Sunday, February 1, 2009

क्‍या वजह है लिख नहीं पा रहा..

कुछ दिन हुए लिख नहीं पा रहा. ख़ैर, फिर कुछ दिन होंगे लिख पाने लगूंगा. सभी बड़े लेखकों के साथ होता है. वह क्‍या तो पुर्तगाली या पता नहीं कहां का लेखक था नोबेल पाते-पाते रह गया था, लेकिन हाथ का ठहरा-ठहरा कलम उनासी वर्षों तक चलता रहा. उसके बाद उसकी मौत हो गयी तो लाजिमी है लिखना अटक गया. उस पुर्तगाली या जहां कहीं का भी वह नामवर लेखक था ईश्‍वर उसकी आत्‍मा को शांति दे. मेरी आत्‍मा को भी दे क्‍योंकि रहते-रहते सोचकर कब्‍जवाली चढ़ी-चढ़ी-सी खासी झुंझलाहट होने लगती है कि क्‍या वजह है लिख क्‍यों नहीं पा रहा. मकान-मालिक ने घर खाली करने का नोटिस नहीं दिया न जिस मकान में साले साहब ने हमारी पूंजी लगायी हुई है (साठ परसेंट हमारा है, तैंतीस साले जी का, बाकी के सात परसेंट पूजनीय सास- अबे, कहां की पूजनीय, हरामखोर खड़ूस बुढ़ि‍या कहीं की!- के) उसके बिल्‍डर के पैसों के साथ फरार होने के अंदेशे हैं, फिर जगजीवन प्रकाशन की संवेदनप्रभा मालकिन ऊषाजी अबभी मेरे मेंहदी रंगे बालों पर इसरार से इत्र छिड़कती हैं, और मेरे किसी जिगरी यार ने अभी तक तो मेरी किसी लंबी कहानी का प्‍लॉट उड़ाकर ‘संभव’ या ‘यथासंभव’ में अपने नाम से छपवाया नहीं है. फिर क्‍या वजह है कि मैं लिख नहीं पा रहा?

क्‍या मेरे अंतर की ईर्ष्‍या है जो मुझे लिखने से रोक रही है? बलराज की कहानियों का सुनते हैं हंगरी के किसी गुमनाम से प्रकाशन में अनुवाद छप रहा है, या बलविंदर की ताज़ा कवितायें एक अवांगार्द मणिपुरी एंथॅलॉजी में आ रही हैं, क्‍या बिरादरी में हमपेशा साथियों को यह अचानक मिल रही सफलता मेरे रूद्ध लेखन व अवसाद का मूल है? क्‍या मैं उम्र के वसंतों को पीछे छोड़ने के साथ इस कदर छिछला, आत्‍मकेंद्रित होता जा रहा हूं? क्‍या मैं किसी भी दिन यह भूल सकता हूं कि बलराज (और किन्‍हीं सीमित अर्थों में बलविंदर भी) मेरी बदनामियों व बदगमनों में मेरा सबसे करीबी यार रहा है? सब्‍जीमंडी वाले मकान और चोरकलान गली वाली घटिया नौकरी के बावजूद मैं आज, अभी तक अगर लेखक बना हुआ हूं तो उसके पीछे एक और सिर्फ़ एक शख़्स जिम्‍मेदार है, मेरा अपना बलराज (और किन्‍हीं सीमित अर्थों में बलविंदर) ?

यह सच है कि मेरी मशहूर लंबी कविता ‘ओ मेरी नाक़ामियां तू छोड़ आना मुझे उस गांव जिसके नमक का स्‍वाद जानने से मेरा अजन्‍मा बच्‍चा रह गया’ का अनुवाद गुजराती में तब हुआ था जब बलराज को लोग हंगरी क्‍या हरियाणा तक में नहीं जानते थे (अब भी जानते हैं इसकी काफी आशंका है) ! गुजरात के रास्‍ते बंबई के उपनगर गोरेगांव पूर्व में भी मेरा एक संक्षिप्‍त नागरिक अभिनंदन हुआ था, मेरे हाथों तीन सौ रुपयों का एक पोस्‍ट डेटेड चेक व एक सस्‍ते शॉल की अर्पणा हुई थी (क्षमा करें, जानता हूं वाजिब शब्‍द नहीं लिख रहा, लेकिन अर्पणा से अलग फिलहाल कोई अन्‍य शब्‍द सूझ नहीं रहा. अर्पणा तक ही लिख पा रहा हूं यह अपने में महत्‍तम अचीवमेंट नहीं?). गुजरात की उस ऐतिहासिक यात्रा से वापस शहर लौटकर खबर हुई कि मेरी गैरहाज़ि‍री में बलराज ने यहां-वहां, कहां-कहां मेरे कवि-कल्‍पना, काव्‍य-रचना व मार्मिक साहित्‍यउत्‍सों का गंदा मज़ाक बनाकर रखा हुआ है, मेरे व मेरे साहित्‍य के खिलाफ़ कैसी बेहूदी गॉसिप-मॉंगरिंग करता रहा है (और सिर्फ़ बलराज ही नहीं, किन्‍हीं सीमित अर्थों में बलविंदर भी!). हम काफी महीनों तक एक-दूसरे के संपर्क में आने से बचते रहे. वस्‍तुत: बचता बलराज ही रहा था, मेरे मोर्चे पर महज ख़ामोशी थी. क्‍योंकि इस समूचे आततायी, आतंककारी, एंटी-लिटरेरी प्रसंग का मुझपर ऐसा गहरा सदमा पहुंचा था कि महीनों न मैं ऊषाजी के प्रति मन में कोई विशेष मनोभाव अथवा प्रेम जेनरेट कर सका, न किसी भी तरह का साहित्‍य उत्‍पादित कर सकने में समर्थ हुआ. शोक व सन्‍नता के वे गहरे, भीषण दिन थे..

लेकिन यह सब बहुत पहले की बातें हैं. इधर कुछ दिन हुए मैं लिख नहीं पा रहा, क्‍यों नहीं लिख पा रहा हूं? राजस्‍थान की एक मशहूर कवियत्री(?) कह गयी हैं (या कवियत्री गुजरात की हैं, कोई साहित्यिक षोडशी कृपया इस पर शोध करेगी?): “संतों, मारो कलम हेराणो हो, संतो, मेरो कलम हेराणो ।” मेरा तो कलम भी नहीं खोया, हमेशा का पेंसिलधारी ठहरा, फिर क्‍यों नहीं लिख पा रहा? संतो, कुछ बको भाई?..

4 comments:

  1. अब शुरू तो हो गये। इत्ता लिख लिये इसके बाद पेंसिल दुबारा छील लीजिये न!

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  2. आपकी पर्सनल रिक्वेस्ट मिल गई:

    संतो, कुछ तो बको!!

    अब का बके..यहाँ तो खुद ही पटखनी खाये आकाश ताक रहे हैं मूँह बाये.

    आप तो फिर भी अधछिलि पेन्सिल से काफी घसीट ले गये. :)

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  3. प्रमोदजी! हेट्स आफ टू यू। लोग तो न लिखने से उपजी पीडा से कराह भी नहीं पाते और आपने तो न लिख पाने को लेकर इतना सब कुछ लिख दिया? वह भी ऐसा कि जी अश! अश! कर उठा।
    सलाम! फर्शी सलाम।

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  4. आप जैसी ही एकालापी पोस्ट अब मुझे भी लिखनी ही पडेगी ! मैं भी बहुत समय से लिख नहीं पा रही हूं !

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