Feb 9, 2009

शब्‍द..

कितने सारे तो. गिरे पड़े. कितना अच्‍छा होता लेकिन कहां हुआ की आह की भाप सोखते. तरतीब में गुंथने को अकारथ बिखरे. बेचैन. हदर-बदर भागते इधर-उधर किधर. बेचारे. शब्‍द. दानों के पीछे गिरी जातीं चिड़ि‍यायें सदल-बल. फिर कभी जैसे दंगों में छूटे ओह, लावारिस चप्‍पल. हल्‍ला. बहुत सारा. बच्‍चे. बहुत सारे. हौंड़ा-हौंड़ी में हिलगते भागते. पहुंचते. एक बच्‍चा. नहीं पहुंचता. खोज होती खबर होती हेरा गया. राह तकती इंतज़ार में आंखों के गूमड़ फूटते लेकिन फिर नहीं आता. खोया हुआ. शब्‍द. खोये से सन्‍नद्ध सही-सही अपने को ज़ाहिर कर पाने में हारी रह गयी बात. जगमग सितारों की समूची भव्‍य रात और फिर सुहानी सुबह का साथ. हूकते से साज़ घिरे, भय में बेसाख़्ता चीख़ते कभी बेसुरे. किंतु आत्‍मा थ्रिर रहती. बेआवाज़. जैसे कामों की अबल-तबल की घनघोरी व्‍यस्‍तताओं में न हो पाता हो खुद से संवाद. आंखों तक पहुंचना छूट गयी हो किंतु मन में उठती हो कभी बिन बताये आयी सुर्ख़ लाल ताप. हंसते फिरते हों सारे-सारे दिन लेकिन हंसी न हो. रोते में रोते में सूख जाते हों हलक लेकिन फिर यह भी याद पड़ता न हो कब रोये थे आख़ि‍री बार. या गिरे थे जब? तब से यूं ही तो पड़े थे.