Friday, January 23, 2009

हिन्‍दी लेखकों की चुरायी डायरी का एक असंपादित, अन्‍यतम संकलन..

किसी बांग्‍लादेशी कवि, छत्‍तीसगढ़ी दार्शनिक, या अफग़ानी उपन्‍यासकार की मार्फत ये अंतरंग रचनात्‍मक विद्युतरंग उजागर हुए होते तो स्‍वाभाविक है हिन्‍दी लेखकीय बिरादरी इन डायरियों को हंसी और थोड़ा पहले ही शुरु हो गया होली का खेल मानकर, हंसी में उड़ाती अपनी नवरचनाधर्मिता में सिर छिपाकर इस अनन्‍य अपमान को भूला देती. लेकिन चूंकि ये डायरी किसी अफग़ानी उपन्‍यासकार के झोले की जगह मुझे, एक रेगुलर हिन्‍दी लेखक को (हालांकि दिवाकरजी अब भी अपने आलोचनात्‍मक प्रबंधों में मेरी उपलब्धियां गिनाने व गहरायी में मेरे विमर्श से बचते हैं. मगर दिवाकरजी हैं कौन? सतसठ साल का बुड्ढा स्‍साला! फक दिवाकरजी!) अपने नियमित डाक से प्राप्‍त हुए हैं, इनकी विश्‍वसनीयता पर संदेह करना बेमानी हो जाता है. अलबत्‍ता डायरी में एंट्री लेखकों के नाम से नहीं है मगर फिर भी मुझे भयानक घबराहट हो ही रही है कि कहीं ऐसा न हो दूसरों की नंगई की खोलमखाली में खुद मेरी डायरी के पन्‍ने भी बाहर आ जायें! भई, स्‍वाभाविक है इतने लंबे रचनात्‍मक जीवन में कब किस मसले, व्‍यक्ति, विवाद, या रचनात्‍मकता की महीन गुत्थियों पर मैंने क्‍या चिंता की, का इतने अर्से बाद अब मैं ठीक-ठीक स्‍मरण न कर पाऊं. आखिरकार लेखक ही हूं, महापुरुष नहीं.

हालांकि दो वर्ष हुए हिमाचल बिजली विभाग ने शिमला में एक संगोष्ठि आयोजित की थी, दुबली-पतली एक गौरवर्णा कमज़ोर सी पाठिका ने अपने परचे में मुझे महापुरुष कहकर चिन्हित किया था (और दिवाकरजी ने तत्‍काल वहीं खड़े होकर बेचारी संवेदनशील कन्‍या की नासमझी [?] पर आपत्ति जतायी थी! मुझे सचमुच बड़ा गुस्‍सा आया था. अरे, एक सुघड़चित्‍त षोडशी अपने मन के झरोखे खोल दुनिया को नयी नज़रों से देखने की कोशिश कर रही है, और आप बुड्ढे, गंवार, ज़ाहिल, उसकी खिड़कियां बंद कर रहे हो? मैंने तभी सत्‍येंद्र को कहा था मुझे लगता है धन्‍वा ने ‘भागी हुई लड़कियां’ इसी खूसट, प्रेमहीन को ध्‍यान में रखकर लिखा होगा! सत्‍येंद्र ने भी कहा था छोड़ो, जाने दो, यार. अमरीका में ओबामा आ गये, और ये अभी तक बिहारी, रसखान और जयदेव का लोकचित्रण बकता रहता है? ऐसे ही लोगों से तो हिन्‍दी अभीतक बंदिनी बनी हुई है. टू हेल विथ दिवाकरजी! मैंने भी सोचा ठीक है, यार, जाने दो, हटाओ, कोई सठियाया आलोचक महापुरुष नहीं मानता है, न माने, असल बात है पाठक के अंतरंग मन में आपकी क्‍या छवि बनती है, नहीं? मगर शाम को तीन पैग अंदर करने के बाद फिर मैंने बड्ढे को घेर ही लिया! सिर्फ फैला होऊं ऐसा नहीं, सीधा-सीधी ऐसी की तैसी पर उतर आया. भाई लोग बीच-बचाव में रोकने-वोकने लगे लेकिन मैं भी ज़ि‍द पर अड़ा रहा कि होंगे अपने घर में दिवाकरजी, हमारे सिर पर पेशाब करेंगे और हम यहां साले को मुंह सिये बैठे रहें? सालभर यहां-वहां साले को सड़ांध पादते रहते हैं, चाहते हो सबके साथ हम भी उसको सुगंधि मानें? दिवाकरजी गुस्‍से में कांपने लगे कि देखिये, हमारे स्‍वास्‍थ्‍य की सार्वजनिक चर्चा में मत जाइये, हां! मैंने भी उखड़कर जवाब दिया था बहुत बिहारी, जयदेव करते रहते हैं, बेला बेलिंस्कि पढ़ा है? दिवाकरजी घबराकर पूछे बेला बेलिंस्कि कौन? मैंने चिढ़कर कहा था मुझको क्‍या मालूम कौन है, मगर आपने पढ़ा है?)..

ख़ैर, लेखक होने, अन्‍यतम प्रतिभा-प्रसूत होने का यह नुकसान भी है कि जहां एक ओर पाठकों की आत्‍मा में आपके लिए अन्‍यतम प्रेम संचित होता है, वहीं कुछ ईर्ष्‍याग्रस्‍त अंधी आलोचना आपको दु:खी भी करती चलती है. अब यही देखिये, तहलका के नववर्षांक में कोई वीरेंद्र यादव हैं, वर्षभर का पता नहीं क्‍या अगड़म-बगड़म साहित्यिक असेसमेंट किया है, जो किया है सो किया है, मज़े की बात, मेरे नाम का कहीं ज़ि‍क्र तक नहीं! ऐसे पत्रिका चलेगी? हिन्‍दी साहित्‍य? ऐसे चलेगा? चलेगा मगर फिर पहुंचेगा कहां?..

छोड़ि‍ये, इन कहानियों का कोई अंत नहीं. ऐसे ही नहीं है कि हिन्‍दी की ऐसी दुर्दशा है. डायरी में अंतरंग प्रसंगों की ऐसी-ऐसी नंगी चर्चायें हैं कि आपको पता चल ही जायेगा कैसी दुर्दशा है. मेरी बस आपसे इतनी करबद्ध प्रार्थना है कि मेरा खुद का लिखा कहीं कुछ गलती से प्रकाश में आ जाये तो मुझे तत्‍काल सूचित करके सावधान कीजियेगा, क्‍योंकि, सहृदय पाठक, आप भी जानते हैं हिन्‍दी का असल नुकसान मुझसे नहीं, दिवाकरजीओं से है.

बहुत इन लियू ऑफ़ एन इंट्रोडक्‍शन हुआ, अब सामने से हटता हूं. मैं नहीं, अब डायरी बोलेगी! आमीन!

(जारी)

4 comments:

  1. वीरेंद्र यादव जी की गिनती नासमझों में करते हैं हम. वर्ष भर का तो छोड़िये दशक भर का साहित्यिक असेसमेंट बिना आपके नाम के ख़तम असेसमेंट है. डायरी आपको मिली है, इसके लिए आपको बधाई.

    और आप निश्चिंत रहें. आपका लिखा जहाँ भी दिखेगा हम आपको सूचित करेंगे. आप तो बस डायरी छापिये.

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  2. अब यही देखिये, तहलका के नववर्षांक में कोई वीरेंद्र यादव हैं, वर्षभर का पता नहीं क्‍या अगड़म-बगड़म साहित्यिक असेसमेंट किया है, जो किया है सो किया है, मज़े की बात, मेरे नाम का कहीं ज़ि‍क्र तक नहीं! ऐसे पत्रिका चलेगी? हिन्‍दी साहित्‍य? ऐसे चलेगा? फिर जायेगा कहां?.. छोड़ि‍ये, इन कहानियों का कोई अंत नहीं. ऐसे ही नहीं है कि हिन्‍दी की ऐसी दुर्दशा है.

    achha laga diary padhna.

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  3. डाय ना
    डाय री
    हाय हां
    कहां
    कहां
    डाह तो नहीं
    वाह भी नहीं
    राह भी नहीं
    डायरी
    डायना की
    तलाशो

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  4. इब अइसा है कि नामी, ख्याति वाला स्टार राइटरों की चरचा तो होएगी ही ना. अपुन जइसन भासा, कथ्य, स्टाइल, ख्याति रहित एनॉनिमस राइटरों का नाम लेकर डायरी की लुटिया थोड़े ही डुबोनी है!

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