Sunday, March 15, 2009

घोड़ादुख..

जाने अटकी हवाओं के ऐसे उदास दिन किन उझराये घिरावों से ख़्याल मन में उठा होगा कि गुल्‍लू को छनौटे से खाजा पर चाशनी का शीरा गिराते देख मंटू बाबू बुदबुदाते हैं- इसी को पहुंचल पीर लोग गदहा का लीद लाइफ़ बोलता होगा, नहीं हो, शंकर? जिन्‍नगी साला निकल गया और हम अभी तक घोड़ा नहीं चढ़े! गुल्‍लुआ बिना उनकी ओर देखे, करीयर कड़ाह में छनौटा बोर दोबारा खाजाधन नहलाते हुए मंटू बाबू की चिंता को एक नये टैंजेंट की तरफ़ मोड़ता है (वैसे, मरोड़ता है कहना ज़्यादा वाजिब होगा), ‘हटाइये घोड़ा, हाथी पर बइठे हैं, जी? कवनो शेर खान और कुंवर बाबू का जमाना है कि आंख का आगे हाथी-घोड़ा का बरात लागा है? बीस कदम हुंआ टमटम इस्‍टैंड पर जाके पूछ लीजिये, केतना गो पोर्पराइटर होगा, ऊहो घोड़ा नहीं चाढ़ा होगा!’

शंकर माझी मेघना के बंडल से एक बीड़ी निकाल कर जलाते हैं, ‘केकरा लगे अब हाथी-घोड़ा वाला टाईम है, हो मंटू बाबू. अब का छौंड़ा लोग को देखते हैं गाय-भइंस का भी कहां सवारी करता है? देह पर चार ठो चूल नहीं उठा कि मोटर सब का तरफ डेजायरेबल देखने लगता है.’

गुल्‍लू: ‘ऊ पुरनका टैम गया, भैया. आज का मंहग का बहकी टैम में चवन्‍नी का चाह मांगियेगा त् कहीं चाह पाइयेगा, जी?’

मंटू बाबू चुप सुनते रहे लेकिन मन उनका इन सुनवाइयों में था नहीं. सुई अभी भी इस तक़लीफ़ में अटकी थी (दरअसल दो दिन पहले बिनवा सोनारिन ने पीछे से चिंउटी काटने की उनकी मासूम कोशिश पर संड़सी पटककर बरज दिया था कि वह जैतपुर की पहाड़ी है कि हदर-बदर जब देखो घोड़ा दौड़ाने चल आते हैं? तब से मंटू बाबू के मन में बात अटक गयी थी कि जैतपुर की पहड़ि‍या उठान त् है ही हरमख़ोर!), हम ही हैं कि घोड़ा खान न हुए! लानत है अइसा लाइफ पर कि एक मर्तबा घोड़ा नहीं चढ़े!

और अब चूंकी बात अन्‍हरनाल से बाहर आ चुकी थी तो इस मनोभाव से भी मुक्‍त होना मुश्किल था कि घोड़ा, हाथी दरकिनार, वह तो गाय, भैंस, गदहा क्‍या कभी बकरी तक की सवारी न किये! इसी के ऊपरी इस्‍माइलवा एगो सेर न कह गया है- जिन्‍नगी कइसी है पहेली, कभी ई हंसाये, ज़ादा कइके, भोंसड़ी के, रुलाये?

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