Monday, January 19, 2009

ज़ि‍न्‍दगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा, कहां से रहेगा, करने की वजह नहीं है..

अभी चार दिन पहले ही हमने रेंका था ‘कह दो बहार फिर एक बार कि दिल जले’, मगर जैसाकि एक बड़े तत्‍वज्ञानी (श्रीश्री प्रमोदपाद पुष्‍पप्रचंड) पहले कह गये हैं, और ठीक ही कह गये हैं- ‘रेंकनेवाले रेंकते रह गये, लोकतंत्र लूटनेवालों ने उसे चिरई के पाद बराबर भी महत्‍व न दिया!’ वही बात है, हम चाहे जो रेंकें, बाबू अनूप अपनी वाली मौज ठेल जायेंगे, स्‍वप्‍नदर्शी भी कहलाने को ही स्‍वप्‍नदर्शी होंगी, हम सपने की लिखेंगे वह यथार्थस्‍पर्शी होने लगेंगी! ऐसे ही नहीं है कि हम सुबह-सुबह अचकचाकर ‘फिर वही शाम वही ग़म वही तन्‍हाई है’ गाने लगते हैं, जबकि हमें भी मालूम होता है संझा दूर है और सुबह-सुबह तन्‍हाई है, अच्‍छी बात है, कौन हम यूएन की बाईस सदस्‍यों की आपातसभा के बीच गाज़ा पट्टी के सवाल पर सिर-फुटव्‍वल की कामना कर रहे हैं. हां, ग़म ज़रूर है, कि इतने साल से हम गाज़ा-गाज़ा कर रहे थे अब देख रहे हैं कि बीबीसी हमारी बांह उमेंठकर अपने वेबसाइट पर उसे गज़ा कह रहा है. फिर दूसरा ग़म यह है कि कल दोपहर किसी मित्र के यहां से रसानंदनुभूति के बाद अपनी कुटिभृकूटि लौटे हैं तो देह लग रहा है चार हिस्‍सों में बंटकर अलगनी पर टंगा हुआ है और कराहकर दर्द ज़ाहिर करना चाहते हैं लेकिन मुंह से आह नहीं तलत महमूद छूट रहे हैं!

तलत महमूद के पीछे-पीछे बर्मन बाबू भी निकल रहे हैं. ‘वहां कौन है तेरा, जायेगा कहां, मुसाफिर..’. बोकारो से पारुल बोल रही हैं सही बात है, ‘वहां’ काहे ला जा रहे हैं, मत जाइये, बोकारो चल आइये. पारुल से पूछे बोकारो में किताब की दुकान है? म्‍यू‍ज़ि‍क-ट्यूज़ि‍क की? तो जवाब देने की जगह पारुल बोलने लगती हैं ठीक है, मत आइये, चूल्‍हा में जाइये! मैंने कुछ नहीं कहा. क्‍या कहता कि चूल्‍हेवाली उपमा मत दो क्‍योंकि बाबूजी सारा जीवन ब्‍लास्‍ट फ़र्नेस में ही नौकरी बजाये हैं, तो चूल्‍हावाला ताना देकर हमको डराओ मत..

ओह, शब्‍दों के भेड़ उत्‍तर की तरफ़ हांके लिये चलता हूं और आप कहते हैं अहा, दक्खिन कितना सुहाना सज रहा है! मैं सारंगी के तार पर डंडी फेरता हूं और आप उसमें सुरबहार का सिंगार ढूंढ़ लाते हैं. शायद मेरा ठीक-ठीक लिखना और आपका उसे ठीक-ठीक समझ लेना कभी वैसे ही संभव नहीं होगा जैसे सलिल चौधुरी के ऑर्केस्‍ट्रा में बाबू महेंदर कपूर को बिठाकर ‘कोई होता मेरा अपना..’ गवाना? या सचिन दा का ‘लाख मनाले दुनिया, साथ न ये छूटेगा..’ ? छूटेगा के पहले सोचनेवाली बात है कभी बनेगा? साथ? सही? कभी रफ़ी साहब उमगकर गा सकेंगे ‘जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आसपास होता है..’ ? आप पूछने लगियेगा साहब सविता के बारे में गा रहे हैं कि सुनीता के बारे में? सूफी गा रहे हैं, या फूफी को याद कर रहे हैं नहीं सोचियेगा. हद है. सच्‍ची. ऐसे ही नहीं है कि मैं लिखने पर मज़बूर होता हूं प्‍यार, शब्‍द दो-चार, किस काम के, दाम के.. ! रफ़ी साहब के पीछे-पीछे मुकेश मियां भी पहले कह ही गये हैं ‘दोस्‍त दोस्‍त ना रहा, प्‍यार प्‍यार, ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा, कैसे रहता, क्‍यों रहता’..

(ऊपर, पता नहीं कहां से बेभार ली गयी फ़ोटो है, सारंगी की है, कहने की ज़रूरत नहीं, समझदार आप पहचान गये ही होंगे)

6 comments:

  1. इत्ते खूबसूरत गानों के लिंक का शुक्रिया....

    ReplyDelete
  2. आप की पोस्ट पर आज पहली बार आना हुआ...दुखों को हँसी मैं ठेलना भी अच्छा लगा...गीतों को फिर याद करना भी ...साथ ही..ये कहना,कुछ फूल गूंथना चाहता हूं.. हंसते हुए उदासी में लबरेज़ ओह, कैसा तो सुरीला गीत हो जाना चाहता हूं.. बधाई,

    ReplyDelete
  3. @शुक्रिया विधुजी..

    ReplyDelete
  4. ब्‍लास्‍ट फ़र्नेस म बहुतै अकसीडेंट / म्‍यू‍ज़ि‍क-ट्यूज़ि‍क सेफ़ सैड / लुके रहिये-वैसे गाने बढ़िया सुनवाये :)

    ReplyDelete
  5. गान गुलो सबाइ खूब भालो . आपनार लेखा'उ भालो . किंतु मोशाय 'ऐतबार' कोरून . धाक्का खेले'उ कोरून .

    'रसानंदनुभूति' -- एइ वर्ड टा की होलो . कौनो नूतन वर्ड 'कॉइन' कोरेछेन ?

    ReplyDelete
  6. @व्‍याकरणाचार्ज जी,
    रस+ आनंद (+वन, मिसिंग है, ग़लती हो गयी) + अनुभूति = रसानंदनुभूति. भूल हो गयी? अब हो ही गयी होगी तो कौन है कि पहली बार होगी? ऐसे ही नहीं न है कि सन नवासी में हमने काव्‍यपंक्तियां निसृत की थीं:
    भूलों तुम्‍हींने तो हमें पाला/ शूलों ने सम्‍भाला/
    पल-पल हेरते रहे/ हारते रहे/ जीवन विष हाला

    ReplyDelete