Sunday, March 29, 2009

संतन जिन पंथन गये..

“जंगली घड़ि‍याल के से फैले चील के भरे, भारी पंख हों जिनकी तेज़ धमक में उड़ा जाता हो मेरे दु:स्‍वप्‍नों का वह काला घोड़ा शानदार- कला की बला की सभी परिकल्‍पनाओं की गोली बिना अदब, बेमतलब बना मुंह में निगलकर बिना डकारे मेरे कान फुसफुसाता- बेबात थकाना मत, गुरु, संतनवाले पथ हमें न भटकाना!” ख़याली डायरी में काले घोड़े की उड़ान दर्ज़ कर मन की रेल की खिड़कियों से जंगलों पर तरबूज के फांक-से दौड़ते चांद को मैं तकता रहूंगा. सोचता संत किन-किन पंथों गये होंगे? आगे वे राह बनियों के काम आये होंगे? व्‍यवसाय रणनीति की गुप्‍त बैठकों में उनको उन्‍होंने गुना होगा, आनेवाली विधियों में बुना होगा?

अपने वक़्तों के घाघ, नाक तक गंध में डूबे अपराध उन रास्‍तों गये होंगे? कितनी कल्‍पनाशीलता अपनायी होगी, कल्‍पना की संतीय ऊंचाइयों का अपराध ने थाह पाया होगा? कि बहुत दुर्दांत और वॉयलेंस का मेला प्‍लांट करके भी हॉलीवुडीय एक चिरकुट गांव भर बसाया होगा? कान में फुसफुसाया नहीं होगा, संतों ने रास्‍ता दिखाया नहीं होगा?

संतत्‍व में अपनी बहुत आस्‍था नहीं फिर भी पता नहीं क्‍यों है संतों के भीतरी द्वंद्व, भटकाव के बीहड़ों से निकल फिर दमकते पंथ की सोचकर चमक-चमकता रहता हूं. मन में कहानियां सिरजने लगती हैं.. कहानियों के पीछे काला घोड़ा कान में आकर फुसफुसा जाता है- “भाई जान, संतों की रहने दो, तुम्‍हारे बस का रोग नहीं है, कहानियों की सोचो! समझ आता है कथा किन पथां गये होंगे?”

याद है वो चांदनी की रात, सफ़ि‍या बेगम का सन्‍नाटों में हैलुसनेट करके दम तोड़ना? ओह, क्‍या मंज़र, कहां से कहां से कहां से और फिर कहां होते कहां गुज़र गये? क़ुर्रतुल आपा की इस हैरतअंगेज़ दौड़ में उनकी संगत को भी कोई रहस्‍यभरा रंगीन घोड़ा भारी डैने फैलाये उनकी मेज़ तक चला आता रहा होगा? किधर से निकलकर कहां जाती हैं कहानियां? सोचते हुए लिखा कल्विनो ने ‘इफ ऑन अ विंटर्स नाइट अ ट्रैवलर’, हाथ में किताब लिये मैं पन्‍ने पलटता रहा और पता नहीं क्‍यों मानुएल पुइग और अंतोनियो ताबुक्‍की की सोचता रहा. बारहवीं (या तेरहवीं?) सदी के अरब व्‍यवसायी अब्राहम बेन यिजू और उसके भारतीय मलाबारी ग़ुलाम की कहानी के कैसे घुमावदार मोड़ थे? ‘इन एन एंटिक लैण्‍ड’ में अमिताव घोष ने इस रोमांचक कथा को दर्ज़ किया है, मगर वह बहुत बाद की बात है, उस कथा को बुनने और जानने की जो अमिताव की यात्रायें रहीं- मिस्‍त्र में गेनिज़ा के अनोखे पुरालेखागार और उसपर गोएतें का दिवानेपन से भरा उद्भट शोध- वह खुद किसी नशीले सफर से कहीं कमतर है? गोएतें की स्‍वीपिंग अकादमीय उपलब्धियों पर ज़रा अमिताव बाबू की इन आदरभरी पंक्तियों पर नज़र डालिये:
"The complete bibliography of Goitein’s writings runs into a seventy-page book, with a twenty-two page supplement. It contains a total of 666 entries in Hebrew, German, English and French. His writings were published in Europe, America, Israel, Tunisia, India and Pakistan, and they included pieces in popular magazines, a Hebrew play and, of course, innumerable books and articles. At the age of thirty Goitein had started single-handed upon the kind of project for which university departments usually appoint committees: an edition of the Ansab al-Ashraf (The Noble Lineages), a 2,500 page work by the ninth-century Arab historian, al-Baladhuri..”
ओह कहानियां, डगमग सितमग़र किधर निकलती हैं? महीन रहस्‍यभरी हवाओं पर सवार, किधर-किधर?..

2 comments:

  1. "संतत्‍व में अपनी बहुत आस्‍था नहीं फिर भी पता नहीं क्‍यों है संतों के भीतरी द्वंद्व, भटकाव के बीहड़ों से निकल फिर दमकते पंथ की सोचकर चमक-चमकता रहता हूं."

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  2. थोड़ा समझ पायी...थोड़ा नहीं....

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