Saturday, January 31, 2009

एक्‍स्‍ट्रीमली सेंसुअस रोमान.. मीठा मन, बेमतलब?


पता नहीं क्‍या है कभी एक तस्‍वीर का एक छोटा मामूली टुकड़ा कि आंखों में एकदम अटक सा जाता है! रसोई की मेज़ पर धरे बर्तन की टेक, या खिड़की पर बैठी अपने पंख दुलराती, बेशऊर संसार को कैसी चमकभरी आंखों निहारती कोई चिड़ि‍या नेक.. कि आपको लगता है दिन क्‍या, दुनिया में होना सकारथ हुआ! थोड़ी देर पहले बेरुत में बसी पार्लर चलाती कुछ लेबनानी लड़कियों की ज़िंदगी के गिर्द बुनी एक मासूम-सी फ़ि‍ल्‍म देख रहा था, और एक सीन से गुज़रते हुए कुछ ऐसा अटक गया कि बैकग्राउंड ट्रैक की चोरी के बिना, ओह, रहा न गया. हालांकि तबीयत तो हो रही थी सीधे लड़कियां ही चुरा लूं, मगर तकनॉलजी ने अभी इतनी तरक़्क़ी कहां की है?..

पॉडकास्‍ट का टेक्‍स्‍ट बस यूं ही संगीत के सुर में नहाये-नहाये, बोलते-बोलते रिकॅर्ड किया गया है, कृपया उसकी भाषायी अशुद्धियां, भदेसपने का मज़ाक न बनाइयेगा..

5 comments:

  1. अरे, आह! अबे, किस तरह की हिंदी है ये, किस अहिंदीभाषी प्रदेश से उड़ाकर लाये? दिन होती है? होती? कब से दिन होने की जगह होनी लगी? थकी-थकी, हारी-हारी? ओह, हारे हुए पतनकास्‍टर! सैडिस्टिक लिंगो मास्‍टर?..

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  2. कड़क है. आवाज के तरन्नुम में ऐसे ही बह गये, ओह!

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  3. apne post par apna hi comment???


    so desperate to b famous??

    very bad sir jee

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  4. एहसास सी है? एहसास सी है? अबे, हाऊ? जबीन, प्‍लीज़ टेक दिस ट्रेज़र अवे!

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  5. आपने बडे इत्मीनान से
    पोडकास्ट किया है ..
    और खिडकी की पट्टीयोँ से झाँकती स्त्री,
    एक अधूरी कथा कह रही है
    - लावण्या

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