Wednesday, March 18, 2009

बांग्‍लादेशी क्रिकेटर को गुस्‍सा क्‍यों आता है?

अब शायद यह बात को रखने का वाजिब तरीका नहीं. गुस्‍सा का क्‍या है बांग्‍लादेशी क्रिकेटर को ही क्‍यों, किसी को भी आ सकता है. मैं ही, दिन क्‍या, रात के भी ज़्यादा वक़्त, उंगलियों की नोक और मूंछों की जोंक पर लिये रहता हूं, गुस्‍सा. बाज मर्तबा एहसास होता है गुस्‍सा तो खाक़ क्‍या होगा, मुंह पर मूंछ तक नहीं बच पायी, तो अदबदाकर और गुस्‍सा आता है. फिर एक बार शुरू हो चुकने पर देर तक आता ही रहता है. कहने का मतलब गुस्‍से से ऐसे ही आये-जाये वाले संबंध हैं. उसमें भी जाये वाले कम, आये वाले ज़्यादह हैं. बच्‍चे के कान में मंत्र फुसफुसाता भले दीखूं, होता दरअसल गुस्‍से में पिनपिनाता ही हूं, तो अलग से बांग्‍लादेशी क्रिकेटर का कसूर गिनाने का मतलब नहीं, पूछनेवाला उससे क्रिकेट की बाबत सवाल करेगा तो भले आदमी को गुस्‍सा आयेगा ही. पहली बार के बाद दूसरी किस्‍त में भी वही आयेगा. गुस्‍सा. इसी वजह से टीचरी में फंसी बुशरा अंसारी भी फिनकने लगती है. फिनकेगी ही, भई, क्यों कोई पत्‍थर मारे मेरे दिवाने को? या पेट के सुहाने को? या बिहारी वक़ील बाने को? आदमी छिनककर आपकी गर्दन पकड़ेगा ही, एक बार पकड़ते हुए फिर दुबारा भी पकड़ेगा.

मोइन अख़्तर का नाम नहीं सुना था, देखा तो बस थोड़ी देर पहले है, मगर अब देख लिया है तो लगता है देखना-सुनना कुछ अर्से बना रहेगा. आपमें किसी के पास इस अनोखे पाकिस्‍तानी प्रतिभा की कोई डीवीडी हो तो मुझ अनोखे तक भेजने की ज़रा जहमत उठायें..

चलते-चलते, अपने यहां टेलीविज़न कभी ऐसा रोचक होगा?

1 comment:

  1. Ora è il bimbo a guardare lontano nell’incanto della favola che il suo amico indiano gli racconta.
    calina

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