? अंधों में काने राजा का खोखला बाजा? लिखे लिखे लिखे गए, चार पैरा के विस्तार में सत्य बिछाकर लेट गए, धन्य हुए, जानना था सब जान लिये, उसके बाद तृप्ति की एक डकार हासिल की?

विकट प्रश्न है सत्य क्या है? वह है जो लिखते, लिखे जाते उच्चार रहा हूं, और सामनेवाले के पल्ले घेले भर नहीं पड़ रहा, मुस्कियाते हुए वह उसे बुहार रहा है, एक दूसरी झुनझुनी बजाकर किसी दूसरे सुर में पुकार रहा है? मेरा सत्य ही दिन की चार मन:स्थितियों में चौदह बार बदलता है, अभी थोड़ी देर पहले का प्रमुदित मन थोड़े अंतराल पर कलुषित कालेपन में घिघियाने, सबसे आंख बचाने लगता है, तो इससे अपने सत्य के बाबत ही क्या नतीजा निकले? जो भी निकलेगा वह तथ्यत: एकमेव और संपूर्ण होगा? और नहीं होगा तो उसके अनेकमय में मेरा अपना ठीक-ठीक क्या मैं कैसे छांटूं? इज़ इट आस्किंग द इम्पॉसिबल?

मैं कौन? जो लगभग तीसेक साल पहले राऊरकेला, उड़ीसा से बाहर के ज़रा विस्तृत संसार की तरफ़ निकला? या वह जो इतने लंबे फ़ासले पर खड़ा उस पीछे को परायेपन में देख रहा है? व्हिच वन इज़ द रियल ‘मी’ एंड व्हिच वन इज़ द ‘डबल’? मैं वह हूं जो लिखने के बाद अपने लिखे को एक डिटैच्ड निर्ममता से देखने की सजगता रख सकता है, या वही, उतना भर ही मैं, मेरापन है जो अहा, अपने लिखे को लिखते आह्लादित, उन्मादित है? अब आया जाये ज़रा काम के सीरियस शबदावली पर. बार्थ साहब कहते हैं, “the writer no longer contains within himself passions, humors, sentiments, impressions, but that enormous dictionary, from which he derives a writing which can know no end or halt: life can only imitate the book, and the book itself is only a tissue of signs, a lost, infinitely remote imitation.”

ख़ैर, अदरवाइज़ सिसिफस के मिथ की कहानी है ही, एक पत्थर है हम ढोये चलते हैं, ब्लॉग है तो लिखे, ठेले चलते हैं, किसी दिन सचमुच बैठकर हिसाब करने लगें कि गुरु, कर क्यों रहे हैं तो हो सकता है हाथ-पैर फूल जायें, और ज़माने पहले अल्ला-मियां की चाकरी में गईं नानी याद आने लगें? किशोर कुमार का वह ‘पिया का घर’ फ़ि‍ल्मवाला गाना भी है ही, ‘‘ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है रंग-रुप..’’

दरअसल इस घुमड़न-बहकन का मतलब मत निकालिये, दो घंटे बाद हो सकता है ठीक-ठीक जवाब देना मेरे लिए भी मुश्किल हो जाये, इस दौड़ती लिखाई का तात्का़लिक कारण सिर्फ़ इतना भर है कि बाबू बार्थ ने (देख-देखकर दंग हो रहे हैं) काम की बहुत सारी महत्व्पूर्ण लिखाई ठेल रखी है, और साठ के शुरुआत से ही ठेलते रहे हैं, हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो वह तो हिंदी की अनोखी मेधा का एक एंगल है, हिंदी के अपने बुद्धत्व से अलग हिंदी में फिर भला क्या उपलब्ध है? अंग्रेजी में नेट से ऊपरियाया एक निबंध अभय ने हमारी तरफ़ ठेला तो हम लड़ि‍याने लगे कि तुमने हमारा इलाहाबाद के रेल का बर्थ तो ख़ैर खराब किया ही, कम से कम अब बार्थ दुरुस्त़ करो, एक समूची किताब न सही, अदद लेखन पर के एक लेख का तर्जु़मा तो कर ही दो! अभय ने दबी आवाज़ में ‘हां’ किया, दो घंटे बाद फैली आवाज़ में ‘क्यों करें?’ हूकने लगें के बचाव का बहाना बना ये पंक्तियां घसीट दीं, आप घिसटे हुए इतनी बुद्धि निकाल-संभाल लेंगे इस उम्मीद में इसे बिना दहले ठेल रहा हूं..

वैसे विनीत का ऑडियो रेकॉर्डर मिला या नहीं? उन संभावित नामों की लिस्ट भेजूं जिनके सामान की जांच में उसके पाये जाने की शर्तिया गारंटी होगी?