Friday, March 27, 2009

दिल पुकारे, आ रे, आ रे आ रे..

मन भी गजब दुनिया है, बैठे-बिठाये खेल खेलता रहता है, स्‍वप्‍नदर्शी ने कल कविता लिखी, प्रत्‍यक्षा बहकती तैमूर तक चली गयीं. ऐसा ही है मन. रहते-रहते घर में अकेले छूट गये बच्‍चे की प्रतीति में सारे बांध टूटे का जार-जार रूदन बन जाता है, तो कभी अपरिचित निस्‍सीम अंधेरों में बेमतलब बहका-बहका हंसता चलता.. जो किताबों से प्यार करते होंगे वे जानते होंगे कि (गांठबंद बेव्‍याही चिड़चिड़ी, असमय बुढ़ा गयी औरत का बच्‍चों के प्रति रूखेपन की तरह) ऐसे दिन भी आते हैं जब हाथ में पड़ी किताब लेकर सूझता नहीं कि इनका क्‍या करें (रिश्‍ते के चुक चुकने के अनंतर कंधे पर धरे सिर से औरत को मन में किसी बहाव नहीं, सिर्फ़ थकाव की अनुभूति होती है).. दिन बीतते हैं फिर वह समय भी आता है कि हाथ किताब लगती है, और गरीब घर के बच्‍चे के हाथ आये खिलौने की तरह मन कैसा तो आनंदमगन, रसडूब होने लगता है. उम्र की थकान में कुम्‍हलाये, पीले पड़ते पन्‍नों में नाक डुबाये कुछ वैसी ही ओर-छोर की आनंदानुभूति होती है जैसे बरसों की बिछड़ी धूपखायी आशनायी को ताउम्र की मनचाही छांहदार आंचल की पनाह मिल गयी हो!

बेचारा भोला भटका-भटका मन. साइकिल, रेल, संवेदनाओं, समयों की कैसी खोयी, कहां गये, क्‍या पाये यात्रायें करता. बिल्‍ली की तरह नज़र धंसाये, संकरी दीवारों दौड़ता, गिलहरी की तरह अस्थिर, किसी चील की तरह अचानक ऊंची उड़ान पर निकल चलता. दुनिया को हतप्रभ नज़रों से तकता, किसी अनुभवदराज़ शेर की तरह आह भरता?

बचपन में कर दी थी, दूसरों ने करवायी शादी, मैं नहीं जानता इस औरत को, क्‍या करूंगा इसका की तर्ज़ पर ढेरों ऐसे दिन आते हैं कि किताबों से दूर दूर दूर, दूर चला जाता हूं, एक दो नहीं फिर कई रातें घर लौटकर नहीं आता. फिर वह वक़्त भी आता है कि पहले प्रेम के पागल उछाह की तरह पहाड़ी ढलानों पर दौड़ता आता हूं, किताब अकुलायी, एक लजायी लड़की की तरह बांह दबाये राह तकती होती है..

ओह, इस शेल्‍फ़ से उस शेल्‍फ़, इस ज़बान से उस ज़बान तक भटकनेवाले मन. इतने सारे लेखक लगता है मानो परिवार के पुराने हों. फिर इतनी सारी मन को खींचतीं जो अभी भी अजानी हों.. फिर ऐसा मौका भी आता है घण्‍टों इस शेल्‍फ़ से उस तक में टहलते मन हार जाता है, सम्‍मोहन में नहीं, डिप्रेशन में हाथ कवर की डिज़ाइन, या फ्लैप पर की चंद लाईनों में उलझी कोई किताब उठाती है, और फिर घर की खदान और मन की उठान के किन्‍हीं उठे हुए क्षणों में उससे गुज़रते हुए मन सन्‍न, बरबस धन्‍य हो जाता है कि भई, क्‍या बात है, यह तो अनजाने संगत सुहानी हुई!

पिछले दिनों इसी तरह यूं ही खंगलायी में जो इधर-उधर कुछेक किताबें उठायीं, दो ऐसी हैं जिन्‍हें पढ़ते हुए सचमुच धन्‍य हो रहा हूं. पहली माइकल कुक की सरल, छोटी सी ‘द ब्रीफ़ हिस्‍टरी ऑव ह्यूमन रेस’ है, दूसरी रॉब गिफर्ड की ‘चायना रोड’ है. रॉब रेडियो के हैं, किताब लिखने के पहले नेशनल पब्लिक रेडियो के लिए सात टुकड़ों में एक रेडियो शो किया था, अच्‍छी घुमायी है, टहलते हुए चीन में मन उलझाने की आपकी दिलचस्‍पी हो तो शो को यहां सुन सकते हैं. किताब का तो क्‍या कहें, मन सचमुच प्रसन्‍न है. एक छोटा सा टुकड़ा उद्धृत कर रहा हूं:

“The Communist Party now gives almost nothing to the people it claims to represent. The Party only takes. From each according to his ability, to each… nothing. In terms of social welfare, it is fair to say that Chinese society today is less socialist than Europe.”

मौका लगा तो इन किताबों पर आगे और कभी. फ़ि‍लहाल रॉब की संगत में रेडियो वाली चीनी टहल का ही मज़ा लें..

4 comments:

  1. रिश्‍ते के चुक चुकने के अनंतर कंधे पर धरे सिर से औरत को मन में किसी बहाव नहीं, सिर्फ़ थकाव की अनुभूति होती है....ऐसा आपने कैसे जाना....बिना औरत हुए..??

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  2. review se lagta hai, cook ki kitab asadharan hogi.

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  3. प्रमोद जी ,
    किताबों के प्रति रुझान ,और शब्दों का कोलाज मुझे बराबर आपके ब्लॉग की तरफ खींचता है ..और मुझे यहाँ आकर कुछ न कुछ मिलता जरूर है ..
    हेमंत कुमार

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  4. If possible you can add two kore in your list

    1. Neither East NOR WEST
    2. A Thousand Sighs, A thousand Revolts


    both by Chistiane Bird

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