Thursday, February 12, 2009

फिर जुगलबंदी..

दिशाहारा लड़का संभवत: महज मन में धमकते ताक़त को झोंकने की गरज से चढ़ान पर अपनी साइकिल के इंजन की उड़ान उड़ रहा है. खुले आसमान में एक बुढ़ाती चील अपना बिगड़ा सुर सेट कर रही है. एक गंवार ज़ाहिल कुत्‍ता है मुंह ऊपर किये चील के नीचे-नीचे दौड़ रहा है, मानो बुढ़इनी फलक से वैलेंटाइन का तोहफा फेंकनेवाली हो! तीन-चार छूटे हुए लावारिस सागवान के पेड़ हैं हैरत में सूखते कि पास-पड़ोस के सब कट गये फिर हमको किस मोहब्‍बत में छोड़ दिया? कहीं इसलिए तो नहीं छोड़ दिया कि आगे तिल-तिल का तूफ़ान जीना होगा, भारी भुगतान सीना होगा? लड़का इस चंहुओर की बेहाल हरियालियों से बेफिक्र, रॉड पर दायें-बायें धमकता- लरज़ता- उछलता उड़ा जा रहा है. होंठों पर ‘ओ मेरे शाहे खुबां, ओ मेरी जाने जनां, तुम मेरे पास होते हो कोई दूसरा नहीं होता’ नहीं है लेकिन मन में कुछ ऐसी ही शराब उमड़ी बरस रही है..

गांव के छोर और चढ़ान के ठोर पर जाने कहां से लड़की का आविर्भाव हुआ है. अंततोगत्‍वा अचकचाहट में साइकिली ठहराव हुआ है. अपने से घबराये लड़की-लड़का एकदम से बहककर ‘इमोशनल अत्‍याचार’ का कैलेंडर बांचने लगे हैं, पेश है एक अनकट सेलेक्‍शन:

- तुम यहां? किसी का वेटिन कर रही हो?

- ऊंहूं.. मेला देखने गयी थी!

- मेला तो तीन गांव उधर है..

- हम सोचे थे इधर है, इसी बास्‍ते.. इतना चढ़ाई चढ़े सब वेस्‍टेज हो गया!

- हूं.. अब क्‍या करोगी?

- अब घर से निकल ही गयी हूं तो कुछ देखकर ही लौटूं..

- इधर देखने को है क्‍या.. ऐसे ही फालतू थकोगी?..

- जो भी.. अब गलती हुई है तो सज़ा भी हमीं को भुगतना होगा.. ऐसे ही घर लौटूंगी तो मन को हर्ट करेगा..

- बुरा न मानो तो एक सजेसन बोलूं.. साइकिल पर आ जाओ, दोनों जने साथ-साथ देख लेंगे, कितना अच्‍छा लगेगा!

- क्‍या अच्‍छा लगेगा? ऐसा क्‍या देख लेंगे?

- पहले चढ़ोगी साइकिल पे तब न समझोगी?

- अरे, ऐसे ही साइकिल चढ़ जाऊं, इतनी बेसरम हूं? तुमको हम जाने कहां हैं.. भरोसा करने में हमको टाईम लगता है!

- ठीक है, आगे मत बैठो, पीछे कैरियर पर बैठोगी उसमें तो भरोसा कर सकती हो न?

- मालूम नहीं, दिलीप के संगे कैरियरे पर बैठे थे, गलती से जाने कब उसकी पीठ से मुंह टचा गया था, पूरा शाम हम लाज में कैसे तो सिकुड़े-सिकुड़े बैठे रहे..

- मेरे से मत टचाना, होंठ पर चुन्‍नी बांधके बैठना, कहां कहां का फालतू चिंना करती रहती हो?

- तुम पर भरोसा कर सकती हूं? रियल में? प्‍लीज़, बोलो ना?

- ऐसी बात का कोई जवाब होता है? या तो होता है या फिर नहीं होता है, भरोसा, नहीं?..

लड़का साइकिल के रॉड पर स्‍नेहिल हाथ फिराता है, लड़की का कोमल चेहरा देखता है, पीछे अटके हुए कुत्‍ते की बेकली देखता है. ऊपर आसमान में बुढ़इन चील अभी भी अपना खोया सुर खोज रही है..

12 comments:

  1. मुझे कुछ नहीं मिला इसमें,,,,आपने क्या तलाशा?

    ReplyDelete
  2. @तनु,
    चील का सुर समझने के फेर में ढेर हुआ होऊंगा?..

    ReplyDelete
  3. सम्वाद अगे क्यो नही चला? मै तो साथ बह चली थी!

    ReplyDelete
  4. बात आगे बढ़ाइये न! बहुत दिन हो गये आप एक्को प्रेमपत्र भी न लिखे। कित्ता तो खराब बात है।

    ReplyDelete
  5. अजब रसायन, गजब स्वाद। वैलेंटाइन मन गया।

    ReplyDelete
  6. Pramod ji,
    cheel ke sur ko samajhne ke fer men apne achchha velentine mana liya.
    Hemant Kumar

    ReplyDelete
  7. इ तो वाकई इमोसनल अत्याचार हुई गवा। हम तो इंतजार ही कर रहे थे और आपने फच्च से पोस्ट का दि एंडे कर दिया। ऐसन तो टीआरपी मेंटेन करना मुसकिल हुई जावेगा, अब इस कहानी को तो पब्लिक डिमांड पर आगे बढाया ही जाए। वैसे भी बहुत दिन हुए आपकी कोई कथा-कहानी पढ़े हुए, चीन यात्रा के बाद तो आप कहानी लिखना ही बंद कर दिए हैं।

    ReplyDelete
  8. इहे ला बताये थे कि जा के ब्ल्लौग पे लिख दिजिये. हमरा इज्जत का कोनो चिन्ते नहीं है आपको?

    ReplyDelete
  9. सुजाता जी से सहमत हूं। आप लिखते हैं तो बहा ले जाते हैं। लेकिन लड़के ने राड पर हाथ क्यों फिराया, कैरियर पर क्यों नहीं।

    ReplyDelete
  10. ओहो। यह कठोर स्नेहिल हाथ और भाषा का वह बगटुट बहाव।

    ReplyDelete
  11. kafee dino se chuppi laga rakhee hai?

    ReplyDelete
  12. भरोसा या तो होता या नहीं होता है। इस बात के बाद कोई मुस्कुरा दे तो भीतर भीतर नई कहानी बनने लगती

    ReplyDelete