Saturday, March 14, 2009

ओह, इश्कियाते अल्‍ला हू..

तेरे इश्‍क में हमने बहुत बहलाइयां. तनहाइयां. तेरे इश्‍क में. हाय. राख से रूखी, कोयल से काली, छिनकते रहे, धमकते रहे, उड़ते रहे आसमां, कभी गहरे अंधेरों कैसी बेहाली. तेरे इश्‍क में हाय. तेरी जुस्‍तजू करते रहे, मरते रहे, तेरे इश्‍क में. तेरे रूबरू बैठे हुए मरते रहे, गहते रहे, गहना हुए, रेती ढहना हुए, सुरसधा बाजा, कभी उतारा पहना हुए, ओ तेरे इश्‍क में. हाय. बादल धुने, मौसम बुने, सदियां गिनीं, अपलक आंखों में उतरती सदियों सी लम्‍बी रातें चुनीं, हाय, तेरे इश्‍क में. रोज़ बनते रहे, तीर सा तनते रहे, लतर की सिकुड़ाइयां हुए, दरदीली अंगड़ाइयां हुए, पिघलते रहे, ओह, तेरे इश्‍क में, क़यामत हुए, क़दामत हुए, नदी सा लरज़ते रहे, तेरे पैरों बहते रहे. आंखिन किरकिरी हुए, उदास फैली दुपहरियां झुरझुरी हुए, लहकते रहे, लड़खड़ाते रहे. तेरे इश्‍क में.

एक वो दिन भी थे एक ये दिन भी है, एक वो रात थी एक ये रात है, रात ये भी गुज़र जायेगी. गुज़र जायेगी? कोई आता है पलकों पर चलता हुआ, एक आंसू सुनहरी सा जलता हुआ. ख़्वाब बुझ जायेंगे, रात रह जायेगी, रात ये भी गुज़र जायेगी? स्‍पेनिश गिटार में सितार में सारंगी से संवर जायेगी? उदासियों में नम कहानियां? रेखाओं से निकलकर कहां पहुंचायेंगी?

(रेखा भारद्वाज को सुनते हुए. रेखा और गुलज़ार महाराज से क्षमायाचना मांगते हुए)

8 comments:

  1. dil mein ek huk uthi,sihq ishq,sunder shabd,sunder bhav.

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  2. रेखाओं से निकलकर शायद यादों के उन्ही अनसुलझे जाल में जहां से हम खुद नही निकलना चाहते...वो उलझने कभी-कभी खुद सुलझाने का मन नहीं करता..बस यूंही उस गिरह को पकड़े रहें...थामें रहें...और इंतज़ार करते रहें...लेकिन पता नहीं किसका...और क्यों...!!

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  3. ऐसे ही बैठी इठला रही थी मसक्कलियाँ खोपड़ियोँ पर

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  4. मुआ इश्क !फिर भी मीठी सी चुभन देता है.

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  5. ये इश्क़-इश्क़ है इश्क़-इश्क़ ...

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  6. उफ्फ ये कम्बख्त इश्क.. :)

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  7. इश्क की केमिस्ट्री पढ़वाने के लिए शुक्रिया साब जी

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  8. इश्क तो इश्क है साहब

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