Saturday, January 17, 2009

प्‍यार, शबद दो-चार, किस काम के, दाम के..



काश मेरे शब्‍द तुम्‍हारे फटियारे दिनों का कपड़ा हो पाते. भूख में कुम्‍हलाये, पपड़ाये होंठों पर रंगों नहाये, कुछ ओह, नारंगी बहार बनते, मन के गहरों में उमगती, कहां-कहां तक तो उतर गयी, सारंगी सितार बनते. इतना तो इतना तो इतना तो संगीत लरजता कि छींट के मलिनियाये सूती परदे पर मुरझाये नीले फूल की पंखुड़ि‍यां थिहरने, कांपने लगतीं, बरामदे के मुहाने पर रखे लोहे के जाले में कांसे की कटोरी नम आंखें अपनी ढांपने लगती. मेरे शब्‍द तुम्‍हारे दु:खियारे दिनों के अकेले सुनसान की सुकूनदेह सड़क, रिक्‍शे की उठंगी फैली सवारी, मुश्किल दिनों में अखबार के नीचे जाने कब दबाकर रखी और अब अचानक पा लिये थोड़े रुपये और ओह, कैसे तो आह्लादकारी रेजगारी होते. निकलते घनी बारिश के बाद के आसमान की तरह, फड़फड़ाते नन्‍हें परों को गरदन के नर्म रोंयें सहलाते काश मेरे शब्‍द तुम्‍हें टहल घुमाने निकलते, पूरे रास्‍ते तुम ठिहलतीं, नये पत्‍तों की मानिंद फुनगतीं, ओह, कित्‍ता कित्‍ता कित्‍ता कित्‍ता सारा तो हंसती चलतीं. काश.

7 comments:

  1. जितने जख्मों की बात किये हो-हर जख्म पर आपके शब्द हर रुप में मरहम का ही काम करेंगे. बस, ऐसा स्नेह बहुत होता है. तब सोच ही सबसे ज्यादा जरुरी हो जाती है.

    ReplyDelete
  2. महत्वपूर्ण आकांक्षा की सुंदर अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete
  3. अच्छा लगा ....पसंद आया आपका काश

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्‍छी आकांक्षा।

    ReplyDelete
  5. ओह.. गद्यात्मक पद्य या पद्यात्मक गद्य...

    ReplyDelete
  6. हंस रही होंगी इसे पढ़कर वे।

    ReplyDelete
  7. Anupji se sahamat. aur umeed hai hansane laayak haalat me hee ho!!!

    ReplyDelete