लड़की मन के थकाव अपनी उम्र के बंधाव से छूटी एक अनलिखे गाने में खुद को गुनगुनाती, पुराने दायरों से मीलों दूर निकल किसी जादुई वृक्ष की फुनगी पर पहुंच मन के सुफ़्फ़ेद पंखों के सांवले धूल झाड़ती खुद को हैरत से तकेगी, तकती दमकेगी. मटमैलों ख़्यालों में उलझी फिर रोज़मर्रा के लोकल में लौट पुरानी इमारत की तंग सीढ़ियां चढ़ती, उचटे मॉल के पिटे शेल्फ़ों से गुज़रती, कंप्यूटर कीबोर्ड के कटावों, देर रात आईने की छांहों- खुली आंखों, अवचेतन हर घड़ी उस पुरुष की राह तकेगी जो उसकी आत्मा का दलिद्दर हर लेगा, उचटे जीवन, पिचकी पिचकारी सी देह, खालीपन के गहरे सभी खोहों में नये अर्थ भर देगा! मैं मोहब्बत का एक अबूझ झोला उम्र व अकेलेपनों के कंटीले कांधे टांगे, कमज़ोर पसलियों में खराब खानों की झांस और तंगहाली में जिये अनगिन सिगरेटों की खांस भरे सरपट दिशाहीन दौड़ता बार-बार गिरता उठूंगा. अपनी फटी आत्मा के कसैले जमाव, बेमतलब ख़बरों के जगर-मगर नक़्शों के बीच दुनिया के पहचाने-अपहचाने फैलाव में वह किताब खोजा फिरूंगा जो मुझे मेरे अंधेरों से पार लेगा. मेरे दलदल के नीचे, गहरे तल, हलहल के नीचे चमकते पारों का संसार देगा, तीन सौ वर्ष पुरानी किसी समुराइ भारी तलवार के सनसनाते वार में मेरे सब आलसबंधों को बार लेगा? नशीली आंख पर घिसी चिरकुटई की चम्मड़ चादर होगी, लप्पड़ों पीटता उसे भूलता होऊंगा, लरजता कि कांख में दबी हदर-हदर उमंगगागर होगी?(ऊपर की पेंटिंग परमजीत सिंह से साभार)