Thursday, February 5, 2009

कहानियां लिखनेवाले की कहानी?..

सोचते हुए माथा धुनने की इच्‍छा होती है कि आखिर क्‍या है जीवन का तार पकड़ में क्‍यों नहीं आता, आयेगा तो किस तरह आयेगा? खिड़की पर खड़े होकर बाहर देखते हुए वह पकड़ में चला आयेगा, या बाहर से खिड़की के भीतर झांकने पर वह स्‍वयं को प्रकट करने लगेगा, वह क्‍या तरीका होगा जिससे जीवन के तार को जीत लूंगा? या कम से कम ऐसी पहचान हो जायेगी कि उसकी गुत्थियों का कुछ सिरा मेरे हाथ लगेगा? सोचता हूं और फिर तालू पर सूखेपन की अनुभूति होती है, सदियों का सूखापन, जैसे इस प्‍यास का इलाज नहीं!

लिखता हूं लिखता हूं लिखे चला जाता हूं फिर जिस बिंदु पर ठहरता हूं वह क्‍या जगह होती है और उसके आगे जो स्‍पष्‍ट नहीं दीख रहा होता है वे कैसे, किन रास्‍तों के इंगित होते हैं? फिर सोचते हुए लगता है कि इस उलझन की सरल, जटिल जैसी भी समीक्षा करूं, वह स्‍वयं को एक भोली उम्‍मीद में भुलाये रखने, एक नशीले झांसे से अलग कुछ है हो सकेगा? क्‍या यह अधबीच लेखन ठहरा बिंदु नये पाठों, सन्‍दर्भों को जांचते हुए फिर वहां से शुरू करो आगे चलो का महज़ इशारा भर होगा? किंतु इसका स्‍पष्‍ट मतलब यह कैसे नहीं होगा कि आगे का लिखा पढ़े पाठ के प्रभावी छायाओं के असर में तब खुद को लिखवा नहीं रहा होगा? क्‍या यह लेखन साथ पढ़े जा रहे पाठ की संगत का घटिया ‘डबल’ मात्र न होगा? ओह, अधबीच अटके लेखन के आगे की अवचेतना के झीने परदों के गुंठनों को सलझाना क्‍या एक आंतरिक, मर्मांतक अंतहीन युद्ध का आयोजन नहीं? ऐसा युद्ध जिसमें साथी और दुश्‍मन की पहचान लगभग, लगभग असंभव हुई जायेगी बनी रहेगी?

कभी सोचता हूं जीवन में ‘विचार’ को ऐसी प्रमुखता देना ही कला के सहज, स्‍पॉनटेनियस उद्गम के रास्‍ते सबसे बड़ी बाधा है. ‘विचारमुक्‍त’ होकर संभवत: रचनात्‍मकता के मैं नये मुकाम पहचान पाऊं, स्‍वयं को नयी चेतनता की नीली झील में उमगता रौशन देख पाऊं? बुद्ध का सहज, सरस ‘द एंड ऑफ़ सफरिंग’ की निस्‍सीम शांति की चरमावस्‍था? दिक़्क़त है बुद्ध का गहरे क्‍या मैंने अगंभीर अध्‍ययन भी नहीं किया (ओह, इतने वर्षों ज्ञान के कैसे कुसंगों में उलझा रहा मैं?). धर्मशाला में बिताये तीन महीनों बौद्धों के बीच मैं केरल में अरब व्‍यापार की चर्चाओं में उलझा रहा था? क्‍या करता रहा था धर्मशाला में? मनुष्‍य की स्‍मृति ऐन नाज़ुक मौक़ों पर उसे क्‍यों धोखा देती चलती आती जाती लौटती फिर चली जाती है? किंतु यह भी सत्‍य है कि धर्म मेरे जीवन का अपेक्षाकृत कमज़ोर तत्‍व रहा है. बचपन में माता के संग कसौली में बिताये वर्ष ऐसी यादों से भरे पड़े हैं (माता कहतीं धर्म से तू इतना अछूता क्‍यों रहता है, पुष्‍पांक, कहीं मेरी ममता के प्रकाश में धब्‍बे तो नहीं रह गये?). विमलजी भी मेरी धार्मिक निस्‍संगता के प्रसंगों पर स्‍तब्‍ध रहा करते..

किंतु ‘विचार’, ‘चिंतन’ से स्‍वतंत्र लेखन में आस्‍था व जुड़ाव को बांधे रखा जा सकेगा? क्‍या वह नये आंतरिक स्‍खलन, एक नयी उश्रृंखल व्‍यर्थकारी उद्यमशीलता बनकर न रह जायेगी? सोचता हूं कितना प्रीतिकर होता जो बुद्ध के सत्‍संग में इन प्रश्‍नों की गहरी, बौद्धिक समीक्षा हो सकती! पिरिंदी, दसकानसोंदाली, त्राक्ष्‍वी, तोमास्‍सो सब ही मेरी तरह मुश्किल क्षणों में बुद्ध सत्‍संग की ऐसी ही करुण कामना करते रहे हैं (किंतु क्‍या मेरा साहित्‍य उन ऊंचाइयों को छू सका है? ‘तद्बल’ और ‘वियोगवाणी’ का श्रद्धापर्व उस अनुरागी मनोहारिता के कहीं भी निकट पहुंच सका है?).

किंतु असल प्रसंग तो अशेष रहता ही है कि जीवन के तार पकड़ में क्‍यों नहीं आते..

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