Wednesday, January 14, 2009

शोर करती ख़ामोशी..

लिखना चाहता हूं.. लेकिन चुप भी रहना चाहता हूं.. सच कहूं तो चुप रहकर चुपके से लिख देना चाहता हूं.. लेकिन चुपके से लिख देने पर चुप रहना बना रहता कहां है.. मगर नहीं लिखकर भी बना रहता है? ह्राबाल ने लिखा नहीं है इतना सारा शोर करती ख़ामोशी? सीधी बात है चुप रहना चाहता हूं लेकिन चुप रहना ऐसी सीधी बात नहीं.. बड़ी बात है सीधा कुछ नहीं, द्वंद्वात्‍मक होता है.. फिर मैं तो यूं भी सीधा नहीं.. टेढ़े से सीधे की तरफ़ आने की कोशिश में पता नहीं कहां, कितना ऐंड़ा-ऐंठा होता रहता हूं.. बहुत बार बात इतनी बिगड़ जाती है कि लिखना असम्‍भव हो जाता है.. मगर चूंकि टेढ़ा हूं तो अलिखनीय की टेढ़े पड़े-पड़े की असंभवस्‍था को ज़रा और टेढ़ा करके लिखसकनीय अवस्‍था की तरफ़ मोड़ देना भी बाज-मर्तबा संभव हो जाता है.. चहककर धकापेल मचाते हुए फिर लगता है इतनी ठेलमपेल करना ज़रूरी है? आंख झपकते वॉग्‍नर बजाना.. ज़रूरी है? रहते-रहते ख़ामोशी की सिम्‍फ़नी सेट करने का कौशल नहीं होना चाहिये? शोपें. शुबर्ट. साइलेंस. साइलेंस!..

लेकिन फिर यही मज़ा है कानों में किसी गुमनाम स्‍टेशन पर छोड़ दी गयी लावारिस रेल के लोहे पर धीमे-धीमे गिरती बारिश की आवाज़ गूंजने लगती है. उसको भूलने की कोशिश करता हूं तो फिर कमरे का बेहया पंखा अपनी घर्र-घर्र के शोर में चीखकर सवाल करने लगता है कि मेरा क्‍या. कंप्‍यूटर बिना खोले की-बोर्ड पर बजती उंगलियों की घस-घस सुन पड़ती है.. जबकि उंगलियां छाती पर शरीफ़ बच्‍चे सी बेहरकत, स्थिर बंधी होती हैं.. लेकिन कनपटी पर फिर कुछ खट-खट दौड़ने लगता है.. बंद कंप्‍यूटर के अंधेरों के बावज़ूद वर्ड की खिड़की खुल अपनी सफ़ेद चुनरियां लहराने, शंकर हुसैन फ़ि‍ल्‍म की लता का वो अचानक अस्थिर कर देनेवाला गाना ‘अपने आप रातों में..’ सुनाने लगती है..

ओह, मैं चुप रहना चाहता हूं.. या कहिये लिखते हुए चुप हूं जैसा कुछ दिखना चाहता हूं.. आई नो इट्स आल एब्‍सर्ड, इट्स आस्किंग टू मच.. लेकिन फिर यह भी सही नहीं है कि आई ऑल्‍वेस सेड दैट आई विल बी आस्किंग टू मच? आह, व्‍हॉट अ ट्रैप.. थोड़ा साइलेंस नहीं हो सकता?.. या नॉयस?

(ऊपर काली-सफ़ेद तस्‍वीर: बाबा बाहुमिल ह्राबाल)

6 comments:

  1. यह शंकर हुसैन के गीत का लिंक दिया, धन्यवाद। बाकी, आप चहुचक तो लिखते हैं ही।

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  2. एक दम सायलेन्टली टिप्पणी करके निकल जा रहा हूँ..सुनियेगा इस सन्नाटे की गुंजार को..खरामा खरामा कान फोडू न हो जाये..उसके पहले ही--कुछ कह डालिये.

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  3. सन्नाटों चुप हो जाओ...
    खामोशी की आवाज़
    सुन लेने दो...

    उठते गिरते हुए जज्बों को
    कोई अर्थ पहन लेने दो...

    जो मैं कहना चाहता नहीं...
    खामोश रह कर कह लेने दो...

    जो मैं सुनना चाहता हूँ...
    इस शोर में सुन लेने दो

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  4. वाह गुरुदेव...चुप रहकर चुपके से लिखने के फेर में आप तो संगीत सुनने-सुनाने लगे :)

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  5. साइलेंस jaan levaa ho saktaa hai..kabhi kabhi

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  6. सिर्फ धन्यवाद....
    इतना अच्छा लिखा...और मुझे पढ़ने का मौका मिला....
    शोर करती खामोशी....

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