Wednesday, January 21, 2009

दीदी, चलो ना..

दीदी को समझाना हंसी-खेल नहीं.. न समझना.. एक बार मन बना लें, कहां-कैसे टेक लेनी है की जगह तय कर लें फिर कोई दीदी को उनकी जगह से हिला के दिखा दे ज़रा? संदेश की मिठाई, स्‍वाति पटनायक की ढिठाई किसी भी तरीके का दीदी पर असर नहीं पड़ता.. महेन लाख सिर पटके.. दाल की देगची में कलछुलभर नमक, या गुलाब के पौधे में जाकर पेशाब गिरा देने की धमकी दे.. दीदी के चेहरे पर एक लकीर तक नहीं खिंचती! जबकि इतनी बड़ी कौन-सी मांग की जाती है? ज़रा-सा बाज़ार चलने को ही तो कहा जाता है! थोड़ी देर को घर से बाहर निकलेंगी तो ऐसा नुकसान हो जायेगा? थोड़ा सा चलेंगी तो? चल नहीं सकतीं? चलो ना, दीदी, ओहो, प्‍लीज़!..

4 comments:

  1. दीदी का मन नहीं है, मनुहार काम न आएगी।

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  2. जरूर कोई बात गहरे तक चुभ गई है। वर्ना कोई भी दीदी इतनी मान मनौव्‍वल नहीं कराती।

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  3. मन्नौव्वल करते रहिये-मान जायेंगी.

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  4. कब से दिमाग खा रहे हो..फिर कहते हो..जबरदस्ती थोड़े है...:)

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