Saturday, January 31, 2009

एक्‍स्‍ट्रीमली सेंसुअस रोमान.. मीठा मन, बेमतलब?


पता नहीं क्‍या है कभी एक तस्‍वीर का एक छोटा मामूली टुकड़ा कि आंखों में एकदम अटक सा जाता है! रसोई की मेज़ पर धरे बर्तन की टेक, या खिड़की पर बैठी अपने पंख दुलराती, बेशऊर संसार को कैसी चमकभरी आंखों निहारती कोई चिड़ि‍या नेक.. कि आपको लगता है दिन क्‍या, दुनिया में होना सकारथ हुआ! थोड़ी देर पहले बेरुत में बसी पार्लर चलाती कुछ लेबनानी लड़कियों की ज़िंदगी के गिर्द बुनी एक मासूम-सी फ़ि‍ल्‍म देख रहा था, और एक सीन से गुज़रते हुए कुछ ऐसा अटक गया कि बैकग्राउंड ट्रैक की चोरी के बिना, ओह, रहा न गया. हालांकि तबीयत तो हो रही थी सीधे लड़कियां ही चुरा लूं, मगर तकनॉलजी ने अभी इतनी तरक़्क़ी कहां की है?..

पॉडकास्‍ट का टेक्‍स्‍ट बस यूं ही संगीत के सुर में नहाये-नहाये, बोलते-बोलते रिकॅर्ड किया गया है, कृपया उसकी भाषायी अशुद्धियां, भदेसपने का मज़ाक न बनाइयेगा..

Friday, January 30, 2009

घर में घर, मन में साहित्‍यमणि, होगा?..

(आमतौर पर ‘एम’ से इशारा ‘मर्डर’ का होता है, हिचकॉक की फ़ि‍ल्‍म ‘डायल एम फॉर मर्डर’ जैसे मशहूर साहित्यिक दृष्‍टांत इसकी पुष्टि करते ही हैं, लेकिन डायरी की वर्तमान एंट्री के नैरेटर ‘एम’ से किसी मर्डर की बजाय ज़्यादा आशय संभवत: उसके ‘मोरोज़’ होने का लगाया जाना चाहिये. कम से कम मैं तो इसी सहूलियत का सहारा ले रहा हूं..)

वापस घर लौट आया हूं (जाने की अब जगहें भी कहां रहीं? जीपी के यहां रम पीने जा सकता था, लेकिन रम से ज़्यादा उसके ठिये उसकी तक़लीफ़ों का वही घिसा जाम होता कि दोस्‍त, लंबी कहानियां बारह निकाल लिये किंतु उपन्‍यास कभी निकाल पायेंगे? और खींच-खांचकर किसी तरह निकाल ही दिया तो अपने को सर्वतत्‍ववादी समझनेवाले ये बुड्ढे उसकी हवा नहीं निकाल देंगे? बहुत डिप्रेसिंग है, यार, लिख-लिखकर रीम पर रीम काग़ज़ के निकाले जाओ, और कोई अजाना-दीवाना एक ख़ास नज़रों से देखता, मिठास में लपेट तंजभरा एक वाक्‍य कह जाता है और आपका समूचा लेखन मिनट भर में गदहे की लीद में बदल जाता है! मैं इतना गंदा लिखता हूं, एम? इतना बुरा है मेरा लेखन, टेल मी, यार?..

पूरी शाम, साला, इसी का रोना! मैं गंदा हूं, मैं महान हूं! अबे, गोबर, पहले अपनी लीद पर खुद एक राय मुकर्रर कर लो, फिर दूसरों का मुंह जोहना शुरू करना! और मुझसे तो न ही पूछा करो, उपन्‍यास क्‍या मैंने तो किसी दिन तुम्‍हारी लम्‍बी कहानियों पर एक लाईन कह दिया तो उसके बाद रम क्‍या तुम हमें रेंडी के तेल के लिए भी न पूछो? अबे, कहां-कहां के जोकर आकर अदब में भरे पड़े हैं? गोबर के ऊपर कितना भी भीमकाय गोबर रखो, रहेगा अंतत: तो वह गोबर ही?) सड़कों पर भटकते साहित्‍य की चिंताओं में सचमुच कभी-कभी दिल टूट जाता है! उसके बाद घर लौटो तो वहां भी दिल के जुड़ने के रास्‍ते कहां निकलते हैं?

वापस घर लौटा हूं, और घर वैसा ही बदरंग और बेमतलब दिख रहा है जैसा सुबह छोड़कर गया था. छोटा बेटा खिड़की का लोहा थामे लरजती नज़रों फ़र्श और खिड़की की ऊंचाई ताड़ रहा है, कि खिड़की से नीचे कूदकर हीरोगिरी छांटी जा सकती है, या वह मुंह फुड़वाने का शॉर्टकट साबित होगा; अब चूंकि बेटा मेरा है तो कैसे भला ऐसे चैलेंजिंग रिस्‍क ले ले? नहीं लेता, नीचे कूदने की जगह, नाक में उंगली से कुछ खोजने की एक नयी रचनात्‍मकता में संतुष्‍ट होने लगता है. दोनों बेटियां आपस में लड़ रही हैं, और एक अदद पेंसिल के पीछे लड़ रही हैं. निचली भागी अपने बचाव में मेरे पास आती है कि पप्‍पा, पप्‍पा, देखो, दीदी ने मेरा पेंसिल चुराया है!

मैं कह सकता हूं आखिर बेटी किसकी है, दिन भर मैं भी तो वही करता हूं! यहां-वहां से शब्‍द और बिम्‍बों की जेब काटता फिरता हूं, तेरी बहन बेचारी ने तो एक पेंसिल भर चुराया है! (ओह, तीनेक महीने पहले की बात है, जाने जीपी के यहां की खराब रम का असर था, या मेरी पिटी समझ का, भक्तिमय कुछ तमिल काव्‍यपंक्तियां थीं, उनकी चोरी तो चतुरायी से कर ली मैंने, मगर मेरे भावपूर्ण गद्यानुवाद में वह कुछ ऐसे कामोत्‍तेजक बिम्‍बों में बदल गयी कि इसका सही-सही अहसास तो मुझे तब जाकर हुआ जब एक क्रिस्‍तान स्‍कूल में बच्‍चों के बीच मेरे परचे के पाठ पर ननें मुझे पीटने को उद्यत होने लगीं! क्‍या जीवन में कवि स्‍वाभिमान के ऐसे तुच्‍छ अपमानों का सिलसिला कभी बंद होगा? फारसी के किस कवि ने कहा है कि चोरी बड़ी सुकुनदेह हुआ करती है, एक बार कर लो तो फिर ताउम्र आरामदेह हुआ करती हैं? कवि ने कहा है तो साफ़ दर्शाता है कवि आरामदेह कमरों में रहा है, जीवन की वास्‍तविकतायें उसे छू तो गयी हैं, लेकिन वह उनको छूने व उनका वास्‍तविक मर्म आत्‍मसात करने से रह-रह गया है!)..

तब तक रसोई के दरवाज़े पर बीवी नमूदार होती है, और बजाय इसके कि किसी ऐसी ख़बर से मेरा जी हल्‍का करे कि बिलासपुर या मनोहरपुर (या छोड़ो हटाओ, राजगांगपुर ही सही) में मेरी रचना का सार्वजनिक सम्‍मान हुआ है, राजकीय पुरस्‍कार की घोषणा हुई है, गंवार औरत वही वाक्‍य दोहराती है जो पिछले तेरह वर्षों से रोज़ शाम को सुनते-सुनते अब मेरे कानों में मवाद जमने लगा है! कि बैंगन के साथ कढ़ी बना दूं? जल्‍दी बन जायेगा और आप पसंद भी करते हो?.. इच्‍छा तो हुई कहूं, नहीं, स्‍त्री, पसंद तो मैं यह करता हूं कि बाथरूम की नाली के आगे तुझे पटक-पटककर तब तक पीटता रहूं जबतक मेरी देह न दुखने लगे, लेकिन ऐसा मैंने अंतत: स्‍वगत ही कहा, प्रकट महज मुस्‍कराकर अपनी ख़ामोशी को महिमामंडित करता रहा..

ओह, क्‍या मेरे जीवन के सारे प्रेम चुक गये हैं? वह महीन, कोमल, विद्युतरंग दृष्टि जो मेरी साहित्यिक उत्‍प्रेरणाओं का उद्गमस्‍थल होगा? क्‍या मन की उतृंग हरीतिमाओं में बांग्‍ला कन्‍याओं का अब फिर पुन: विचरण न होगा? क्‍या आगे का सबकुछ महज कबीर के एक दोहे में सिमटकर रह जायेगा:
जऊ निरधन सरधन कै जाई
आगे बैठा पीठि फिराई।
क्‍या सचमुच सुघड़, संस्‍कृति-सुरुचिसंपन्‍न बंगबालायें भोबिसत्‍त में हमेशा अब मुझे पीठ ही दिखायेंगी? जबकि मैं पेट देखने को तरसता रहूंगा? आह, रचनात्‍मकता में व्‍यस्‍क परिपक्‍वता प्राप्‍त करना भी क्‍या एक क्रूर दुर्योग है?

मेज़ पर ‘प्रांजल बंग्‍ला प्रेमपत्रों का सरस हिंदी गद्यानुवाद’‘क्‍या आप हूलियो सारांतिनो के साहित्‍य से परिचित हैं?’ के अनूठे साहित्‍यरत्‍न सुशोभित हो रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्‍या है उन्‍हें हाथ लगाने की मन में इच्‍छा नहीं हो रही!

(एम फॉर?.. महिषादल, मेदिनीपुर, मार्मिक, मांगलिक, मोहाबत, महावत, किंबा मरणासन्‍न?)

Thursday, January 29, 2009

उसका चेहरा..

कल वह दिखे और मैं डर गया. उनके दिखने में फूल बरसेंगे की प्रतीति यूं भी न थी, लेकिन मंच पर टीन की तलवार की रगड़धड़ गुंजायमान होगा की रोमांचकारी अपेक्षायें भी न थीं. ओह, जबकि उनका दिखना सशरीर दिखना नहीं, अचानक एक अदने फ़ोटो का सामने आ जाना भर था! अचानक फ़ोटो सामने आ गया था और उसी फुर्तीले त्‍वरित अनुपात में मैं स्‍वयं को तीन कदम पीछे और कुछ अललबम बुदबुदाता पा रहा था. मानो ड्राइंग क्‍लास के ठीक बीच में बच्‍चा अपने पेंसिल बॉक्‍स के इरेज़र को केंचुये में लिपटा, या पेंसिल पर पिस्‍सु पा गया हो! और घबराकर बेंच पर खड़ा होकर चीखने की खलबल हो रही हो लेकिन मिस चैटर्जी से पिटने के भय में कुर्सी पर मुरझाया दुबका पड़ा आह भरता तबाह हो रहा हो!

ओह, चेहरे की आदमी खुद मैनुफैक्‍चरिंग नहीं करता, साइकिल रिपेयरिंग मास्‍टर रज़्ज़ाक मियां ने इतने वर्षों पहले कहा था, फिर उनके दीखने पर मैं क्‍यूं ऐसा हलकान, हैरान हो रहा था? शुचितावादी (इस शब्‍द के लिए एक दूर शहर की मोहतरमा हैं, उनका ताउम्र आभारी रहूंगा..) हिंसा नहीं कर रहा था? सही कर रहा था? शर्म और खीझ हो रही थी कि एक चेहरे के अदद दीख भर जाने पर इतना हड़बोंग, ऐसा हाई जंप, ऐसी गोताखोरी? लेकिन फिर लगा इस व्‍यक्ति के चीकटपने, उसकी आत्‍मा के तलघर के अंधेरों को पता नहीं क्‍यों जैसे मैं पहचानता हूं, इसका यह चेहरा बॉयोलॉजिकल उत्‍पादन नहीं, इसके घटिया धंधेबाज चीकटपने से जन्‍मा इसके निजी अंधेरे का उत्‍पाद है!

गले में अटके थूक को बाहर उगल आंखें मूंदे उस चीकट चेहरे को भूल मैंने हवा में ताज़गी महसूसने की कोशिश की..

Wednesday, January 28, 2009

शाम के सितार..

रंजी सामने तिपाये के तकिये पर पैर फैलाये, सोफे में धंसी आंख पर चश्‍मा चढ़ाये गोद में मसनद दबाये किताब में फंसी थी. उसके बाजू की खाली जगह में खुद को धंसाते, शाम की उचाट ख़ामोशी के पर कुतरते, मैंने अपने मन की कही- पता नहीं क्‍या है कि किताब पढ़ती लड़कियां मुझे इतनी अच्‍छी क्‍यों लगती हैं!

- ओह, हमारी किस्‍मत!, का संक्षिप्‍त जुमला और एक सर्द आह भरने की घटिया एक्टिंग करके रंजी अपनी किताब में उलझी रही. मैंने एक बेहयायी से उसके हाथों से किताब खींच परे पटक दिया, व दूसरी बेहयायी में उसके गोद के मसनद की नरमी पर अपने माथे को जगह दिया, और बिना रंजी को इसका मौका दिये कि वह चिढ़कर मुझे नीचे फ़र्श पर धकेल दे, शाम के सितार के अपने तार छेड़ने लगा- अबे, लेकिन क्‍या चक्‍कर है कि रहते-रहते दिल गौरेये की जान की तरह दर्द में हूकता इस दीवार से उस दीवार, कभी रसोई की खिड़की तो कभी बांस पर बंधे तार के बीच हुम्‍म-हुम्‍म, सांय-सपाक् कराहता घिरनी-सा नाचता फिरता है, क्‍यों?

मेरे बालों से खेलती रंजी मुस्‍कराने लगी. मैंने चिढ़ने की अच्‍छी एक्टिंग करते उसकी फूल सी कोमल उंगलियों को परे झटक दिया- दांत मत दिखाओ, मेरी उलझन का हल बताओ!

मसनद से सिर हटाकर, फुर्ती से खुद को उठाकर, रंजी के बगल पल्‍थी मारकर किसी फ़ौजी सार्जेंट की तरह सेट करते हुए मैंने अपनी तक़रीर, गंभीर, जारी रखी- ठीक-ठाक भरा-पूरा जीवन है, तुम सिगरेट से नफ़रत नहीं करतीं न मैं तुम्‍हारे कोये-सी आंखों से, मैं भले बाज मर्तबा दांतों में जीभ दबाये दरवाज़े में चेहरा फंसाये तुम्‍हें ताकता हूं मगर सच्‍चायी है हमारे घर एक कुत्‍ता तक नहीं, न इस घर से बाहर निकलकर हमें बहुत सारे कुत्‍तों की संगत करनी पड़ती है, फिर भी, देखो, मन रहते-रहते कैसे बंजारों सा भटकने लगता है, तुम बाथरुम में गुनगुनाती दांत मांजती हो, मैं पीछे से आकर तुम्‍हारे गरदन के रोंओं में खुद को भूलने की जगह तुमसे बेहूदा सवाल करता हूं- अच्‍छा, ये ट्यून तुम्‍हें अब भी याद है?

अब रंजी नाराज़ हो गयी. मेरे कंधे में उंगली धंसाती बोली- लीव मी अलोन, अदरवाइस आई विल हिट यू!

- व्‍हॉट इज़ दिस नाऊ, मैं तुमसे एक सीरियस आर्ग्‍यूमेंट कर रहा हूं, एंड यू विल हिट मी, व्‍हाई? रंजी की आंखों में आंख गड़ाकर मैंने उसे हिप्‍नोटाइज़ करने की कोशिश की, लेकिन बेशऊर, बद्तमीज़ लड़की नज़रें फेरकर अपनी किताब में लौट गयी. मैं सिर झुकाये, फूली छाती और फटते माथे पर साइलेंटली बोंगो बजाता झख मारता रहा.

थोड़ी देर माथे में बजती चुप्‍पी के बाद मैंने कहा- एक बुरी ख़बर है, सुनोगी?

लड़की सुनती भी तो सुनना चाहती हूं जैसा कोई इशारा नहीं किया, किताब में चेहरा छिपाये रही, छिपाये-छिपाये ही कुछ देर बाद बुदबुदायी- अभी तक तो कान में मिश्री घोल रहे थे, ठीक है अब अंगार घोलो. अंबानी के बारे में फिर कोई नया सूराग ढूंढ़ लाये हो?

रंजी की कोये-सी आंखों में अपनी असहायता तकता मैंने कहा- कहीं लोकसभा के प्रोसेडिंग्‍स देख रहा था. जिन ख़बरों को राष्‍ट्रीय अखबारों में कभी जगह नहीं मिलती, ऐसे कुछ डिटेल्‍स सामने आ रहे थे. ऑवियसली दीख रहा था केवल कांग्रेस, भाजपा ही नहीं, सीपीएम तक एक बड़े घपले की लोकसभा में चर्चा के दौरान इसका मोर्चा संभाले थी कि कैसे समूचे विवाद में रिलायंस का नाम तक सामने न आये!

शाम धीमे-धीमे सरकती जाने कहां जाती रही..

Tuesday, January 27, 2009

मोदी, टाटा, मित्‍तल, अंबानी इंक एंड गांधी एट आल..

इन दिनों एक ऑनलाइन विज्ञप्ति सर्कुलेशन में है, विज्ञप्ति रतन टाटा, सु‍नील मित्‍तल, अनिल अंबानी को संबोधित है, जिनके मोदी समर्थन के खिलाफ़ विज्ञप्ति लिखनेवाले ऑनलाइन दस्‍तख़त इकट्ठा करके 30 जनवरी, 2009 सेलुलर साइलेंस दिवस के बतौर मनाने की कामना करते हैं, कि इंडिया इंक को गांधीवादी तरीके से बताया जा सके कि आपके इस फासीवादी कदम का देखिये, जनता कैसे गांधीवादी विरोध करती है! ‘तहलका’ के ताज़ा अंक में समूचे प्रकरण, व क्‍यों इस विज्ञप्ति के पक्ष में वह दस्‍तख़त का समर्थन नहीं करते, पर प्रकाशन चलानेवाले एस आनंद की बड़ी ही रोचक टिप्‍पणी है. उद्योगपति तो अपनी सहूलियत व फ़ायदे के अनुकूल आज़ादी के पहले भी आचरण करते थे, अब भी वही कर रहे हैं, लेकिन विज्ञप्ति का ड्राफ्ट तैयार करनेवालों ने जिस तरह गांधी के नायकत्‍व को अपनी ढाल बनाया है, उस नायकत्‍व में ही आनंद बड़े दिलचस्‍प अंतर्विरोधों की पहचान करते हैं. अंग्रेजी में पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं. कृपया पढ़ि‍ये, छोटा व इस मुश्किल समय में गहरी समझ का प्‍यारा निबंध है.

दरवाज़े के बाहर..

यहीं हूं दरवाज़े के बाहर गली में, सड़क के छोर शहर के इस ओर, ज़रा आगे बस्‍ती है, सब पराये हैं, कभी सुखी ज़्यादा घबराये दीखते हैं. पहाड़ी मंदिर की घंटी की टुंगटुंग नहीं, जंगली अंधेरों में एक रेल गुजरती, आगे कुछ और सटपटाये सूबे होंगे उनमें निकलती होगी, वहीं कहीं बिजली और थोड़ी हवा बचाता सफेदी पर सियाह घिस रहा होऊंगा मैं, हारे अपने जतन जोड़ता, करीने से तह करके तुम्‍हारा नाम मोड़ता, किफ़ायत से कॉफ़ी बनाता दिन-दिन खींचकर हवाई चप्‍पल चलाता, सस्‍ते दूरबीन से दायें दुनिया देखता. बायें दुनिया के उस मुहाने, बीस बहानों के आड़ तुम्‍हें खोज लेता हूंगा, ओह, कितना नेह नहाये फुसफुसाता, कि यहीं हूं दरवाज़े के बाहर..

Sunday, January 25, 2009

वीडियो की एक ज़रा सी छांह, या ऐसा ही कुछ एक मासूम एहसास..

हाथ के रोंओं को जलाती, अधबीच ट्रैफिक कभी भी गिर पड़ें के लगभग नशीलेपन का एहसास दिलाती गर्म दोपहर (जनवरी अभी खत्‍म भी नहीं हुई, और ऐसी गर्मी, यकीन होता है? मुंबई में यकीन करने, और आप किस्‍मत के मारे बाहर सड़क पर हुए तो उसे देह पर झेलने के सिवा कोई और रास्‍ता नहीं), ज़रूरी नहीं हमेशा अपने पीछे दु:ख ही लाये. कभी थोड़ी कला भी ला सकती है. या लायी है का कम से कम मुगालता तो हो ही सकता है. हो सकता है ऐसी आततायी गर्मी के असर में हुआ हो. तो कितनी कला है वह आप देखकर आप अंदाज़ लगायें.. न लगे तो हमारे हिस्‍से का एक गिलास ठंडा पानी गटक जायें..

Friday, January 23, 2009

हिन्‍दी लेखकों की चुरायी डायरी का एक असंपादित, अन्‍यतम संकलन..

किसी बांग्‍लादेशी कवि, छत्‍तीसगढ़ी दार्शनिक, या अफग़ानी उपन्‍यासकार की मार्फत ये अंतरंग रचनात्‍मक विद्युतरंग उजागर हुए होते तो स्‍वाभाविक है हिन्‍दी लेखकीय बिरादरी इन डायरियों को हंसी और थोड़ा पहले ही शुरु हो गया होली का खेल मानकर, हंसी में उड़ाती अपनी नवरचनाधर्मिता में सिर छिपाकर इस अनन्‍य अपमान को भूला देती. लेकिन चूंकि ये डायरी किसी अफग़ानी उपन्‍यासकार के झोले की जगह मुझे, एक रेगुलर हिन्‍दी लेखक को (हालांकि दिवाकरजी अब भी अपने आलोचनात्‍मक प्रबंधों में मेरी उपलब्धियां गिनाने व गहरायी में मेरे विमर्श से बचते हैं. मगर दिवाकरजी हैं कौन? सतसठ साल का बुड्ढा स्‍साला! फक दिवाकरजी!) अपने नियमित डाक से प्राप्‍त हुए हैं, इनकी विश्‍वसनीयता पर संदेह करना बेमानी हो जाता है. अलबत्‍ता डायरी में एंट्री लेखकों के नाम से नहीं है मगर फिर भी मुझे भयानक घबराहट हो ही रही है कि कहीं ऐसा न हो दूसरों की नंगई की खोलमखाली में खुद मेरी डायरी के पन्‍ने भी बाहर आ जायें! भई, स्‍वाभाविक है इतने लंबे रचनात्‍मक जीवन में कब किस मसले, व्‍यक्ति, विवाद, या रचनात्‍मकता की महीन गुत्थियों पर मैंने क्‍या चिंता की, का इतने अर्से बाद अब मैं ठीक-ठीक स्‍मरण न कर पाऊं. आखिरकार लेखक ही हूं, महापुरुष नहीं.

हालांकि दो वर्ष हुए हिमाचल बिजली विभाग ने शिमला में एक संगोष्ठि आयोजित की थी, दुबली-पतली एक गौरवर्णा कमज़ोर सी पाठिका ने अपने परचे में मुझे महापुरुष कहकर चिन्हित किया था (और दिवाकरजी ने तत्‍काल वहीं खड़े होकर बेचारी संवेदनशील कन्‍या की नासमझी [?] पर आपत्ति जतायी थी! मुझे सचमुच बड़ा गुस्‍सा आया था. अरे, एक सुघड़चित्‍त षोडशी अपने मन के झरोखे खोल दुनिया को नयी नज़रों से देखने की कोशिश कर रही है, और आप बुड्ढे, गंवार, ज़ाहिल, उसकी खिड़कियां बंद कर रहे हो? मैंने तभी सत्‍येंद्र को कहा था मुझे लगता है धन्‍वा ने ‘भागी हुई लड़कियां’ इसी खूसट, प्रेमहीन को ध्‍यान में रखकर लिखा होगा! सत्‍येंद्र ने भी कहा था छोड़ो, जाने दो, यार. अमरीका में ओबामा आ गये, और ये अभी तक बिहारी, रसखान और जयदेव का लोकचित्रण बकता रहता है? ऐसे ही लोगों से तो हिन्‍दी अभीतक बंदिनी बनी हुई है. टू हेल विथ दिवाकरजी! मैंने भी सोचा ठीक है, यार, जाने दो, हटाओ, कोई सठियाया आलोचक महापुरुष नहीं मानता है, न माने, असल बात है पाठक के अंतरंग मन में आपकी क्‍या छवि बनती है, नहीं? मगर शाम को तीन पैग अंदर करने के बाद फिर मैंने बड्ढे को घेर ही लिया! सिर्फ फैला होऊं ऐसा नहीं, सीधा-सीधी ऐसी की तैसी पर उतर आया. भाई लोग बीच-बचाव में रोकने-वोकने लगे लेकिन मैं भी ज़ि‍द पर अड़ा रहा कि होंगे अपने घर में दिवाकरजी, हमारे सिर पर पेशाब करेंगे और हम यहां साले को मुंह सिये बैठे रहें? सालभर यहां-वहां साले को सड़ांध पादते रहते हैं, चाहते हो सबके साथ हम भी उसको सुगंधि मानें? दिवाकरजी गुस्‍से में कांपने लगे कि देखिये, हमारे स्‍वास्‍थ्‍य की सार्वजनिक चर्चा में मत जाइये, हां! मैंने भी उखड़कर जवाब दिया था बहुत बिहारी, जयदेव करते रहते हैं, बेला बेलिंस्कि पढ़ा है? दिवाकरजी घबराकर पूछे बेला बेलिंस्कि कौन? मैंने चिढ़कर कहा था मुझको क्‍या मालूम कौन है, मगर आपने पढ़ा है?)..

ख़ैर, लेखक होने, अन्‍यतम प्रतिभा-प्रसूत होने का यह नुकसान भी है कि जहां एक ओर पाठकों की आत्‍मा में आपके लिए अन्‍यतम प्रेम संचित होता है, वहीं कुछ ईर्ष्‍याग्रस्‍त अंधी आलोचना आपको दु:खी भी करती चलती है. अब यही देखिये, तहलका के नववर्षांक में कोई वीरेंद्र यादव हैं, वर्षभर का पता नहीं क्‍या अगड़म-बगड़म साहित्यिक असेसमेंट किया है, जो किया है सो किया है, मज़े की बात, मेरे नाम का कहीं ज़ि‍क्र तक नहीं! ऐसे पत्रिका चलेगी? हिन्‍दी साहित्‍य? ऐसे चलेगा? चलेगा मगर फिर पहुंचेगा कहां?..

छोड़ि‍ये, इन कहानियों का कोई अंत नहीं. ऐसे ही नहीं है कि हिन्‍दी की ऐसी दुर्दशा है. डायरी में अंतरंग प्रसंगों की ऐसी-ऐसी नंगी चर्चायें हैं कि आपको पता चल ही जायेगा कैसी दुर्दशा है. मेरी बस आपसे इतनी करबद्ध प्रार्थना है कि मेरा खुद का लिखा कहीं कुछ गलती से प्रकाश में आ जाये तो मुझे तत्‍काल सूचित करके सावधान कीजियेगा, क्‍योंकि, सहृदय पाठक, आप भी जानते हैं हिन्‍दी का असल नुकसान मुझसे नहीं, दिवाकरजीओं से है.

बहुत इन लियू ऑफ़ एन इंट्रोडक्‍शन हुआ, अब सामने से हटता हूं. मैं नहीं, अब डायरी बोलेगी! आमीन!

(जारी)

Thursday, January 22, 2009

संयुक्‍त राष्‍ट्र आम सभा को एक विज्ञप्ति पर दस्‍तख़त..

यह महज इत्‍तेफाक़ नहीं है कि ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के ठीक पहले गज़ा में इज़राइल की ओर से युद्धचिराम का ऐलान हो गया. क्‍यों हो गया? इसलिए कि इस बड़े वैश्विक जलसे में उनका जनसंहार व्‍यापक ध्‍यानाकर्षण, और अमरीकी कूटनीति की असुविधा न बने. तकरीबन पांचेक लाख लोगों के बिन पानी और बिजली के संकट के रहने, व 1300 फ़लीस्तिनियों के खात्‍मे से ऐसा नहीं है इज़राइल इतने पर चुप और संतुष्‍ट बैठा रहनेवाला है. बस ओबामा की रोमानी उम्‍मीदी हवाओं के थोड़ा ज़मीन पर आकर स्थिर हो लेने की वह राह तकेगा, कि फिर नये दम से घमासान मचाया जा सके, एक बहके सांड़ की तरह गज़ा के ध्‍वंस को अपने सींग से फिर एक बार चींथ सके, तबाही मचाने और बेघरों को कैसे पिला-पिलाके मारते हैं की एक नयी, जघन्‍य तस्‍वीर बना सके..

किस अंतर्राष्‍ट्रीय कानून के तहत इन युद्ध अपराधियों को सज़ा मिलेगी? कभी मिलेगी? कैसे मिलेगी? महज बर्बर बल के बूते मसले हल करने के इस पाशविक समय में हम सच्‍चायी की नैतिकता और न्‍याय पर यकीन करें? करने का कोई मतलब होगा? नेट के मार्फ़त कुछ भले लोग मतलब ढूंढ रहे हैं, इज़राइल के युद्ध अपराधियों को सज़ा दिलवाने में आपकी दिलचस्‍पी हो तो उनकी मदद करें, यहां जाकर एक दस्‍तख़त करें, मैं अभी करके आ रहा हूं..

Wednesday, January 21, 2009

दीदी, चलो ना..

दीदी को समझाना हंसी-खेल नहीं.. न समझना.. एक बार मन बना लें, कहां-कैसे टेक लेनी है की जगह तय कर लें फिर कोई दीदी को उनकी जगह से हिला के दिखा दे ज़रा? संदेश की मिठाई, स्‍वाति पटनायक की ढिठाई किसी भी तरीके का दीदी पर असर नहीं पड़ता.. महेन लाख सिर पटके.. दाल की देगची में कलछुलभर नमक, या गुलाब के पौधे में जाकर पेशाब गिरा देने की धमकी दे.. दीदी के चेहरे पर एक लकीर तक नहीं खिंचती! जबकि इतनी बड़ी कौन-सी मांग की जाती है? ज़रा-सा बाज़ार चलने को ही तो कहा जाता है! थोड़ी देर को घर से बाहर निकलेंगी तो ऐसा नुकसान हो जायेगा? थोड़ा सा चलेंगी तो? चल नहीं सकतीं? चलो ना, दीदी, ओहो, प्‍लीज़!..

Monday, January 19, 2009

ज़ि‍न्‍दगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा, कहां से रहेगा, करने की वजह नहीं है..

अभी चार दिन पहले ही हमने रेंका था ‘कह दो बहार फिर एक बार कि दिल जले’, मगर जैसाकि एक बड़े तत्‍वज्ञानी (श्रीश्री प्रमोदपाद पुष्‍पप्रचंड) पहले कह गये हैं, और ठीक ही कह गये हैं- ‘रेंकनेवाले रेंकते रह गये, लोकतंत्र लूटनेवालों ने उसे चिरई के पाद बराबर भी महत्‍व न दिया!’ वही बात है, हम चाहे जो रेंकें, बाबू अनूप अपनी वाली मौज ठेल जायेंगे, स्‍वप्‍नदर्शी भी कहलाने को ही स्‍वप्‍नदर्शी होंगी, हम सपने की लिखेंगे वह यथार्थस्‍पर्शी होने लगेंगी! ऐसे ही नहीं है कि हम सुबह-सुबह अचकचाकर ‘फिर वही शाम वही ग़म वही तन्‍हाई है’ गाने लगते हैं, जबकि हमें भी मालूम होता है संझा दूर है और सुबह-सुबह तन्‍हाई है, अच्‍छी बात है, कौन हम यूएन की बाईस सदस्‍यों की आपातसभा के बीच गाज़ा पट्टी के सवाल पर सिर-फुटव्‍वल की कामना कर रहे हैं. हां, ग़म ज़रूर है, कि इतने साल से हम गाज़ा-गाज़ा कर रहे थे अब देख रहे हैं कि बीबीसी हमारी बांह उमेंठकर अपने वेबसाइट पर उसे गज़ा कह रहा है. फिर दूसरा ग़म यह है कि कल दोपहर किसी मित्र के यहां से रसानंदनुभूति के बाद अपनी कुटिभृकूटि लौटे हैं तो देह लग रहा है चार हिस्‍सों में बंटकर अलगनी पर टंगा हुआ है और कराहकर दर्द ज़ाहिर करना चाहते हैं लेकिन मुंह से आह नहीं तलत महमूद छूट रहे हैं!

तलत महमूद के पीछे-पीछे बर्मन बाबू भी निकल रहे हैं. ‘वहां कौन है तेरा, जायेगा कहां, मुसाफिर..’. बोकारो से पारुल बोल रही हैं सही बात है, ‘वहां’ काहे ला जा रहे हैं, मत जाइये, बोकारो चल आइये. पारुल से पूछे बोकारो में किताब की दुकान है? म्‍यू‍ज़ि‍क-ट्यूज़ि‍क की? तो जवाब देने की जगह पारुल बोलने लगती हैं ठीक है, मत आइये, चूल्‍हा में जाइये! मैंने कुछ नहीं कहा. क्‍या कहता कि चूल्‍हेवाली उपमा मत दो क्‍योंकि बाबूजी सारा जीवन ब्‍लास्‍ट फ़र्नेस में ही नौकरी बजाये हैं, तो चूल्‍हावाला ताना देकर हमको डराओ मत..

ओह, शब्‍दों के भेड़ उत्‍तर की तरफ़ हांके लिये चलता हूं और आप कहते हैं अहा, दक्खिन कितना सुहाना सज रहा है! मैं सारंगी के तार पर डंडी फेरता हूं और आप उसमें सुरबहार का सिंगार ढूंढ़ लाते हैं. शायद मेरा ठीक-ठीक लिखना और आपका उसे ठीक-ठीक समझ लेना कभी वैसे ही संभव नहीं होगा जैसे सलिल चौधुरी के ऑर्केस्‍ट्रा में बाबू महेंदर कपूर को बिठाकर ‘कोई होता मेरा अपना..’ गवाना? या सचिन दा का ‘लाख मनाले दुनिया, साथ न ये छूटेगा..’ ? छूटेगा के पहले सोचनेवाली बात है कभी बनेगा? साथ? सही? कभी रफ़ी साहब उमगकर गा सकेंगे ‘जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है..’ ? आप पूछने लगियेगा साहब सविता के बारे में गा रहे हैं कि सुनीता के बारे में? सूफी गा रहे हैं, या फूफी को याद कर रहे हैं नहीं सोचियेगा. हद है. सच्‍ची. ऐसे ही नहीं है कि मैं लिखने पर मज़बूर होता हूं प्‍यार, शब्‍द दो-चार, किस काम के, दाम के.. ! रफ़ी साहब के पीछे-पीछे मुकेश मियां भी पहले कह ही गये हैं ‘दोस्‍त दोस्‍त ना रहा, प्‍यार प्‍यार, ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा, कैसे रहता, क्‍यों रहता’..

(ऊपर, पता नहीं कहां से बेभार ली गयी फ़ोटो है, सारंगी की है, कहने की ज़रूरत नहीं, समझदार आप पहचान गये ही होंगे)

Saturday, January 17, 2009

प्‍यार, शबद दो-चार, किस काम के, दाम के..



काश मेरे शब्‍द तुम्‍हारे फटियारे दिनों का कपड़ा हो पाते. भूख में कुम्‍हलाये, पपड़ाये होंठों पर रंगों नहाये, कुछ ओह, नारंगी बहार बनते, मन के गहरों में उमगती, कहां-कहां तक तो उतर गयी, सारंगी सितार बनते. इतना तो इतना तो इतना तो संगीत लरजता कि छींट के मलिनियाये सूती परदे पर मुरझाये नीले फूल की पंखुड़ि‍यां थिहरने, कांपने लगतीं, बरामदे के मुहाने पर रखे लोहे के जाले में कांसे की कटोरी नम आंखें अपनी ढांपने लगती. मेरे शब्‍द तुम्‍हारे दु:खियारे दिनों के अकेले सुनसान की सुकूनदेह सड़क, रिक्‍शे की उठंगी फैली सवारी, मुश्किल दिनों में अखबार के नीचे जाने कब दबाकर रखी और अब अचानक पा लिये थोड़े रुपये और ओह, कैसे तो आह्लादकारी रेजगारी होते. निकलते घनी बारिश के बाद के आसमान की तरह, फड़फड़ाते नन्‍हें परों को गरदन के नर्म रोंयें सहलाते काश मेरे शब्‍द तुम्‍हें टहल घुमाने निकलते, पूरे रास्‍ते तुम ठिहलतीं, नये पत्‍तों की मानिंद फुनगतीं, ओह, कित्‍ता कित्‍ता कित्‍ता कित्‍ता सारा तो हंसती चलतीं. काश.

Friday, January 16, 2009

बच्‍ची के साथ घूमना..

बच्‍ची बच्‍ची थी ज़ि‍द पर अड़ी रही घूमने जायेगी. मैंने कातर होकर समझाने की कोशिश की इतनी समझदार हो क्‍या ज़रूरत है घूमने की, फिर मैं खुद घुमा हुआ तुम्‍हें खाक़ घुमाऊंगा? ऐसा भी नहीं कि बच्‍ची ने हमारे बालों में तेल लगाया था, कंधे, कमर पर मुक्‍की मारी थी कि हम पर उसकी ईनाम की देनदारी हो. नहीं. फकत बच्‍ची थी, और हम उस बचपने के मारे थे, बदमाश उसका बेजा फ़ायदा उठा रही थी. बीच में बरजकर मैंने कहना चाहा फुदको मत, घूमना, दुनिया देखना मज़ाक नहीं. बड़े-बड़े इस नाव और उस जहाज चढ़े कहां-कहां उड़ते रहे, सुल्‍तानों से मुलाक़ातें की, मोटी पोथियां लिखकर भुलावे में रहे दुनिया नाप ली है, जबकि घरवाली की आंखों के भाप को तापने की काबिलियत होती तो जान पाते ताउम्र क़ायदे से एक जोड़ी आंख नहीं घूम पाये, बाकी घूमना गाल बजाना, झंडे घुमाना, धंधा फैलाना था, दुनिया जानना कहां था?

सोने के पहले दवाई की गोलियां निगलने के ठीक पहले कोई बिल गेट्स से पूछे दुनिया कितनी समझते हैं, ज़्यादा संभावना है आदमी समझदार हुआ चुप रहेगा, जवाब देने की जगह दूसरी दवाइयां खोजने लगेगा. जूनियर बुश समझदार नहीं हैं, बहुत दुनिया घुमायी की, मगर कितना उसे जानते थे वह दुनिया तो देख ही रही थी, आते-आते एक मुकाम पर अमरीका भी देखने लगी..

बच्‍ची बच्‍ची थी ज़ि‍द पर अड़ी रही घूमने जायेगी, दुनिया देखेगी. अब मैं क्‍या बताता हंसी-खेल नहीं है देखना. दुनिया. देखी ज़माने की यारी वह सब ठीक है लेकिन आदमी देखी दुनिया सारी गा रहा हो तो उसकी मीमांसा करने की जगह समझ लेना चाहिये थेथरयी गा रहा है, और हद से हद बंदे ने बिलासपुर देखा होगा, भ्रष्‍ट ससुराल और दलाल ससुर की सिर पर छतरी हो तो संभवत: बरेली से भटकता बंबई तक भी पहुंचा होगा, मगर जनाब बास्‍को सुदामा का वही केप ऑफ गुड होप होगा, उसके आगे थेथरयी होगी, दुनिया का तत्‍वज्ञान नहीं.. एक मौका मेरे हिस्‍से भी आया था. देखने का. चुन्‍नी का होश खोयी दीवानी लड़की ने अपना हाथ हमारे हवाले करके कहा था लो, देखो, पढ़ो इसमें अपनी ज़िंदगी! मगर वह उम्र रही होगी, लड़की के हाथों अपनी ज़िंदगी पढ़ने की जगह मैं लड़की के दांतों की कैवेटिज़ पढ़ने की ज़ि‍द पर अड़ गया, और बात, फिर कुछ वही बास्‍को सुदामा जैसी होपलेस सा कुछ हो गयी थी..

बच्‍ची को मैंने समझाने की कोशिश बाबू, हमने कुछ गांवों की टहल की है, कुछ शहरों से गुजरे हैं, रेलों से खाली हो चुकने के बाद चंद छोटे स्‍टेशनों का खाली, बेमतलब उजाड़लोक याद है, कुछ घरों की दीवारें, घुटने पर थाली लेकर रात का खाना और सुबह मसहरी हटाकर दुधाइन-जलाइन चाय पीना.. अपने बेहूदा मज़ाकों पर भोलेपन की हंसियां, और अपनी भोली हिंसा में किसी का जार-जार रोना याद है दुनिया घूमना नहीं याद है, सच्‍ची, हम दुनिया कहां घूम सकते थे, कभी नहीं घूमे..

बच्‍ची हुमसती पैर पटक रही थी, हौल-डौल मचाये थी. आदमी भले किसी लड़की के हाथों में अपनी ज़िंदगी पढ़ने से रह गया के परले दरजे के स्‍तरवाला बेवक़ूफ़ हो, रूखा, हिंसक हो, मगर एक सांवली, तेल को तरसती बालोंवाली, गजर-मजर दो कौड़ि‍या फ्रॉक पहने बच्‍ची की ज़ि‍द को जीत सकता है? बच्‍ची की उंगलियां थामे पीली घास पर बहकता मैं ढलान पर कुछ आगे तक गया. ठीक सामने एक भीमकाय वृक्ष था; उसके आगे पहुंचते ही बच्‍ची एकदम से अटक गयी, रुको, रुको की चपलता के बाद बड़ी-बड़ी आंखों से वह अपहचाना बड़ाकार तकती रही, मचलकर पूछी ये क्‍या? मैंने जान बची लाखों पाये वाला थोड़ा मुस्‍कराकर, मगर सच पूछें तो नज़र बचाकर जवाब दिया- दुनिया है, यही तो है!

बच्‍ची आखिर बच्‍ची थी और मैं भी आदमी सा आदमी, क्‍या जवाब देता?..

Thursday, January 15, 2009

कह दो बहार फिर एक बार..

आप कहेंगे इस कठुआये जाड़े में बहार? मतलब क्‍या, भई?.. लेकिन फिर मैं कहूंगा कलकतिया पीरहरंकर भैया बता रहे थे पसीना पोंछ रहे हैं तो सुनकर मैं भावुक क्‍या होता, शर्मिंदगी में उसिना चावल की तरह खदकने लगा.. फिर भावुकता के ऐसे पसीनाप्रसावन समय में बहार की सोचने लगूं तो आपको क्‍यों, हमारी एक्‍सों को भी शिकायत नहीं होनी चाहिये.. एक बात यह भी है, बंधु, बात हो रही है तो इसे यहां याद कर लेना बेमानी नहीं होगा, कि ज़रूरी नहीं एक बिहारी हमेशा बिहार की ही में अझुराया रहे, बहार की सोचे न पाये? पॉलिटिकली ही नहीं, कल्‍चरली भी करेक्‍ट होगा?..

फिर ऐसा भी रोज़-रोज़ थोड़े होता है कि उत्‍तरी अफ्रीकी जैज़ एनसांब्‍ल बैकग्राउंड में रहे और फोरग्राउंड में मुझे चमकने दे? मगर फिर, पतनशील प्रतिभा दिल्‍ली, कलकत्‍ता, मद्रास में ही अपना जलवा दिखाये ऐसा भी किसने कहा है, बहकते-बहकते दिख रहा है कैसे अफ्रीकियों को भी उसने छका-नचवा दिया है.. एनीवे, इस लिंक पर जाकर आप भी पतनशील पराक्रम का प्रसाद पायें.. कह दो बहार फिर एक बार, अहा, अहा! जाइये, जाइये, छुच्‍छे हियां गोड़ मत हिलाइये, लिंकवा पर सुनके क्षुधितमन को मुदित, प्रमुदित करिये..

Wednesday, January 14, 2009

शोर करती ख़ामोशी..

लिखना चाहता हूं.. लेकिन चुप भी रहना चाहता हूं.. सच कहूं तो चुप रहकर चुपके से लिख देना चाहता हूं.. लेकिन चुपके से लिख देने पर चुप रहना बना रहता कहां है.. मगर नहीं लिखकर भी बना रहता है? ह्राबाल ने लिखा नहीं है इतना सारा शोर करती ख़ामोशी? सीधी बात है चुप रहना चाहता हूं लेकिन चुप रहना ऐसी सीधी बात नहीं.. बड़ी बात है सीधा कुछ नहीं, द्वंद्वात्‍मक होता है.. फिर मैं तो यूं भी सीधा नहीं.. टेढ़े से सीधे की तरफ़ आने की कोशिश में पता नहीं कहां, कितना ऐंड़ा-ऐंठा होता रहता हूं.. बहुत बार बात इतनी बिगड़ जाती है कि लिखना असम्‍भव हो जाता है.. मगर चूंकि टेढ़ा हूं तो अलिखनीय की टेढ़े पड़े-पड़े की असंभवस्‍था को ज़रा और टेढ़ा करके लिखसकनीय अवस्‍था की तरफ़ मोड़ देना भी बाज-मर्तबा संभव हो जाता है.. चहककर धकापेल मचाते हुए फिर लगता है इतनी ठेलमपेल करना ज़रूरी है? आंख झपकते वॉग्‍नर बजाना.. ज़रूरी है? रहते-रहते ख़ामोशी की सिम्‍फ़नी सेट करने का कौशल नहीं होना चाहिये? शोपें. शुबर्ट. साइलेंस. साइलेंस!..

लेकिन फिर यही मज़ा है कानों में किसी गुमनाम स्‍टेशन पर छोड़ दी गयी लावारिस रेल के लोहे पर धीमे-धीमे गिरती बारिश की आवाज़ गूंजने लगती है. उसको भूलने की कोशिश करता हूं तो फिर कमरे का बेहया पंखा अपनी घर्र-घर्र के शोर में चीखकर सवाल करने लगता है कि मेरा क्‍या. कंप्‍यूटर बिना खोले की-बोर्ड पर बजती उंगलियों की घस-घस सुन पड़ती है.. जबकि उंगलियां छाती पर शरीफ़ बच्‍चे सी बेहरकत, स्थिर बंधी होती हैं.. लेकिन कनपटी पर फिर कुछ खट-खट दौड़ने लगता है.. बंद कंप्‍यूटर के अंधेरों के बावज़ूद वर्ड की खिड़की खुल अपनी सफ़ेद चुनरियां लहराने, शंकर हुसैन फ़ि‍ल्‍म की लता का वो अचानक अस्थिर कर देनेवाला गाना ‘अपने आप रातों में..’ सुनाने लगती है..

ओह, मैं चुप रहना चाहता हूं.. या कहिये लिखते हुए चुप हूं जैसा कुछ दिखना चाहता हूं.. आई नो इट्स आल एब्‍सर्ड, इट्स आस्किंग टू मच.. लेकिन फिर यह भी सही नहीं है कि आई ऑल्‍वेस सेड दैट आई विल बी आस्किंग टू मच? आह, व्‍हॉट अ ट्रैप.. थोड़ा साइलेंस नहीं हो सकता?.. या नॉयस?

(ऊपर काली-सफ़ेद तस्‍वीर: बाबा बाहुमिल ह्राबाल)

Sunday, January 11, 2009

संडे सड़ंगी..



संडे सड़ंगी धिड़िंग-धिड़िंग, पिड़िंग-पिड़िंग, रामा हो रामाs..

आरे मोंकू बुझिबे नाहीं गंजाम जिलार बाबूलाल साड़ंगी वाकि
बाजा बाजैय्या पंडित रामनरायनर सरंगी, मूं हेलि खाली
शुद्ध खांटी संडेर बाजा बजना संडे सड़ंगी, हे रामा हो रामाs..

काम कै-कै मन कच गया, लिख-लिख-लिख हाथ खेंच गिया
अईना देख सिंगार करते, छींट का परदा तान बहार करते, हो
रामा उनसे बतियाते इनको बताते अरे, देखिये न जी, सोहाना है
मालिक, अट्ठाइस कैरेट का सोगहग सोना बहुतै पोराना है, हो
असमान छू लेगा जमीनी जीत लेगा खिल-खिल दांत देखाते
बिलागबानी का नवका उमंग में किलिर-किलिर रंग भरते
पसंद का तरंग में उड़ि‍-उड़ि‍ पतंग बनते, रामा हो रामाs?..

बियफे चोन्‍हाते गांजा धुंआते बुध कचहरी को जूता लगाते
मंगल सलीमा जाते, जी, सोम शिवाला में पीपल का पाता
सजाते शनिचर भऊजी को असपताली चंहुपाते, शुक सजाइल
सेंटाइल फुलमति का परेमधन न पाते, जी, हो रामा हो रामाs?..

संडे सड़ंगी धिड़िंग-धिड़िंग, पिड़िंग-पिड़िंग, रामा हो रामाs..

Wednesday, January 7, 2009

पुरबिया फुटानीबाज का मेहराइल फन्‍नी-टे‍रजिक गीत



आइये महराज, लगाइये लात, घबराइये नहीं
कुच्‍छौ न करेंगे, छाती कपार पर चहरना
छोरिये, मालिक, आपका बालो न बरेंगे
हमरा हैसियत है, जी? मारिये-मारिये,
लजाते काहे ला हैं, घूम के मारिये
घुमाके मारिये, जवने से हो तवने
सहूलत से मारिये, हमको पिरेक्टिस है
लात खाने का ठाढ़े-ठाढ़े ढिमिलयाने का
हंसी-हंसी बल्‍ल देना बलुका बहाने का
थारी का दू गो रोटी अऊर चार ठो आलू पर
रेती-पानी गिरवाने का, गंजवाने का, आदत है
लजाइये नहीं, लात चलाइये, आपको हक बनता है
आपपे शोभाता है, हम लात खाते शोभाते हैं
दुनिया का पुरनका दस्‍तूर है कुछ लोग अपना
गोड़ का सुन्‍नरता परखने बास्‍ते लात फैलाते हैं
कुछ लोग जांगर का चिलैंजिंग में लाती का
परसाद पाते हैं, भरभरुआ माटी का मकानी
जइसन भर्र-भर्र ढहल जाते हैं. घरइल गोड़ का
सुन्‍नरता का परीच्‍छा होता है, अऊर हियां चमइल
चाम का कसावट का जंचाइल होता है, न-न, मालिक
लजाइये नहीं, खुलके चलाइये, ई देह आपही का है
हम थेथर हैं थुरावन परसाद हैं कचरलका कादो हैं
आगा-पीछा दायें-बहिना जेने नीमन लगे, धन्‍न
कीजिये, आतमाभर सजाइये, मनभर लात लगाइये.

मत पूछो रंग..


मुंदी आंखों पर मरी मकड़ि‍यों का जाल होगा, उंगलियां रह-रहकर कांप जाती होंगी कि इतना तो हिल गयीं अब और उम्र क्‍या चाहती है, देह बिन बताये कभी हौल जाता होगा जैसे बाढ़ में भसा गांव डोलता है लम्‍बी रात, पोर डुगरते-सिहुरते बैठते होंगे अपना हिसाब करते जैसे ठंड में सन्‍न पटरियों पर टूटे पहिये बजाती बूढ़ी कोई रेल खरड़-खरड़ करती नापती होगी अपनी उम्र काले-रूखे पहाड़ी रस्‍तों पर. और पहाड़ चुकता न होगा और पहाड़ चुकता न होगा रात बीतती न होगी, ठंडीले कांटें सपरते न होंगे उखड़ी सांस सम पर लौटती न होगी, और तक़लीफ़ों में नहाया हकलाया जुसेप्‍पे आह भरकर पूछता होगा ये कैसे दिन हैं आसमान का रंग क्‍या है? मैं सूती के सस्‍ते चादर में मुंह छुपाये धीमे-धीमे गिनता होऊंगा एक-दो-तीन-तेरह-तीस फिर फुसफुसाकर बुदबुदाता होऊंगा मन का रंग?

Friday, January 2, 2009

भू‍मैटिंग* : एक पैस्‍टोरल, बेमतलब..

करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ..’, खड़खड़ि‍या हीरो-हौंडा सैकिल पर भिलैनी का खड़खड़ केरीकेच्‍चर जैनरायन भुइंया. सैकिलिया साला पीछे चल रहा है और जैनरायना का म्‍यूजिक आगे दौड़ रहा है!

सगरे अंजोर है जवानी फूट रहा है, जबकि जवानी का दहलीच पर- पुरनका बेमतलब साबुन का पाथर में बदल गईल- कीच जइसन ठाड़ा होके निऊनिया आंख में धुंआ अऊर जिन्‍नगानी में करीखा पोत रही है. तब ले चूल्‍हा में गुल का गोली सजा रही है, गोईंठा तोर-तोर के गोबर हो रही है, आंख से लहर-लहर बहके गाल पर लोर सेटिल हो गया है, लेकिन बेचलित्‍तर चुल्‍हवा का आगी सेटिल नहीं हो रहा..

करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ..’ जैनरायना चुपायेगा नहीं, हो? लछमी टाकी से सलीमा देखके लौट रहा है? मगर लछमिया त् बन्‍न है, हुंआ डकैती हुआ था न जी? टिकिस, नवका फिलिम का पोस्‍टर, टारच-सारच सब गमछा में बांधके, अऊर सगरे इस्‍टाफ को लैटरीन में लाकिंग करके, डकैती पाल्‍टी रेक्‍सा में हाजीपुर का डैरेक्‍सन में फ़रार हो गया था, न हो, बदरुद्दीन?

बेबी कुमारी लंगटा छौंड़ा का देह में खींचके गंजी पहिना रही है. छौंड़ा नाक से पानी छोड़ रहा है. अभी दू मिनिट पहिले नाली में झाड़ा छोड़ रहा था. –‘अऊर खा, हरामी, चाना का भुंजा!’ कान्‍हा पर संड़सी मारते हुए महतारी ने गुस्‍सा दिखाया था, अभी दू मिनिट पहिले. अब दुलार बहा रही थी- ‘हमरा नीमन बेटा है, हमरा राजा बेटा है! इस्‍नो-पौडर कैके हमरा राजकुमार सारुख हो जायेगा, न बिसुन बेटा? तनी कड़ू का तेल मल दीं?’ –‘नै!’ बच्‍चा चिंहुककर अपनी महतारी से अलग होता है..

करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ.. दोना भर जलेबी दिहले जइह ऐ करेजऊ..’ जैनरायना जाने कवन लहर का असर में अइसा लहरीदार तान छेरे है!

पीछे-पीछे कांधा पर बैल का पुरनका पगहा गिराये शंकर मंडल का मैट्रिक फेलियर छौंड़ा छेरता है- ‘हे जैनरायन भइय्या, सैकिलिया के चक्‍का में हावा नै है, ऊ नै लौकीस है, खाली दोनवा का जलेबिये लौकता है?’

- ‘खाली सैकिलिये में काहे ला, बाबू? कंहवा-कंहवा देखें कि हावा नै है? अऊर देखने लगेंगे त् करेजा से गाना बहिरियायेगा, हो? कुच्‍छौ नै लौकेगा, तूहो हावा हो जाओगे, हं! करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ, करेजऊ.. दोना भर जलेबी दिहले जइह ऐ करेजऊ..जियरा उजियारा भरले जइह हे, करेजऊ!’ खड़खड़ि‍या खड़खड़ाती जाती रही.. आत्‍मा में कैसे सूराख़ बनाती रही?

( *भूमैटिंग: ऐसी अव्‍यवस्थित, अस्‍वस्‍थ्‍य क्रिया जहां भू अकबकायी आस-पास जो हाथ आये, जिस शक्ल में आये, उससे भेंट करने लगे, लहालोट लोटमलोट करने लग जाये, उससे भी थके नहीं, फिर हारकार मेट करने लगे.)

Thursday, January 1, 2009

सॉर्ट ऑव प्रेमपत्र टू द हिंदी आई नो..

सॉर्ट ऑव इसलिए कह रहा हूं कि एकदम प्रेम जैसा प्रेम आप समझते होंगे, मेरी समझ में अब बहुत नहीं आता. वक़्त ने किया क्‍या हंसीं सितम जैसे गानों का न हंसीं समझ आता है, न सितम. तुमको देखा तो ये ख़्याल आया, ज़िंदगी धूप तुम घना साया में ज़िंदगी का धूप होना तो समझ आता है, तुम कहां से घंटा ऐसा क्‍या घना साया हो जाओगी कतई समझ नहीं आता. मगर, चूंकि प्रेम करनेवाले पागल होते हैं, उल्‍टा और पुल्‍टा सब सही-सही समझकर ही बेलिमिट में कहते और करते हैं, करते रहें उनकी ज़िंदगी है, मैं लिमिट में पीने की ही तरह लिमिट में प्रेम का भी तत्‍वज्ञान जान गया हूं, तो प्रेमपत्र भी वैसा ही लिख सकूंगा- सिर्फ़ इतने की सफ़ाई दे रहा हूं (ले कौन रहा है पता नहीं, बट व्‍हॉटेव्‍हर..). लेकिन सवाल उठता है यह सॉर्ट ऑव प्रेम भी क्‍यूं? व्‍हाई? हूं.. शायद इसीलिए कि आज सुबह नहीं, कल रात ही से मन कैसा तो अलसाया-अलसाया-सा है, कुछ करने की इच्‍छा नहीं हो रही. वैसे ही जैसे प्रेम में अलसाया, बेचैन कुछ न करें, बस बैठे तड़पते रहें का एक ठहरा-सा सस्‍पेंस तना रहता है. लगता है जाने किस-किस तरह के सनसनीखेज़ वाक़ये अनछुये, अनघटे दहलीज़ पर गर्म सांसें भर रहे हैं, कभी भी कुछ का कुछ हो जायेगा, और न हुआ तो जान चली जायेगी, और इसी तरह के जाने कैसे-कैसे के फ़ि‍जूल के ड्रामायी ख़याल, और दिन है कि अपने अनड्रामायी सुर में चुपचाप बीता चलता है. वैसे ही जैसे प्रेमीमन कलपता कैसे-कैसे तो आग में भुनता रहता है, और प्रेम- डिटैच्‍ड, इन अ मैटर ऑव फ़ैक्‍ट वे- चुपचाप गुज़र जाती है. हिस्‍टरी. पीरियड, लगभग ऐसा-वैसा-सा ही कुछ, नहीं? सॉट ऑव? ख़ैर, दैट वॉज़ द इंट्रोडक्‍शन..

गया, नया, व्‍हॉटेव्‍हर.. हू केयर्स ऑव ब्‍लंक्‍चुयेशन.. नॉट मी फॉर श्‍युअर. नॉट इवन फ़ॉर स्‍टैंडडाईर्ज्‍ड हिंदी.. मी डोंट केयर, स्‍वीटहार्ट, स्‍टैंडडाईर्ज्‍ड हिंदी गयी तेल लेने. ऑर व्‍हॉटेव्‍हर लेने. एंड आई शुड नॉट इवन बी लुकिंग बैक इन एंगर, ऑर सरप्राइज़.. कंटेप्‍लेटिंग, पॉंडरिंग, क्‍लैरिफ़ाइंग क्लिनींग माई थॉट्स.. बट व्‍हॉई? ओह, लेट इट बी, ना? देखने और समझने को कितनी और जगहें हैं, मालूम नहीं कितना समझ आयेंगी, बट वन विल एटलीस्‍ट ट्राई टू ग्रेपल विद् इट.. वंडरिंग, प्‍लीडिंग.. कम इन माई ग्रिप, बेबी, कम, कम.. प्‍लीज़?

मन के शीशे पर सवालों की भारी बूंदें बजती रहेंगी, किस ज़बान में बज रही हैं उसे परमासिर भ्राष्‍टव अपनी हिंदी में पहचानकर विरेचित कर लेंगे, व्‍हॉई इट हैज़ टू कम सो ईज़ी एंड सिंपल? ईज़ इट रियली दैट सिंपल? ऑल्‍वेज़? फिर मन का वह छितराया-पसराया अनप्रोसेस्ड, अनगढ़ संसार छत्‍तीसगढ़ के किसी छोटे स्‍टेशन उतरकर कचारु के सोमारु के किसी छोटे झारखण्‍डी गांव में टहलने निकल जायेगा तो परमश्री उसे फिर भी श्रीश्री रामचंद्र शुक्‍ल व डॉक्‍टर नगेंद्र व नंददुलारे बाजपेयी के सेट चश्‍मे से सेटल कर लेंगे ही? ऑल्‍वेज़? एंड इन इट्स ऑल कॉम्‍प्‍लेक्‍स एंड वाईडर सोशल-लिंग्वीस्टिक कॉनोटेशंस? इतनी समर्थ, व समझदार है वह पुराना घिसा चश्‍मा? आई वंडर. बट ओन्‍ली फ़ॉर अ मोमेंट. बीयॉंड इट, आई डोंट इवन केयर. देखने को दूसरी चीज़ें हैं. समझने को. एंड आई वुड गो ऑन लुकिंग. एटलीस्‍ट आई वुड विश टू. नया, पुराना, व्‍हॉटेव्‍हर..

भाषा के किसी बने-बनाये खांचें में क्‍यों लटके रहें? जिस हिंदी ने स्‍कूलों में हमें शिक्षित, व हमारे संस्‍कारों को दीक्षित किया, उस भाषिक पहचान, राष्‍ट्रीय अभियान की, बहुत अर्सा हुआ, हवा निकल चुकी है. यह यूं ही नहीं ही है कि नाम लेने लायक एक राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक, पाक्षिक पत्रिका तक नहीं है हिंदी के पास. इसीलिए नहीं है कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ऐसे किसी सेतु को खड़ा करनेवाली समझ व समाज हिंदी के पास नहीं है. क्षेत्रीय क्षत्रप हैं, वह अपनी छोटी फ़ौजें जोड़ते व तोड़ते रहते हैं, मगर मूलत: वह हिंदी से खाया-खिलाया-चलाया जा रहा बाज़ार है, विचार नहीं. हिंदी का वैचारिक संसार किसी किताब की पांच सौ कापियां छाप ‘सारे समाज पहुंच गये’ की मीठी डकार भरता है, और छपाई दो हज़ार की संख्‍या पार की तो लेखक महोदय सफलता की चरम ऊंचाइयां छूकर लगभग बेहोशी प्राप्‍त करने लगते हैं. जिन्‍होंने कभी अपने बच्‍चे को हिंदी माध्‍यम स्‍कूलों में भेजने को सोचा न होगा, हिंदी के नाम पर थू-थू, चप्‍पल पात करने लगते हैं. कौनवाली हिंदी का विचार पता नहीं इन गुणीजनों के मन में कितना घूमता होता है. हिंदी का वैचारिक लोक ऐसी ही हवाई चिंताओं, व हवाई लड़ाईयों का लोक है. सडेनली गेटिंग आऊट ऑव इट्स पैंट्स, देन टेकिंग टू मच टाईम टू कूल डाऊन. ख़ुदा ख़ैर करे. या जिस किसी को करना हो.

स्‍कूलों वाली स्‍टैंडर्डाईज़्ड हिंदी तो गयी, बहुत समय हुआ गयी. अब रहेगी तो वर्णसंकर, हमारी तरह का करर-करर कंकड़ ही रहेगी, डोंट यू थिंक सो? फ़ॉर गॉड्स सेक, माई फ़्रेंड, ग्रो! आयम सेइंग इट इन द ट्रू स्पिरिट ऑव केयर एंड लव, यस, फ़ॉर यू, एंड फ़ॉर माई फेयरी हिंदी!

और हां, रोते-गाते, थोड़ा थकते-थोड़ा मचलते-बहकते, कभी-कभी समझते भी, जाने कैसी तो उलझी व्‍यथा-टंटा-मुहब्‍बतों में महकते बेचारे मंदी के नीचे मेहराये-पिराये साल में आपका समय ठिलता-ठेलता ठीक-ठाक गुज़रे. हमारी प्‍यारी शुभकामनाएं.