- चचा हुसैन, इस तिलिस्म से बाहर आने का उपाय क्या है?, अंधेरों में आंखें जलाता, काली रौशनायी में चमकता, अपना ज़हर पोंछता मैं बुदबुदाता हूं.
चचा एक ख़्वाब से निकलकर दूसरे के बाजू बढ़ते हैं, भूली हुई बेला की महक सूंघते हैं, मेरे सवाल को अनसुना किये रहते हैं.
काग़ज़ पर सियाही की तरह कवि की पंक्तियां फैलती हैं: सड़कें/ समय में सिर्फ़ आगे को जाती हैं/ आती वे सिर्फ़ पीछे से हैं/ जहां तुम खड़े हो/ महज़ वह एक जगह है सड़क पर/ जहां एक औरत को नंगा करके पीट रहे हैं सिपाही/ इन्हीं सड़कों से चलकर आते रहे हैं आततायी/ इन्हीं पर चलकर आयेंगे एक दिन/ अपने भी जन.
मैं सन्न दिगंत तक फैले रेगिस्तान में गहरे प्यास-निमग्न चौंकता थिर बना रहता हूं, चचा की बेला नहीं होती, बहुत बड़े बच्चे की बहुत बड़ी भूख होती है. प्राचीन, नवीन जाने कैसी सभ्यताओं की कैसी कुहरीली, गहरीली संक्रांतियों की खलबल, दलबदल मंज़र होता है, बालों में रेत बसाये, मुंह में कंकड़ाये कड़ुवाये सरल राजनीतिक सवाल होते हैं, आंखों के आगे साहित्यिक बेमतलबी की भारी ढाल का खुला, नंगा कंकाल होता है. चीख़कर पूछना चाहता हूं, बुदबुदाहट में आवाज़ उड़ती है, क्या करेगा कवि? भावुकताओं भरे इच्छापूर्ति के खेत हरे लोकों में स्वयं को बहलाया करेगा? भाषासधे सुथरे मुंशी की तर्ज़ पर कविता के रजिस्टर सजाया करेगा कवि? बदलाव के घनेरे घोषणापत्रों में कभी, कब आया करेगा कवि?
चचा उरुवेला की बेलाओं को तकते रहे, मेरे सवालों को अब भी अनसुना किये रहे.
(कविवर वीरेन डंगवाल से क्षमायाचना सहित)