Wednesday, January 7, 2009

पुरबिया फुटानीबाज का मेहराइल फन्‍नी-टे‍रजिक गीत



आइये महराज, लगाइये लात, घबराइये नहीं
कुच्‍छौ न करेंगे, छाती कपार पर चहरना
छोरिये, मालिक, आपका बालो न बरेंगे
हमरा हैसियत है, जी? मारिये-मारिये,
लजाते काहे ला हैं, घूम के मारिये
घुमाके मारिये, जवने से हो तवने
सहूलत से मारिये, हमको पिरेक्टिस है
लात खाने का ठाढ़े-ठाढ़े ढिमिलयाने का
हंसी-हंसी बल्‍ल देना बलुका बहाने का
थारी का दू गो रोटी अऊर चार ठो आलू पर
रेती-पानी गिरवाने का, गंजवाने का, आदत है
लजाइये नहीं, लात चलाइये, आपको हक बनता है
आपपे शोभाता है, हम लात खाते शोभाते हैं
दुनिया का पुरनका दस्‍तूर है कुछ लोग अपना
गोड़ का सुन्‍नरता परखने बास्‍ते लात फैलाते हैं
कुछ लोग जांगर का चिलैंजिंग में लाती का
परसाद पाते हैं, भरभरुआ माटी का मकानी
जइसन भर्र-भर्र ढहल जाते हैं. घरइल गोड़ का
सुन्‍नरता का परीच्‍छा होता है, अऊर हियां चमइल
चाम का कसावट का जंचाइल होता है, न-न, मालिक
लजाइये नहीं, खुलके चलाइये, ई देह आपही का है
हम थेथर हैं थुरावन परसाद हैं कचरलका कादो हैं
आगा-पीछा दायें-बहिना जेने नीमन लगे, धन्‍न
कीजिये, आतमाभर सजाइये, मनभर लात लगाइये.

9 comments:

  1. बहुतहे खूब कहे हैं

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  2. चचा जे थूरे क आदी ह एक बार ओकरो थुराई हो जाए तब तब आई असली मजा।

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  3. एतना लतमरुआ नीअर काहें चिघर रहें जी। जेकरा लात लगाने का मन करेगा ऊ आपसे नेवता थोरे न माँगेगा। दलिद्दर झारने का एगो मोसम होता है। बस अब निअराया ही है। जब घानी बाज जाय, कुछु कह नाहीं सकते हैं...। कौनो तैजुब मत करिएगा।

    जै राम जी की...। :)
    हमको समझ नहीं आया कि एतना बिलाप काहें कर रहे हैं। ऊहो हिन्दी के बँटवार लागाके...?

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  4. @त्रिपाठी जी,
    सही कह रहे हैं. मगर लात खायेवाला बहुत समझदारी कहंवा से झाड़ेगा. फुटानी में बकरी माफिक मेमिया रहा है, बेचारे की नदानी बख्‍श दीजिये.

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  5. बड़ा दर्द भरा आवाहन है!

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  6. सही बात है। हम थेथर, थुरावन प्रसाद या कचरलका कादो ही हैं। वैसे हम गर्व से अपने को हिन्‍दू, हिन्‍दीभाषी, भारतवासी, जनवादी, समतावादी और ना जाने क्‍या क्‍या कहते रहते हैं।

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  7. कबीर दास 'रिलीव' होकर चले गए का ? 'चार्ज' आपको दे गए हैं ?

    हमको तो उहै चाम चींथने वाला बिंग-बान,उहै दुखिया सुर बुझाता है .

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  8. थुरावन परसाद... बहुत सारी यूनिक बातों में एक शब्द यह भी :)

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