Wednesday, January 7, 2009

मत पूछो रंग..


मुंदी आंखों पर मरी मकड़ि‍यों का जाल होगा, उंगलियां रह-रहकर कांप जाती होंगी कि इतना तो हिल गयीं अब और उम्र क्‍या चाहती है, देह बिन बताये कभी हौल जाता होगा जैसे बाढ़ में भसा गांव डोलता है लम्‍बी रात, पोर डुगरते-सिहुरते बैठते होंगे अपना हिसाब करते जैसे ठंड में सन्‍न पटरियों पर टूटे पहिये बजाती बूढ़ी कोई रेल खरड़-खरड़ करती नापती होगी अपनी उम्र काले-रूखे पहाड़ी रस्‍तों पर. और पहाड़ चुकता न होगा और पहाड़ चुकता न होगा रात बीतती न होगी, ठंडीले कांटें सपरते न होंगे उखड़ी सांस सम पर लौटती न होगी, और तक़लीफ़ों में नहाया हकलाया जुसेप्‍पे आह भरकर पूछता होगा ये कैसे दिन हैं आसमान का रंग क्‍या है? मैं सूती के सस्‍ते चादर में मुंह छुपाये धीमे-धीमे गिनता होऊंगा एक-दो-तीन-तेरह-तीस फिर फुसफुसाकर बुदबुदाता होऊंगा मन का रंग?

10 comments:

  1. very poetic indeed, except that I disagree on the काले-रूखे पहाड़ी रस्‍तों पर.

    So far I have spent 70% of my life on various mountain regions but never came across of this kind.

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  2. लाखों लोगों में कोई अजदक होता है, गुरूजी हम तो आपके लेखन बहुत पुराने मुरीद रहे है। कुछ भी, कैसा भी, कभी भी, कहीं भी कहना सबको नही आता। और आप इसी पे मास्टरी करे बैठे हो। पहली बार टिपीया रहें है।

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  3. ओह उदासी में लबरेज ऐसे में कौन पूछेगा रंग .प्रणाम

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  4. @शुक्रिया, इरशाद मियां,

    वैसे किसी को, किसी को भी, इस तरह भाव देना अच्‍छी बात नहीं..

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  5. जुसेप्पे ये पढ़कर कहीं चादर ढाँपे बुदबुदा रहा होगा.

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  6. भाव देने ही वाले थे, कि रोक दिए गए।
    घुघूती बासूती

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  7. प्रमोद जी,
    इतना नैराश्य क्यूं ?

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  8. टूटे पहिये बजाती बूढ़ी कोई रेल खरड़-खरड़ करती नापती होगी अपनी उम्र काले-रूखे पहाड़ी रस्‍तों पर
    आपकी बात सच हो जाये, सरपट ना सही इस तरह से हाँफती भागती रेल ही वहाँ चलने लगे तो बचे पहाड़ भी हरे हो जायें

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