Monday, February 2, 2009

लम्‍बतम, किम्‍बा 'लम्‍बीतम' कविता..?

29 दिसम्‍बर, 2008, प्रयाग.
लिख ली. अंतत:. अबतक की अपनी सबसे लम्‍बतम (किम्‍बा ‘लम्‍बीतम’?) कविता! ओह. सोचकर चकित हूं. विगत कई दिन हुए सोचकर चकित होता था इच्‍छाशक्ति के चरम मंजाव पर भी यह संभव न होगा. न लिखी जा सकेगी. लेकिन लिखते-लिखते अंततोगत्‍वा लिख ही ली गयी. कैसा तो विरल अनुरागी रागात्‍मक रचनात्‍मक क्षण! अर्से बाद ऐसा हुआ. कि गहरे अंतर्द्वंद्व के तनावबद्ध शब्‍द ऐसे सरस शब्‍दबंध में सहजभाव निसृत हुए, होते गये. मन में लगता है मानो दस झरने बह रहे हों. अंत:प्रातंर में माधुर्य-सुरभि का कोई दिव्‍यप्रकाश दिप्-दिप् जल रहा हो! इच्‍छा हुई पृष्‍ठ में डोलती स्‍त्री के गंदले नयन पट स्‍नेहरत्‍न उन्‍नत अपने चुंबनपुष्‍पों से ढंक दूं! जानता हूं कविताविमुख स्‍त्री उसकी अधिकारिणी नहीं, किंतु मनमादल पर तीव्र श्रृंगारदल दोल-वादन कर रहे हैं, उनका क्‍या? ओह, क्‍या जल्‍दी ही मैं अपने समय का मेघदूत लिख रहा होऊंगा? उत्‍साह का इतना अतिरेक संभवत: न्‍यायसंगत नहीं. अपने समय का लिखूं इसके पहले उचित नहीं कि कालिदास के समय का पढ़ लूं पहले? किंतु मेघदूत पढ़ना क्‍या सचमुच ज़रूरी होगा?

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समझ नहीं पा रहा अपनी लम्‍बतम (या ‘लम्‍बीतम’?) ‘नया साहित्‍य’ को प्रेषित करूं कि ‘नया सूर्योदय’? दोनों ही ग्‍लानिपूर्ण म्‍लान साहित्‍येतर राजनीतिक विवादों का केंद्र. मेरी कविता के प्रति वहां न्‍याय हो सकेगा? सोचता हूं मित्र सत्‍यव्रत नारू की राय लूं, फिर पुन: यह भी सोचता हूं मित्र सत्‍यव्रत नारू की राय क्‍या होगी. कहेंगे अभी कविता हुई नहीं, शिल्‍प में इसे और बांधो, मांजो. याकि कविता पर विष्‍णु खरे, किम्‍बा कुंवर नारायण के प्रभाव की छायायें हैं! नहीं, तत्‍क्षण मित्र सत्‍यव्रत नारू की राय लेने की इच्‍छा राय लेने के पहले ही मृत्‍युप्राप्‍त होती है. कविता को खत्‍म हुए तीन घंटे हो चुके हैं और वह कहां भेजी जायेगी का प्रश्‍न अभी भी अनिश्चित है की बात सोचते हुए मन में भय के काले, घनेरे बादल फैल रहे हैं!

05 जनवरी, 2009, इलाहाबाद.
नववर्ष मंगलतम! रचनात्‍मकता के गहरे रागात्‍मक चुंबकीय एंद्रीकता की नम अंतरंग आत्‍मीय क्षणों के अनंतर बहुत दिनों बाद घर से बाहर निकलना संभव हुआ. ओह, समाजानुराग के कैसे ताज़ा हवा के झोंके. कभी-कभी? पुष्‍पवंदनताजवंतजी से मुलाक़ात हुई. पुष्‍पवंदन भी इन दिनों लम्‍बी कविताओं को लेकर पिले पड़े हैं, मैंने किंचित प्रभावोत्‍कारी मद में लरजते इशारा किया ‘निशांत’ का नया अंक आने दो, गुरुवर, फिर अपन लम्‍बी कविताओं पर चर्चा करेंगे! पुष्‍पवंदन का चेहरा फक्‍क. मैं इलायची की चाय की चुस्कियों में महकता, लम्‍बवत लताओं सा लहकता रहा..

ताजवंतजी भारी ज्ञानी पुरुष. उनके आगे मुंह खोलते भय होता है. किंतु पुरानी आदत है मुंह खोले बिना रहा भी नहीं जाता. इन दिनों ताजवंतजी आदि-तमिल साहित्‍य की भक्ति में गहरे डूबे हुए. मैंने किंचित आश्‍चर्य दर्शाते कहा, बाबा, साहित्‍य में इतना पीछे लौटकर चीज़ों को देखना क्‍या उचित है? वह भी तमिल साहित्‍य? क्‍या साहित्यिक कार्यव्‍यापार भविष्‍य इंगन-दिर्ग्‍दर्शन नहीं? ताजवंतजी भड़क गये, मैंने कहा शांत हों, गदाधारी गुरुवर! संक्षिप्‍त-सी मुलाकात में मन खिन्‍न हो गया. कैसे-कैसे क्षुद्रमना, खिन्‍नधनी लोगों से अपना साहित्‍य भरा पड़ा है? अपना ही क्‍यों, संभवत: तमिल साहित्‍य भी इन्‍हीं गंदगियों में लिप्‍त हो? जेब में अपनी लम्‍बतम (या ‘लम्‍बीतम’?) कविता लिये गया था लेकिन ताजवंतजी के संकुचित लघुकाय संकीर्ण संसार में उसे प्रकाशित करने की इच्‍छा पर मानो वज्राघात हुआ. कविता जेब में ही रही. मन में मौनवीणा का मौनरागम बजता रहा.

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इंदु ने पत्र लिखकर जानना चाहा है क्‍या बिंदु से भी मेरे वैसे ही गहरे, आत्‍मीय, रागात्‍मक संबंध हैं जैसे चंद महीनों पूर्व इंदु के प्रति होने की मैंने सघन घोषणाएं की थीं? (वैसे मेरे लिए खबर है, कब की थी, भई? ओह, यह क्‍लांतकन्‍यायें कैसे-कैसे तो कल्‍पना प्रांजल विहानों में विहगती रहती हैं, यथार्थतल पर लायी जाते ही कैसे तो अलबल बकने लगती हैं?) इंदु को तत्‍काल पत्र लिखकर सूचित किया, प्रिये इंदु, तुम मेरे जीवन का पूर्वप्रांतर हो, हमेशा रहोगी. जबकि बिंदु का कहां कोई प्रांत है, वह तो सदा-सदा की देशनिकाला है, नहीं है? (किंतु क्‍या किसी देशनिकाला को स्‍नेह-शरणागत होने का हक़ नहीं? यह मैंने इंदु से नहीं, बिंदु को अलग पत्र लिखकर स्‍नेह-सूचित किया..

1 comment:

  1. साहित्यकार जी को हिंदी युग्म की सदस्यता दिलवाइए, फिर देखिए कि कविता के आकाश पर वे कैसे देदिप्यमान नक्षत्र बनकर उभरते हैं.

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