Friday, January 16, 2009

बच्‍ची के साथ घूमना..

बच्‍ची बच्‍ची थी ज़ि‍द पर अड़ी रही घूमने जायेगी. मैंने कातर होकर समझाने की कोशिश की इतनी समझदार हो क्‍या ज़रूरत है घूमने की, फिर मैं खुद घुमा हुआ तुम्‍हें खाक़ घुमाऊंगा? ऐसा भी नहीं कि बच्‍ची ने हमारे बालों में तेल लगाया था, कंधे, कमर पर मुक्‍की मारी थी कि हम पर उसकी ईनाम की देनदारी हो. नहीं. फकत बच्‍ची थी, और हम उस बचपने के मारे थे, बदमाश उसका बेजा फ़ायदा उठा रही थी. बीच में बरजकर मैंने कहना चाहा फुदको मत, घूमना, दुनिया देखना मज़ाक नहीं. बड़े-बड़े इस नाव और उस जहाज चढ़े कहां-कहां उड़ते रहे, सुल्‍तानों से मुलाक़ातें की, मोटी पोथियां लिखकर भुलावे में रहे दुनिया नाप ली है, जबकि घरवाली की आंखों के भाप को तापने की काबिलियत होती तो जान पाते ताउम्र क़ायदे से एक जोड़ी आंख नहीं घूम पाये, बाकी घूमना गाल बजाना, झंडे घुमाना, धंधा फैलाना था, दुनिया जानना कहां था?

सोने के पहले दवाई की गोलियां निगलने के ठीक पहले कोई बिल गेट्स से पूछे दुनिया कितनी समझते हैं, ज़्यादा संभावना है आदमी समझदार हुआ चुप रहेगा, जवाब देने की जगह दूसरी दवाइयां खोजने लगेगा. जूनियर बुश समझदार नहीं हैं, बहुत दुनिया घुमायी की, मगर कितना उसे जानते थे वह दुनिया तो देख ही रही थी, आते-आते एक मुकाम पर अमरीका भी देखने लगी..

बच्‍ची बच्‍ची थी ज़ि‍द पर अड़ी रही घूमने जायेगी, दुनिया देखेगी. अब मैं क्‍या बताता हंसी-खेल नहीं है देखना. दुनिया. देखी ज़माने की यारी वह सब ठीक है लेकिन आदमी देखी दुनिया सारी गा रहा हो तो उसकी मीमांसा करने की जगह समझ लेना चाहिये थेथरयी गा रहा है, और हद से हद बंदे ने बिलासपुर देखा होगा, भ्रष्‍ट ससुराल और दलाल ससुर की सिर पर छतरी हो तो संभवत: बरेली से भटकता बंबई तक भी पहुंचा होगा, मगर जनाब बास्‍को सुदामा का वही केप ऑफ गुड होप होगा, उसके आगे थेथरयी होगी, दुनिया का तत्‍वज्ञान नहीं.. एक मौका मेरे हिस्‍से भी आया था. देखने का. चुन्‍नी का होश खोयी दीवानी लड़की ने अपना हाथ हमारे हवाले करके कहा था लो, देखो, पढ़ो इसमें अपनी ज़िंदगी! मगर वह उम्र रही होगी, लड़की के हाथों अपनी ज़िंदगी पढ़ने की जगह मैं लड़की के दांतों की कैवेटिज़ पढ़ने की ज़ि‍द पर अड़ गया, और बात, फिर कुछ वही बास्‍को सुदामा जैसी होपलेस सा कुछ हो गयी थी..

बच्‍ची को मैंने समझाने की कोशिश बाबू, हमने कुछ गांवों की टहल की है, कुछ शहरों से गुजरे हैं, रेलों से खाली हो चुकने के बाद चंद छोटे स्‍टेशनों का खाली, बेमतलब उजाड़लोक याद है, कुछ घरों की दीवारें, घुटने पर थाली लेकर रात का खाना और सुबह मसहरी हटाकर दुधाइन-जलाइन चाय पीना.. अपने बेहूदा मज़ाकों पर भोलेपन की हंसियां, और अपनी भोली हिंसा में किसी का जार-जार रोना याद है दुनिया घूमना नहीं याद है, सच्‍ची, हम दुनिया कहां घूम सकते थे, कभी नहीं घूमे..

बच्‍ची हुमसती पैर पटक रही थी, हौल-डौल मचाये थी. आदमी भले किसी लड़की के हाथों में अपनी ज़िंदगी पढ़ने से रह गया के परले दरजे के स्‍तरवाला बेवक़ूफ़ हो, रूखा, हिंसक हो, मगर एक सांवली, तेल को तरसती बालोंवाली, गजर-मजर दो कौड़ि‍या फ्रॉक पहने बच्‍ची की ज़ि‍द को जीत सकता है? बच्‍ची की उंगलियां थामे पीली घास पर बहकता मैं ढलान पर कुछ आगे तक गया. ठीक सामने एक भीमकाय वृक्ष था; उसके आगे पहुंचते ही बच्‍ची एकदम से अटक गयी, रुको, रुको की चपलता के बाद बड़ी-बड़ी आंखों से वह अपहचाना बड़ाकार तकती रही, मचलकर पूछी ये क्‍या? मैंने जान बची लाखों पाये वाला थोड़ा मुस्‍कराकर, मगर सच पूछें तो नज़र बचाकर जवाब दिया- दुनिया है, यही तो है!

बच्‍ची आखिर बच्‍ची थी और मैं भी आदमी सा आदमी, क्‍या जवाब देता?..

11 comments:

  1. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया। अफ़सोस हुआ कि पहले क्यों नहीं आया। मन को झकझोरनए वाला आलेख है और वह भी इतनी सहज-सरल शैली में।
    बधाई।

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  2. जी बहुत सुन्दर


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    आप भारतीय हैं तो अपने ब्लॉग पर तिरंगा लगाना अवश्य पसंद करेगे, जाने कैसे?
    तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

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  3. बढ़िया दुनिया घुमा रहे हैं।

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  4. बच्चियाँ छोटी हों या बड़ी हो जाएँ दुनिया देखने की चाह तो तब तक रहती ही है जब तक यह समझ नहीं आ जाता कि दुनिया लगभग वैसी ही है सब जगह, या जैसी सोची थी वैसी नहीं है कहीं भी।
    भीमकाय पेड़ तक की दुनिया तो दिखा ही दी उसे। वैसे जब तक वह किसी से दुनिया दिखाने की जिद करती रहेगी दुनिया कभी नहीं देख पाएगी। दुनिया केवल उनके देखने की वस्तु है जो स्वयं उसे देख सकें, किसीके दिखाने की राह न देखें।
    घुघूती बासूती

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  5. @घुघूतीजी,
    सही कहती हैं. बच्‍ची अपने बूते रहे, हमारी बाट क्‍यों जोहे..
    कम से कम आपको दुनिया दिखाने का हमारा सपना तो भरभराके बैठ गया..
    बाकी, संक्रान्ति की हमारी मिठायी?

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  6. बच्ची जरूर दुनिया देखेगी और अपने बूते!

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  7. "बच्‍ची की उंगलियां थामे पीली घास पर बहकता मैं ढलान पर कुछ आगे तक गया. ठीक सामने एक भीमकाय वृक्ष था; उसके आगे पहुंचते ही बच्‍ची एकदम से अटक गयी, रुको, रुको की चपलता के बाद बड़ी-बड़ी आंखों से वह अपहचाना बड़ाकार तकती रही, मचलकर पूछी ये क्‍या? मैंने जान बची लाखों पाये वाला थोड़ा मुस्‍कराकर, मगर सच पूछें तो नज़र बचाकर जवाब दिया- दुनिया है, यही तो है!" बहुत तबियत से लिखा है बच्ची की उंगली पकड़े हम भी कहाँ कहाँ घूम आए बहुत खूब......अब तिरंगा लगा ही डालिये

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  8. बहुत दिनों बाद बिना दिमाग पर जोड़ डाले ही सब समझ में आ गया.. :)
    मजाक कर रहा हूं, बुरा ना माने.. हमेशा आपको पढ़ता हूं और आपको पढ़ना अच्छा भी लगता है..

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  9. @नहीं, विमल,
    तिरंगा लहराने जैसी तो कोई बात नहीं है, कभी नहीं होगी..

    @पीडी बाबू,
    अब आपकी बात समझने के लिए हम दिमाग तोर रहे हैं. हद है, बाबू, हम खुद को इतना तोड़-तोड़कर लिखते हें, और हमें समझने के लिए आपको दिमाग जोड़ना पड़ता है? कौनवाले बैंक से लेकर जोड़ते हैं.. कि डिक्‍शनरी खोलकर
    ?
    हें हें हें, अब आपो बुरा जिन मानियेगा, हम तिल्‍लगी कर रहे थे.

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