Thursday, March 26, 2009

स्टिल लाइफ़..

घोड़े घोड़े होंगे इशारा पाते ही दौड़ने लगेंगे, क्‍योंकि वही किया होगा उन्‍होंने उम्रभर, इशारों की राह तकते दौड़ने की थोड़ी सी ज़मीनों की पहचान करते, उनपर अपनी दुलकियों की पिटी हुई चार बाई चार और सात गुणे तीन की मापवाले कलमकारी सजा आने की सिद्धहस्‍तता को कलमबंद करते. इस पहचानी हुई ज्‍यूगराफ़ि‍या की कलामंदी से बाहर मन और दिमाग़ की सारी अलामतें घोड़ों के लिए दुनिया में कृषि के अविष्‍कार से पहले का ‘हंटर-गेदरर्स’ का पथरीला घिसा संसार होगा, माने अभी हाल अट्ठाहरवीं सदी तक का किसानी से वंचित ऑस्‍ट्रेलिया होगा. कागज़ पर सुघड़ लिखायी की उसमें कला न होगी, सारंगी की मार्मिकताओं की उसमें रुला न होगी, घोड़ा अदद घोड़ा बना होगा, अपनी ‘ये है रेशमी जुल्‍फ़ों का अंधेरा’ की ऐंठ में घना सरपट-सरपट, माने तलछट की पानियों में महज़ आयतन का घना होगा.

पहाड़ि‍यों की ढलान पर जाने कितनी मर्तबा ऊपर और दायें-बायें बदहवाशी में दौड़-दौड़कर खुद के कुत्तेपने से आश्‍वस्‍त होकर कुत्ता पैरों पर सिर धरे अपने भौंकने का मौका तकता होगा. जैतून के पेड़ हवा में सिर नवाये चुप्‍पे सांसें भरते होंगे, भेड़े बीच-बीच के अचक्के की लयकारी में हवा में गरदनों की घंटियां टुनटुनाती ज़रा, ज़रा सी घास पर खुशी टूंगती होंगी, पेड़ की छांह में फटे मोज़े और रूखे बालोंवाला अल बशीर अकॉर्डियन पर वही कुछ धुनें बजाता होगा जो उसके चाचा और गांव का बूढ़ा अभागा शराबी मंसूर जाने कितनी पीढ़ि‍यों से बजाते रहे होंगे.

इस बेमतलब, रूटिनबद्ध दोपहर के फैलाव में किसी वक़्त उन पहाड़ी मैदानों की तंग पगडंडियों से तीनेक बुरकापोश औरतों का दल गुज़रेगा. धूल और गर्द के एक लघुकाय गुबार के परे देर तक उनके बुरके दीखते होंगे, उनकी औरतायी नहीं. जैसे कोई एक अनजानी नन्‍हीं चिड़ि‍या चीख़-चीख़कर एक गाना गाती होगी, मगर उसे कोई सुनता न होगा!

4 comments:

  1. जब भी लिखते हैं...बहुत गूढ़ लिखते हैं...कई बार मैं समझ नहीं पाती हूं...लेकिन समझने की समझदारी करती रहती हूं..यूं ही नहीं छोड़ना चाहती...इस गहरे अर्थ को...कई बार यूंही हंस-हंस के पागल हो जाती हूं...पढ़ती हूं बारंबार...हंसते भी...समझते भी...और कई बार उदास भी हो जाती हूं....

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  2. @तनुजी शर्माजी जोशीजी,
    खामख़्वाह भाव दे रही हैं. बहुत क्‍या, गूढ़ जैसा भी कुछ नहीं होता.. और होता है तो उतना ही होता है जैसे ज़ि‍न्‍दगी होती है. समझ में नहीं आता तो इसलिए कि लिखते-लिखते मैं भी समझ बनाने की कोशिश ही करता रहता हूं, सब जाने रहने की गुरुवायी नहीं.. आप आकर पढ़ जाती हैं, इसका शुक्रिया.

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  3. आपकी सोच और आपकी कलम को मेरा सलाम ....बेहतरीन रचना

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  4. अल बशीर की पीढियों पुरानी धुनों की बात पर एक पुराने गाने के बोल याद आ गए - जिंदगी वही रहती है मौसम बदल जाते हैं। मौसम की बात पर एक और गाना याद आ गया - एक बरस में मौसम चार पतझड़ सावन बसंत बहार। लेकिन अभी तो चुनाव का मौसम है..जीवन का पांचवा मौसम इन वक्‍त वही है। आखिर वक्‍त की पगडंडी पर ही तो हमारी जीवन की बैलगाड़ी चलती है और गले में बंधी घंटी बजती है- रूनढुन, रूनढुन...रूनढुन, रूनढुन :)

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