Tuesday, March 24, 2009

इंतिज़ार..

तीर पर लिपटे किसी गहरे, अचूक ज़हरीले विष की तरह मैं चुनावों की ओर उड़ जाना चाहता हूं. लेकिन जानता हूं जैसे कृष्‍ण की चतुराई से ऐन वार के वक़्त अर्जुन का रथ ज़मीन में धंस गया था और कर्ण के तीर पर लिपटे अश्‍वसेन नाग की अपनी मां के वध का बदला लेने, अर्जुन को मारने की मंशा महज़ रुमानी अरमान बनकर रह गये थे, मेरे तीर भी महज़ मेरे ख़्याली आसमानों में ही भटकने को अभिशप्‍त हैं! कैमरे और माइक के आगे अपने को लोगों का नुमाइन्‍दा बतानेवाले चीख़-चीख़कर सबकुछ बदलते रहने की बातें करते दीखेंगे इसलिए कि कुछ भी बदला न जा सके, सबकुछ यथावत बना रहे. भाषा और राजतंत्र के उपयोग में आने के साथ प्राचीन सभ्‍यतायें अस्तित्‍व में आयीं, पीछे-पीछे भयानक ग़ैरबराबरी के अभिशाप आये. राजा की मौत पर संगत में रानियां, रसोइये, रेवड़, खान-पानदान सब राजा की बारात बन साथ-साथ मुर्दे के बाजू दफ़न होते. अब यह जो नयी सभ्‍यता है इसकी चुनावी प्राचीनता में हमारे ऐंठे हुए सपने हैं, हर पांच साल पर तिल-तिलकर पांच साल के लिए खुद को दफ़ना आते हैं!

- चचा हुसैन, इस तिलिस्‍म से बाहर आने का उपाय क्‍या है?, अंधेरों में आंखें जलाता, काली रौशनायी में चमकता, अपना ज़हर पोंछता मैं बुदबुदाता हूं.

चचा एक ख़्वाब से निकलकर दूसरे के बाजू बढ़ते हैं, भूली हुई बेला की महक सूंघते हैं, मेरे सवाल को अनसुना किये रहते हैं.

काग़ज़ पर सियाही की तरह कवि की पंक्तियां फैलती हैं: सड़कें/ समय में सिर्फ़ आगे को जाती हैं/ आती वे सिर्फ़ पीछे से हैं/ जहां तुम खड़े हो/ महज़ वह एक जगह है सड़क पर/ जहां एक औरत को नंगा करके पीट रहे हैं सिपाही/ इन्‍हीं सड़कों से चलकर आते रहे हैं आततायी/ इन्‍हीं पर चलकर आयेंगे एक दिन/ अपने भी जन.

मैं सन्‍न दिगंत तक फैले रेगिस्‍तान में गहरे प्‍यास-निमग्‍न चौंकता थिर बना रहता हूं, चचा की बेला नहीं होती, बहुत बड़े बच्‍चे की बहुत बड़ी भूख होती है. प्राचीन, नवीन जाने कैसी सभ्‍यताओं की कैसी कुहरीली, गहरीली संक्रांतियों की खलबल, दलबदल मंज़र होता है, बालों में रेत बसाये, मुंह में कंकड़ाये कड़ुवाये सरल राजनीतिक सवाल होते हैं, आंखों के आगे साहित्यिक बेमतलबी की भारी ढाल का खुला, नंगा कंकाल होता है. चीख़कर पूछना चाहता हूं, बुदबुदाहट में आवाज़ उड़ती है, क्‍या करेगा कवि? भावुकताओं भरे इच्‍छापूर्ति के खेत हरे लोकों में स्‍वयं को बहलाया करेगा? भाषासधे सुथरे मुंशी की तर्ज़ पर कविता के रजिस्‍टर सजाया करेगा कवि? बदलाव के घनेरे घोषणापत्रों में कभी, कब आया करेगा कवि?

चचा उरुवेला की बेलाओं को तकते रहे, मेरे सवालों को अब भी अनसुना किये रहे.

(कविवर वीरेन डंगवाल से क्षमायाचना सहित)

2 comments:

  1. अनसुना करना ही सबसे सुरक्षित तरीका है इन प्रश्नों से बचने या निपटने का।
    घुघूती बासूती

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  2. क्या करें ? कहाँ जाएँ ? कमबख्त पीछा भी नहीं छुटता, महिषासुर की तरह हर बार मर-मर के जिन्दा हो जाता है

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