Wednesday, April 1, 2009

किसकी जय हो? और भय, वो किसकी हो?..

आठ-दस महीने के बच्‍चे की आंख के आगे रंगीन खिलौने हिलाइये, बच्‍चे की आंखें चमकने लगेंगी. पेट के बल लेटा हो ज़मीन पर हाथ दाब उचककर बैठने की कोशिश करेगा. दांत चियारे चुटकी बजाइये, देखियेगा, बच्‍चे के चेहरे पर हंसी नाचने लगेगी. बच्‍चे का स्‍वभाव है. उसी तरह जैसे बच्‍चा आपकी आंख में या नाक में उंगली ठेले और जवाब में आप हेंहें करने लगें, वह आपका स्‍वभाव होगा. कुत्‍ते को लात लगाइये, वह केंकें करता चार कदम भागा हुआ जायेगा, फिर आपकी दिशा में पलटकर इंसानी समझ में प्रकटत: भौंकता दीखेगा, जबकि वास्‍तविकता में कुत्‍ता-ज़बान में आपके परिवार के अंतरंग सदस्‍यों से अपने अंतरंग संबंधों की गालियों की भाषा में घोषणा कर रहा होगा! ख़ैर, कुत्‍ता कुत्‍ता है, स्‍वाभाविक है कुत्‍ता-स्‍वभाव से बंधा होगा. हम सभी अपने स्‍वभावों से बंधे होते हैं. मगर ऐसा नहीं कि इस नियम के अपवाद नहीं होते, रेयर होते हैं लेकिन होते हैं. आप बहुत अभागे हों तो भी आपके जीवन में ऐसा मौका आता ही है कि आप एक बच्‍चे को कुत्‍ता, कुत्‍ते को इंसान और आदमी को पिल्‍ले की तरह बर्ताव करता देखें. आपकी किस्‍मत अच्‍छी रही, और आदमी की खराब तो आप बेचारे आदमी को बच्‍चे की तरह आचरण करता भी देख सकते हैं! इट्स ऑल मैटर ऑफ़..

इन फ़ैक्‍ट द क्रक्‍स ऑफ़ द मैटर इज़ कि आज सुबह से मैं सोच की पता नहीं क्‍यों ऐसी टेढ़ी राहों पर चल रहा हूं. जबकि सारा दिन गुज़र चुकने के अनंतर अबतक मुझे सीधी राह पर आ जाना चाहिये था, लेकिन सीधी क्‍या, मैं टेढ़े पर भी ठीक-ठीक सीधा नहीं संभल या चल पा रहा हूं! इट्स नॉट हेल्‍दी. नीदर प्राकृतिक. व्‍हॉट सॉर्ट ऑफ़ स्‍वभाव आई गॉट, नो, रियली? वेल, आई अम ऑलरेडी फ़ीलिंग लाइक सम लॉस्‍ट कुत्‍ता, जो लगातार इस दुविधा से गुज़र रहा है कि केंकें गा रहा है या भौंकाइयों में उछल रहा है!

लेकिन सचमुच, मेरे ऐसे हास्‍यास्‍पद आचरण की क्‍या सफ़ाई हो सकती है? माथे पर आम चुनाव है और समूचे देश में कौन कम चिरकुट है के प्रश्‍न पर राष्‍ट्रीय भटकाव है की आशंकाओं में मैं दहलकर घबरा गया हूं? या माथे पर लाल टोपी धरे मुन्‍ना भाई मीडिया को संबोधित कर रहे थे, या मीडिया तरुण वरुण की बेहूदगी को न जानने की इच्‍छा रखनेवाले देश को ज़बरदस्‍ती सुनवाये जा रही थी, इसलिए हलबल होता रहा हूं? कि पाकिस्‍तान में होनहार बेरोज़ग़ार बच्‍चे कितनी आसानी से अफ़ग़ानिस्‍तानी मॉडल के रास्‍ते अफ़ीम, मजहब और थोड़े से पैसों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, मुल्‍क को जवा सकते हैं, भई किसलिए?

एक सीधा साधु स्‍वभाव होता है, हिंदी प्रकाशकों का तो होता ही है, कि किताब का नाम आग का दरिया हो तो कवर को चमचमाते शोलों से भर दो, चांद चाहिये का नाम हो तो कवर पर एकदम ऊपर चांद टांक दो. इससे ज़ाहिर होता है दुनिया जितनी सीधी है वैसी ही सीधाइयों में हिंदी प्रकाशन (लुप्‍तप्राय की तर्ज़ पर) दीप्‍तप्राय है. इससे ज्यादा आप उसे दीपक दिखायें तो चांसेस हैं उस दुनिया में सचमुच आग लग जाये, और आढ़त पर बैठनेवाले प्रकाशक की कुर्सी पर जा बैठें और प्रकाशक जो है सरकारी बाबुओं के कमीशनदार एजेंट में बदल जाये? ऐसी परिघटना पारंपरिक सामाजिक व साहित्यिक स्‍वभाव के लिहाज़ से अच्‍छे लक्षण नहीं होंगे, क्‍योंकि लेखक भी फिर धर्मशाला जाकर लिखने की जगह किसी अधर्मशाला की चाकरी में अपने को निखारता होगा. अब इससे उसका निजी कुछ भला भले होता हो, साहित्‍य, इन जेनरल, समाज में कहीं कुछ कबारती न होगी.

यह सब अच्‍छे लक्षण नहीं हैं. रियली. इन सब परिघटनाओं से ऐसा नहीं होगा कि सारा समाज आगे की राह पर सीधे चलने की जगह पता नहीं किन अंधेरों में टेढ़े शीर्षासनों पर स्‍वयं को सेटिया रहा होगा? बजाजी अख़बार चला रहे होंगे, रिपोर्टर इलाकों में भटकते धूल फांकने की जगह एसी कमरों में भजन गा रहे होंगे? तेल और फ़ोन बेचनेवाले फ़ि‍ल्‍म बना रहे होंगे और जो कैमरे के पीछे खड़े होकर फ़ि‍ल्‍म बनाना चाहते हैं वो पीसी के आगे बेमतलब की लाइनें सजा रहे होंगे?

संझीयायी सांझ से अब गहन है यह अंधकारा वाला माहौल सज रहा है, और आप क्‍या, मैं खुद देख पा रहा हूं कि वकृता जा नहीं पा रही, भौंकना संभाल में नहीं आ रहा, एज़ आई सेड अर्लियर, इट्स नॉट हेल्‍दी. नॉर प्राकृतिक. आई जस्‍ट होप दैट वी ऑल डोंट स्‍टार्ट हाउलिंग इन कोरस, अबे, हम इतने गये-गुज़रे कुत्‍ते होंगे? नो, ना?

2 comments:

  1. आशाओं की डोर पर चलते हुए ही तो हम कठोर से कठोर समय में भी अपनी सांसों का चलना जारी रखे हुए हैं। लेकिन शायद यह भी सच है कि हमारा आशावाद ही हमारे पैरों में बेडि़यां भी डाले हुए है। हम जीवन भर सकारात्‍मक सोचने की कोशिश करते रहते हैं और ऐसा करने में अपनी अस्मिता को नकारते जाते हैं। हमारा स्‍व कभी स्‍वतंत्र नहीं हो पाता, हमारा पूरा जीवन किसी सोच या व्‍यवस्‍था की पराधीनता में ही व्‍यतीत हो जाता है।

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