उनींदे लैंडस्केप्स में अर्थधंसी चोटें..

कभी पास पहुंचकर नज़दीक से साबुत सिर-पैर
देखेंगे नहीं ऐसी बुढ़ायी पनचक्कियों की आवारा
हवा हूं. जाने कब किधर अचानक पीछे रह गये
खेतों की हरियालियां भरी-भरी मकई की बालियां.
ढलती रात का सूनसान भारी चद्दर कांधे गिराये
घड़ी भर ईनार पर सुस्ताये, हाय, बरगद के उलझे
लतरों में अपनी पहचान छिपाये, किसी भगोड़े भूत
की छाया हूं. ‘गाईड’ के एसडी बर्मन की मदहोश
माया हूं, होंठों पर आते-आते ओह, पहले ही ठहर
गयी, न देखे जा सके सपनों की काया हूं.
बालों में खोयी-खोयी सोयी चलती उंगलियां
कंघी की थपकियां, आंखों ने देखा नहीं है
देखेंगी अभी और कुछ देर बाद, एक महीन
कांटा गड़ा है नाखून के नीचे निकल आया है
ख़ून जाने किसकी शरारत होगी, मैं नहीं हूं.