Wednesday, January 28, 2009

शाम के सितार..

रंजी सामने तिपाये के तकिये पर पैर फैलाये, सोफे में धंसी आंख पर चश्‍मा चढ़ाये गोद में मसनद दबाये किताब में फंसी थी. उसके बाजू की खाली जगह में खुद को धंसाते, शाम की उचाट ख़ामोशी के पर कुतरते, मैंने अपने मन की कही- पता नहीं क्‍या है कि किताब पढ़ती लड़कियां मुझे इतनी अच्‍छी क्‍यों लगती हैं!

- ओह, हमारी किस्‍मत!, का संक्षिप्‍त जुमला और एक सर्द आह भरने की घटिया एक्टिंग करके रंजी अपनी किताब में उलझी रही. मैंने एक बेहयायी से उसके हाथों से किताब खींच परे पटक दिया, व दूसरी बेहयायी में उसके गोद के मसनद की नरमी पर अपने माथे को जगह दिया, और बिना रंजी को इसका मौका दिये कि वह चिढ़कर मुझे नीचे फ़र्श पर धकेल दे, शाम के सितार के अपने तार छेड़ने लगा- अबे, लेकिन क्‍या चक्‍कर है कि रहते-रहते दिल गौरेये की जान की तरह दर्द में हूकता इस दीवार से उस दीवार, कभी रसोई की खिड़की तो कभी बांस पर बंधे तार के बीच हुम्‍म-हुम्‍म, सांय-सपाक् कराहता घिरनी-सा नाचता फिरता है, क्‍यों?

मेरे बालों से खेलती रंजी मुस्‍कराने लगी. मैंने चिढ़ने की अच्‍छी एक्टिंग करते उसकी फूल सी कोमल उंगलियों को परे झटक दिया- दांत मत दिखाओ, मेरी उलझन का हल बताओ!

मसनद से सिर हटाकर, फुर्ती से खुद को उठाकर, रंजी के बगल पल्‍थी मारकर किसी फ़ौजी सार्जेंट की तरह सेट करते हुए मैंने अपनी तक़रीर, गंभीर, जारी रखी- ठीक-ठाक भरा-पूरा जीवन है, तुम सिगरेट से नफ़रत नहीं करतीं न मैं तुम्‍हारे कोये-सी आंखों से, मैं भले बाज मर्तबा दांतों में जीभ दबाये दरवाज़े में चेहरा फंसाये तुम्‍हें ताकता हूं मगर सच्‍चायी है हमारे घर एक कुत्‍ता तक नहीं, न इस घर से बाहर निकलकर हमें बहुत सारे कुत्‍तों की संगत करनी पड़ती है, फिर भी, देखो, मन रहते-रहते कैसे बंजारों सा भटकने लगता है, तुम बाथरुम में गुनगुनाती दांत मांजती हो, मैं पीछे से आकर तुम्‍हारे गरदन के रोंओं में खुद को भूलने की जगह तुमसे बेहूदा सवाल करता हूं- अच्‍छा, ये ट्यून तुम्‍हें अब भी याद है?

अब रंजी नाराज़ हो गयी. मेरे कंधे में उंगली धंसाती बोली- लीव मी अलोन, अदरवाइस आई विल हिट यू!

- व्‍हॉट इज़ दिस नाऊ, मैं तुमसे एक सीरियस आर्ग्‍यूमेंट कर रहा हूं, एंड यू विल हिट मी, व्‍हाई? रंजी की आंखों में आंख गड़ाकर मैंने उसे हिप्‍नोटाइज़ करने की कोशिश की, लेकिन बेशऊर, बद्तमीज़ लड़की नज़रें फेरकर अपनी किताब में लौट गयी. मैं सिर झुकाये, फूली छाती और फटते माथे पर साइलेंटली बोंगो बजाता झख मारता रहा.

थोड़ी देर माथे में बजती चुप्‍पी के बाद मैंने कहा- एक बुरी ख़बर है, सुनोगी?

लड़की सुनती भी तो सुनना चाहती हूं जैसा कोई इशारा नहीं किया, किताब में चेहरा छिपाये रही, छिपाये-छिपाये ही कुछ देर बाद बुदबुदायी- अभी तक तो कान में मिश्री घोल रहे थे, ठीक है अब अंगार घोलो. अंबानी के बारे में फिर कोई नया सूराग ढूंढ़ लाये हो?

रंजी की कोये-सी आंखों में अपनी असहायता तकता मैंने कहा- कहीं लोकसभा के प्रोसेडिंग्‍स देख रहा था. जिन ख़बरों को राष्‍ट्रीय अखबारों में कभी जगह नहीं मिलती, ऐसे कुछ डिटेल्‍स सामने आ रहे थे. ऑवियसली दीख रहा था केवल कांग्रेस, भाजपा ही नहीं, सीपीएम तक एक बड़े घपले की लोकसभा में चर्चा के दौरान इसका मोर्चा संभाले थी कि कैसे समूचे विवाद में रिलायंस का नाम तक सामने न आये!

शाम धीमे-धीमे सरकती जाने कहां जाती रही..

2 comments:

  1. रंजी को किताब पढ़ने दी होती न...

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  2. कोये सी आँखें ! लिखते जाइए हम घुघूती की( 'सी' नहीं ) आँखों से पढ़ रहे हैं।
    घुघूती बासूती

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