Tuesday, March 17, 2009

सरेबाज़ार घर के खुले अंबार में..


घर के किसी पुराने शर्मोखेज़ दाग़दार भेद की तरह
नंगे पैरों के नीचे अचानक भारी कंकड़ चला आयेगा
जाने क्‍या उचककर उठेगा हवा में, दिल से उठेगी टूटी
एक हाय-हाय! सारंगी-सुरों के सस्‍ते एक दो-कौड़ि‍या
फ्यूज़न बाज़ार में आवारा टहलता टकराऊंगा खुद से
अचानक (क्‍या करने गया होऊंगा भला? फीके पड़ते
चंद सपनों की अगोरी करने, जांत में दर रहे खुद से
फिर-फिर बरजोरी करने?) कटी हूक और फटे फोड़े-सा
चीखूंगा अबे, टूटी हैंडिल के भटके साइकिल, अब क्‍या
फांसने आये हो? चुपचाप घर बैठे खांस नहीं सकते थे?
‘संगम’ के राज कपूर की तरह सिनेमास्‍कोप में नीली
आंखों की गीली-सजीली चाबुक लहराऊंगा, सिर झुकाये
बुदबुदाऊंगा घर के बाहर टहल रहा था, पहचानी अनजानी
यही ज़रा सी ज़मीन है, कितना भी दूर जाकर जाने क्‍यों
इसी की खूंटियों में थिहरता हूं, पता नहीं कितनी रातें
हुयीं बाहर बाहर बाहर बाहर बाहर टहलता रहा, घर के
अंदर आने के ख़याल से, सच पूछो, दोस्‍त, दहल रहा था.

3 comments:

  1. मुक्त गध का आनंद अद्भुत होता ही है.. मैं भी टहलते हुए ही आया.. वैसे फिल्म गुलाल नही देखी है तो देख लीजिए.. मलाल नही रह जाए ना देखने का... शायद आपको पसंद आएगी..

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  2. just loved the snap....a very tender one!
    like the baby telling you to look at "now"....and you looking so far far away...
    :)

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  3. kya cheez likhe ho guroo. allah kare zore-qalam aur ziada...

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