Thursday, January 29, 2009

उसका चेहरा..

कल वह दिखे और मैं डर गया. उनके दिखने में फूल बरसेंगे की प्रतीति यूं भी न थी, लेकिन मंच पर टीन की तलवार की रगड़धड़ गुंजायमान होगा की रोमांचकारी अपेक्षायें भी न थीं. ओह, जबकि उनका दिखना सशरीर दिखना नहीं, अचानक एक अदने फ़ोटो का सामने आ जाना भर था! अचानक फ़ोटो सामने आ गया था और उसी फुर्तीले त्‍वरित अनुपात में मैं स्‍वयं को तीन कदम पीछे और कुछ अललबम बुदबुदाता पा रहा था. मानो ड्राइंग क्‍लास के ठीक बीच में बच्‍चा अपने पेंसिल बॉक्‍स के इरेज़र को केंचुये में लिपटा, या पेंसिल पर पिस्‍सु पा गया हो! और घबराकर बेंच पर खड़ा होकर चीखने की खलबल हो रही हो लेकिन मिस चैटर्जी से पिटने के भय में कुर्सी पर मुरझाया दुबका पड़ा आह भरता तबाह हो रहा हो!

ओह, चेहरे की आदमी खुद मैनुफैक्‍चरिंग नहीं करता, साइकिल रिपेयरिंग मास्‍टर रज़्ज़ाक मियां ने इतने वर्षों पहले कहा था, फिर उनके दीखने पर मैं क्‍यूं ऐसा हलकान, हैरान हो रहा था? शुचितावादी (इस शब्‍द के लिए एक दूर शहर की मोहतरमा हैं, उनका ताउम्र आभारी रहूंगा..) हिंसा नहीं कर रहा था? सही कर रहा था? शर्म और खीझ हो रही थी कि एक चेहरे के अदद दीख भर जाने पर इतना हड़बोंग, ऐसा हाई जंप, ऐसी गोताखोरी? लेकिन फिर लगा इस व्‍यक्ति के चीकटपने, उसकी आत्‍मा के तलघर के अंधेरों को पता नहीं क्‍यों जैसे मैं पहचानता हूं, इसका यह चेहरा बॉयोलॉजिकल उत्‍पादन नहीं, इसके घटिया धंधेबाज चीकटपने से जन्‍मा इसके निजी अंधेरे का उत्‍पाद है!

गले में अटके थूक को बाहर उगल आंखें मूंदे उस चीकट चेहरे को भूल मैंने हवा में ताज़गी महसूसने की कोशिश की..

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