Saturday, February 7, 2009

ज़हाने-जलेबी ऊर्फ़ मसालात एक अटकी मुहब्‍बत का..

लड़का क्‍या था सूखकर सूखी लकड़ी हो रहा था, जाने जिजीविषा की क्‍या बेहया ज़ि‍द थी कि किसी यतीमखाने के फटी खुरचनों, तार-तार होती खाट की उरचनों पर गिरा होने की जगह अभीतक साबूत ज़मीन पर खड़ा था, और मज़ा यह कि ग़ुमनाम हवाओं की चंचलता की बनिस्‍बत मलिन मन की उमगताओं में डोल रहा था! बेडौल लड़की अडोल स्थिर और ग़मज़दा थी, मानो ऋतिक रौशन से शुरू हुई बात अंतत: राजपाल यादव की मंगनी पर आकर खत्‍म क्‍या होती, ऐन शादी के बखत बात खुली दुल्‍हे का दाहिना पैर पोलियो-पीड़ि‍त है हवा में झूल रहा है, जबकि लड़की झूल नहीं रही, अडोल स्थिर खड़ी थी..

लड़का चंचल लतर हो रहा था, कांपती आवाज़ में मिमियाकर बोला- किस बात पे किस बात पे किस बात पे दुखी हो? ऐसा क्‍या हुआ क्‍या किया हमने, जवाब दो?

लड़की कुछ नहीं बोली, सूखे हलक से ज़रा-सी थूक हवा में उछाल अंगूठे से ज़मीन खुरचने की बेपरवाही ज़ाहिर करती रही. लड़का भीतर ही भीतर दिन का कौन वक्त था जब नहीं मचलता, फ़ि‍लहाल बाहरी तौर पर भी अंदरूनी तहख़ानाय बेचैनियां खनकाता रहा.

- हर घड़ी तुम्‍हारी ही सोचता हूं.. दिन में तुम्‍हें चार-चार ख़त लिखता हूं.. आखिर और क्‍या चाहती हो?

लड़की ने लड़के को उन नज़रों से देखा सत्‍तर के दशक में सिनेमाहॉल के बाहर शरीफ़ घरों के बिगड़े बच्‍चे ब्‍लैक में टिकट का बेहूदा पैसा मांगनेवाले ब्‍लैकियों को जिन हिक़ारती नज़रों से देखा करते. देखती रही बोली कुछ नहीं.

- क्‍या है ऐसे क्‍यों देख रही हो? चमककर लड़के ने घबराया सवाल दागा.

- फिर कैसे देखूं तुम बात ही ऐसी बेवक़ूफ़ि‍यों की करते हो?

- जाने क्‍या है मुझसे चाहती हो? इतना कुछ तो तुम्‍हारे लिए करता रहता हूं! फ़ोन के ज़माने में ख़त लिखता हूं, दिल निकालकर दे दूं फिर खुश रहोगी?, फिर वही चढ़ी हारी मिमयाहटें..

- उसका मैं क्‍या करूंगी?- लड़की बेरूखी से उसकी बात काटकर बोली, फिर वही उड़ी-उड़ी हिक़ारती नज़रों से उसे तकती रही, ज़रा ठहरकर बोली- तुम्‍हारा लिखना न लिखना सब बराबर है!

- मतलब? दिन में चार-चार लिखता हूं और तुम्‍हारे लिए उनका मतलब नहीं?

- उनमें मतलब जैसी कोई बात हो तब तो मतलब होगा! न मेरी सहेलियां समझ पाती हैं, न मुन्‍नू के भेजे में उनका मतलब घुसता है.. हारकर कल मैंने अम्‍मी के हाथ रख दिया कि किसी दोस्‍त की चिट्ठी है ज़रा पढ़कर समझा दो, बेचारी पांचेक मिनट तक उससे जूझती रही, फिर बोली जाने क्‍या जलेबीनुमा बातें लिखी हैं, हमारे तो घेला भर समझ नहीं आया!

लड़का सन्‍न अपनी मुहब्‍बत का इस क़दर बेदिल, बेरहम नुमायशी तमाशा सुनता रहा, लड़की बेधड़क बोला करती रही- क्‍या फ़ायदा ऐसे इज़हारे-मुहब्‍बत का जिसका इशारा हमारी सहेलियां तक न समझ सकें? अम्‍मी तक बुरा न मानें, फिर फ़ायदा क्‍या? रहने दो खुद को हलकान न करो दुखाओ मत, हमें ख़त न ही लिखा करो!

लड़का लतरों की तरह आंखें फाड़े बेवज़ा लहराता रहा, बेडौल लड़की अडोल अपनी जगा स्थिर बनी खुद को शहंशाहे-आशिको तक़लीफ़ कहनेवाले को नहीं जाने क्‍या था किस चीज़ को अपलक तकती रही..

2 comments:

  1. माफी...
    लेकिन क्या करुं,हंसी ही नहीं रुकी...इसे पढ़कर

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