Thursday, January 15, 2009

कह दो बहार फिर एक बार..

आप कहेंगे इस कठुआये जाड़े में बहार? मतलब क्‍या, भई?.. लेकिन फिर मैं कहूंगा कलकतिया पीरहरंकर भैया बता रहे थे पसीना पोंछ रहे हैं तो सुनकर मैं भावुक क्‍या होता, शर्मिंदगी में उसिना चावल की तरह खदकने लगा.. फिर भावुकता के ऐसे पसीनाप्रसावन समय में बहार की सोचने लगूं तो आपको क्‍यों, हमारी एक्‍सों को भी शिकायत नहीं होनी चाहिये.. एक बात यह भी है, बंधु, बात हो रही है तो इसे यहां याद कर लेना बेमानी नहीं होगा, कि ज़रूरी नहीं एक बिहारी हमेशा बिहार की ही में अझुराया रहे, बहार की सोचे न पाये? पॉलिटिकली ही नहीं, कल्‍चरली भी करेक्‍ट होगा?..

फिर ऐसा भी रोज़-रोज़ थोड़े होता है कि उत्‍तरी अफ्रीकी जैज़ एनसांब्‍ल बैकग्राउंड में रहे और फोरग्राउंड में मुझे चमकने दे? मगर फिर, पतनशील प्रतिभा दिल्‍ली, कलकत्‍ता, मद्रास में ही अपना जलवा दिखाये ऐसा भी किसने कहा है, बहकते-बहकते दिख रहा है कैसे अफ्रीकियों को भी उसने छका-नचवा दिया है.. एनीवे, इस लिंक पर जाकर आप भी पतनशील पराक्रम का प्रसाद पायें.. कह दो बहार फिर एक बार, अहा, अहा! जाइये, जाइये, छुच्‍छे हियां गोड़ मत हिलाइये, लिंकवा पर सुनके क्षुधितमन को मुदित, प्रमुदित करिये..

2 comments:

  1. सुने, प्रमुदित हुये। आप पाडकास्टिंग शानदार करते हैं। अब त जारी रहेगा न!

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  2. अभी जाकर सुनने का प्रसाद लेते है इस लिंकवा पर. आप ठहरे रहिये.

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