Monday, March 16, 2009

विलगाव का दिशाहारा जनपद..

बहुत सारी आवाज़ों के जंगल में अंतर के आर्तनाद की रजिस्‍ट्री होगी? इमली का ऊंचा पेड़ चौंककर अपनी जड़ों में हिला होगा, या नीचे को आती चि‍ड़ि‍या घबराहट में डरकर वापस पीछे को उड़ी होगी? ओह, बहुत सारी आवाज़ों के जंगल में अंतर के आर्तनाद की शिनाख़्त कहां? जबकि बहुत सारी आवाज़ों के जंगल के सिलसिले हैं चलते हैं उठते हैं उतरते हैं फिर ऊपरते हैं कभी खत्‍म कहां होते. बीहड़ उजाड़ों में ख़ामोशियां हवाओं पर उस्‍तरे चलातीं मर्सिया गा रही होती हैं, तब भी? कहां..

बदहाल कुंए के मुहाने पर एक बेहाल बचपन के सजावटी कंकाल में खड़ी लड़की, कभी रंगीन रहा होगा के अपने फ्राक का पानी निचोड़ती फुसफुसाती मुस्‍कराती है- हमारा दिल बुढ़ायी मकई का कटा खेत है, भैयाजी, हमारी हंसी सौ झूठ, कोई भटकल भूत!

बच्‍ची ने कहा है या मैं महज़ ख़्याली दलदल में खुद को निगल रहा हूं?- बेटा सोचता है. खेत हैं खेत हैं खेत हैं खेत हैं, खेत खत्‍म नहीं होते. चीख़ती ख़ामोशियां. और फिर कनात दर कनात दर कनात कायनात. आवाज़ें. मालूम नहीं हाथ में पूजा की तश्‍तरी थी या अस्‍पताल की झोली, धानी सूती साड़ी में मां आगे निकल गयी है, बेटा पीछे रह गया है. बेटा पीछे से आवाज़ देता है, फ्रेंच में. मां सुन नहीं पाती, भोजपुरी में.

पीछे छूटा रह गया बेटा पीछे छूटी रह गयी बछिया की कोमल त्‍वचा, उसके सख़्त माथे पर हाथ फिराता है, बछिया अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से हिन्‍दी कविता की बेमतलब करुणा उसके चेहरे पर आलता और पैरों में मेंहदी की तरह लिखती चलती है. बेटा कटा हुआ दिल और कटी आवाज़ में मां को पुकारता है- मां, सुन रही हो? तुमको कितना पास बुलाना चाहता था, कितनी जगह ले जाना चाहता था? सूती साड़ि‍यों के रंग के बाहर तुमने दूसरे रंग कहां देखे? इस निष्‍ठुर तरीके से सब पीछे छूट जाने का ढंग, कभी कब पहचानी, मां? फ्रेंच में बोलता बेटा हांफने लगता है, बछिया बेमतलब बेटे को ताकने.

आगे टूटी पगडंडी पर मां अपनी टूटी ज़ि‍न्‍दगी सहेजती भोजपुरी में बुदबुदाती है वह कुछ नहीं समझती. भाषा और शिक्षा के औज़ार, संस्‍कृति के विचार, और जीवन में बेटे के करीब होने के प्‍यार की लम्‍बी दूरियां वह किस भोजपुरी में कैसे पाट पायेगी?

सौ हाथ की दूरी पर ज़बान बदलते देस की अपने अंतर की संवादहीनता का क्‍या? शोर, शोर, शोर, सहज संवाद का मिठोर? कहां कहां कहां?

डेरेक वॉलकॉट वेस्‍ट इंडीज़ के कवि-रचनाकार हैं, उनकी एक कविता की चार पंक्तियां चुरा रहा हूं:
I'm just a red nigger who love the sea,
I had a sound colonial education,
I have Dutch, nigger, and English in me,
and either I'm nobody, or I'm a nation.

6 comments:

  1. aap kehan kya chahte hai ye top apke shirshk se hi pata chal jata hai...
    par...


    इमली का ऊंचा पेड़ चौंककर अपनी जड़ों में हिला होगा, या नीचे को आती चि‍ड़ि‍या घबराहट में डरकर वापस पीछे को उड़ी होगी? ओह, बहुत सारी आवाज़ों के जंगल में अंतर के आर्तनाद की शिनाख़्त कहां?


    &


    सौ हाथ की दूरी पर ज़बान बदलते देस की अपने अंतर की संवादहीनता का क्‍या? शोर, शोर, शोर, सहज संवाद का मिठोर? कहां कहां कहां?


    isise aur apke chitr se apke kehna ke lehje ki taarif kare bina nahi raha jata....

    ..wakii apko tipyane main mein nahi sharmaoonga!!
    kai dino baad gadya main aisa kavitamay lehza dekhne lo mila...

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  2. dil ko halka-sa ragdti hui nikal gayi...

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  3. मार्मिक !
    घुघूती बासूती

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  4. बहुत सारी आवाज़ों के जंगल में अंतर के आर्तनाद की शिनाख़्त कहां?

    मुझे तो लगता है शिनाख्त करने वाला हीं कहीं खो गया है!!!

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  5. दिल को छूने वाली!

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  6. आगे टूटी पगडंडी पर मां अपनी टूटी ज़ि‍न्‍दगी सहेजती भोजपुरी में बुदबुदाती है वह कुछ नहीं समझती. भाषा और शिक्षा के औज़ार, संस्‍कृति के विचार, और जीवन में बेटे के करीब होने के प्‍यार की लम्‍बी दूरियां वह किस भोजपुरी में कैसे पाट पायेगी?

    प्रमोद जी ,
    बहुत मर्मस्पर्शी ,भावनात्मक शब्द चित्र /लेख जो भी कह लें .बार बार पढने का मन हो रहा है.
    हेमंत कुमार

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