Tuesday, March 10, 2009

फुआ फिर मत बोलना पुआ..

मैंने चुमकी से कहा इस उम्र में अब होली-वोली का क्‍या पूछती है (लगवाने की क्यों ज़रूरत है, रंग हमेशा हम देह व आत्‍मा पर लिये नहीं घूमते? फिर वैसे भी ढेरों चिरकुट चबूतरें हैं जहां इन दिनों तिलक-होली के महत्ता-मंत्र पढ़े जा रहे हैं, और मैं तो यूं भी अपने इस निष्‍ठुर शहर में पानी का मारा, त्‍वचा के सूखेपने में हारा हूं!), सो होली-सोली, बेमतलब की आंखमिचोली की न पूछ, पुआ तल सकती है, मुंह में रस-स्‍वाद का दलदल भर सकती है, तो बता?

आसपास घास का तिनका होता, और तलवार की तरह तेज़ सरपत-सा न भी होता तो चुमकी की आंखों में कटार-सा ज़रूर चमकता, और वह उसे दांतों में दबा एक बार बैठक में बैठे लोगों से नज़रें चुराकर मुझे कटी निगाहों से फांक करती एकदम लरज़ती कि कहां, किस दुनिया में बहकता हूं? किस अधिकार-भाव से अजाने परिवेश और असंभव भूगोल में उस पर पुए की मांग लेकर गिरता हूं, कोई लॉजिक है? आंखें कमज़ोर हो गयी होंगी, लेकिन आत्‍मा की हुमस कहां होती है? उसी उमग में उमगता होऊंगा कि चुमकी को बिन-बोले जवाब देता हूं लॉजिक लेकर कब तुम्‍हारे पास आये थे, हमारी फूलन-बेलन देवी? त्यौहार लेकर आये थे. उंगलियों के पोर व नाक के छोर पर प्‍यार, अपनी चाल में बहार लेकर आये थे. अपनी हूकों में मस्‍तानी फुहार लेकर आये थे, भूल गयीं, बेवक़ूफ़?

रसोई के गजर-मजर से तीन मर्तबा खाली हाथ और नेह के सूने प्‍लेट सजाये चुमकी लौटती है कि मेरे मन की शराब पीनी है तो बताओ, पुए की असंभव ज़ि‍द में आज के दिन हमको छोटा मत बनाओ! मैं चुप होकर फुसफुसाने लगता हूं अच्‍छा है इंतज़ार हुसैन, अच्‍छा है ओ क़दामतपसंद लड़की, ज़ि‍द्दी जितना होऊं आज तक कभी ज़ि‍द किया तुझसे? चिरौरी की है, नयन-निहोरा किया, हम तो पता नहीं किस अजाने स्‍टेशन पर ए एच व्‍हीलर की टाल से थिक नात् हां की पोथी उठाकर कहीं से कहीं बहक लेनेवाले, तुझको यूं सतायेंगे? देगची में बासी पुड़ि‍यों के नीचे दबे तीन पुओं की मांग में हाय, अब छोटा बनायेंगे?

चुमकी तमककर कहती है ऐसे बात मत करो कि हमारा कलेजा फट जाये. जानते हो जीवन की जांत और घराइन कनात में फंसे-उलझे हैं नहीं तो तुम भी समझते हो तुम्‍हें तीन नहीं तीन सौ पुओं में नहला देते! खुद पुआ बन जाते कि भकोसो, बकलोल प्रसाद, सुखी रहो, नहीं समझते?

कहां समझता हूं, नहीं समझता. आंगन भर अबीर है, दीवार की नोक तक लाल है, मेरे छूकर देख जाओ, चुमकिया, सूखे गाल हैं, और ओह, इतना तो वक़्त निकल गया, अभी भी पुए का मलाल है..

कहां तला जा रहा है, चुमकी? प्‍लेट में सजाकर, धुंए की नेह-बदली में नहलाकर नहीं लाओगी?..

11 comments:

  1. पूआ मुआ गोल नहीं है, बाकी सारी दुनिया पूए के ही पीछे है। पर पूआ मिलता नहीं। थिक न्यात स्वामी भी पूए की बात करते हैं पर कुछ गोल गोल अंदाज में। उनके बड़े आक़ा भी बड़े खिलाड़ी थे। घर के पूए छोड़ कर, खयाली पूए खाने बन बन घूमे। अंत में पूए के बदले सुजाता की खीर में ही धाप लिए...
    आप काहे में धापेंगे ?

    ReplyDelete
  2. वाह वाह मज़ा आगया पढकर आपके लेखन में एक लय है जिसमें कई भार मेरी भीतर एक थिरकन पैदा होती रही। आपको होली की शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  3. होली की मुबारकबाद,पिछले कई दिनों से हम एक श्रंखला चला रहे हैं "रंग बरसे आप झूमे " आज उसके समापन अवसर पर हम आपको होली मनाने अपने ब्लॉग पर आमंत्रित करते हैं .अपनी अपनी डगर । उम्मीद है आप आकर रंगों का एहसास करेंगे और अपने विचारों से हमें अवगत कराएंगे .sarparast.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. @आपके लेखन में एक लय है जिसमें कई बार मेरी भीतर एक थिरकन पैदा होती रही।

    वाह! कैसे-कैसे रसिक हैं जो आपकी पूआपंथी पढ़कर भी थिरक रहे हैं। मुझे तो यह पूआ इतना गरिष्ट हो गया है कि हिलना-डुलना मुश्किल हो गया है।

    अब तो बस इतना कह पाऊंगा जी... हैप्पी होली :)

    ReplyDelete
  5. होली की सपरिवार शुभकामनाएँ आपको जी

    ReplyDelete
  6. @सिद्धार्थजी, शंकरजी,
    होली कल है और देखिये आप आज ही हिलने-डुलने में असमर्थता ज़ाहिर कर रहे हैं? रसिकता की बहुत मत सोचिये, मैंने बहुत पहले सोचना बंद कर दिया था, नहीं तो रोज़ अदबदाकर बुदबुदाये बिना रहा नहीं जाता कि हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत अच्‍छी लिखायी कम बसाईन पदायी ज़्यादा है. कुछ का, बेमतलब ही सही, मन कहीं अटक जाये इसको इतना दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं, जैसाकि हमने पहले ही कहा- हमारा लगातार मन खटकता रहता है, मगर हमने उसे दिल पर लेना कब से छोड़ रखा है. कल के लिए संभले रहिये, अभी समूचे दिन हिलने-डुलने की ज़रूरत बनी रहेगी..

    ReplyDelete
  7. होली की शुभकामनाएँ !
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  8. फोटुइया कहाँ का लगाये हैं? एकदम्मे हमारे तरफ़ का बुझा रहा है. फ़ाइनली पुआ मिला की नहीं? हम तो हियाँ मालपुआ चाभे मिजाज से. का किये होली में? कोई नल्ली में न पटका? हाथ-गोड़ तोड़ा के न न आइयेगा?

    ReplyDelete
  9. विकास ने सही पूछा है, फाइनली पुआ मिला कि नहीं, वरना मेरी मां ने इतनी गुझियां बनाई हैं कि दो-चार दिन तो आराम से काम चल जाएगा।

    ReplyDelete
  10. का बतायें, नीलिमा बिकास बन, कहीं चिरकुटई में भांग पी लिये थे, नसा तो नहींये हुआ, पेट नल का टूटही टोंटी हो गया और देह पर बोखार चढ़ा सो अलग, ऐसे में हम चाहे भले जेतना चाहते रहे हों कि कोई देवानी-रूह नोरानी हमको पूआ-गुझिया खवा दे, मगर आसपास का अपने को हितैसी बताता लेकिन निठुरता दरसाता निर्मोही समाज था, कहंवा हमको मीठा पर हाथ लगाने दिया? किया येहीये भर कि एक कोना पटकवाकर हमको दिल जलाने दिया!

    ReplyDelete