Monday, April 6, 2009

टू इज़ टू मेनी..

जर्मनी का कोई छोटा शहर. छोटे शहर के दो छूटे हुए बेरोज़ग़ार. एक सूखे बांस की तरह उजड़ा-उखड़ा, दूसरा गराज के पिछाड़े जाने किस ज़माने से भूल गये पुराने मॉडल के वॉल्‍क्‍सवागन की तर्ज़ पर तानपूरे का तूंबा. बेबात की हंसते, बेबात माचिस की तीली जलाते, बेबात टॉयलेट के कटोरे के सामने जाकर खड़े हो जाते, बेबात लड़की घूरने लगते; और बेबात की सारी बातें जब चुक जातीं तो हारकर फिर बीयर पीने लगते, और फिर तबतक पीते रहते जबतक सारी बातें बेमतलब न हो जातीं और किसी से बेमतलब झगड़ा करके उसका सिर फोड़ देना या अपनी फुड़वा लेने में कोई फर्क़ न रह जाता.

गली के मोड़ पर फलों का ठेला लगानेवाले बुज़ुर्ग शेवकेत लंबी सांस लेकर बुदबुदाये- बेरोज़गारी आदमी को जहां न पहुंचा दे!

फार्मिंग टूल्‍स की दूकान के काउंटर पर बैठनेवाली मार्ता ज़ुवोलोव्‍स्‍की चिढ़कर बोली- मुफ्त की रोटी तोड़ने की लत लग जानेवाले हाथों से कभी लट्ठे नहीं कटते!

सुबह ग्यारह बजे दबे-दबे सिरदर्द के साथ उठने और फिर उन्‍हीं मुड़े-तुड़े ट्रैकसूट में पचासेक मिनट बाद तोल्‍क के बार पहुंचने के बाद अभी दोपहर तीन बजे तक बांस बीयर की सात बोतलें खाली कर चुका था, मगर अंतर की प्‍यास बुझ नहीं रही थी. तूंबा ने अचानक चौंककर तोल्‍क को इत्ति‍ला किया कि उन्‍हें बीयर पिला-पिलाकर एक दिन वह अमीर हो जायेगा. तोल्‍क ने मुर्दा आवाज़ में जवाब दिया कि आजकल रुमानिया के जिप्सियों को भी बीयर पिलाकर कोई अमीर नहीं हो सकता! काउंटर पर की खाली बोतलें हटाते हुए फिर उसने सोचकर जवाब दिया कि आजकल सिर्फ़ बैंक की नौकरियों में लगे लोग अमीर हो सकते हैं!

बार में तोल्‍क का हाथ बंटानेवाली और ऊब से घबराकर उसे बीच-बीच में अपना शरीर सौंपनेवाली जोवान्‍ना के दिमाग में जाने कहां से खुराफात सूझी कि उसने तूंबे को छेड़ते हुए सवाल किया- तू आजकल कुछ ज़्यादा ही फैल रहा है, कहीं का गड़ा ख़ज़ाना हाथ लगा है, बात क्‍या है, मेरे सनम?

तूंबे ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद लापरवाही से जवाब दिया- लास्‍ट टाईम उधारी की कार से हम शहर के बाहर सैर पर गये थे.. खेतों के किनारे एक लड़की ने मुझे दिल दे दिया था.

- ओह, जोवान्‍ना चौंकने का नाटक करती बोली- उसने तुम्‍हें दिल दे दिया इसलिए तुम मोटे होने लगे?

तूंबे ने अपने भारी देह को अपने भारी पैरों पर प्रतीकात्‍मक रूप से ज़रा इधर-उधर करते हुए अपनी खीझ ज़ाहिर की- तुम्‍हें तो कुछ समझाने की कोशिश करना ही बेकार है! लड़की ने कहा था मुझसे मिलने आयेगी. आयेगी तो स्‍वाभाविक है मेरे यहां मेहमान बनकर रहेगी, मेरा खाना खायेगी! यही वज़ह है कुछ दिनों से मैं दो लोगों का खाना खाकर खर्चे का अंदाज़ लेने की कोशिश कर रहा हूं..

जोवान्‍ना भकुवायी तूंबे का चेहरा तकती रही, तूंबे ने चिढ़कर मुंह फेर लिया- एनीवे, मैंने तय कर लिया है उसे मेरे यहां आने की ज़रूरत नहीं!

तोल्‍क ने हंसते हुए मज़ाक किया- क्‍यों? अपने गद्दे पर लड़की लेटी देखने की अब तबीयत नहीं?

तूंबा ने उदास होकर कहा- नहीं, मैंने हिसाब लगाकर देख लिया है, दो लोगों के खाने का खर्चा उठाने की मेरी हैसियत नहीं.

इतनी देर से मुंह में मक्खन डाले बांस ने इतनी देर बाद मुंह खोला- वेल, सोचने बैठो तो बात समझ आयेगी व्‍हाई देयर आर टाईम्‍स वेन टू इज़ टू मेनी!

इसके बाद बीयर की नयी खेप का ऑर्डर लेकर अंदर गयी जोवान्‍ना ने आईने में अपनी शकल देखी और पता नहीं किसे खारिज करते हुए मुंह बिचका लिया.

(ऊपर अमरीकन पेंटर एडवर्ड हॉपर की पेंटिंग, संडे, 1926)

4 comments:

  1. दिलचस्प..है सर जी....

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  2. अच्छी लेखनी....पड़कर बहुत खुशी हुई /
    .....हिन्दी मे टाइप करनेकेलिए आप कौनसी टूल यूज़ करते हे / रीसेंट्ली मे एक यूज़र फ्रेंड्ली इंडियन लॅंग्वेज टाइपिंग टूल केलिय सर्च कर रहा ता, तो मूज़े मिला " क्विलपॅड " / आप भी इसीका इस्तीमाल करते हे क्या ?

    सुना हे की "क्विलपॅड ", गूगलेस भी अच्छी टाइपिंग टूल हे ? इसमे तो 9 इंडियन भाषा और रिच टेक्स्ट एडिटर भी हे / क्या मूज़े ये बताएँगे की इन दोनो मे कौनसी हे यूज़र फ्रेंड्ली....?

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  3. कमाल की रचना है ........ क्या कहू........औकात का होना बहुत जरुरी है नही तो विचार का कोई मोल नही
    है इस दुनिया मे चाहे वह लड्का हो या लड्की.ऐसे मे इंसान बेमोल रह जाता है इसका निर्धारण उसे स्वयँ करनी होती है ......two is too many or not........

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  4. पढ़कर अच्छा महसूस किया

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