Monday, March 9, 2009

कितने सारे दिन?..

इतने सारे दिन (तीन हफ़्ते. ज़्यादा नहीं होते, मगर इतने कम भी कहां होते हैं) बाहर रहने के बाद लौटा हूं तो एक तरह से यह भी लग रहा है कि कहीं गया भी था? मन में हमेशा पता नहीं क्‍यों बचपने भरा एक भोला भरोसा होता है कि जाने अनजानी-फिर-फिर पहचानी जगहों में कैसी दग्ध कर जानेवाली अनुभूतियों से सामना होगा, कुछ ऐसी पता नहीं कहां तो मुलाकातें हो जायेंगी कि मन में समझ के बीस तरह के नये झण्‍डे फड़फड़ाने लगेंगे, लौटान के पहले कैसी-कैसी तो औंटान हो जायेगी (संभवत: मुझसे छिपकर अंतर्लोक में कुछ सुसुप्‍त प्रक्रियायें चलती भी रही हों, मगर बाहर) तो यही महसूस होता है कि खाली लोटे की तरह बजते झोला टांगकर रेल में बैठे थे, वापस लौटे हैं तो झोले में कुछ नयी किताबों का बोझ भले चढ़ गया हो, लोटे के खालीपन की खड़खड़ाहट कहीं नहीं गयी है!

बनारस में खबर हुई एक मित्र भांग के पापड़ की खरीदारी में निकले हैं, मैं सन्‍नभाव सोचता रहा भांग-खवैयों की यह बड़ी अनोखी कल्‍पनाशीलता है. ऐसे ही सड़क पर बाबू अफलातून टकरा गये, स्‍कूटर के हत्‍थे पर संझा की तरकारी की खरीदारी करके गाली सुनाने के लिए किसी को खोज रहे थे, अलसाया मैं हाथ लग गया, चिरौरी की चलिये, भांग खिलवाइये, तो बेमन इधर-उधर की गालियां बजाते बोले झोले में मुरगी है और अभी रात भर मैरिनेट होगी फिर जाकर कल कहीं पकने और जीमने का जोगाड़ बनेगा, मुर्गी की टांग चाभनी है तो बोलो, भांग के दरवाज़े अभी मत खोलो! मैं पान की दूकान पर सिगरेट पूछता मन ही मन चौंकता रहा आदमी आदमी को कब समझ सकेगा, मैं तो इतनी उम्र गुज़र गयी अभी मुरगी तक को नहीं समझ सका हूं. शहर के बाहर की हरियालियां दिखती हैं, उनमें उमगने लगता हूं, जिस इकॉनमी में वे रची-बसी हैं उनकी पेंचदार सिलसिलों व परतों को समझने से रह जाता हूं. राजगीर की तनी धूप और खुले मैदानों के सनसनाते सपाट विस्‍तार में खड़खड़ाते टमटम पर डोलता एक खाली लोटे की तरह ही बजता चलता हूं कि हे बिम्बिसार, हे बाबा, बुद्ध, कुछ समझाओ सरकार, कुछ बताओ, मालिक?

सचमुच निकला था कहीं बाहर? कोई कहीं याद कर रहा था, मुझसे मन भर रहा था? कि मैं बस अपनी नज़रों में उतर रहा था? ओह, इस उमर में भी ऐसी, कैसी-कैसी तो चिरकुट तुकबंदियां! आदमी क्‍या सचमुच सबसे ज़्यादा खुद अपना बंदी है? जवाब दो, बोकारो की बैंडिट क्‍वीन?

2 comments:

  1. मुरगी समझ आ जाए तो एक पोस्ट लिख जनता जनार्दन को भी समझाइएगा। वैसे मुरगी व मराठी भाषा की मुलगी में क्या कोई अदृष्य तारतम्य है जो मुरगी समझ नहीं आती और उसे समझने की शायद कोशिश की जाती है। वैसे मुरगी भी शायद आपको ही क्या पूरी मनुष्य जाति को नहीं समझ पाती होगी।
    कोई बनारस या उत्तर भारत छोड़ होली मनाने मुम्बई क्यों लौट सकता है समझ नहीं आया।
    होली की शुभकामनाएँ।
    घुघूती बासूती

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  2. अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा......

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