Tuesday, January 27, 2009

दरवाज़े के बाहर..

यहीं हूं दरवाज़े के बाहर गली में, सड़क के छोर शहर के इस ओर, ज़रा आगे बस्‍ती है, सब पराये हैं, कभी सुखी ज़्यादा घबराये दीखते हैं. पहाड़ी मंदिर की घंटी की टुंगटुंग नहीं, जंगली अंधेरों में एक रेल गुजरती, आगे कुछ और सटपटाये सूबे होंगे उनमें निकलती होगी, वहीं कहीं बिजली और थोड़ी हवा बचाता सफेदी पर सियाह घिस रहा होऊंगा मैं, हारे अपने जतन जोड़ता, करीने से तह करके तुम्‍हारा नाम मोड़ता, किफ़ायत से कॉफ़ी बनाता दिन-दिन खींचकर हवाई चप्‍पल चलाता, सस्‍ते दूरबीन से दायें दुनिया देखता. बायें दुनिया के उस मुहाने, बीस बहानों के आड़ तुम्‍हें खोज लेता हूंगा, ओह, कितना नेह नहाये फुसफुसाता, कि यहीं हूं दरवाज़े के बाहर..

8 comments:

  1. वाह, क्या बात है!
    घुघूती बासूती

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  2. पता नहीं...क्या लिखते हैं....हर बार कुछ सोचने को मजबूर करते हैं....मेरे पास शब्द नहीं होते....कसीदे पढ़ने के लिए...गर वॉयस मैसेज की सुविधा होती...तो एक ठंड़ी सांस से आपको ज़रुर समझ आता कि जो कुछ भी आप लिखते हैं...दूसरों को भी छूकर जाता है......

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  3. @......
    ....... पहले छह बिंदु आपका नाम है, नीचे के सात, मेरी ठंडी सांसें हैं. यह बताने को, कि जो आपने लिखा है, कहीं वह भी मुझे छूकर निकल गया है...

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  4. Pramod ji ,
    bahut achchha likha hai apne...ab ye shabd chitra..bhav chitra ..kya hai ..ap janen.
    Hemant Kumar

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  5. Bakee fotua badee parfect kheenchal ba...
    Hemant

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