Wednesday, February 4, 2009

सांवली रुपाली की तीन तुकबंदियां.. क्षमा करें इन्‍हें कविता मानने से पतनशील संपादक मंडल गुरेज करेगा..



तुम्‍हारी यादों में
रेगिस्‍तान के प्‍यासे को जैसे गांव का कुंआ याद आता है
लुटे व्‍यापारी को याद आयेगी ईश्‍वर की फिंकी, फाड़ी तस्‍वीर
जब सारे मेले चुक लेंगे जब रात अंधेरी काली गाढ़ी होगी
आऊंगी तुम्‍हारी यादों में खोयी टिमटिमाती एक लक़ीर।

अन्‍तर की चाहना
खिंच लो खिंच आऊंगी, भूला दो भुल जाऊंगी
सब कहीं हूं सुबह की ओस भोर का सपना हूं
अन्‍तर की चाहना में पुकारोगे मिलूंगी हर पल
रोकर गुज़ारोगे हैरान देखूंगी, हसूंगी, उड़ जाऊंगी।

मेरा ठिकाना
नाम मत पूछना, नाम में कभी बंधी नहीं
काम मत पूछना, काम नहीं समझोगे कभी
पढ़ सको तो मेरी आंखें पढ़ना वही नाम है
मेरा आंगन मेरी दुनिया सारे ठिकाने वहीं हैं
जहां दिखती वहां होती नहीं जहां हूं वहां मुझे
सुनने संवारने पहचानने कभी तुम आये कहां।

(निरुपमा दी के लिए..)

10 comments:

  1. इ पतनसील शंपादक तो मरे हुए जानवर की हड्डी लेकर तमाम कवीयों, लेककों, रचानाकरों के पीछे हाथ-मुंह और जाने क्या क्या धोकर पीछे पड़ गया है.
    आगे के एपीसोड का हंसते-हंसते ईंतजार हे...

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  2. ओहो, ओहो, केतना अच्‍छा, केतना अच्‍छा, जय हो रुपालीजी मतवालीजी?
    रात कली एक खाब में आयी सुबह हुई त माथा पे टेकुलि सजायी?
    दुनिया ओ दुनिया तेरा जवाब नहीं, तुम मेरे पास होते हो तो कोई दूसरा नहीं होता!
    ओहो ओहो ओ जानेवाले हो सके त लौट के आना?
    -प्रीतक्रंदन प्रामानिक,
    पुरुनिया

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  3. तेरे पीछे ठाड़ा है जमाना
    , दीदी
    नहीं पिछुआना घबराना, दीदी
    कवनो के पटक-पटक के पीटे
    के होगा त हमको बोले से नहीं
    सकुचाना मत लजाना, दीदी!

    -बजरंगी महतो, मोजफ्फरपुर

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  5. Are we ever going to have a clean and democratic governance in this country? We all need to pull ourselves together and make something amazingly beautiful out of this wreck of a country.
    -Marc Zelip,
    PR, Botswana
    Fair & Lovely,
    Central African Distribution

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  6. सब मित्‍था है, झुट्ठा गल्‍प-परपंच है!
    सांवलिया रुपलिया परेम का क ख ग क्‍या घेंवड़ो नहीं जानती! परेम में जनाना पगला जाता है, लैन पे लैन का मोहबत मुसंबी सेतार नहीं छेरता!
    -प्रेम कलं‍किनी,
    पीरमोहाना, सहरसा

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  7. We are keeping an eye on you, Mr. Marc, we're not letting you spoil and dirty this pure, godly soil of our mother earth!
    Young Botswana Radicals
    Feb Nine Declarations

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  8. अरे, एही बदे न जमाना तोहरा के प्रेम कलंकिनी बोलाता है? चोट्टी कहीं की, जबरिये दीदी को गारी दे रही है, जरा मजाली त देखो मुंहजार का? अरे, हरमखोर, परेम में दीदिया पगलाइल लैन थोरे लिख रही है, आसिक पगला जाये, उसका चैनधन हेराय जाये, उसका मनिफेस्‍टो परर्ह रही है! मगर तू कलंकिनी को कइसे बुझायेगा? तरंगिनी होती तब न बुझाता, जी?
    -बजरंगी महतो, मोजफ्फरपुर

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  9. why u r posting ur own comment on ur ur post only .the annonymous post r only written by u. sir jeeblogger.com

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