Thursday, April 2, 2009

उंगलीमार

कल टेढ़े-टेढ़े सकल पदारथ सोचता रहा, शायद अच्‍छा नहीं सोचता रहा. कुत्‍ते, बच्‍चे, आदमी की इस फनेल से निकालकर उस बकेट में रसायन फेंटते रहना कुत्‍ते का क्‍या, आदमी का भी भला नहीं करता (फिर बच्‍चे के लिए तो वह आनंदातिरेक भला क्‍या होगा, उसके नाक और आंख में उंगली डालने के बराबर है). आढ़त पर बैठनेवाले को हिंदी प्रकाशक की कुर्सी पर बिठालना और पत्रकार से आरती उतरवाना पतित ही सही, मगर विचार करने की कैसी अगरबत्‍तीशीलता है? और अगर है भी तो उसमें मगर ही मगर हैं, शील उसका बड़ा ही संदिग्‍ध है. कहने का मतलब बुरा है. और बुरा को बुरा कहा ही जाना चाहिये. पूरे मुल्‍क की कहीं और उंगली डली हुई है और मैं आंख और नाक में अच्‍छा न सोच पाने की उंगलियां डालता रहा? जबकि वहां से निकालकर उंग‍ली कहीं और ले जाने की ज़रूरत थी? है! रात की ग़लती सुबह सुधारने की घड़ी आन खड़ी है तो देखिये, अब सूझ नहीं रहा कि इस उंगली ससुर को डालें किधर! माने चुनावी परिदृश्‍य में एकदम बाहुबलियों वाली विचारधन्‍यता वाला मामला हो गया है, नहीं? कि बाबू राजू यादव, या पप्‍पू पराक्रमी पर चुनाव न लड़ पाने की विवशता बन जाये तो मैदान में लाड़ से श्रीमती फुलवारीजी फुलकुमारीजी को उतार लावें. वोटर ससुर अरबराया रहता है ही, घबराकर फूलमंत उंगली बैलॅट बक्‍से में फंसायेगा ही!

देखिये, सुभो-सुभो लतखोरी की लवंगलता अदा, मैं फिर इधर-उधर उंगली घूमा रहा हूं, जहां नहीं ले जाना चाहिये, उसे लिये जा रहा हूं. दिक्‍कत क्‍या है? नहीं, नहीं, सच्‍चो में? और ऐसा भी नहीं है कि मैंने नशा किया है? भांग होली के दिन पी थी, मगर तब भी पेट झरने लगा था नशा कहां चढ़ा था? मेरे साथ यूं भी पुरानी बीमारी है. ओल्‍ड मॉंक की बोतल खोलके बैठो तो मैं विवेकानंद बोलने लगता हूं, और खरबूजे का पौन गिलास रस पीते ही पता नहीं कहां तो बहकने और कैसी-कैसी बकने लगता हूं. व्‍हाई? ऐसी वकृता सीखी कहां से है? उन लड़कियों से जिनके कान में फुसफुसा के कहिये कि हे प्रेयसी, पहाड़कुमारी, तुम्‍हें एक ठो प्रेमपत्र अर्पित करना चाहता हूं तो चमककर पहाड़कुमारी उबलने लगती हैं कि रे हरामख़ोर, तेरी हिम्‍मत कैसे हुई, छिछोरे, हमसे ऐसा भद्दा मज़ाक करने की? तेरा नाक नोंच लूंगी, मुंह में जलती लुकाठी डाल दूंगी एटसेट्रा-एटसेट्रा. आप ऊबकर बोलते हैं कि ठीक है, धन्‍यकुमारी, पड़ी रहो अपने पहाड़ पर, नहीं लिखेंगे प्रेमपत्र. तो हरहराकर फिर नाक और मुंह नोंचने पर उतारू होने लगती हैं कि तेरी मज़ाल कैसे हुई रे हरामी कि हमको उलझाकर अब प्रेम दर्शाने से मुंह बचा रहा है?

बड़ी दिक्‍कत है. सच्‍ची में. है क्‍यों के सारे सूत्र भारतीय दर्शन की तरह अमूर्तन में सकुचाये खड़े हैं. उंगली आंख के आगे इधर-उधर नाच रही है लेकिन तय करना मुश्किल हो रहा है कि इसे लेकर जायें किधर. पिछले तीन दिनों से मुंबई में जैसी गरमी पड़ रही है क्‍या उसीकी आंख में डाल दें? कि घबराकर अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दें? लेकिन फिर आप कहेंगे अबे, बच्‍चे की तरह बिहेव करना बंद करो. मैं कहूंगा दीवार पर दौड़ते हुए जब कुत्‍ते की तरह उदबिलाव हो रहा था तब यह लाड़-दुलार दिखाना नहीं सूझा था? इस पर जानता हूं आप अपनी उंगली हिलाने लगेंगे. बाहर निकालकर न भी हिलायें जेब में तो घुमायेंगे ही. बट दैट इज़ हाऊ इट इज़. द होल कंट्री इज़ टर्निंग इनटू सम सॉर्ट ऑर अदर ऑफ़ सम उंगलीमार!

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