Thursday, January 1, 2009

सॉर्ट ऑव प्रेमपत्र टू द हिंदी आई नो..

सॉर्ट ऑव इसलिए कह रहा हूं कि एकदम प्रेम जैसा प्रेम आप समझते होंगे, मेरी समझ में अब बहुत नहीं आता. वक़्त ने किया क्‍या हंसीं सितम जैसे गानों का न हंसीं समझ आता है, न सितम. तुमको देखा तो ये ख़्याल आया, ज़िंदगी धूप तुम घना साया में ज़िंदगी का धूप होना तो समझ आता है, तुम कहां से घंटा ऐसा क्‍या घना साया हो जाओगी कतई समझ नहीं आता. मगर, चूंकि प्रेम करनेवाले पागल होते हैं, उल्‍टा और पुल्‍टा सब सही-सही समझकर ही बेलिमिट में कहते और करते हैं, करते रहें उनकी ज़िंदगी है, मैं लिमिट में पीने की ही तरह लिमिट में प्रेम का भी तत्‍वज्ञान जान गया हूं, तो प्रेमपत्र भी वैसा ही लिख सकूंगा- सिर्फ़ इतने की सफ़ाई दे रहा हूं (ले कौन रहा है पता नहीं, बट व्‍हॉटेव्‍हर..). लेकिन सवाल उठता है यह सॉर्ट ऑव प्रेम भी क्‍यूं? व्‍हाई? हूं.. शायद इसीलिए कि आज सुबह नहीं, कल रात ही से मन कैसा तो अलसाया-अलसाया-सा है, कुछ करने की इच्‍छा नहीं हो रही. वैसे ही जैसे प्रेम में अलसाया, बेचैन कुछ न करें, बस बैठे तड़पते रहें का एक ठहरा-सा सस्‍पेंस तना रहता है. लगता है जाने किस-किस तरह के सनसनीखेज़ वाक़ये अनछुये, अनघटे दहलीज़ पर गर्म सांसें भर रहे हैं, कभी भी कुछ का कुछ हो जायेगा, और न हुआ तो जान चली जायेगी, और इसी तरह के जाने कैसे-कैसे के फ़ि‍जूल के ड्रामायी ख़याल, और दिन है कि अपने अनड्रामायी सुर में चुपचाप बीता चलता है. वैसे ही जैसे प्रेमीमन कलपता कैसे-कैसे तो आग में भुनता रहता है, और प्रेम- डिटैच्‍ड, इन अ मैटर ऑव फ़ैक्‍ट वे- चुपचाप गुज़र जाती है. हिस्‍टरी. पीरियड, लगभग ऐसा-वैसा-सा ही कुछ, नहीं? सॉट ऑव? ख़ैर, दैट वॉज़ द इंट्रोडक्‍शन..

गया, नया, व्‍हॉटेव्‍हर.. हू केयर्स ऑव ब्‍लंक्‍चुयेशन.. नॉट मी फॉर श्‍युअर. नॉट इवन फ़ॉर स्‍टैंडडाईर्ज्‍ड हिंदी.. मी डोंट केयर, स्‍वीटहार्ट, स्‍टैंडडाईर्ज्‍ड हिंदी गयी तेल लेने. ऑर व्‍हॉटेव्‍हर लेने. एंड आई शुड नॉट इवन बी लुकिंग बैक इन एंगर, ऑर सरप्राइज़.. कंटेप्‍लेटिंग, पॉंडरिंग, क्‍लैरिफ़ाइंग क्लिनींग माई थॉट्स.. बट व्‍हॉई? ओह, लेट इट बी, ना? देखने और समझने को कितनी और जगहें हैं, मालूम नहीं कितना समझ आयेंगी, बट वन विल एटलीस्‍ट ट्राई टू ग्रेपल विद् इट.. वंडरिंग, प्‍लीडिंग.. कम इन माई ग्रिप, बेबी, कम, कम.. प्‍लीज़?

मन के शीशे पर सवालों की भारी बूंदें बजती रहेंगी, किस ज़बान में बज रही हैं उसे परमासिर भ्राष्‍टव अपनी हिंदी में पहचानकर विरेचित कर लेंगे, व्‍हॉई इट हैज़ टू कम सो ईज़ी एंड सिंपल? ईज़ इट रियली दैट सिंपल? ऑल्‍वेज़? फिर मन का वह छितराया-पसराया अनप्रोसेस्ड, अनगढ़ संसार छत्‍तीसगढ़ के किसी छोटे स्‍टेशन उतरकर कचारु के सोमारु के किसी छोटे झारखण्‍डी गांव में टहलने निकल जायेगा तो परमश्री उसे फिर भी श्रीश्री रामचंद्र शुक्‍ल व डॉक्‍टर नगेंद्र व नंददुलारे बाजपेयी के सेट चश्‍मे से सेटल कर लेंगे ही? ऑल्‍वेज़? एंड इन इट्स ऑल कॉम्‍प्‍लेक्‍स एंड वाईडर सोशल-लिंग्वीस्टिक कॉनोटेशंस? इतनी समर्थ, व समझदार है वह पुराना घिसा चश्‍मा? आई वंडर. बट ओन्‍ली फ़ॉर अ मोमेंट. बीयॉंड इट, आई डोंट इवन केयर. देखने को दूसरी चीज़ें हैं. समझने को. एंड आई वुड गो ऑन लुकिंग. एटलीस्‍ट आई वुड विश टू. नया, पुराना, व्‍हॉटेव्‍हर..

भाषा के किसी बने-बनाये खांचें में क्‍यों लटके रहें? जिस हिंदी ने स्‍कूलों में हमें शिक्षित, व हमारे संस्‍कारों को दीक्षित किया, उस भाषिक पहचान, राष्‍ट्रीय अभियान की, बहुत अर्सा हुआ, हवा निकल चुकी है. यह यूं ही नहीं ही है कि नाम लेने लायक एक राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक, पाक्षिक पत्रिका तक नहीं है हिंदी के पास. इसीलिए नहीं है कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ऐसे किसी सेतु को खड़ा करनेवाली समझ व समाज हिंदी के पास नहीं है. क्षेत्रीय क्षत्रप हैं, वह अपनी छोटी फ़ौजें जोड़ते व तोड़ते रहते हैं, मगर मूलत: वह हिंदी से खाया-खिलाया-चलाया जा रहा बाज़ार है, विचार नहीं. हिंदी का वैचारिक संसार किसी किताब की पांच सौ कापियां छाप ‘सारे समाज पहुंच गये’ की मीठी डकार भरता है, और छपाई दो हज़ार की संख्‍या पार की तो लेखक महोदय सफलता की चरम ऊंचाइयां छूकर लगभग बेहोशी प्राप्‍त करने लगते हैं. जिन्‍होंने कभी अपने बच्‍चे को हिंदी माध्‍यम स्‍कूलों में भेजने को सोचा न होगा, हिंदी के नाम पर थू-थू, चप्‍पल पात करने लगते हैं. कौनवाली हिंदी का विचार पता नहीं इन गुणीजनों के मन में कितना घूमता होता है. हिंदी का वैचारिक लोक ऐसी ही हवाई चिंताओं, व हवाई लड़ाईयों का लोक है. सडेनली गेटिंग आऊट ऑव इट्स पैंट्स, देन टेकिंग टू मच टाईम टू कूल डाऊन. ख़ुदा ख़ैर करे. या जिस किसी को करना हो.

स्‍कूलों वाली स्‍टैंडर्डाईज़्ड हिंदी तो गयी, बहुत समय हुआ गयी. अब रहेगी तो वर्णसंकर, हमारी तरह का करर-करर कंकड़ ही रहेगी, डोंट यू थिंक सो? फ़ॉर गॉड्स सेक, माई फ़्रेंड, ग्रो! आयम सेइंग इट इन द ट्रू स्पिरिट ऑव केयर एंड लव, यस, फ़ॉर यू, एंड फ़ॉर माई फेयरी हिंदी!

और हां, रोते-गाते, थोड़ा थकते-थोड़ा मचलते-बहकते, कभी-कभी समझते भी, जाने कैसी तो उलझी व्‍यथा-टंटा-मुहब्‍बतों में महकते बेचारे मंदी के नीचे मेहराये-पिराये साल में आपका समय ठिलता-ठेलता ठीक-ठाक गुज़रे. हमारी प्‍यारी शुभकामनाएं.

4 comments:

  1. दिन है कि अपने अनड्रामायी सुर में चुपचाप बीता चलता है. वैसे ही जैसे प्रेमीमन कलपता कैसे-कैसे तो आग में भुनता रहता है, और प्रेम- डिटैच्‍ड, इन अ मैटर ऑव फ़ैक्‍ट वे- चुपचाप गुज़र जाती है. हिस्‍टरी. पीरियड, लगभग ऐसा-वैसा-सा ही कुछ, नहीं? सॉट ऑव? ख़ैर, दैट वॉज़ द इंट्रोडक्‍शन.. aapne theek likhaa hai..nav varsh ki shubhkaamnaayen

    ReplyDelete
  2. हिन्दी को बस अब ऐसे ही प्रेमियों की कमी रह गयी है। जमाए रहिए जी अपनी ये उन्मुक्त यात्रा या फिर चले जाइए तेल लेने या सॉट ऑव सम थिंग्लाइक दैट...

    हिन्दी अपना गुजारा तो कर ही रही है... पहले से कुछ आगे ही बढ़ी है। बढ़ती ही जाएगी...। ऐसे ‘सॉट ऑव प्रेमियों’ के कारण नहीं बल्कि इनके बावजूद...

    ReplyDelete
  3. महबूबा तो वैसी रहेगी जी, जैसी इस के चाहने वाले रखना चाहेंगे। हर चाहने वाले के चित्त मैं जैसी है वैसी उकेरता है। जब औरन के चित्त ताक झांक कर आता है, महबूबा की लट कहीं उलझी नजर आती है, तो सुलझाता है, और कहता है ......... ऐसे तो लट मत उलझाया करो।

    ReplyDelete
  4. मजा आ गया...लेकिन दिमाग भारी हो गया...माना कि बोलते वक्त ये हिंदी आसान लगने लगी है लेकिन इन्हे पढ़ना..उफ..नानी याद दिलाता है..ठीक वैसे ही जैसे कभी-कभी मैथिली पढ़ना या लिखना।

    ReplyDelete