Monday, March 30, 2009

बिनाशीर्षक..

लड़की मन के थकाव अपनी उम्र के बंधाव से छूटी एक अनलिखे गाने में खुद को गुनगुनाती, पुराने दायरों से मीलों दूर निकल किसी जादुई वृक्ष की फुनगी पर पहुंच मन के सुफ़्फ़ेद पंखों के सांवले धूल झाड़ती खुद को हैरत से तकेगी, तकती दमकेगी. मटमैलों ख़्यालों में उलझी फिर रोज़मर्रा के लोकल में लौट पुरानी इमारत की तंग सीढ़ि‍यां चढ़ती, उचटे मॉल के पिटे शेल्‍फ़ों से गुज़रती, कंप्‍यूटर कीबोर्ड के कटावों, देर रात आईने की छांहों- खुली आंखों, अवचेतन हर घड़ी उस पुरुष की राह तकेगी जो उसकी आत्‍मा का दलिद्दर हर लेगा, उचटे जीवन, पिचकी पिचकारी सी देह, खालीपन के गहरे सभी खोहों में नये अर्थ भर देगा! मैं मोहब्बत का एक अबूझ झोला उम्र व अकेलेपनों के कंटीले कांधे टांगे, कमज़ोर प‍सलियों में खराब खानों की झांस और तंगहाली में जिये अनगिन सिगरेटों की खांस भरे सरपट दिशाहीन दौड़ता बार-बार गिरता उठूंगा. अपनी फटी आत्‍मा के कसैले जमाव, बेमतलब ख़बरों के जगर-मगर नक़्शों के बीच दुनिया के पहचाने-अपहचाने फैलाव में वह किताब खोजा फिरूंगा जो मुझे मेरे अंधेरों से पार लेगा. मेरे दलदल के नीचे, गहरे तल, हलहल के नीचे चमकते पारों का संसार देगा, तीन सौ वर्ष पुरानी किसी समुराइ भारी तलवार के सनसनाते वार में मेरे सब आलसबंधों को बार लेगा? नशीली आंख पर घिसी चिरकुटई की चम्‍मड़ चादर होगी, लप्‍पड़ों पीटता उसे भूलता होऊंगा, लरजता कि कांख में दबी हदर-हदर उमंगगागर होगी?

(ऊपर की पेंटिंग परमजीत सिंह से साभार)

Sunday, March 29, 2009

संतन जिन पंथन गये..

“जंगली घड़ि‍याल के से फैले चील के भरे, भारी पंख हों जिनकी तेज़ धमक में उड़ा जाता हो मेरे दु:स्‍वप्‍नों का वह काला घोड़ा शानदार- कला की बला की सभी परिकल्‍पनाओं की गोली बिना अदब, बेमतलब बना मुंह में निगलकर बिना डकारे मेरे कान फुसफुसाता- बेबात थकाना मत, गुरु, संतनवाले पथ हमें न भटकाना!” ख़याली डायरी में काले घोड़े की उड़ान दर्ज़ कर मन की रेल की खिड़कियों से जंगलों पर तरबूज के फांक-से दौड़ते चांद को मैं तकता रहूंगा. सोचता संत किन-किन पंथों गये होंगे? आगे वे राह बनियों के काम आये होंगे? व्‍यवसाय रणनीति की गुप्‍त बैठकों में उनको उन्‍होंने गुना होगा, आनेवाली विधियों में बुना होगा?

अपने वक़्तों के घाघ, नाक तक गंध में डूबे अपराध उन रास्‍तों गये होंगे? कितनी कल्‍पनाशीलता अपनायी होगी, कल्‍पना की संतीय ऊंचाइयों का अपराध ने थाह पाया होगा? कि बहुत दुर्दांत और वॉयलेंस का मेला प्‍लांट करके भी हॉलीवुडीय एक चिरकुट गांव भर बसाया होगा? कान में फुसफुसाया नहीं होगा, संतों ने रास्‍ता दिखाया नहीं होगा?

संतत्‍व में अपनी बहुत आस्‍था नहीं फिर भी पता नहीं क्‍यों है संतों के भीतरी द्वंद्व, भटकाव के बीहड़ों से निकल फिर दमकते पंथ की सोचकर चमक-चमकता रहता हूं. मन में कहानियां सिरजने लगती हैं.. कहानियों के पीछे काला घोड़ा कान में आकर फुसफुसा जाता है- “भाई जान, संतों की रहने दो, तुम्‍हारे बस का रोग नहीं है, कहानियों की सोचो! समझ आता है कथा किन पथां गये होंगे?”

याद है वो चांदनी की रात, सफ़ि‍या बेगम का सन्‍नाटों में हैलुसनेट करके दम तोड़ना? ओह, क्‍या मंज़र, कहां से कहां से कहां से और फिर कहां होते कहां गुज़र गये? क़ुर्रतुल आपा की इस हैरतअंगेज़ दौड़ में उनकी संगत को भी कोई रहस्‍यभरा रंगीन घोड़ा भारी डैने फैलाये उनकी मेज़ तक चला आता रहा होगा? किधर से निकलकर कहां जाती हैं कहानियां? सोचते हुए लिखा कल्विनो ने ‘इफ ऑन अ विंटर्स नाइट अ ट्रैवलर’, हाथ में किताब लिये मैं पन्‍ने पलटता रहा और पता नहीं क्‍यों मानुएल पुइग और अंतोनियो ताबुक्‍की की सोचता रहा. बारहवीं (या तेरहवीं?) सदी के अरब व्‍यवसायी अब्राहम बेन यिजू और उसके भारतीय मलाबारी ग़ुलाम की कहानी के कैसे घुमावदार मोड़ थे? ‘इन एन एंटिक लैण्‍ड’ में अमिताव घोष ने इस रोमांचक कथा को दर्ज़ किया है, मगर वह बहुत बाद की बात है, उस कथा को बुनने और जानने की जो अमिताव की यात्रायें रहीं- मिस्‍त्र में गेनिज़ा के अनोखे पुरालेखागार और उसपर गोएतें का दिवानेपन से भरा उद्भट शोध- वह खुद किसी नशीले सफर से कहीं कमतर है? गोएतें की स्‍वीपिंग अकादमीय उपलब्धियों पर ज़रा अमिताव बाबू की इन आदरभरी पंक्तियों पर नज़र डालिये:
"The complete bibliography of Goitein’s writings runs into a seventy-page book, with a twenty-two page supplement. It contains a total of 666 entries in Hebrew, German, English and French. His writings were published in Europe, America, Israel, Tunisia, India and Pakistan, and they included pieces in popular magazines, a Hebrew play and, of course, innumerable books and articles. At the age of thirty Goitein had started single-handed upon the kind of project for which university departments usually appoint committees: an edition of the Ansab al-Ashraf (The Noble Lineages), a 2,500 page work by the ninth-century Arab historian, al-Baladhuri..”
ओह कहानियां, डगमग सितमग़र किधर निकलती हैं? महीन रहस्‍यभरी हवाओं पर सवार, किधर-किधर?..

Friday, March 27, 2009

दिल पुकारे, आ रे, आ रे आ रे..

मन भी गजब दुनिया है, बैठे-बिठाये खेल खेलता रहता है, स्‍वप्‍नदर्शी ने कल कविता लिखी, प्रत्‍यक्षा बहकती तैमूर तक चली गयीं. ऐसा ही है मन. रहते-रहते घर में अकेले छूट गये बच्‍चे की प्रतीति में सारे बांध टूटे का जार-जार रूदन बन जाता है, तो कभी अपरिचित निस्‍सीम अंधेरों में बेमतलब बहका-बहका हंसता चलता.. जो किताबों से प्यार करते होंगे वे जानते होंगे कि (गांठबंद बेव्‍याही चिड़चिड़ी, असमय बुढ़ा गयी औरत का बच्‍चों के प्रति रूखेपन की तरह) ऐसे दिन भी आते हैं जब हाथ में पड़ी किताब लेकर सूझता नहीं कि इनका क्‍या करें (रिश्‍ते के चुक चुकने के अनंतर कंधे पर धरे सिर से औरत को मन में किसी बहाव नहीं, सिर्फ़ थकाव की अनुभूति होती है).. दिन बीतते हैं फिर वह समय भी आता है कि हाथ किताब लगती है, और गरीब घर के बच्‍चे के हाथ आये खिलौने की तरह मन कैसा तो आनंदमगन, रसडूब होने लगता है. उम्र की थकान में कुम्‍हलाये, पीले पड़ते पन्‍नों में नाक डुबाये कुछ वैसी ही ओर-छोर की आनंदानुभूति होती है जैसे बरसों की बिछड़ी धूपखायी आशनायी को ताउम्र की मनचाही छांहदार आंचल की पनाह मिल गयी हो!

बेचारा भोला भटका-भटका मन. साइकिल, रेल, संवेदनाओं, समयों की कैसी खोयी, कहां गये, क्‍या पाये यात्रायें करता. बिल्‍ली की तरह नज़र धंसाये, संकरी दीवारों दौड़ता, गिलहरी की तरह अस्थिर, किसी चील की तरह अचानक ऊंची उड़ान पर निकल चलता. दुनिया को हतप्रभ नज़रों से तकता, किसी अनुभवदराज़ शेर की तरह आह भरता?

बचपन में कर दी थी, दूसरों ने करवायी शादी, मैं नहीं जानता इस औरत को, क्‍या करूंगा इसका की तर्ज़ पर ढेरों ऐसे दिन आते हैं कि किताबों से दूर दूर दूर, दूर चला जाता हूं, एक दो नहीं फिर कई रातें घर लौटकर नहीं आता. फिर वह वक़्त भी आता है कि पहले प्रेम के पागल उछाह की तरह पहाड़ी ढलानों पर दौड़ता आता हूं, किताब अकुलायी, एक लजायी लड़की की तरह बांह दबाये राह तकती होती है..

ओह, इस शेल्‍फ़ से उस शेल्‍फ़, इस ज़बान से उस ज़बान तक भटकनेवाले मन. इतने सारे लेखक लगता है मानो परिवार के पुराने हों. फिर इतनी सारी मन को खींचतीं जो अभी भी अजानी हों.. फिर ऐसा मौका भी आता है घण्‍टों इस शेल्‍फ़ से उस तक में टहलते मन हार जाता है, सम्‍मोहन में नहीं, डिप्रेशन में हाथ कवर की डिज़ाइन, या फ्लैप पर की चंद लाईनों में उलझी कोई किताब उठाती है, और फिर घर की खदान और मन की उठान के किन्‍हीं उठे हुए क्षणों में उससे गुज़रते हुए मन सन्‍न, बरबस धन्‍य हो जाता है कि भई, क्‍या बात है, यह तो अनजाने संगत सुहानी हुई!

पिछले दिनों इसी तरह यूं ही खंगलायी में जो इधर-उधर कुछेक किताबें उठायीं, दो ऐसी हैं जिन्‍हें पढ़ते हुए सचमुच धन्‍य हो रहा हूं. पहली माइकल कुक की सरल, छोटी सी ‘द ब्रीफ़ हिस्‍टरी ऑव ह्यूमन रेस’ है, दूसरी रॉब गिफर्ड की ‘चायना रोड’ है. रॉब रेडियो के हैं, किताब लिखने के पहले नेशनल पब्लिक रेडियो के लिए सात टुकड़ों में एक रेडियो शो किया था, अच्‍छी घुमायी है, टहलते हुए चीन में मन उलझाने की आपकी दिलचस्‍पी हो तो शो को यहां सुन सकते हैं. किताब का तो क्‍या कहें, मन सचमुच प्रसन्‍न है. एक छोटा सा टुकड़ा उद्धृत कर रहा हूं:

“The Communist Party now gives almost nothing to the people it claims to represent. The Party only takes. From each according to his ability, to each… nothing. In terms of social welfare, it is fair to say that Chinese society today is less socialist than Europe.”

मौका लगा तो इन किताबों पर आगे और कभी. फ़ि‍लहाल रॉब की संगत में रेडियो वाली चीनी टहल का ही मज़ा लें..

Thursday, March 26, 2009

स्टिल लाइफ़..

घोड़े घोड़े होंगे इशारा पाते ही दौड़ने लगेंगे, क्‍योंकि वही किया होगा उन्‍होंने उम्रभर, इशारों की राह तकते दौड़ने की थोड़ी सी ज़मीनों की पहचान करते, उनपर अपनी दुलकियों की पिटी हुई चार बाई चार और सात गुणे तीन की मापवाले कलमकारी सजा आने की सिद्धहस्‍तता को कलमबंद करते. इस पहचानी हुई ज्‍यूगराफ़ि‍या की कलामंदी से बाहर मन और दिमाग़ की सारी अलामतें घोड़ों के लिए दुनिया में कृषि के अविष्‍कार से पहले का ‘हंटर-गेदरर्स’ का पथरीला घिसा संसार होगा, माने अभी हाल अट्ठाहरवीं सदी तक का किसानी से वंचित ऑस्‍ट्रेलिया होगा. कागज़ पर सुघड़ लिखायी की उसमें कला न होगी, सारंगी की मार्मिकताओं की उसमें रुला न होगी, घोड़ा अदद घोड़ा बना होगा, अपनी ‘ये है रेशमी जुल्‍फ़ों का अंधेरा’ की ऐंठ में घना सरपट-सरपट, माने तलछट की पानियों में महज़ आयतन का घना होगा.

पहाड़ि‍यों की ढलान पर जाने कितनी मर्तबा ऊपर और दायें-बायें बदहवाशी में दौड़-दौड़कर खुद के कुत्तेपने से आश्‍वस्‍त होकर कुत्ता पैरों पर सिर धरे अपने भौंकने का मौका तकता होगा. जैतून के पेड़ हवा में सिर नवाये चुप्‍पे सांसें भरते होंगे, भेड़े बीच-बीच के अचक्के की लयकारी में हवा में गरदनों की घंटियां टुनटुनाती ज़रा, ज़रा सी घास पर खुशी टूंगती होंगी, पेड़ की छांह में फटे मोज़े और रूखे बालोंवाला अल बशीर अकॉर्डियन पर वही कुछ धुनें बजाता होगा जो उसके चाचा और गांव का बूढ़ा अभागा शराबी मंसूर जाने कितनी पीढ़ि‍यों से बजाते रहे होंगे.

इस बेमतलब, रूटिनबद्ध दोपहर के फैलाव में किसी वक़्त उन पहाड़ी मैदानों की तंग पगडंडियों से तीनेक बुरकापोश औरतों का दल गुज़रेगा. धूल और गर्द के एक लघुकाय गुबार के परे देर तक उनके बुरके दीखते होंगे, उनकी औरतायी नहीं. जैसे कोई एक अनजानी नन्‍हीं चिड़ि‍या चीख़-चीख़कर एक गाना गाती होगी, मगर उसे कोई सुनता न होगा!

Tuesday, March 24, 2009

इंतिज़ार..

तीर पर लिपटे किसी गहरे, अचूक ज़हरीले विष की तरह मैं चुनावों की ओर उड़ जाना चाहता हूं. लेकिन जानता हूं जैसे कृष्‍ण की चतुराई से ऐन वार के वक़्त अर्जुन का रथ ज़मीन में धंस गया था और कर्ण के तीर पर लिपटे अश्‍वसेन नाग की अपनी मां के वध का बदला लेने, अर्जुन को मारने की मंशा महज़ रुमानी अरमान बनकर रह गये थे, मेरे तीर भी महज़ मेरे ख़्याली आसमानों में ही भटकने को अभिशप्‍त हैं! कैमरे और माइक के आगे अपने को लोगों का नुमाइन्‍दा बतानेवाले चीख़-चीख़कर सबकुछ बदलते रहने की बातें करते दीखेंगे इसलिए कि कुछ भी बदला न जा सके, सबकुछ यथावत बना रहे. भाषा और राजतंत्र के उपयोग में आने के साथ प्राचीन सभ्‍यतायें अस्तित्‍व में आयीं, पीछे-पीछे भयानक ग़ैरबराबरी के अभिशाप आये. राजा की मौत पर संगत में रानियां, रसोइये, रेवड़, खान-पानदान सब राजा की बारात बन साथ-साथ मुर्दे के बाजू दफ़न होते. अब यह जो नयी सभ्‍यता है इसकी चुनावी प्राचीनता में हमारे ऐंठे हुए सपने हैं, हर पांच साल पर तिल-तिलकर पांच साल के लिए खुद को दफ़ना आते हैं!

- चचा हुसैन, इस तिलिस्‍म से बाहर आने का उपाय क्‍या है?, अंधेरों में आंखें जलाता, काली रौशनायी में चमकता, अपना ज़हर पोंछता मैं बुदबुदाता हूं.

चचा एक ख़्वाब से निकलकर दूसरे के बाजू बढ़ते हैं, भूली हुई बेला की महक सूंघते हैं, मेरे सवाल को अनसुना किये रहते हैं.

काग़ज़ पर सियाही की तरह कवि की पंक्तियां फैलती हैं: सड़कें/ समय में सिर्फ़ आगे को जाती हैं/ आती वे सिर्फ़ पीछे से हैं/ जहां तुम खड़े हो/ महज़ वह एक जगह है सड़क पर/ जहां एक औरत को नंगा करके पीट रहे हैं सिपाही/ इन्‍हीं सड़कों से चलकर आते रहे हैं आततायी/ इन्‍हीं पर चलकर आयेंगे एक दिन/ अपने भी जन.

मैं सन्‍न दिगंत तक फैले रेगिस्‍तान में गहरे प्‍यास-निमग्‍न चौंकता थिर बना रहता हूं, चचा की बेला नहीं होती, बहुत बड़े बच्‍चे की बहुत बड़ी भूख होती है. प्राचीन, नवीन जाने कैसी सभ्‍यताओं की कैसी कुहरीली, गहरीली संक्रांतियों की खलबल, दलबदल मंज़र होता है, बालों में रेत बसाये, मुंह में कंकड़ाये कड़ुवाये सरल राजनीतिक सवाल होते हैं, आंखों के आगे साहित्यिक बेमतलबी की भारी ढाल का खुला, नंगा कंकाल होता है. चीख़कर पूछना चाहता हूं, बुदबुदाहट में आवाज़ उड़ती है, क्‍या करेगा कवि? भावुकताओं भरे इच्‍छापूर्ति के खेत हरे लोकों में स्‍वयं को बहलाया करेगा? भाषासधे सुथरे मुंशी की तर्ज़ पर कविता के रजिस्‍टर सजाया करेगा कवि? बदलाव के घनेरे घोषणापत्रों में कभी, कब आया करेगा कवि?

चचा उरुवेला की बेलाओं को तकते रहे, मेरे सवालों को अब भी अनसुना किये रहे.

(कविवर वीरेन डंगवाल से क्षमायाचना सहित)

Saturday, March 21, 2009

जिस तरह का पागलपन..



- ये किस तरह का पागलपन है?

- क्‍या किस तरह का पागलपन है?

- यही जो तुम तब से धुंआ फूंके जा रहे हो, सिगरेट धूंके जा रहे हो? बाईस साल के लड़के नहीं कि किसी को इम्‍प्रेस करना है?

- बाईस साल के लड़के अब सिगरेट धूंककर कहां किसी को इम्‍प्रेस करने की कोशिश करते होंगे, शायद सिगरेट की बात उठते ही खांसकर, या उसे पानी में डूबोकर करते हों?

- व्‍हाटेवर, तुम्‍हें मालूम है मैं क्‍या कह रही हूं!

- दैट आई एम नॉट अ बाईस साल का लड़का?

- दैट यू डोंट नीड टू बी टोल्‍ड, मैं पूछ रही हूं ऐसी बेचैनी क्‍या है? इस तरह दिल क्‍यों जला रहे हो?

- दिल जला हुआ है, दरअसल उसे भूलने के लिए सिगरेट फूंक रहा हूं. तुम्‍हें याद नहीं ‘शोले’ में संजीव कुमार का डायलॉग था, ‘लोहा लोहे को काटता है’?

- जैसे-जैसे उमर बढ़ रही है देख रही हूं तुम कितना समझदार हुए जा रहे हो! स्‍टब ईट!

- मेरे दिल का क्‍या? लेट इट बर्न टू ऐशेज़, उसकी तक़लीफ़ नहीं?

- वन कैन डू व्‍हाट वन कैन डू, वन कांट डू व्‍हाट वन कांट डू.

- दैट्स व्‍हाट आई एम डुइंग, पुटिंग माईसेल्‍फ़ ऑन फ़ायर.

- क्‍या दिक़्क़त क्‍या है तुम्‍हारी? कभी लॉजिकल नहीं हो सकते?

- तुम्‍हारे साथ लॉजिकल? कैन आई? कैन यू? डोंट मेक मी लाफ!

- करेक्‍ट, यू कैन नॉट, फाईन, बर्न यूअरसेल्‍फ़ टू ऐशेज़, इन फैक्‍ट आई माइट एन्‍जॉय द शो!

- ...

- व्‍हॉट?

- नथिंग.

- नहीं, तुम कुछ सिग्‍नल करने की कोशिश कर रहे हो!

- नहीं, तुम सिर्फ़ कुछ वैसा समझदार दिखने की कोशिश कर रही हो जो तुम हो नहीं.

- ओह, शट् अप!

- ओके.

Wednesday, March 18, 2009

बांग्‍लादेशी क्रिकेटर को गुस्‍सा क्‍यों आता है?

अब शायद यह बात को रखने का वाजिब तरीका नहीं. गुस्‍सा का क्‍या है बांग्‍लादेशी क्रिकेटर को ही क्‍यों, किसी को भी आ सकता है. मैं ही, दिन क्‍या, रात के भी ज़्यादा वक़्त, उंगलियों की नोक और मूंछों की जोंक पर लिये रहता हूं, गुस्‍सा. बाज मर्तबा एहसास होता है गुस्‍सा तो खाक़ क्‍या होगा, मुंह पर मूंछ तक नहीं बच पायी, तो अदबदाकर और गुस्‍सा आता है. फिर एक बार शुरू हो चुकने पर देर तक आता ही रहता है. कहने का मतलब गुस्‍से से ऐसे ही आये-जाये वाले संबंध हैं. उसमें भी जाये वाले कम, आये वाले ज़्यादह हैं. बच्‍चे के कान में मंत्र फुसफुसाता भले दीखूं, होता दरअसल गुस्‍से में पिनपिनाता ही हूं, तो अलग से बांग्‍लादेशी क्रिकेटर का कसूर गिनाने का मतलब नहीं, पूछनेवाला उससे क्रिकेट की बाबत सवाल करेगा तो भले आदमी को गुस्‍सा आयेगा ही. पहली बार के बाद दूसरी किस्‍त में भी वही आयेगा. गुस्‍सा. इसी वजह से टीचरी में फंसी बुशरा अंसारी भी फिनकने लगती है. फिनकेगी ही, भई, क्यों कोई पत्‍थर मारे मेरे दिवाने को? या पेट के सुहाने को? या बिहारी वक़ील बाने को? आदमी छिनककर आपकी गर्दन पकड़ेगा ही, एक बार पकड़ते हुए फिर दुबारा भी पकड़ेगा.

मोइन अख़्तर का नाम नहीं सुना था, देखा तो बस थोड़ी देर पहले है, मगर अब देख लिया है तो लगता है देखना-सुनना कुछ अर्से बना रहेगा. आपमें किसी के पास इस अनोखे पाकिस्‍तानी प्रतिभा की कोई डीवीडी हो तो मुझ अनोखे तक भेजने की ज़रा जहमत उठायें..

चलते-चलते, अपने यहां टेलीविज़न कभी ऐसा रोचक होगा?

Tuesday, March 17, 2009

सरेबाज़ार घर के खुले अंबार में..


घर के किसी पुराने शर्मोखेज़ दाग़दार भेद की तरह
नंगे पैरों के नीचे अचानक भारी कंकड़ चला आयेगा
जाने क्‍या उचककर उठेगा हवा में, दिल से उठेगी टूटी
एक हाय-हाय! सारंगी-सुरों के सस्‍ते एक दो-कौड़ि‍या
फ्यूज़न बाज़ार में आवारा टहलता टकराऊंगा खुद से
अचानक (क्‍या करने गया होऊंगा भला? फीके पड़ते
चंद सपनों की अगोरी करने, जांत में दर रहे खुद से
फिर-फिर बरजोरी करने?) कटी हूक और फटे फोड़े-सा
चीखूंगा अबे, टूटी हैंडिल के भटके साइकिल, अब क्‍या
फांसने आये हो? चुपचाप घर बैठे खांस नहीं सकते थे?
‘संगम’ के राज कपूर की तरह सिनेमास्‍कोप में नीली
आंखों की गीली-सजीली चाबुक लहराऊंगा, सिर झुकाये
बुदबुदाऊंगा घर के बाहर टहल रहा था, पहचानी अनजानी
यही ज़रा सी ज़मीन है, कितना भी दूर जाकर जाने क्‍यों
इसी की खूंटियों में थिहरता हूं, पता नहीं कितनी रातें
हुयीं बाहर बाहर बाहर बाहर बाहर टहलता रहा, घर के
अंदर आने के ख़याल से, सच पूछो, दोस्‍त, दहल रहा था.

Monday, March 16, 2009

विलगाव का दिशाहारा जनपद..

बहुत सारी आवाज़ों के जंगल में अंतर के आर्तनाद की रजिस्‍ट्री होगी? इमली का ऊंचा पेड़ चौंककर अपनी जड़ों में हिला होगा, या नीचे को आती चि‍ड़ि‍या घबराहट में डरकर वापस पीछे को उड़ी होगी? ओह, बहुत सारी आवाज़ों के जंगल में अंतर के आर्तनाद की शिनाख़्त कहां? जबकि बहुत सारी आवाज़ों के जंगल के सिलसिले हैं चलते हैं उठते हैं उतरते हैं फिर ऊपरते हैं कभी खत्‍म कहां होते. बीहड़ उजाड़ों में ख़ामोशियां हवाओं पर उस्‍तरे चलातीं मर्सिया गा रही होती हैं, तब भी? कहां..

बदहाल कुंए के मुहाने पर एक बेहाल बचपन के सजावटी कंकाल में खड़ी लड़की, कभी रंगीन रहा होगा के अपने फ्राक का पानी निचोड़ती फुसफुसाती मुस्‍कराती है- हमारा दिल बुढ़ायी मकई का कटा खेत है, भैयाजी, हमारी हंसी सौ झूठ, कोई भटकल भूत!

बच्‍ची ने कहा है या मैं महज़ ख़्याली दलदल में खुद को निगल रहा हूं?- बेटा सोचता है. खेत हैं खेत हैं खेत हैं खेत हैं, खेत खत्‍म नहीं होते. चीख़ती ख़ामोशियां. और फिर कनात दर कनात दर कनात कायनात. आवाज़ें. मालूम नहीं हाथ में पूजा की तश्‍तरी थी या अस्‍पताल की झोली, धानी सूती साड़ी में मां आगे निकल गयी है, बेटा पीछे रह गया है. बेटा पीछे से आवाज़ देता है, फ्रेंच में. मां सुन नहीं पाती, भोजपुरी में.

पीछे छूटा रह गया बेटा पीछे छूटी रह गयी बछिया की कोमल त्‍वचा, उसके सख़्त माथे पर हाथ फिराता है, बछिया अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से हिन्‍दी कविता की बेमतलब करुणा उसके चेहरे पर आलता और पैरों में मेंहदी की तरह लिखती चलती है. बेटा कटा हुआ दिल और कटी आवाज़ में मां को पुकारता है- मां, सुन रही हो? तुमको कितना पास बुलाना चाहता था, कितनी जगह ले जाना चाहता था? सूती साड़ि‍यों के रंग के बाहर तुमने दूसरे रंग कहां देखे? इस निष्‍ठुर तरीके से सब पीछे छूट जाने का ढंग, कभी कब पहचानी, मां? फ्रेंच में बोलता बेटा हांफने लगता है, बछिया बेमतलब बेटे को ताकने.

आगे टूटी पगडंडी पर मां अपनी टूटी ज़ि‍न्‍दगी सहेजती भोजपुरी में बुदबुदाती है वह कुछ नहीं समझती. भाषा और शिक्षा के औज़ार, संस्‍कृति के विचार, और जीवन में बेटे के करीब होने के प्‍यार की लम्‍बी दूरियां वह किस भोजपुरी में कैसे पाट पायेगी?

सौ हाथ की दूरी पर ज़बान बदलते देस की अपने अंतर की संवादहीनता का क्‍या? शोर, शोर, शोर, सहज संवाद का मिठोर? कहां कहां कहां?

डेरेक वॉलकॉट वेस्‍ट इंडीज़ के कवि-रचनाकार हैं, उनकी एक कविता की चार पंक्तियां चुरा रहा हूं:
I'm just a red nigger who love the sea,
I had a sound colonial education,
I have Dutch, nigger, and English in me,
and either I'm nobody, or I'm a nation.

Sunday, March 15, 2009

घोड़ादुख..

जाने अटकी हवाओं के ऐसे उदास दिन किन उझराये घिरावों से ख़्याल मन में उठा होगा कि गुल्‍लू को छनौटे से खाजा पर चाशनी का शीरा गिराते देख मंटू बाबू बुदबुदाते हैं- इसी को पहुंचल पीर लोग गदहा का लीद लाइफ़ बोलता होगा, नहीं हो, शंकर? जिन्‍नगी साला निकल गया और हम अभी तक घोड़ा नहीं चढ़े! गुल्‍लुआ बिना उनकी ओर देखे, करीयर कड़ाह में छनौटा बोर दोबारा खाजाधन नहलाते हुए मंटू बाबू की चिंता को एक नये टैंजेंट की तरफ़ मोड़ता है (वैसे, मरोड़ता है कहना ज़्यादा वाजिब होगा), ‘हटाइये घोड़ा, हाथी पर बइठे हैं, जी? कवनो शेर खान और कुंवर बाबू का जमाना है कि आंख का आगे हाथी-घोड़ा का बरात लागा है? बीस कदम हुंआ टमटम इस्‍टैंड पर जाके पूछ लीजिये, केतना गो पोर्पराइटर होगा, ऊहो घोड़ा नहीं चाढ़ा होगा!’

शंकर माझी मेघना के बंडल से एक बीड़ी निकाल कर जलाते हैं, ‘केकरा लगे अब हाथी-घोड़ा वाला टाईम है, हो मंटू बाबू. अब का छौंड़ा लोग को देखते हैं गाय-भइंस का भी कहां सवारी करता है? देह पर चार ठो चूल नहीं उठा कि मोटर सब का तरफ डेजायरेबल देखने लगता है.’

गुल्‍लू: ‘ऊ पुरनका टैम गया, भैया. आज का मंहग का बहकी टैम में चवन्‍नी का चाह मांगियेगा त् कहीं चाह पाइयेगा, जी?’

मंटू बाबू चुप सुनते रहे लेकिन मन उनका इन सुनवाइयों में था नहीं. सुई अभी भी इस तक़लीफ़ में अटकी थी (दरअसल दो दिन पहले बिनवा सोनारिन ने पीछे से चिंउटी काटने की उनकी मासूम कोशिश पर संड़सी पटककर बरज दिया था कि वह जैतपुर की पहाड़ी है कि हदर-बदर जब देखो घोड़ा दौड़ाने चल आते हैं? तब से मंटू बाबू के मन में बात अटक गयी थी कि जैतपुर की पहड़ि‍या उठान त् है ही हरमख़ोर!), हम ही हैं कि घोड़ा खान न हुए! लानत है अइसा लाइफ पर कि एक मर्तबा घोड़ा नहीं चढ़े!

और अब चूंकी बात अन्‍हरनाल से बाहर आ चुकी थी तो इस मनोभाव से भी मुक्‍त होना मुश्किल था कि घोड़ा, हाथी दरकिनार, वह तो गाय, भैंस, गदहा क्‍या कभी बकरी तक की सवारी न किये! इसी के ऊपरी इस्‍माइलवा एगो सेर न कह गया है- जिन्‍नगी कइसी है पहेली, कभी ई हंसाये, ज़ादा कइके, भोंसड़ी के, रुलाये?

Saturday, March 14, 2009

ओह, इश्कियाते अल्‍ला हू..

तेरे इश्‍क में हमने बहुत बहलाइयां. तनहाइयां. तेरे इश्‍क में. हाय. राख से रूखी, कोयल से काली, छिनकते रहे, धमकते रहे, उड़ते रहे आसमां, कभी गहरे अंधेरों कैसी बेहाली. तेरे इश्‍क में हाय. तेरी जुस्‍तजू करते रहे, मरते रहे, तेरे इश्‍क में. तेरे रूबरू बैठे हुए मरते रहे, गहते रहे, गहना हुए, रेती ढहना हुए, सुरसधा बाजा, कभी उतारा पहना हुए, ओ तेरे इश्‍क में. हाय. बादल धुने, मौसम बुने, सदियां गिनीं, अपलक आंखों में उतरती सदियों सी लम्‍बी रातें चुनीं, हाय, तेरे इश्‍क में. रोज़ बनते रहे, तीर सा तनते रहे, लतर की सिकुड़ाइयां हुए, दरदीली अंगड़ाइयां हुए, पिघलते रहे, ओह, तेरे इश्‍क में, क़यामत हुए, क़दामत हुए, नदी सा लरज़ते रहे, तेरे पैरों बहते रहे. आंखिन किरकिरी हुए, उदास फैली दुपहरियां झुरझुरी हुए, लहकते रहे, लड़खड़ाते रहे. तेरे इश्‍क में.

एक वो दिन भी थे एक ये दिन भी है, एक वो रात थी एक ये रात है, रात ये भी गुज़र जायेगी. गुज़र जायेगी? कोई आता है पलकों पर चलता हुआ, एक आंसू सुनहरी सा जलता हुआ. ख़्वाब बुझ जायेंगे, रात रह जायेगी, रात ये भी गुज़र जायेगी? स्‍पेनिश गिटार में सितार में सारंगी से संवर जायेगी? उदासियों में नम कहानियां? रेखाओं से निकलकर कहां पहुंचायेंगी?

(रेखा भारद्वाज को सुनते हुए. रेखा और गुलज़ार महाराज से क्षमायाचना मांगते हुए)

Tuesday, March 10, 2009

फुआ फिर मत बोलना पुआ..

मैंने चुमकी से कहा इस उम्र में अब होली-वोली का क्‍या पूछती है (लगवाने की क्यों ज़रूरत है, रंग हमेशा हम देह व आत्‍मा पर लिये नहीं घूमते? फिर वैसे भी ढेरों चिरकुट चबूतरें हैं जहां इन दिनों तिलक-होली के महत्ता-मंत्र पढ़े जा रहे हैं, और मैं तो यूं भी अपने इस निष्‍ठुर शहर में पानी का मारा, त्‍वचा के सूखेपने में हारा हूं!), सो होली-सोली, बेमतलब की आंखमिचोली की न पूछ, पुआ तल सकती है, मुंह में रस-स्‍वाद का दलदल भर सकती है, तो बता?

आसपास घास का तिनका होता, और तलवार की तरह तेज़ सरपत-सा न भी होता तो चुमकी की आंखों में कटार-सा ज़रूर चमकता, और वह उसे दांतों में दबा एक बार बैठक में बैठे लोगों से नज़रें चुराकर मुझे कटी निगाहों से फांक करती एकदम लरज़ती कि कहां, किस दुनिया में बहकता हूं? किस अधिकार-भाव से अजाने परिवेश और असंभव भूगोल में उस पर पुए की मांग लेकर गिरता हूं, कोई लॉजिक है? आंखें कमज़ोर हो गयी होंगी, लेकिन आत्‍मा की हुमस कहां होती है? उसी उमग में उमगता होऊंगा कि चुमकी को बिन-बोले जवाब देता हूं लॉजिक लेकर कब तुम्‍हारे पास आये थे, हमारी फूलन-बेलन देवी? त्यौहार लेकर आये थे. उंगलियों के पोर व नाक के छोर पर प्‍यार, अपनी चाल में बहार लेकर आये थे. अपनी हूकों में मस्‍तानी फुहार लेकर आये थे, भूल गयीं, बेवक़ूफ़?

रसोई के गजर-मजर से तीन मर्तबा खाली हाथ और नेह के सूने प्‍लेट सजाये चुमकी लौटती है कि मेरे मन की शराब पीनी है तो बताओ, पुए की असंभव ज़ि‍द में आज के दिन हमको छोटा मत बनाओ! मैं चुप होकर फुसफुसाने लगता हूं अच्‍छा है इंतज़ार हुसैन, अच्‍छा है ओ क़दामतपसंद लड़की, ज़ि‍द्दी जितना होऊं आज तक कभी ज़ि‍द किया तुझसे? चिरौरी की है, नयन-निहोरा किया, हम तो पता नहीं किस अजाने स्‍टेशन पर ए एच व्‍हीलर की टाल से थिक नात् हां की पोथी उठाकर कहीं से कहीं बहक लेनेवाले, तुझको यूं सतायेंगे? देगची में बासी पुड़ि‍यों के नीचे दबे तीन पुओं की मांग में हाय, अब छोटा बनायेंगे?

चुमकी तमककर कहती है ऐसे बात मत करो कि हमारा कलेजा फट जाये. जानते हो जीवन की जांत और घराइन कनात में फंसे-उलझे हैं नहीं तो तुम भी समझते हो तुम्‍हें तीन नहीं तीन सौ पुओं में नहला देते! खुद पुआ बन जाते कि भकोसो, बकलोल प्रसाद, सुखी रहो, नहीं समझते?

कहां समझता हूं, नहीं समझता. आंगन भर अबीर है, दीवार की नोक तक लाल है, मेरे छूकर देख जाओ, चुमकिया, सूखे गाल हैं, और ओह, इतना तो वक़्त निकल गया, अभी भी पुए का मलाल है..

कहां तला जा रहा है, चुमकी? प्‍लेट में सजाकर, धुंए की नेह-बदली में नहलाकर नहीं लाओगी?..

Monday, March 9, 2009

रेल में..





कितने सारे दिन?..

इतने सारे दिन (तीन हफ़्ते. ज़्यादा नहीं होते, मगर इतने कम भी कहां होते हैं) बाहर रहने के बाद लौटा हूं तो एक तरह से यह भी लग रहा है कि कहीं गया भी था? मन में हमेशा पता नहीं क्‍यों बचपने भरा एक भोला भरोसा होता है कि जाने अनजानी-फिर-फिर पहचानी जगहों में कैसी दग्ध कर जानेवाली अनुभूतियों से सामना होगा, कुछ ऐसी पता नहीं कहां तो मुलाकातें हो जायेंगी कि मन में समझ के बीस तरह के नये झण्‍डे फड़फड़ाने लगेंगे, लौटान के पहले कैसी-कैसी तो औंटान हो जायेगी (संभवत: मुझसे छिपकर अंतर्लोक में कुछ सुसुप्‍त प्रक्रियायें चलती भी रही हों, मगर बाहर) तो यही महसूस होता है कि खाली लोटे की तरह बजते झोला टांगकर रेल में बैठे थे, वापस लौटे हैं तो झोले में कुछ नयी किताबों का बोझ भले चढ़ गया हो, लोटे के खालीपन की खड़खड़ाहट कहीं नहीं गयी है!

बनारस में खबर हुई एक मित्र भांग के पापड़ की खरीदारी में निकले हैं, मैं सन्‍नभाव सोचता रहा भांग-खवैयों की यह बड़ी अनोखी कल्‍पनाशीलता है. ऐसे ही सड़क पर बाबू अफलातून टकरा गये, स्‍कूटर के हत्‍थे पर संझा की तरकारी की खरीदारी करके गाली सुनाने के लिए किसी को खोज रहे थे, अलसाया मैं हाथ लग गया, चिरौरी की चलिये, भांग खिलवाइये, तो बेमन इधर-उधर की गालियां बजाते बोले झोले में मुरगी है और अभी रात भर मैरिनेट होगी फिर जाकर कल कहीं पकने और जीमने का जोगाड़ बनेगा, मुर्गी की टांग चाभनी है तो बोलो, भांग के दरवाज़े अभी मत खोलो! मैं पान की दूकान पर सिगरेट पूछता मन ही मन चौंकता रहा आदमी आदमी को कब समझ सकेगा, मैं तो इतनी उम्र गुज़र गयी अभी मुरगी तक को नहीं समझ सका हूं. शहर के बाहर की हरियालियां दिखती हैं, उनमें उमगने लगता हूं, जिस इकॉनमी में वे रची-बसी हैं उनकी पेंचदार सिलसिलों व परतों को समझने से रह जाता हूं. राजगीर की तनी धूप और खुले मैदानों के सनसनाते सपाट विस्‍तार में खड़खड़ाते टमटम पर डोलता एक खाली लोटे की तरह ही बजता चलता हूं कि हे बिम्बिसार, हे बाबा, बुद्ध, कुछ समझाओ सरकार, कुछ बताओ, मालिक?

सचमुच निकला था कहीं बाहर? कोई कहीं याद कर रहा था, मुझसे मन भर रहा था? कि मैं बस अपनी नज़रों में उतर रहा था? ओह, इस उमर में भी ऐसी, कैसी-कैसी तो चिरकुट तुकबंदियां! आदमी क्‍या सचमुच सबसे ज़्यादा खुद अपना बंदी है? जवाब दो, बोकारो की बैंडिट क्‍वीन?