(आमतौर पर ‘एम’ से इशारा ‘मर्डर’ का होता है, हिचकॉक की फ़िल्म ‘डायल एम फॉर मर्डर’ जैसे मशहूर साहित्यिक दृष्टांत इसकी पुष्टि करते ही हैं, लेकिन डायरी की वर्तमान एंट्री के नैरेटर ‘एम’ से किसी मर्डर की बजाय ज़्यादा आशय संभवत: उसके ‘मोरोज़’ होने का लगाया जाना चाहिये. कम से कम मैं तो इसी सहूलियत का सहारा ले रहा हूं..)
वापस घर लौट आया हूं (जाने की अब जगहें भी कहां रहीं? जीपी के यहां रम पीने जा सकता था, लेकिन रम से ज़्यादा उसके ठिये उसकी तक़लीफ़ों का वही घिसा जाम होता कि दोस्त, लंबी कहानियां बारह निकाल लिये किंतु उपन्यास कभी निकाल पायेंगे? और खींच-खांचकर किसी तरह निकाल ही दिया तो अपने को सर्वतत्ववादी समझनेवाले ये बुड्ढे उसकी हवा नहीं निकाल देंगे? बहुत डिप्रेसिंग है, यार, लिख-लिखकर रीम पर रीम काग़ज़ के निकाले जाओ, और कोई अजाना-दीवाना एक ख़ास नज़रों से देखता, मिठास में लपेट तंजभरा एक वाक्य कह जाता है और आपका समूचा लेखन मिनट भर में गदहे की लीद में बदल जाता है! मैं इतना गंदा लिखता हूं, एम? इतना बुरा है मेरा लेखन, टेल मी, यार?..पूरी शाम, साला, इसी का रोना! मैं गंदा हूं, मैं महान हूं! अबे, गोबर, पहले अपनी लीद पर खुद एक राय मुकर्रर कर लो, फिर दूसरों का मुंह जोहना शुरू करना! और मुझसे तो न ही पूछा करो, उपन्यास क्या मैंने तो किसी दिन तुम्हारी लम्बी कहानियों पर एक लाईन कह दिया तो उसके बाद रम क्या तुम हमें रेंडी के तेल के लिए भी न पूछो? अबे, कहां-कहां के जोकर आकर अदब में भरे पड़े हैं? गोबर के ऊपर कितना भी भीमकाय गोबर रखो, रहेगा अंतत: तो वह गोबर ही?) सड़कों पर भटकते साहित्य की चिंताओं में सचमुच कभी-कभी दिल टूट जाता है! उसके बाद घर लौटो तो वहां भी दिल के जुड़ने के रास्ते कहां निकलते हैं?
वापस घर लौटा हूं, और घर वैसा ही बदरंग और बेमतलब दिख रहा है जैसा सुबह छोड़कर गया था. छोटा बेटा खिड़की का लोहा थामे लरजती नज़रों फ़र्श और खिड़की की ऊंचाई ताड़ रहा है, कि खिड़की से नीचे कूदकर हीरोगिरी छांटी जा सकती है, या वह मुंह फुड़वाने का शॉर्टकट साबित होगा; अब चूंकि बेटा मेरा है तो कैसे भला ऐसे चैलेंजिंग रिस्क ले ले? नहीं लेता, नीचे कूदने की जगह, नाक में उंगली से कुछ खोजने की एक नयी रचनात्मकता में संतुष्ट होने लगता है. दोनों बेटियां आपस में लड़ रही हैं, और एक अदद पेंसिल के पीछे लड़ रही हैं. निचली भागी अपने बचाव में मेरे पास आती है कि पप्पा, पप्पा, देखो, दीदी ने मेरा पेंसिल चुराया है!
मैं कह सकता हूं आखिर बेटी किसकी है, दिन भर मैं भी तो वही करता हूं! यहां-वहां से शब्द और बिम्बों की जेब काटता फिरता हूं, तेरी बहन बेचारी ने तो एक पेंसिल भर चुराया है! (ओह, तीनेक महीने पहले की बात है, जाने जीपी के यहां की खराब रम का असर था, या मेरी पिटी समझ का, भक्तिमय कुछ तमिल काव्यपंक्तियां थीं, उनकी चोरी तो चतुरायी से कर ली मैंने, मगर मेरे भावपूर्ण गद्यानुवाद में वह कुछ ऐसे कामोत्तेजक बिम्बों में बदल गयी कि इसका सही-सही अहसास तो मुझे तब जाकर हुआ जब एक क्रिस्तान स्कूल में बच्चों के बीच मेरे परचे के पाठ पर ननें मुझे पीटने को उद्यत होने लगीं! क्या जीवन में कवि स्वाभिमान के ऐसे तुच्छ अपमानों का सिलसिला कभी बंद होगा? फारसी के किस कवि ने कहा है कि चोरी बड़ी सुकुनदेह हुआ करती है, एक बार कर लो तो फिर ताउम्र आरामदेह हुआ करती हैं? कवि ने कहा है तो साफ़ दर्शाता है कवि आरामदेह कमरों में रहा है, जीवन की वास्तविकतायें उसे छू तो गयी हैं, लेकिन वह उनको छूने व उनका वास्तविक मर्म आत्मसात करने से रह-रह गया है!)..
तब तक रसोई के दरवाज़े पर बीवी नमूदार होती है, और बजाय इसके कि किसी ऐसी ख़बर से मेरा जी हल्का करे कि बिलासपुर या मनोहरपुर (या छोड़ो हटाओ, राजगांगपुर ही सही) में मेरी रचना का सार्वजनिक सम्मान हुआ है, राजकीय पुरस्कार की घोषणा हुई है, गंवार औरत वही वाक्य दोहराती है जो पिछले तेरह वर्षों से रोज़ शाम को सुनते-सुनते अब मेरे कानों में मवाद जमने लगा है! कि बैंगन के साथ कढ़ी बना दूं? जल्दी बन जायेगा और आप पसंद भी करते हो?.. इच्छा तो हुई कहूं, नहीं, स्त्री, पसंद तो मैं यह करता हूं कि बाथरूम की नाली के आगे तुझे पटक-पटककर तब तक पीटता रहूं जबतक मेरी देह न दुखने लगे, लेकिन ऐसा मैंने अंतत: स्वगत ही कहा, प्रकट महज मुस्कराकर अपनी ख़ामोशी को महिमामंडित करता रहा..
ओह, क्या मेरे जीवन के सारे प्रेम चुक गये हैं? वह महीन, कोमल, विद्युतरंग दृष्टि जो मेरी साहित्यिक उत्प्रेरणाओं का उद्गमस्थल होगा? क्या मन की उतृंग हरीतिमाओं में बांग्ला कन्याओं का अब फिर पुन: विचरण न होगा? क्या आगे का सबकुछ महज कबीर के एक दोहे में सिमटकर रह जायेगा:
जऊ निरधन सरधन कै जाईक्या सचमुच सुघड़, संस्कृति-सुरुचिसंपन्न बंगबालायें भोबिसत्त में हमेशा अब मुझे पीठ ही दिखायेंगी? जबकि मैं पेट देखने को तरसता रहूंगा? आह, रचनात्मकता में व्यस्क परिपक्वता प्राप्त करना भी क्या एक क्रूर दुर्योग है?
आगे बैठा पीठि फिराई।
मेज़ पर ‘प्रांजल बंग्ला प्रेमपत्रों का सरस हिंदी गद्यानुवाद’ व ‘क्या आप हूलियो सारांतिनो के साहित्य से परिचित हैं?’ के अनूठे साहित्यरत्न सुशोभित हो रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्या है उन्हें हाथ लगाने की मन में इच्छा नहीं हो रही!
(एम फॉर?.. महिषादल, मेदिनीपुर, मार्मिक, मांगलिक, मोहाबत, महावत, किंबा मरणासन्न?)